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’96 not a review, but the feels – जानलेवा!

हर चीज़ की एक क़ीमत होगी। ये रुपयों में हो, ज़रूरी नहीं, कभी कभी समय भी बहुत मुश्किल से मिलता है। और कुछ चीजें समय माँगती हैं। होली के दो दिन पहले, मैंने बहुत दिन बाद एक फ़िल्म देखी। वो भी पूरी एक सिटिंग में। सुबह के पाँच साढ़े पाँच बज गए सोते सोते। फ़िल्म देखना तो बहुत अच्छा लगा लेकिन अगला दिन पूरा ही लगभग बर्बाद हो गया। मैं इतनी थकी हुई थी कि कुछ और कर नहीं साक़ी। रंग ख़रीदने थे, पिचकारी। होली के लिए और भी कुछ घर का राशन वग़ैरह लाना था।

फ़िल्म का नाम है ‘96। सिम्पल सी फ़िल्म है। लेकिन ऐसे लम्हे जुड़े हैं कि एक के बाद एक सीधे दिल पर चोट लगती जी जाती है। बाद के समय में मैं जितनी मुखर रही प्रेम को लेकर, ये इमैजिन करना मुश्किल होता है कि पहली बार कोई अच्छा लगा था तो उससे कुछ भी कहना कितना मुश्किल था। फिर छोटे शहरों में किसी के प्रति कुछ महसूस करना यानी आपके बिगड़ने के दिन आ गए। चाहे कितने भी अच्छे मार्क्स आ जाएँ, डाँट तो खूब पड़ेगी ही अगर घर में बात पता चली तो। स्कूल में बाक़ी बच्चे चिढ़ाएँगे, सो अलग। पहली बार कोई अच्छा लगता है तो हम बहुत कमजोर सा महसूस करते हैं, क्यूँकि चीजें हमारे हाथ से एकदम निकल जाती हैं। उसका एक नज़र देखना, उसका राह चलते मिल जाना या कि कभी क्लास में कॉपी देते हुए ज़रा सा हाथ छू भर जाना। कितना मुश्किल होता है उससे कुछ भी कहना।


उन दिनों कहाँ सोचा था कि फ़ेस्बुक या Orkut जैसी कोई चीज होगी और हम बाद में मिलेंगे भी। तब तो ऐसा ही लगा था कि अब शायद ज़िंदगी में फिर कभी भी नहीं मिलेंगे। गर्मी की छुट्टियाँ कितनी बुरी लगती थीं। सारी छुट्टियाँ बुरी लगती थीं। लेकिन सबसे बुरा लगता था कि जो हमें इतना पसंद है, उसे हम रत्ती भर भी नहीं पसंद। उस समय का हिला हुआ कॉन्फ़िडेन्स वापस आने में कितना वक़्त लग गया।


फ़िल्म देखते हुए मुझे खूब रोना आया। लगभग पूरी फ़िल्म में ही। इस तरह किसी के लिए कुछ महसूस करना और न कह पाना। उस उम्र में कितना दुखता है, जिसपर बीती है, उसे ही मालूम होगा। तब तो ये भी नहीं समझ में आता है कि प्यार अभी कई बार और होगा। इतनी समझ होती तो फिर भी कम दुखता, उस वक्त भी। फ़िल्म देखते हुए मैं एकदम से उस चौदह पंद्रह साल की उम्र में थी और शायद इसलिए इतना रोना आया कि आयडेंटिफ़ाई कर पा रही थी किरदार से। छोटी छोटी चीजों से बुनी हुई फ़िल्म है। डिटेलिंग कमाल की है। पानी के नल के नीचे हाथ लगा कर पानी पीना, पानी पीने के बाद नल को धोना ऐसी चीजें हैं जो हम सबने की हैं, अपने 90s में।


फ़िल्म में गाने भी बहुत सुंदर हैं। बैक्ग्राउंड म्यूज़िक भी। फ़िल्म देखने के बाद तमिल थोड़ा सीखने का भी मन किया। हालाँकि तमिल या कभी कभी मलयालम देखते हुए भी, कुछ शब्द तो समझ आ ही जाते हैं क्यूँकि संस्कृत के शब्द होते हैं। जैसे कि कन्नड़ में पानी को नीर बोलते हैं। कुछ मोमेंट्स पर ऐसे शब्द भी आए, ऐसे मोमेंट्स भी आए कि लगा कि इतना सीधे असर कैसे कर सकती है कोई चीज़। किसी के गले तक न लगना। किसी का हाथ तक न पकड़ना। और फिर भी इतना प्यार करना। क्या पागलपन है। क्या बेवक़ूफ़ी है। बचपना इसी को कहते हैं।


