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त्रासदी के प्रति अधिकतर लोगों के मन में एक सहज (या असहज) आकर्षण होता है। ड्रामा पढ़ते हुए हम इसे पेथॉस के रूप में पढ़ते हैं। मृत्यु, दुःख, विरह… हमारी सम्वेदना को जागृत करते हैं और हमें उल्लास या ख़ुशी की तुलना में ज़्यादा प्रभावित करते हैं। मीडिया भी हमें अधिकतर नेगेटिव चीज़ें ज़्यादा दिखाता है – हत्या, बलात्कार, आगज़नी, आत्महत्या, भीड़ द्वारा घेर कर मारना। ख़बरों में अच्छी ख़बरें बहुत कम देखने पढ़ने को मिलती हैं। इस लिहाज़ से अगर देखें तो दुनिया में सबसे ज़्यादा ख़ुशी अगर कहीं है तो वो बॉलीवुड फ़िल्मों में है। 

इंटर्नेट और मोबाइल रिकॉर्डिंग के इन दिनों में हम पाते हैं कि क्रूरता का बेख़ौफ़ और निर्लज्ज प्रदर्शन बहुत ज़्यादा बढ़ रहा है। कई क़िस्म के वाइरल विडीओ में हिंसा और एक तरह की निष्ठुरता है। इस सिलसिले में कुछ दिन पहले नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हुयी फ़िल्म द हाईवेमेन याद आती है। फ़िल्म में टेक्सस रेंजर्स  के दो पुराने रेंजर्स को बुलाया जाता है एक ख़ास केस के लिए। उन्हें कुख्यात हत्यारी जोड़ी बॉनी ऐंड क्लाइड को खोजना और ख़त्म करना है। इस जोड़ी ने नृशंस हत्याएँ की हैं लेकिन जनता में इनका पागलों की तरह क्रेज़ है। लोग उनसे बहुत प्यार करते हैं, उनकी तरह कपड़े पहनना चाहते हैं, उनकी तरह बाल कटाना चाहते हैं। लोगों का हत्यारों के प्रति ऐसा आकर्षण ख़तरनाक और समझ से परे है। बॉनी एक कमसिन लड़की है और क्लाइड भी उससे उम्र में थोड़ा ही बड़ा है। हत्या करने में बरती क्रूरता के कारण लोग उन्हें साहसिक मानते हैं। बॉनी और क्लाइड को आख़िर में उनकी कार में घेर कर मार दिया जाता है। रेंजर्स बिना किसी चेतावनी के लगभग 150 राउंड फ़ायर करते हैं। ख़बर फैलती है और लोग उनकी कोई ना कोई निशानी अपने पास रखने के लिए उस फ़ोर्ड ऐंजेला को चारों तरफ़ से घेर लेते हैं…कोई ख़ून सने कपड़ों के टुकड़े काट कर ले जा रहा है…कोई गोलियाँ… कुछ औरतों ने बालों की लट काट कर रखी और एक पुलिस अफ़सर ने देखा कि एक व्यक्ति चाक़ू से क्लाइड की ऊँगली काटने जा रहा था। 

इस तरह के आकर्षण को Hybristophilia कहा जाता है…और इसकी गिनती एक तरह का मानसिक विकार में होती है जहाँ आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों के प्रति आकर्षण होता है। इसे बॉनी और क्लाइड सिंड्रोम भी कहते हैं। कई औरतें इस तरह के सीरियल किलर्स से प्रेम करती हैं…जेल में चिट्ठियाँ लिखना या ऐसे केस की सुनवायी में आना और किलर्स के प्रति दीवानगी प्रदर्शित करने के क़िस्से अक्सर मीडिया में देखने को मिलते हैं। ऐसे पुरूषों का क़िस्सा थोड़ा कम सुनने को मिला है, शायद इसलिए भी आँकड़ों के अनुसार ९०% हत्यायें पुरुष करते हैं(इंटर्नेट पर मिला आँकड़ा) और सीरियल किलर औरतें बहुत कम हुयी हैं।

इन दिनों चर्नोबल की बहुत चर्चा है। मैंने देखने की कोशिश की, लेकिन ज़्यादा देर देख नहीं पायी। पहले एपिसोड में 15 मिनट बचा हुआ था कि आगे देख नहीं पायी। वहाँ कहता है कि शहर से किसी को बाहर जाने नहीं दिया जाएगा। फ़ोन लाइंस कट कर दो। मिलिटेरी बुला लो। apathy is something I have a lot of trouble coming to terms with. ऐसा अपने देश में भी कई बार देखते हैं कि सिर्फ़ इसलिए कि कुछ लोगों को किसी चीज़ से फ़र्क़ नहीं पड़ता, कितने लोगों की जान चली जाती है। उतने देर का एपिसोड देखना ही बुरी तरह परेशान कर गया। क्रिमिनल नेग्लिजेन्स। कि लोगों को बताया तक नहीं गया था कि नूक्लीअर पावर प्लांट है जिससे रेडीएशन निकलता है जो ख़तरनाक है। कितने सारे फ़ायरफ़ाईटर मर गए। खुले में रेडीओ ऐक्टिव पार्ट्स थे। कितना डरावना है ये सब। 

