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तुम्हारा गुनाह? उफ़ क्या कहें। दिल में हसरत जगा देने को गुनाह नहीं कहती दुनिया। लेकिन उस तकलीफ़ का क्या। कि तुमने कह दिया, ‘चूम लें तुम्हें’ और हमारा ज़िद्दी पागल मन जो रटे जा रहा था, ‘ना जैबो ऊ टोली, ना सुनबो ऊ बोली’ …समझदारी वाली बात भूल कर…ख़यालों ख़्वाबों के हवाई क़िले बना रहा है।

धुएँ के कमरे…नशे का बिस्तर और गुनाहों की स्याह संतृप्त गंध में सुलगते बदन। मेरी हथेलियाँ तुम्हारी साँवली पीठ का ताप सोचती हैं और झुलस जाती हैं। कि तुम्हारे शहर को खींच कर ला पटकना चाहती हूँ अपने क़दमों में…तोड़ के फेंकना चाहती हूँ तुम्हारे सफ़ेद कुर्ते के बटन। आँख से भी नहीं, लहू वो जो होठों से टपके…जब कि दीवार से टिका कर चूमा जाए तुम्हें बेतहाशा…कि कितनी गहरी आती है साँस तुम्हारी?

चुप बैठे रहो मुझसे मिल के आने के बाद…जीभ फिराओ कटे पर और सोचो…तूफ़ान बुलाने के मंत्र को मन में पढ़ना भी ख़तरनाक होता है।

ये बदन तुम्हें बाँहों में भर के तोड़ देने वाले अरमानों के लिए भी बना है। कि रूह किसने देखी है। मैंने छू के देखा है तुम्हारे सीने में धड़कते दिल को… तुम्हारी साँसों की रेल पटरी से उतरती है तो बर्बाद किए जाती है सपनों के कितने शहर।

मगर मैं नहीं जानती कि कैसा दिखता है तुम्हारा अनावृत कांधा…कि वहाँ उभरी किसी नीली नस की डाल पर गहरे गुलाबी फूल सिल देना चाहती हूँ। मैं चख के देखना चाहती हूँ कि क्या तुम्हारा बदन भी नशे का बना है?

तुम्हारा गुनाह कुछ नहीं जानां…लेकिन ज़िंदगी में मिल लिए अगर तो तुम्हारी एक रात का क़त्ल ज़रूर मेरे हाथ से हो जाएगा। इसलिए लिए माफ़ीनामा भेज रही हूँ। इसे मेरे शहर आने का टिकट भर मत समझना।

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