कुछ साल पहले अपने पहले क्रश से मिली थी। एक कॉफ़ी शॉप में। यूँ उसे बैंगलोर आए हुए काफ़ी टाइम भी हो गया था, उसने एक आध बार बोला भी मिलने को। लेकिन मैंने कभी हाँ नहीं कहा। उस दिन पता नहीं क्या मूड हुआ, उसको बोले कि मिलते हैं। बोलने के दस मिनट बाद ही लगा कि बेकार बोल दिए। फिर फ़ोन करके बोले कि रहने दो, तो बोला कि अब तो हम आधे रास्ते आ गए हैं। हम उसको बोले कि मिलते हैं, उसी समय सीधे लैप्टॉप बंद किया, बॉस को बोला कुछ ज़रूरी काम है और निकल गया। हम हड़बड़ में जींस टी शर्ट पहन के नहीं चले गए। साड़ी पहने। एक सुंदर सी फूलों वाले प्रिंट की ऑफ़ वाइट साड़ी थी। जूड़ा बनाया, घर से निकलते हुए दरवाज़े पर खिले फूल दिखे, तोड़ कर बाल में बोगनविला के फूल लगा लिए।


वो सर्प्राइज़्ड था। उसने सोचा नहीं था मैं साड़ी पहनूँगी। उन दिनों मैं अक्सर साड़ी पहना करती थी। घर से बाहर जाने के लिए तो अधिकतर ही। उसे कॉफ़ी नहीं पसंद थी, लेकिन बोला तुम्हारे पसंद की पी लेते हैं। दालचीनी वाली कॉफ़ी। पी कर बोला, कॉफ़ी नहीं अच्छी लगती है, पर ये वाली लग रही है। हम काफ़ी देर बात करते रहे। उस दिन पहली बार रियलाइज हुआ कि हम अच्छे दोस्त हुआ करते थे एक टाइम, लेकिन जब से उसपर क्रश हुआ था, हमारी बातचीत तक़रीबन कभी नहीं हुई। उसके बाद सीधे उस दिन मिले और बात कर रहे थे। खूब सारी बातें। ज़िंदगी, मुश्किलें, यार-दोस्त। बहुत कुछ। लगा कि प्यार के कारण एक अच्छा दोस्त खो गया था। लेकिन मालूम तब भी था कि प्यार में होने के कारण आगे कभी दोस्ती हो भी नहीं पाएगी। दिल जो होता है कमबख़्त, कभी नॉर्मल नहीं होता है पूरा पूरा। हमेशा उसके होने पर थोड़ा सा तेज धड़कता ही है।


प्यार में होने की क़ीमत अक्सर दोस्ती होती है। हमारे यहाँ इसलिए अधिकतर लोग डरते हैं। कि एक अच्छा दोस्त खो बैठेंगे। लेकिन उसके लिए जिस तरह से हम सोचते हैं, बिना उसकी ज़िंदगी में मौजूद रहे भी, उसकी कोई क़ीमत तो नहीं होती। किसी को दुआ में हमेशा रखते हैं…


’96 ग़ज़ब फ़िल्म है। आप देखिए। शायद आपको पसंद आएगी। बाक़ी हमारा क्या है, ऐसा कुछ होता है जिसका क़िस्सा न बनता हो हमारी ज़िंदगी में। हाँ हो सके तो तमिल में देखिएगा, अंग्रेज़ी सब्टायटल्ज़ के साथ। हिंदी में डबिंग में कई सारी बारीकियाँ ग़ायब हो गयी हैं।


🙂 समय मिले तो फिर सुनाएँगे।

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जूठा

प्रेम की परिभाषा उन शब्दों से बनती हैं जो हमने जिया होता है। किताबों में पढ़ लेने से चीज़ें हमारी नहीं हो जाती हैं। बहुत कुछ क़िस्से कहानियों की बात होती है। ज़िंदगी का उससे दूर दूर तक कोई सामना नहीं होता। 

बिहार के जिस छोटे से शहर में मेरा बचपन बीता और लड़कपन की दहलीज़ देखी, वहाँ स्पर्श अलभ्य था। वर्जित। गुनाह की कैटेगरी का। बचपन शायद फ़िफ़्थ स्टैंडर्ड तक था क्यूँकि उसमें कबड्डी, बुढ़िया-कबड्डी, छुआ छुई, डेंगा-पानी, लुक्का-छुप्पी जैसे कई खेल थे जो छुए जाने के इर्द गिर्द ही थे। चोर को हमेशा एक स्पर्श ही चुराना होता था, उसके बाद वो चोर नहीं रहता। जो छू लिया जाता, वो चोर हो जाता। एक दिन अचानक से मुहल्ले के सब बच्चे पढ़ाई को सीरीयस्ली लेने लगे और शाम को खेलने जाना बंद हो गया। तब मोबाइल तो था नहीं, ना घड़ी सब कोई हाथ में पहनते थे। अँधेरा हो जाने के पहले घर आ जाना होता था बस। 