मैंने फिर विकिपीडिया पर डिटेल में चर्नोबल के बारे में पढ़ा। सेफ़्टी रेग्युलेशंज़ का ख़याल नहीं रखा गया। कितने स्तर पर लोगों ने ग़लतियाँ की और ख़ामियाज़ा कितने निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ा। जो बात मुझे बिलकुल दहला गयी वो ये कि चर्नोबल के रेडीएशन के ख़तरे के डर से 150,000 अबॉर्शन कराए गए। आख़िर ऐसे आँकड़े क्यूँ पहुँच जाते हैं मुझ तक। मैं कहाँ जाऊँ कि कुछ सुंदर मिले…जीने लायक़…सादा…उदास, फीकी शाम सही…तन्हा…चुप्पी शाम सही। 

इन दिनों नेटफ़्लिक्स पर हर तरह के सीरियल हैं। वायलेंट टीवी ड्रामा का एक पूरा अलग सेक्शन है। ज़ाहिर सी बात है, सबके अलग अलग पसंद की चीज़ें होती हैं और फ़िल्में सिर्फ़ फ़िल्में होती हैं। लेकिन हिंसा देखने के कारण हम उसके प्रति धीरे धीरे उदासीन होते चले जाते हैं। मुझे अब भी याद आता है कि हमने एथिक्स इन जर्नलिज़म में पढ़ा था कि अख़बार चूँकि बच्चे बूढ़े सभी देखते हैं इसलिए ख़ास तौर से मुखपृष्ठ पर ख़ून से सने या विचलित करने वाले फ़ोटो न पब्लिश करें। मगर ये २००५ की बात है। इन दिनों टीवी, अख़बार, मोबाइल…हर जगह हिंसा दिखती है। लोग इतने ग़ुस्से से भरे और क्रूर हैं कि जेबकतरे को पीट पीट कर जान से मार देते हैं। आग लगी बिल्डिंग से कूदते बच्चों की विडीओ शूट करते हैं। ऐसे असंवेदनशील समय में हम क्या कर सकते हैं कि दुनिया में थोड़ी कोमलता बाक़ी रहे। अगर इन दिनों के पौराणिक किरदारों के नए रूप देखें तो उन्हें कई क़िस्म के हथियारों से लैस दिखाया जाता है…जबकि हमारे बचपन के राम … श्री राम चन्द्र कृपालु भजमन हरण भवमय दारुनम हुआ करते थे…पूरा भजन समझ नहीं आता था लेकिन इतना था कि राम की छवि बहुत सुंदर है…उसी तरह कृष्ण के बारे में था कि उनकी मुस्कान दुनिया में सबसे सुंदर मुस्कान है…हम ग़ज़ब सुंदर सुंदर उपमाओं और बिंबों को पढ़ते सुनते हुए बड़े हुए थे। इन दिनों क्या हमारे हाथ में जो किताबें हैं या जो विडीओ हैं वे हमें थोड़ा सा मानवीय बना रही हैं? सुंदरता और कोमलता या मानवीयता कैसे बची रहे… किसी अजनबी को देख कर मुस्कुराना… किसी सुंदर कविता को बहुत से और लोगों तक पहुँचाना… कोई बहुत सुंदर कहानी लिख सकना…

जब हम हर कुछ रच सकते हैं…तो हम क्या करें कि दुनिया थोड़ी सी ज़्यादा सुंदर रहे… 

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मेरे पागल हो जाने का सब सामान इसी दुनिया में है।

तुमसे मुहब्बत… खुदा ख़ैर करे… जानां, मुझे तो तुम्हारे बारे में लिखने में भी डर लगता है। कुछ अजीब जादू है हमारे बीच कि जब भी कुछ लिखती हूँ तुम्हारे बारे में, हमेशा सच हो जाता है। कोई ऑल्टर्नट दुनिया जो उलझ गयी है तुम्हारे नाम पर आ कर…डर लगता है, लिखते लिखते लिख दिया कि तुम मेरे हो गए हो तो… या कि लो, आज की रात तुम्हारे नाम… या कि किसी शहर अचानक मिल गए हैं हम…क्या करोगे फिर?

