Musings

कई बार सोचती हूँ तो लगता है हमारा पूरा जीवन ही एक तरह से हमारे बचपन से गाइडेड होता है। हमें बचपन में जो चीज़ें अच्छी लगती थीं, जिनसे हमारी अच्छी याद जुड़ी होती है हम उन चीज़ों के प्रति एक पॉज़िटिव बायस… एक मोह से जुड़े होते हैं।

इस घर में ट्रेन की आवाज़ आती है। एकदम पास तो नहीं, लेकिन कुछ दूर में ट्रेन की पटरी बिछी हुयी है। रात को ख़ास तौर से इंजन की सीटी साफ़ सुनायी पड़ती है। ट्रेन की आवाज़, रेल की पटरियाँ, खोमचे वाले, रेल की पटरी…इन सबके साथ अच्छी यादें जुड़ी हुयी हैं। पटना में मेरे नानी घर के ठीक सामने से सड़क थी और सड़क के छोर पर रेल की पटरी। नानाजी उन दिनों आरा में काम करते थे और रोज़ शाम को ट्रेन से घर लौटते थे। हम लोग अपने घर से ट्रेन को आते देखते थे और जानते थे अब नानाजी घर आ जाएँगे और हमारे लिए मिठाई लाएँगे। ट्रेन की आवाज़ अब भी किसी मीठे की उम्मीद होती है।

उन्हीं रेल की पटरियों पर भाई लोगों के साथ सिंगल पटरी पर बैलेन्स बना कर कितनी दूर बिना गिरे चल सकते हो का कॉम्पटिशन भी होता था। ख़ाली रेल की पटरी मिल जाए तो आज भी हमको उसपर पैर जमा जमा कर चलने में और लोगों से शर्त लगाने में ख़ूब मज़ा आता है।

हम हर गरमी छुट्टी में नानीघर जाते थे। देवघर से पटना अक्सर पाटली में जाते थे या कभी कभी तूफ़ान मेल जो हमेशा लेट ही होती थी। उन दिनों सफ़र हमेशा सुहाना ही होता था। साल की दो ट्रिप नानीघर – दशहरा और गरमी छुट्टी और हर चार साल में एक बार महीने भर का भारत भ्रमण। हम उसे एलऐपसी कहते थे। ट्रेन में जेनरल कंपार्टमेंट में भीड़ होने पर भी जगह लगभग मिल ही जाती थी। हम बच्चों का अतिशय क्यूट होना भी इसका एक कारण रहा होगा। वरना VIP तो था ही। जिसपर दोनों लोग आराम से दो दिशा में मुंडी कर के बैठ जाते थे। दो दिशा में, वरना लड़ते ही रहते सारे टाइम।

फ़ैमिली छुट्टी का एक महीना कमाल होता था। उन दिनों हम स्लीपर कम्पार्ट्मेंट में सफ़र करते थे। पापा हमको ट्रेन से दिखते सारी फ़सलों के बारे में बताते जाते थे। धान, गेहूँ, चना, मक्का, बाजरा, सूरजमुखी… जिस खेत में जो लगा हो, सब पापा को पता होता था। शादी के बाद हम जब ऐसे सवाल अक्सर कुछ और लोगों से करते हैं वो अचरज करते हैं कि हमको क्या ही मतलब है कि खेत में कौन सी फ़सल लगी है। सफ़र में हमको दो चीज़ भरपूर मात्रा में चाहिए – गप्प और भोजन। मुँह चलता रहना चाहिए। बतिया रहे हैं या खा रहे हैं। बहुत कम ऐसा होता है कि मैं चुपचाप कहीं जाना चाहूँ।

देर रात नींद खुल जाती है। कुछ समय में ट्रेन की आवाज़ से वक़्त का पता चल जाएगा। इन दिनों ट्रेन की आवाज़ आती है और हम एक मिठास महसूस करते हैं, उन सारी यात्राओं को याद करके जिन्होंने हमें कितना कुछ सिखाया, कितना प्यार लिखा हमारे हिस्से।

फिर वो एक क़िस्सों वाला जादूगर याद आता है जिसका घर ट्रेन की पटरी के किनारे हुआ करता था और जिनसे फ़ोन पर बात करते हुए हमारे बीच के क़िस्सों में शाम की ट्रेन अपनी मौजूदगी दर्ज कर देती थी।

मैं शब्दों तक लौटती हूँ और ज़रा ज़रा सुख रचती हूँ अपने जीने के लिए।

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