इसके बाद स्पर्श हमारे जीवन से ग़ायब हो गया। स्कूल के खेल भी पिट्टो और बोमपास्टिंग जैसे गेंद वाले हो गए, जिसमें सब एक दूसरे से भागते फिरते। कितकित में भी किसी को छूना नहीं होता था। मुझे अपनी दोस्त का हाथ पकड़ के चलना अच्छा लगता था, तब भी। लेकिन ये बच्चों वाली हरकत थी। और हम अब बड़े हो गए थे। किसी को छूना सिर्फ़ जन्मदिन पर हैपी बर्थ्डे बोलते हुए हाथ मिलाने भर रह गया था। 

प्यार ऐसे किसी समय चुप दस्तक देता है। 

’96 देखते हुए कई सारे सीन पर एकदम कलेजा चाक हो गया है। ख़ूब रोयी हूँ। आँसू से। ऐसा ही एक सीन है जिसमें वे बाइस साल बाद पहली बार मिल रहे हैं। राम बुफे से प्लेट लगा कर लाया है जानू के लिए। जानू ने खाना खाया और फिर प्लेट राम को दे कर कहती है, तुम खा लो अब। वो जेब से निकाल के पेपर नैपकिन देता है उसे और प्लेट उसके हाथ से ले लेता है। स्लो मोशन में प्लेट में चम्मच डाल कर फ़्राइड राइस उठाता है…स्लो मोशन में चम्मच मुँह में लेकर खाता है…संगीत बताता है कि ये लम्हा ख़ास है। हम जानते हैं कि ये लम्हा ख़ास है। 

इसके दो हिस्से हैं। पहला तो है जूठा का कॉन्सेप्ट – हमारे यहाँ किसी को अपनी प्लेट से खाना खाने नहीं देते या बोतल या ग्लास से पानी नहीं पीने देते। क्यूँकि वो जूठा होता है। हमें उन लोगों से घिन भी आती है जो किसी का भी जूठा खा लेते हैं। ये किसी तरह के हायजीन – साफ़ सफ़ाई से जुड़ी हुयी चीज़ होती है। जूठे हाथ से खाना परोस भी नहीं सकते, भले ही आपने कुछ सूखा जैसे कि ब्रेड खाया हो। किसी का जूठा खाना बहुत क़रीबी होने की पहचान होता है। एक ही थाली में खाना खाना सिर्फ़ परिवार के लोगों के साथ होता है या बहुत क़रीबी दोस्तों का। दाँत काटी रोटी का रिश्ता जैसे मुहावरे भी हैं। अधिकतर घरों में भाई-बहन अक्सर एक ही थाली में खाते हैं। कहीं कहीं देवरानी-जेठानी भी। 

दूसरा हिस्सा है, प्यार में किसी का जूठा खाने या पीने की इच्छा होना। इसे वही समझ सकता है जिसने कभी बिसरते स्पर्श को छू लेने की ख़ातिर कुछ ऐसा महसूस किया हो जो हर परिभाषा से बचकाना है। नल से किसी के पानी पीने के बाद नल बिना धोए उस नल से पानी पीना। अपनी पानी की बॉटल से उसे पानी पी लेने को देना। कि अधिकतर बच्चों को पानी की बोतल बिना होंठ से लगाए…यानी, ऊपर से पीना नहीं आता। (मुझे तो अभी तक नहीं आता। मैं हमेशा इसलिए अपनी बॉटल लिए चलती हूँ)। किसी की जूठी चम्मच से खाना खा लेना। और अक्सर ये सबसे ज़रा सा छुप कर, अपराध भाव के साथ करना। हमारे कई छोटे छोटे गुनाह हैं, जो इतने छोटे हैं कि किसी से कहे नहीं गए। उनकी माफ़ी नहीं माँगी गयी। चोरी से अपने क्रश की वॉटरबॉटल से एक घूँट पानी पी लेने में जो आत्मा को तृप्ति मिलती है, वो शब्दों में बयान नहीं की जा सकती। 