यूँ ही ख़्वाहिश हुयी दिल में कि हर बार मुझे ही इश्क़ ज़्यादा क्यूँ हो… कभी तो हो कि चाँदभीगे फ़र्श पर तड़पो तुम और ख़्वाब में बहती नदी के पानी के प्यास से जाग में जान जाती रहे…

के बदन कहानियों का बना है और रूह कविताओं से … मैं तुम्हारे शब्दों की बनी हूँ जानां… तुम्हारी उँगलियों की छुअन ने मुझमें जीवन भरा है…किसी रोज़ जान तुम्हारे हाथों ही जाएगी… इतना तो ऐतबार है मुझे…

तुम इश्क़ की दरकार न करो…बाँधो अपना जिरहबख़्तर… भूल जाओ मेरे शहर का रास्ता…भूल जाओ मेरे दिल का रास्ता। लिखती हूँ और ख़ुद को कोसने भेजती हूँ। कि ऐसा क्यूँ। तुम्हारी ख़ातिर…इश्क़ में थोड़ा तुम भी तड़प लो तो क्या हर्ज है। मगर तुम्हारी तड़प मुझे ही चुभती है…कि मेरे हिस्से की नींद तुम्हारे शहर चली गयी है और उन ख़्वाबों में मुझे भी तो जाना था… तुम जाने किस मोड़ पर इंतज़ार कर रहे होगे…

मेरी हथेलियों में प्यास भर आती है। ऐसा इनके साथ कभी नहीं होता… कभी भी नहीं, सिवाए तब कि जब बात तुम्हारी हो। मेरे हाथों को वरना सिर्फ़ काग़ज़ क़लम की दरकार होती है… छुअन की नहीं… किसी भी और बदन की नहीं। तो फिर कौन सा दरिया बहता है तुम्हारे बदन में जानां कि जिसे ओक में भर पीने को रतजगे लिखाते हैं मेरे शहर में। मैं डरती हूँ इस ख़याल से कि तुम्हें छूने को जी चाहता है… तुम्हें छू लेना तुम्हें काग़ज़ के पन्नों से ज़िंदा कर कमरे में उतार लाना है…तुम ख़यालों में हो फिर भी तुम्हारे इश्क़ में साँस रुक जाती है…तुम मूर्त रूप में आ जाओगे तो जाने क्या ही हो… मैं सोच नहीं पाती… मैं सोचने से डरती हूँ। तुम समझ रहे हो मेरा डर, जानां?

तुम्हें चूमना पहाड़ी नदी हुए जाना है कि जिसका ठहराव तुम्हारी बाँहों के बाँध में है…मगर फिर लगता है, तुम्हें तोड़ न डालूँ अपने आवेग में… बहा न लूँ… मिटा न दूँ… कि जाने तुम क्या चाहते हो… कि जाने मैं क्या लिखती हूँ… 

कि देर रात अमलतास के पीछे झाँकता है चाँद… मैं सपने में में तलाश रही होती हूँ तुम्हारी ख़ुशबू…हम यूँ ही नहीं जीते इश्क़ में बौराए हुए।

के जानां, मेरे पागल हो जाने का सब सामान इसी दुनिया में है। 

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मेरे मरने पर मेरा पता पब्लिक कर देना कि वे सारी चिट्ठियाँ मुझ तक पहुँच सकें जिन पर मेरा हक़ है। मुझे यक़ीन है कि बहुत सी चिट्ठियाँ होंगी मेरे हिस्से की…बहुत से अधूरे क़िस्से होंगे जो लोगों को सुनाने होंगे… बहुत सा प्रेम होगा, अनकहा। बहुत से सवाल होंगे जिनके जवाब सिर्फ़ मेरे पास हैं। फिर कितने शहरों की मिट्टी होगी… कितने मौसमों का ब्योरा होगा… और शायद एक उसका ख़त भी तो, जिसने कभी मेरे जीते जी मेरे खतों का जवाब नहीं दिया। बहुत सा कुछ होगा। आधा। अधूरा। कच्चा। कि सब कहते हैं, तुम्हारे ख़तों का जवाब देना नामुमकिन है। शायद इक आख़िरी बार कहनी हो किसी को कोई बात… शायद अलविदा… शायद फिर मिलेंगे… मुझे नहीं मालूम क्या…

बस इतना कि बहुत से पेंडिंग ख़त हैं मेरे हिस्से के…और कि वे सब आएँगे, इक रोज़।

मुझे उन अनगिन चिट्ठियों की चिता पर ही जला देना।

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कहते हैं, change is the only constant. इस दुनिया में कुछ भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता। चीज़ें बदलती रहती हैं। जो हमारे लिए ज़रूरी है…वो भी ज़िंदगी के अलग अलग मोड़ पर बदलता रहता है। हम भी किन्हीं दो वक़्त में एक जैसे कहाँ होते हैं। फिर बदलाव हमें पसंद भी हैं…वे ज़िंदगी को मायना देते हैं। एक थ्रिल है कि कुछ भी पहले जैसा कभी दुबारा नहीं होगा। 

लेकिन फिर भी। हम चाहते हैं कि कुछ चीज़ें न बदलें। कुछ रिश्ते, कुछ लोग हमारे बने रहें। कुछ चीज़ों के कभी न बदलने का भरोसा हमें राहत देता है। घर, परिवार, कुछ पुराने दोस्त, बचपन की कुछ यादें… जैसे मेरा बचपन देवघर में बीता। मैं वहाँ तक़रीबन ११ साल रही। पूरी स्कूलिंग वहीं से की। वहाँ मिठाई की एक दुकान है – अवंतिका। इतने सालों में भी वहाँ मिलने वाले रसगुल्लों का स्वाद जस का तस है। इसी तरह कभी कभार बस से गाँव जा रहे होते थे तो बेलहर नाम की जगह आती थी जहाँ पलाश के पत्ते के दोने में रसमलाई मिलती थी। सालों साल उसका स्वाद याद रहा और उस स्वाद को फिर तलाशते भी रहे। वहाँ हमारे एक दूर के रिश्ते के भाई रहते थे… मुन्ना भैय्या। बिना मोबाइल फ़ोन वाले उस ज़माने में हम जब भी वहाँ से गुज़रे… वो हमेशा वहाँ रहते थे। एक दोना रसमलाई लिए हुए। मुझे उनकी सिर्फ़ एक यही बात सबसे ज़्यादा याद रही। अब भी कभी गाँव जाने के राते बेलहर आता है लेकिन अब भैय्या वहाँ नहीं रहते और कौन जाने किस दुकान की रसमलाई थी वो। देवघर से दुमका जाने के रास्ते में ऐसे ही एक जगह आती है घोरमारा/घोड़मारा… वहाँ सुखाड़ी साव पेड़ा भंडार था जिसके जैसा पेड़ा का स्वाद कहीं नहीं आता था। जब सुखाड़ी साव नहीं रहे तो उनकी दुकान दो हिस्से में बँट गयी – उन के दोनों बेटों ने एक एक हिस्सा ले लिया। लेकिन वो पेड़े का स्वाद बाँटने के बाद खो गया और फिर कभी नहीं मिला। 

मेरी स्मृति में खाने की बहुत सी जगहें हैं। हर जगह के साथ एक क़िस्सा। हम लौट कर उसी स्वाद तक जाना चाहते हैं… कि माँ के जाने के बाद ज़िंदगी में एक बड़ी ख़ाली सी जगह है… माँ के हाथ के खाने के स्वाद की… या बचपन की… कभी कभी घर जाती हूँ और दीदियाँ कुछ बनाती हैं तो लगता है, शायद… ऐसा ही कुछ था… या कि चाची के हाथ का कुछ खाते हैं तो। लेकिन कभी कह नहीं पाते उनसे… कि कुछ दिन हमको मेरे पसंद का खाना बना के खिला दीजिए। 

मेरा एक क़रीबी और बहुत प्यारा दोस्त था। जैसा कि सब दोस्तों के बीच होता है इस टेक्नॉलजी की दुनिया में… हमारे दिन की पूरी खोज ख़बर एक दूसरे को रहती थी। हम किसी शहर में हैं… हम किसी ख़ूबसूरत आसमान के नीचे हैं… हम किसी समंदर के पास हैं। सोशल मीडिया पर जाने के पहले वे तस्वीरें पर्सनल whatsapp में जाती थीं। मेरी भी, उसकी भी। आज उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर देखीं। ये किसी ब्रेक ऑफ़ से ज़्यादा दुखा। 

हम नहीं जानते कि कब हम किसी से दूर होते चले जाएँगे। किसी की ज़िंदगी में हमारी प्रासंगिकता कम हो जाएगी, हमारी ज़रूरत कम हो जाएगी और हमसे लगाव कम हो जाएगा। ये नॉर्मल है। इससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन जो चाहिए, वो हो पाए…इतनी आसान कब रही है ज़िंदगी। हमें मोह हुआ रहता है। हम कुछ चीजों को यथासम्भव एक जैसा रखना चाहते हैं। कुछ चीज़ों को। कुछ रिश्तों को। 