हम सपने में भी उसे छू लेने का ख़याल नहीं करते। उसकी छुई चीज़ों को छू लेना चाहते। उसकी नोट्बुक। उसकी क़लम। उसके कंधे से उतारा गया स्कूल बैग। उसका रूमाल हमारे कल्पना में आकाशकुसुम था। कभी उसका रूमाल चुरा लेने के सपने देखा करते थे, जानते हुए कि हम में इतनी हिम्मत है ही नहीं। स्क्रैप बुक में उसके लिखे शब्दों को पढ़ने के पहले उस पन्ने पर हथेली रख कर महसूसना, कि उसने यहाँ हाथ रखा होगा। 

मैं दिल्ली अपनी पहली इंटर्नशिप पर गयी थी। कॉलेज के फ़ाइनल ईयर में। वहाँ मेरा जो बॉस था, उसने दूसरे या तीसरे दिन खाना खाने के लिए चम्मच बढ़ा दिया। मैं कभी नहीं भूली कि प्लेट में राजमा चावल था और उसने मुझे अपनी प्लेट में साथ में खाना खाने को कहा था। शायद उसकी यही बात उसे मेरे लिए ज़िंदगी भर ख़ास बना गयी। मेरे घर में पापा, भाई और मैं एक थाली में खाते थे। मैंने बहुत कम वक़्त अकेले खाना खाया होगा। लेकिन घर के बाहर मैं किसी के साथ खाना कभी शेयर नहीं करती थी। न अपनी बॉटल से किसी को पानी पीने देती थी। अब भी नहीं देती हूँ। किसी की जूठी बॉटल से पानी नहीं पी सकती। 

किसी की ड्रिंक का एक सिप ले कर देखना। या किसी से गुज़ारिश करना कि मेरी कॉफ़ी का एक सिप ले लो। चलते हुए किसी का हाथ नहीं, उसकी शर्ट स्लीव पकड़ कर चलना। R माधवन की फ़िल्म, रहना है तेरे दिल में का सीन है जिसमें वो उस लड़की का जूठा ग्लास लेकर आता है… सारे दोस्त उसकी बहुत खिल्ली उड़ाते हैं…लेकिन जिन्होंने ऐसा कुछ जिया है, वे समझते हैं ऐसी बारीकी। ’96 फ़िल्म में जब वो राम के घर जाते हैं, राम जानू के लिए तौलिया और नया साबुन लेकर आता है। वो अपनी कल्पना में ये नहीं सोच सकता कि जानू उस साबुन से नहा सकती है जो राम इस्तेमाल कर चुका है। 

किसी किरदार को रचते हुए बहुत सारी छोटी छोटी बारीकियों पर ध्यान देने से फ़िल्म ऐसी बनती है कि देखने वाला उससे जुड़ जाता है। क्यूँकि कई सारे लम्हे हमने ठीक ठीक ऐसे ही जिए हैं। कभी न कभी। जानकी और रामचंद्रन… पूरी फ़िल्म में एक दूसरे को एक बार hug तक नहीं करते। बस, जब जानकी राम के स्टूडेंट्स को झूठ कहानी सुना रही है कि कैसे वो जानकी से मिलने आया था और वो दौड़ती हुयी आयी थी और कुछ कह नहीं पायी थी, बस उसके गले लग गयी थी। बाइक पर बैठती है तो कैसे सिमट कर बैठती है। गियर पर हाथ रखती है बस…ये कितना छोटा सा स्पर्श है। सहेजने को। जाने के पहले एयरपोर्ट पर उसकी बाँह पकड़ती है। गले लग के रोती नहीं। हथेलियों से उसकी आँखें बंद करती है बस। 

फ़िल्म हिंदी में डब हुयी है और जैसा कि अक्सर होता है, अनुवाद में कई सारी बारीकियाँ खो गयी हैं। फ़िल्म का जो सबसे सुंदर, प्यारा और दिल को छू लेने वाला गाना है…उसकी जगह एक जम्प-कट है। तमिल वाली फ़िल्म देखने के बाद अगर आप हिंदी देखेंगे तो धोखा लगेगा। इरविंग थीवै…लूप में। 

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पलाश से जल सकती हैं हथेलियाँ…वो उँगलियों पर छूटा रंग नहीं आग होती है। 

कुछ दिनों से बंदिश बैंडिट्स के गीत ‘विरह’ को लूप में सुन रही हूँ। दिन व्यस्त रहता है बेतरह। रात आती है तो इस तरह थकान होती है कि अक्सर कुछ सुनने समझने का माइंडस्पेस नहीं रहता। कई दिनों से कुछ पढ़ा-लिखा नहीं था। लेकिन बंदिश बैंडिट्स में इस गीत को गाते हुए अतुल कुलकर्णी को देखते हुए फिर से वैसा ही महसूस हुआ जैसा किसी कमाल की कविता को पढ़ते हुए या किसी कमाल की पेंटिंग को देख कर लगता है। हमारी आत्मा कला की भूखी होती है। ऐसा कुछ मिलता है तो लगता है तृप्ति हुयी। वरना हम बस जी रहे होते हैं। 

कल रात बहुत दिन बाद थोड़ी एनर्जी थी तो वॉक पर निकल गयी। साढ़े ग्यारह बज रहे थे, अधिकतर घरों में कोई लाइट भी नहीं जल रही थी। नोईज कैन्सेलेशन ऑन करने के बाद बाहर की कोई आवाज़ भीतर नहीं पहुँचती। विरह लूप में बज रहा था। मुझे कई सारे लोगों के साथ की आख़िरी मुलाक़ात याद आयी। ये वो सारे लोग थे जिनसे अलग होते हुए ऐसा नहीं लगा था कि अब जाने कब मिलेंगे, मिलेंगे भी या नहीं। ज़िंदगी बहुत अन्प्रेडिक्टबल है लेकिन अचानक से कोई सामने आ जाए, ऐसा इत्तिफ़ाक़ कम होता है। 

मेट्रो स्टेशन पर किसी को अलविदा कहते हुए अजीब महसूस होता है। काँच की खिड़की से पीछे छूटते लोग। उन्हें देख कर बहुत दूर तक हाथ नहीं हिला सकते। वे आँखों के सामने से ओझल हो जाते हैं जैसे कि फ़िल्मों में कोई नया शॉट वाइप हो कर आए। ये अजीब रहा कि जिन बहुत प्यारे लोगों से विदा कहा था वो हमेशा ट्रेन स्टेशन के पास था। किसी का दौड़ कर ऑफ़िस जाते हुए एकदम ही पलट कर देखना। हम हर महीने गिना करते थे कि दिल्ली जाने में इतना वक़्त बचा है। पुस्तक मेला ख़त्म होते ही इंतज़ार शुरू हो जाता था। पिछली बार दिल्ली गयी थी तो जाने जैसे बहुत इत्मीनान हमारे हिस्से था। मिलने में इत्मीनान और विदा कहने में भी इत्मीनान। ट्रेन स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करना किसी को विदा कहने के लिए तैय्यार कर देता है। लेकिन फिर भी जब ट्रेन छूट रही होती है और दूर तक दरवाज़े से हिलता हुआ हाथ दिखता है तो हौल उठता है सीने के बीच। हम ख़ुद को कोस भी नहीं पाते किसी को इतना प्यार करने के लिए। इस दुःख में एक अजीब सी ख़ुशी है…एक नशा है। इतना गहरा प्यार कर पाने की अभी भी हिम्मत बची हुयी है। 

कल एक प्यारे दोस्त से बात कर रही थी, वो कह रहा था कि बीस की उमर के बाद प्यार होता ही नहीं है। उसका अनुभव है। मैंने कहा कि प्यार तीस में भी होता है और चालीस में भी और हर बार वैसा ही लगता है जैसे सोलह की उमर में लगा था। प्यार को वाक़ई उम्र से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हम जिन लोगों से कभी बहुत गहरा प्यार कर लेते हैं तो उसकी छाप आत्मा से पूरे जीवन नहीं जाती। ऐसा नहीं होता है कि उनसे बात करते हुए दिल सम पर धड़क सके…वो हमेशा दुगुन में न भी हो तो ड्योढ़ा तो चलता ही है। मुझे गाते हुए सबसे मुश्किल लगता था ड्योढ़ा में गाना…दुगुन, तिगुण सब हो जाता था…शायद आधी मात्रा का बहुत झोल है। प्रेम हो कि इश्क़ सब आफ़त इसी ढाई मात्रा की है…शतरंज में भी सबसे ख़तरनाक घोड़े की चाल होती है कि उसे कोई रोक नहीं सकता। अपने हिस्से के ढाई घर चलने से…इसी तरह प्रेम भी अपना घर देख कर क़ाबिज़ हो जाता है। दिग्विजय गा रहा है तो कैमरा सब पर ठहरता है, प्रेमिका के पति पर, उसके बेटे पर, देवर पर…ससुर जो गुरु हैं, उनपर भी…लेकिन कैमरा को उस स्त्री से प्रेम है जिसके विरह में यह गीत आत्मा के तार सप्तक तक पहुँचता है। 