अक्सर जब हम सबसे ज़्यादा अकेला महसूस करते हैं तो हम सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति को याद कर रहे होते हैं। सिर्फ़ किसी एक को। बस उसके न होने से पूरी दुनिया वाक़ई ख़ाली लगती है। किसी और के होने न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। ऐसा अक्सर उन लोगों के साथ होता है जिनकी ज़िंदगी में लोग थोड़े कम हों… ऐसे में किसी के होने की विशिष्टता इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि उसके जैसा कोई भी महसूस नहीं होता। उसके आसपास तक का भी नहीं। हम उस रिश्ते को निष्पक्ष भाव से देख कर उसका आकलन नहीं कर पाते हैं। हम बाइयस्ड होते हैं। 

इस ख़ाली जगह को सिर्फ़ किताबों या सफ़र से भरा जा सकता है। थोड़ा सा खुला आसमान कि जो किसी पुरानी इमारत पर जा कर ख़त्म होता हो। थोड़ा सा किसी खंडहर का एकांत। कुछ चुप्पे किरदार जो दिमाग़ में ज़्यादा हलचल न मचाएँ। हम पुराने शहरों में ही पुराने लोगों को भूल सकते हैं। पुराने रिश्ते जब पुरानी इमारतों के इर्द गिर्द टूटते हैं तो उनका टूटना थोड़ा ज़्यादा स्थाई भी होता है और दुखता भी कम है। इसलिए पुरानी दिल्ली से आ कर मुझे साँस थोड़ी बेहतर आती है। 

सोचती हूँ…तुम्हें भुलाने के लिए किस शहर का रूख करूँ… फिर शायद वहाँ की तस्वीरें कहीं पर भी पोस्ट न करूँ… क्या ही फ़र्क़ पड़ता है कि आसमान का रंग कैसा था या कि पत्थर में कितनी धूप रहती थी। 

मैं भी तो बदल रही हूँ तुम्हारे बग़ैर। चीज़ों को सहेजने की ख़्वाहिश मिटती जा रही है। कि तुम मेरी ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा क़ीमती थे। पता नहीं, तुम्हें भी क्या ही सूझी होगी जो किसी रोज़ यूँ ही चले आए मेरी ज़िंदगी में। अब जब इसी तरह यूँ ही चले भी गए हो तो तुम्हारे बिना सब चीज़ें फ़ालतू और बेकार लगती हैं। क्या ही रखें कहीं। क्या लिखें। क्यूँ। किसके लिए?

अगर सब कुछ खो ही जाता है…खो ही जाना है इक रोज़ तो मैं भी चुप्पे चली जाऊँ न…
अलविदा कहना शायद तुम्हें भी नहीं आता है।

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इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है 

दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात 

यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ 

ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात 

  • फ़ैज़ 

इक़बाल बानो की आवाज़ में इसे पहली बार कब सुना था याद नहीं… लेकिन जानां… अभी यूँ ही ‘इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है … दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात’ … पंखा चलता है तो हल्की ठंड लगती है… पैरों पर हल्की सी चादर रख के बैठी हूँ। कपास की गंध आती है कलाइयों से। जाने कब तुम्हारी वो ब्लैक चेक की शर्ट देखी थी ख़्वाब में। उँगलियों पर थोड़ी थोड़ी कपास की महसूसियत है। तुम्हें देखने को तड़प सी गयी हूँ। जब भी सोचती हूँ कि मर जाऊँगी तुम्हारे इश्क़ में…आवाज़ यही आती है दिल से कि तुम्हें तो मर जाना ही चाहिए। 

रात को नींद आधी होती है आँख में और चाँद पूरा होता है आसमान में…सोचती हूँ कि जाने कभी कुछ सोचते होगे तुम भी। मेरे शहर के बारे में। मेरे दिल के मौसम के बारे में? कभी फ़ैज़ पढ़ते हुए सोचा होगा मुझे… जाने कब… किसी ख़ाली लम्हे में सही। मैं चाहती हूँ इतना व्यस्त हो जाना… घर के सारे परदे धो दूँ… किचन रीअरेंज कर दूँ… किताबें रंग के हिसाब से लगा दूँ बुक रैक में… घर को चमका दूँ एकदम ही… इस साढ़े चार हज़ार स्क्वेर फ़ीट के घर को रगड़ के साफ कर दूँ… कि हाथ व्यस्त रहेंगे तो क्या मन भी व्यस्त रहेगा? कि मुझे लिखने के सिवा कुछ आता भी तो नहीं… और मेरे लिखने में इतने साल से सबसे ख़ूबसूरत ज़िक्र तुम्हारा है। मैं तुम्हारे ख़याल की ख़ुशबू से भी इश्क़ करती हूँ। 