विरह की हल्की आँच से हथेलियाँ गर्म हो जाती हैं। पसीजी हथेली…उँगलियों से क़लम फिसलती रहती है…दुपट्टे हल्का आँसू से गीला है…उसी में उँगलियाँ बार बार पोंछ रहे हैं…चिट्ठी तो लिखनी है, न भेजें तो क्या हुआ। जिसने कभी मार्च में गर्म हुयी हथेलियों का पसीना पोंछते पोंछते चिट्ठी न लिखी हो तो क्या ख़ाक प्रेम किया।

पलाश के इस मौसम तुम्हारी कितनी याद आती है तुम जानो तो समझो कि पलाश का जंगल कैसे धधकता है। सीने में कई साल सुलगता है ऐसा विरह। कहानी, कविता, चिट्ठी…स्याही से और भड़कती है आग। सिकते हैं हम भीतर भीतर। सिसकते भी। मुट्ठी में भर लो, तो पलाश से जल सकती हैं हथेलियाँ…वो उँगलियों पर छूटा रंग नहीं आग होती है। 

तुम न ही करो ऐसा प्यार। तुम कलेजा ख़ाक कर लोगे एक बार में ही। तुम बस कच्ची कोंपल का हरा देखो। वसंत और पतझर एक साथ आए जिस दिल में उससे तो दूर ही रहो। होली आ रही। मन फगुआ रहा। कभी कभी अचानक तुम्हारे शहर पहुँच जाने का कैसा मन करता है तुम्हें क्या बताएँ। तुम ख़ुश रहो मेरी जान! तुम पर सब ख़ुशी के रंग बरसें। प्यार। 

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ड्रीमस्केप

फ़रवरी मुहब्बत का महीना होता है। आधे महीने तक लगभग हम अपने प्रेमी या पार्ट्नर के लिए गिफ़्ट, फूल, वादे जैसी चीज़ों में उलझे रहते हैं। बहुत हद तक लड़कपन का खेल है, एक उम्र के बाद ये सब  तमाशा लगने लगता है। चौदह को वैलेंटायन बाबा का नाम ले ले ये महापर्व समाप्त होता है। उसके बाद के दिन वे सारे प्रेमी याद आते हैं जो अब ज़िंदगी में नहीं हैं, जो साथ नहीं हैं। मुझे कई बार लगता है कि 15 फ़रवरी को X-डे डिक्लेयर कर देना चाहिए। कि  आप इत्मीनान से अपने किसी पुराने को  याद कर सकें। साल में एक बार, अगर आप ठीक-ठाक टर्म्ज़ पर हैं तो एक दूसरे से बात कर सकें। किसी को देखते ही लव ऐट फ़र्स्ट साइट वाले क़िस्से कम होते हैं तो अधिकतर ऐसा होता है कि जिनसे हमें प्यार हुआ हो, वो हमारे बहुत अच्छे दोस्त हुआ करते हैं। कुछ बातें जो हमने सिर्फ़ उनसे की हैं। कुछ इन्साइड जोक्स, कुछ पसंद की फ़िल्में और गाने।

आज सुबह मैंने उसे सपने में देखा। ग़ज़ब गड्डमड्ड सपना था। मैं उसके घर गयी हूँ, वहाँ उसकी बीवी है, बच्चा है। बहुत प्यारे हैं दोनों। ये कमरा वही है जहाँ वह उन दिनों रहता था जब हम साथ थे। एक कमरा, साथ में किचन और बाथरूम। एक फ़्लोर ऊपर छत। बग़ल से जाती हुयी सीढ़ियाँ। उसकी बीवी चाय बनाने गयी है। फ़र्श पर दो गद्दे हैं। वो बैठा हुआ अख़बार पढ़ रहा है। ये बिलकुल उन सुबहों जैसा है जैसी हमने साथ बितायी थीं। उन दिनों उसका दोपहर का शिफ़्ट होता था। मैं ऑफ़िस जाने के पहले उससे मिलती हुयी जाती थी। वो चाय के इंतज़ार में होता था। मैं गर्म चाय, अख़बार और उसे छोड़ कर ऑफ़िस निकल जाती थी। सपना ठीक वहीं रुका हुआ है। मैं खड़ी ही हूँ इतनी देर। वो उठा है, लगभग रूआँसा और उसने मुझे बाँहों में भर लिया है। जैसे ये हमारी आख़िरी मुलाक़ात हो। आत्मा अगर भीग सकती है, तो भीग रही है। मेरे अंदर कोई ग्लेशियर पिघल रहा है। प्रेम कभी ख़त्म नहीं होता है, सपने में तो बिल्कुल भी नहीं। मैं सोच रही हूँ, उसने क्यूँ कहा था वो मुझसे ज़िंदगी भर नहीं मिलेगा। हम छत पर चाय पी रहे हैं, चाय में अदरक डली हुयी है। वो मुझसे पूछता है, तुम चाय कबसे पीने लगी। मैं याद करने की कोशिश करती हूँ उसके हाथ कैसे थे। सपने में वही छत है, दूर पार्क में खेलते बच्चों का शोर। हम दोनों उदास हैं। कि अब जाना पड़ेगा। 