इतनी गहराई से समंदर चाहने पर एक झील तो मिल ही सकती है किसी शहर में… किसी शाम… जाने तुम कब मिलोगे। ज़िंदगी में सब कुछ स्लो मोशन है। तुम्हें बिसराना भी। इक रोज़ तुम्हें कम याद करूँगी। किसी ग़ज़ल की नज़ाकत से नहीं याद आएगी तुम्हारे माथे पर की झूलती हुयी लट। कि मालूम, जानां, कैमरा उठाया ही नहीं है दिल्ली से लौट कर इस बार… कि कुछ शूट करने का मन नहीं करता… 

मैं किसी कहानी में मर जाना चाहती हूँ। 

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जाने मुझे वो चाहिए, उसका शहर या कि उसके शहर का मौसम।

इंसान को किसी भी चीज़ से शिकायत हो सकती है। किसी भी चीज़ से। कि जैसे मुझे बैंगलोर के अच्छे मौसम से शिकायत है।

बैंगलोर में इन दिनों मौसम इतना सुंदर है कि उत्तर भारत के लोगों को अक्सर रश्क़ होता है। कि ज़रा अपने शहर का मौसम भेज दो। सुबह को अच्छी प्यारी हवा चलती है। दिन को थोड़े थोड़े बादल रहते हैं। सफ़ेद फूल खिले हैं बालकनी में। दोपहर गर्म होती है, लेकिन पंखा चलाना काफ़ी होता है। कूलर की ज़रूरत नहीं पड़ती। रातें ठंडी हो जाती हैं, बारह बजे के आसपास सोने जाएँ तो पंखा चलाने के बाद पतला कम्बल ओढ़ना ज़रूरी होता है। 

लेकिन मुझे गर्म मौसम बेहद पसंद है और मुझे उस मौसम की याद आती है। मेरा बचपन देवघर में और फिर कॉलेज पटना में था, आगे की पढ़ाई दिल्ली और पहली नौकरी भी वहीं। मुझे उस मौसम की आदत थी। दस साल हो गए बैंगलोर में, मैं अभी भी इस मौसम सहज नहीं होती हूँ। लगता है कुछ है जो छूट रहा है। 

दिल्ली में उन दिनों कपड़े के मामले में बहुत एक्स्पेरिमेंट नहीं किए थे और अक्सर जींस और टी शर्ट ही पहना करती थी। उन दिनों गर्मी के कारण इतना पसीना आता था कि दो तीन दिन के अंदर जींस नमक के कारण धारदार हो जाती थी और घुटने के पीछे का नर्म हिस्सा छिल सा जाता था। तो हफ़्ते में लगभग तीन जींस बदलनी पड़ती थी, कि कपड़े धोने का वक़्त सिर्फ़ इतवार को मिलता था। मुझे याद है कि ऑटो में बैठते थे तो पूरी पीठ तर ब तर और जींस घुटनों के पीछे वाली जगह अक्सर गीली हो जाती थी। चेहरे पर न बिंदी ना काजल टिकता था ना कोई तरह की क्रीम लगाती थी। बहुत गरमी लगी तो जा के चेहरा धो लिया। दिन भर दहकता ही रहता था चेहरा, दोस्त कहते थे, तुम लाल टमाटर लगती हो। 

उन दिनों बायीं कलाई पर सफ़ेद रूमाल बांधा करती थी कि कौन हमेशा पॉकेट से रूमाल निकाल के पसीना पोंछे और फिर वापस रखे। दायीं कलाई पर घड़ी बाँधने की आदत थी। माथे का पसीना कलाई पर बंधे रूमाल से पोंछना आसान था। लिखते हुए उँगलियों में पसीना बहुत आता था, तो वो भी बाएँ हाथ में बंधे रूमाल में पोंछ सकती थी। कभी कभी ज़्यादा गरमी लगी तो रूमाल गीला कर के गले पर रख लेने की आदत थी… या उससे ही चेहरा पोंछने की भी। जैसे चश्मा कभी नहीं खोता, उसी तरह रूमाल भी कभी नहीं खोता था कि उसकी हमेशा ज़रूरत पड़ती थी। 

दस साल में रूमाल रखने की आदत छूट गयी। अब रोना आए तो आँसू पोंछने में दिक्कत और खाने के बाद हाथ धोए तो भी हाथ पोंछने की दिक्कत। याद नहीं पिछली बार क्या हुआ था, पर किसी लड़के ने अपना रूमाल निकाल कर दिया था तो अचानक से उसका इम्प्रेशन बड़ा अच्छा बन गया था। कि वाह, तुम रूमाल रखते हो। अब इतने साल में याद नहीं कि लड़का था कौन और रूमाल की ज़रूरत क्यूँ पड़ी। 