मैं ऑटो करने  के  लिए नीचे सड़क पर आयी हूँ जहाँ लाइन से ऑटो लगे हुए  हैं। IIMC जाना है, अरुणा आसफ़ अली रोड चलोगे? मैं अचरज करती हूँ कि इतने सालों बाद भी मुझे वहाँ का पता इस अच्छी तरह से याद है। जबकि वहाँ अधिकतर 615 बस से ही आते जाते रहे। अजीब ये रहा कि ऑटो मैं बैंगलोर में ले रही हूँ। पैरललि एक और सपना चल रहा था जिसमें मेरी आक्टेवीआ ख़राब हो गयी थी और सर्विस के लिए सर्विस सेंटर भेजे थे। कार मुझे हैंडओवर करने के लिए दिल्ली से कोई व्यक्ति आया हुआ है और इसलिए रुका हुआ है कि मैं कार लेने जा नहीं पा रही हूँ। सर्विस का बिल मुझे समझ नहीं आता कि कोई भी कम्पोनेंट हज़ार दो हज़ार टाइप ही है तो हद से हद दस हज़ार का बिल बनेगा ये एक लाख दस हज़ार का बिल क्या ग़लती से बन गया है। मैं उसे कहती हूँ कि देखिए वीकेंड गुज़र गया है, हफ़्ते भर तक मुझे फ़ुर्सत तो मिलेगी नहीं, मैं अगले शनिवार ही आ सकती हूँ। सर्विस सेंटर मेरे घर से तक़रीबन चार घंटे की ड्राइव है। मेरे फ़ोन की स्क्रीन टूटी हुयी है। मौसम बहुत ठंढा है। मैंने एक लम्बा फ़र का ओवेरकोट पहना हुआ है जिससे हल्की गरमी महसूस हो रही है। उसने जो बाँहों में भरा था, वो गर्माहट भीतर बाहर है। 

नींद खुली है तो ठंढ लग रही है। जबकि मुझे कम्बल फेंकने की आदत कभी नहीं रही। कल बैंगलोर में बारिश हुयी है तो मौसम ठंढा है। वो इसी शहर में है। मैं क़िस्मत पर भरोसा करती हूँ कि हमें एक दिन मिला देगी। क़िस्मत शायद मुझपर भरोसा करती हो कि मैं ख़ुद उससे मिलने चली जाऊँगी। मुझे उसे देखे अब लगभग पंद्रह साल होने को हैं। सोशल मीडिया पर उसकी कोई तस्वीर नहीं। कोई कॉमन फ़्रेंड भी नहीं। वो दिल्ली में था तो एक दिन दोस्त ने उसके बेटे की फ़ोटो भेजी थी। लेकिन उसकी नहीं। मैंने बहुत तड़प के उससे पूछा था उस रोज़ कि वो दिखता कैसा है। तो उसने बताया, कि एकदम पहले जैसा, बस थोड़े से बाल सफ़ेद हुए हैं। इसके अलावा कोई बदलाव नहीं। 

हमारे अंदर कुछ दुःख पलते हैं। उससे दूर होना एक ऐसा ही दुःख है। उसे कभी कभार न देख पाना। उसकी आवाज़ न सुन पाना। हम हमेशा उन लोगों से प्यार क्यूँ करते हैं जो हमसे प्यार नहीं करते। ये प्यार का इक्वेज़न हमेशा ग़लत क्यूँ होता है। कैसा सपना था। जाने कितने दिन दुखेगा। 

Musings, Shorts

लड़की जाने कब से समंदर देख रही है, दुनिया से पीठ फेरे हुए। उसका सतरंगी दुपट्टा अब खो गया है कि जो तस्वीर में लहरा रहा है, हमेशा के लिए। उसे याद है दुपट्टा कहाँ भूली है। उसने कई बार सोचा, कि उस रिज़ॉर्ट में फ़ोन करके कहे कि उसका सतरंगी दुपट्टा वापस भेज दें बैंगलोर। लेकिन कहाँ कह पायी। वो सोचती रही दुपट्टे के बारे में। अब उसे कौन ओढ़ता होगा। किसी लड़के ने गमछे की तरह गले में डाल लिया होगा क्या? बहुत सुंदर था वो…सूती दुपट्टा। 

एक बार खो जाने के बाद, कुछ भी हूबहू वैसा कहाँ मिलता है दुनिया में दुबारा। लड़की ने सोचा तो ज़रा और ज़ोर से पकड़ लिया महबूब का हाथ। राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर तो वो लोग भी खो जाते हैं जो खोना नहीं चाहते। महबूब जाने क्या चाहता हो।

इक शाम की बात थी, ऐसे ही भीड़ वाले एक स्टेशन पर वो मेट्रो में चढ़ गया था और लड़की को भीड़ ने पीछे उलझा के रोक लिया था। काँच के दरवाज़े बंद हुए तो ऐसा लगा, महबूब ने बंद कर लिए दिल के दरवाज़े। लड़की ने काँच पर हाथ रखा तो उसे लगा कि दिल टूट ही जाएगा। अब कौन प्यार करेगा उस लड़की से। 

महबूब लेकिन थोड़ा सा प्यार करता था उस लड़की से…वो अगले स्टेशन पर उसका इंतज़ार करता रहा। लड़की को भरोसा नहीं था कि वो इंतज़ार करेगा। वो देर तक एक के बाद एक मेट्रो छोड़ती गयी और रोती गयी। महबूब जानता था लड़की का डर। इसलिए वो दूसरी मेट्रो से लौट आया इसी स्टेशन। वो जानता था लड़की यहीं होगी। उदास और अनमनी। 

बहुत साल पहले जब वही लड़का बहुत बहुत प्यार करता था, तभी उसने जाना था। उदास और अनमनी लड़कियों को अलविदा नहीं कहना चाहिए। विदा करने के पहले जो लड़कियाँ ख़ुश होती हैं, वे भी विदा होकर बहुत बहुत उदास हो जाती हैं। इतनी उदासी कि उम्र भर लिख लिख के ख़त्म नहीं होतीं। 

उन्हें मिले अब बहुत साल हो गए थे। एक दूसरे को पहली बार जानते हुए, उससे भी कहीं ज़्यादा। लड़की ऊँगली पर गिना रही थी कि उसे क्या क्या याद है। लड़का मुस्कुराते हुए पूछ रहा था। ‘तुम क्या भूली?’। लड़की गिनती भूल कर मुस्कुराने लगी। आइ लव यू टू।

उसने पिछली बार स्टेशन पर जब एक लड़के को अलविदा कहा था तो उसे दुबारा देखना अब तक न हुआ है। तेरह साल हो आए। वो स्टेशन पर ठहरा रह गया था। लड़की ट्रेन से झाँक कर देखती रही दूर तक। ट्रेन मुड़ जाने के बाद भी दरवाज़े पर खड़ी, हाथ हिलाती रही थी। जिस हाथ पर एक गहरे गुलाबी रंग का सिल्क का स्कार्फ़ बँधा था। ये वही स्कार्फ़ था जो लड़की ने उस दिन पहना था जब वो लड़के से पहली बार मिली थी।

एक तो शाम यूँ ही उदास होती है। उसपर वो शाम जिसमें वो शहर से दूर जा रहा हो। लड़की गुमसुम थी। ‘मैं आपको ट्रेन पर छोड़ आऊँ’ वाक्य में प्रश्नवाचक चिन्ह न था। वो ग़लती से ऐसी चीज़ें नहीं भूलती थी कभी। बैग में माचिस रखना। क़लम में स्याही भरना। नोट्बुक में लिखी कविताएँ। वो भूल जाती थी, कैसा था उसका हाथ पकड़ के चलना। 

रेलवे स्टेशन की सीढ़ियाँ थीं। ट्रेन का इंतज़ार था। डूबता हुआ सूरज। लड़की ने उस दिन के बाद से सिगरेट पी ही नहीं। इस बात को जानकर कुछ बेवक़ूफ़ लोग उसे शाबाशी दे देते हैं, कि बुरी चीज़ थी सिगरेट, छोड़ के अच्छा किया। उसके बारे में कोई कुछ नहीं कहता, जिसे स्टेशन छोड़ने चली गयी थी। कि ऐसे छोड़ के अच्छा किया कि नहीं। 

वॉलेट में अब भी उस दिन का प्लैट्फ़ॉर्म टिकट है। उसपर लिखा है। तीन घंटे के लिए वैध। प्लैट्फ़ॉर्म पर भटकती लड़की सोचती है उसका इंतज़ार अवैध है।