जिस उम्र में पहली बार रोमैन्स के बारे में सोचा होगा, वो उम्र ठीक याद नहीं, पर मौसम साल के अधिकतर समय गर्म ही रहता था, तो पहली कल्पना भी वैसी ही कोई थी। कि स्कूल में पानी पीने का चापाकल था और ज़ाहिर तौर से, एक व्यक्ति को हैंडिल चलाना पड़ता था ताकि दूसरा पानी पी सके। कोई दिखे तो वहीं दिखे…बदमाश ने चुल्लु में पानी भर कर फेंका था मेरी ओर…कि वो नॉर्मल बदमाशी थी…पानी पीने के बाद चेहरे पर पानी मारना भी एकदम स्वाभाविक था…लेकिन उस पानी मारते हुए को देखती हुयी लड़की, पागल ही थी… कि लड़के भी ख़ूबसूरत होते हैं, उस भयानक गरमी में दहकते चेहरे पर पानी के छींटे मारते हुए लड़के को देख कर पता चला था। गीले बालों में उँगलियाँ फिरो कर पानी झटकाता हुआ लड़का उस लम्हे में फ़्रीज़ हो गया था। कलाई से रूमाल एक बार में खोला और बढ़ाया उसकी ओर…’रूमाल’… उसने रूमाल लिया…चेहरा पोंछा…मुस्कुराते हुए मुझे देखा और रूमाल फ़ोल्ड कर के अपने पॉकेट में रख लिया। 

उस रोज़ ज़िंदगी में पहला रूमाल ही नहीं खोया था, दिल भी वहीं फ़ोल्ड हो कर चला गया था उसके साथ रूमाल में। हमारे बीच इतनी ही मुहब्बत रही। फिर उन दिनों कहते भी तो थे, रूमाल देने से दोस्ती टूट जाती है। 

गर्मी में ये ख़्वाहिश बाक़ी रही, कि कभी मिलूँ, किसी महबूब या कि म्यूज़ से ही। कूलर का ठंडा पानी चेहरे पर मारते हुए आए वो क़रीब, कि तुम्हें न यही पागल मौसम मिला है शहर घूमने को…मैं मुस्कुराते हुए बढ़ाऊँ सुर्ख़ साड़ी का आँचल…कि जनाब चेहरा पोंछिए…वो कहे कि ज़रूरत नहीं है…हमें इस मौसम की आदत है…और हम कहें कि हमारा ईमान डोल रहा है, नालायक़, चुपचाप इंसानों जैसे दिखो… इस मौसम से ज़्यादा हॉट दिखने की ज़रूरत नहीं है। 

जाने मुझे वो चाहिए, उसका शहर या कि उसके शहर का मौसम। 

इस सुहाने मौसम में लगता है कुछ छूट रहा है। मैं चाहती हूँ कि गरमी में आँचल से पोंछ सकूँ अपना माथा। हवा कर सकूँ उसे ज़रा सा। पंखा झलने का मौसम। आम का मौसम। नानीघर जाने का मौसम। गर्मी छुट्टियाँ। कि मौसम सिर्फ़ मौसम थोड़े है…एक पूरी पूरी उम्र का रोज़नामचा है। इस रोजनामचे के हाशिए पर मैं लिखना चाहती हूँ…ये हमारा मौसम है। इस मौसम मिलो हमसे…जानां!

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इन दिनों किंडल ऐप डाउनलोड कर लिया है और उसपर एक किताब गाहे बगाहे पढ़ती रहती हूँ। उसमें एक दूसरी किताब की बात है जो कि एक उपन्यास के बारे में। इस उपन्यास का नाम है lost city radio, एक रेडीओ प्रेज़ेंटर है जो युद्ध के बाद रेडीओ स्टेशन में काम करती है और सरकार के हिसाब से ख़बरें पढ़ती है… लेकिन उसका एक कार्यक्रम है जिसमें वो खोए हुए लोगों के नाम और उसके बारे में और जानकारियाँ देती है। युद्ध के बाद खोए हुए अनेक लोग हैं। पूरे देश में उसका प्रोग्राम सबसे ज़्यादा लोग सुनते हैं…उसका चेहरा कभी मीडिया के सामने उजागर नहीं किया जाता। 

मैं इस उपन्यास को कभी पढ़ूँगी। लेकिन उसके पहले इसकी दो थीम्स जो कि मुझे बहुत आकर्षित करती हैं। आवाज़ें और खो जाना या तलाश लिया जाना। मैं आवाज़ों के पीछे बौरायी रहती हूँ। जितने लोगों को मैंने डेट किया, कई कई साल उनसे बात नहीं करने के बावजूद उनकी आवाज़ मैं एक हेलो में पहचान सकती हूँ… जबकि बाक़ी किसी की आवाज़ मैं फ़ोन पर कभी नहीं पहचान पाती, किसी की भी नहीं। लड़कों की आवाज़ तो मुझे ख़ास तौर से सब की एक जैसी ही लगती है। गायकों में भी सिर्फ़ सोनू निगम की आवाज़ पहचानती हूँ…वो भी आवाज़ नहीं, वो गाते हुए जो साँस लेता है वो मुझे पहचान में आ जाती है… पता नहीं कैसे। मुझे आवाज़ों का नशा होता है। मैं महीने महीने, सालों साल एक ही गाना रिपीट पर सुन सकती हूँ… सालों साल किसी एक आवाज़ के तिलिस्म में डूबी रह सकती हूँ। 

बारिश की दोपहर मिट्टी की ख़ुशबू को अपने इर्द गिर्द महसूसते हुए सोचती रही, उसकी आवाज़ का एक धागा मिलता तो कलाई पर बाँध लेती…मौली… कच्चे सूत की। उसकी आवाज़ में ख़ुशबू है। गाँव की। रेत की। बारिश की। ऐतबार की। ऐसा लगता है वो मेरा कभी का छूटा कोई है। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं…जन्मपार के रिश्ते। मैं उसके साथ का कोई शहर तलाशती हूँ। एक दिन न, मैं आपको समंदर दिखाने ले चलूँगी। मुझे सब मालूम है, उसके घर के सबसे पास कौन सा समंदर है, वहाँ तक जाते कैसे हैं। एक दिन मैं अपने उड़नखटोला पर आऊँगी और कहूँगी, ऐसे ही चल लो, रास्ते में कपड़े ख़रीद देंगे आपको। बस, अभी चल लो। फिर सोचती हूँ कि ऐसे शहर क्यूँ मालूम हैं मुझे। कि रात जब गहराती है तो बातें कितने पीछे तक जाती हैं। बचपन तक, दुखों तक, ख़ुशी के सबसे चमकीले लम्हे तक। दिन में हम वैसी बातें नहीं करते जैसी रात में करते हैं। मैं समंदर की आवाज़ में उलझे हुए सुनना चाहती हूँ उन्हें…कई कई पूरी रात। चाँद भर की रोशनी रहे और क़िस्से हों। सच्चे, झूठे, सब। मुझे उन लड़कों से जलन होती है जो उनके साथ रोड ट्रिप पर जाते हैं और पुराने मंदिर, क़िले, महल, दुकानें देखते चलते हैं। जो उन्हें गुनगुनाते हुए अपना पसंद का कोई गीत सुना पाते हैं। उनसे बात करते हुए लगता है कि ज़िंदगी कितनी छोटी है और उसमें भी कितना कम वक़्त बिताया हमने साथ। मगर कितना सुंदर। कि बाक़ी लोग पूरी उम्र में भी कोई ऐसी शाम जी पाते होंगे… मैं सोचती हूँ, पूछती हूँ और ख़ुद में ही कहती हूँ, कि नहीं। कि कोई दो लोग दूसरे दो लोगों की तरह नहीं होते। न कोई शाम, शहर या धुन्ध ख़ुद को कभी दोहराती है। 

कभी कभी लगता है मैं खो गयी तो वे किसी से पूछेंगे नहीं मेरे बारे में, बस किसी बहुत ख़ुशनुमा सी शाम ज़रा से उदास हो जाएँगे। आज एक बहुत साल पहले पढ़ा हुआ शब्द याद आ रहा है। अरबी शब्द है, ठीक पता नहीं कैसे लिखते हैं, एक लिस्ट में पढ़ा था, उन शब्दों के बारे में जो अनुवाद करने में बहुत मुश्किल हैं…यकबरनी… यानी तुम मुझे दफ़नाना… 

मुझे नहीं मालूम कि मुझे ऐसी छुट्टियाँ सिर्फ़ किसी कहानी में चाहिए या ऐसे लोग सिर्फ़ किसी क़िस्से में लेकिन उनसे बात करते हुए लगता है ज़िंदगी कहानियों जैसी होती है। कि कोई शहज़ादा होता है, किसी तिलिस्म के पार से झाँकता और हम अपनी रॉयल एनफ़ील्ड उड़ाते हुए उस तिलिस्म में गुम हो जाना चाहते हैं।