Musings, Shorts

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
~ जां निसार अख़्तर
***
रात बहुत चुप्पी होती है। झींगुर जाने क्या क्या गुनगुनाते रहते हैं, या कि भुनभुनाते रहते हैं कि उनके हाथ में कुछ नहीं होता। बेमौसम बारिश होती है। धूप नहीं निकलती। मैं देर रात सोसाइटी के भीतर टहलते हुए चाह रही हूँ कि कहीं से मुट्ठी भर आवाज़ें चुन लूँ। कोई गीत का टुकड़ा, किसी सीरियल का डाइयलोग, किसी के गुनगुनाने की बेसुरी धुन, पानी की टपटप, पूल में बहते पानी की म्यूटेड लय…लेकिन कुछ सुनाई नहीं देता इस ओर। यहाँ शब्द नहीं हैं। लोग नहीं। हँसी नहीं।
फ़ोन में इतना स्पेस है। कितनी तस्वीरें हो सकती हैं लेकिन मैं क्लिक नहीं करती। गाने नहीं सुनती हूँ नए। तुम्हारी स्माइली कितने दिन से नहीं आयी। ब्लू टिक्स नहीं लगे। मेरा पिछला मेसेज वैसे रखा हुआ है बंद दरवाज़े की साँकल में फँसायी गयी चिट्ठी के जैसा।
एक दिन नियत करना है, तुम्हें याद करके भुलाने की कोशिश के लिए। उसके बाद किताबों में डूब कर मर जाऊँगी।
ढेर सारा प्यार।

Musings

मैंने ये नहीं चाहा था कि तारीख़ों को यूँ सीने से लगा कर जियूँ। बीते हुए किसी लम्हे को फ़्रेम कर के रख लूँ और उसकी याद में फीका होता अपना वर्तमान देखूँ।

होना ये चाहिए था कि इस वर्तमान के अपने रंग होते, सपनों की आउट्लायन होती और धीरे धीरे तस्वीर पूरी होती जाती। लेकिन ज़िंदगी के अपने प्लैंज़ हैं। या कि मेरे प्लैंज़ को बर्बाद करने में भी तो मेहनत लगती है।

बहुत सा ट्रैवल प्लान कर रखा था मैंने। दिल्ली। मुंबई। राजस्थान। पटना। कुछ जगहों पर काम के सिलसिले में जाना था। कुछ जगहों पर मन के खोए मकान तलाशने को। कुछ लोग छूट गए थे पीछे, उनसे मिलने का भी मन था।

मगर हुआ ये कि एक के बाद एक लड़ाई मुझे यूँ उलझाती रही कि बस ज़िंदा रहने में बहुत वक़्त गुज़र गया। कुछ साल पहले पापा के यहाँ एक बाबाजी आए थे। पापा को उनमें बहुत विश्वास था। हमको बोले, बाबा से जो माँगना है माँग लो। बाबा को भी लगा होगा कि हम बाल-बच्चा जैसा कोई छोटा मोटा चीज़ माँगेंगे लेकिन हम भी हम थे उन दिनों…हम पूछ बैठे, बाबा, मन की शांति कैसे मिलेगी। आप जो दुनिया को त्याग कर ईश्वर की शरण में चले गए हैं, क्या आपका मन शांत रहता है। इस दुनिया में रहते हुए मन शांत कैसे रहे। बाबा ने कुछ कुछ बातों से मुझे फुसलाया लेकिन मुझे संतोष नहीं हुआ। पापा से डांट अलग खाए कि आपको जो मन सो सवाल करना होता है, कितना मुश्किल से हम बाबा को मना कर घर लाए थे और आप फ़ालतू सब चीज़ माँगना शुरू कर दीं।

अब जानती हूँ कि लड़ाई लम्बी चलेगी और मुझे इस लड़ाई के ख़त्म होने का इंतज़ार नहीं करना है। ज़िंदगी यहीं जीनी है। इसी लड़ाई के बीच। यहीं फूल भी लगाने हैं और कहानियाँ भी लिखनी हैं। यहीं ड्राइविंग लाइसेन्स के लिए फिर से अप्लाई करना है और एनफ़ील्ड की लम्बी राइड पर जाने के लिए ख़ुद को तैय्यार करना है। अपने खाने पीने का ध्यान रखना है। ख़ुद को फ़िट रखने के लिए तैराकी शुरू करनी है।

किताबों और फ़िल्मों के लिए ख़ुद को मेंटली ख़ाली भी रखना है और उन्हें देख कर मेमरी में कुछ स्पेस उनके बारे में अपनी राय रखने के लिए भी रखना है।

फिर से जीना सीखना है। चलना सीखना है एक एक क़दम करके। ज़िंदगी में कुछ लोगों को शामिल होने की जगह देनी है।

हर बार थक जाने के बाद ख़ुद को थोड़ा और मज़बूत करना है। थोड़ी और लम्बी लड़ाई के लिए थोड़ी हँसी और रखनी है पास में। जीना है। और हँसते हुए जीना है। मुहब्बत के ऊपर लगा बैन हटाना है और उसे दिल में जगह देनी है, थोड़ी सी।

तत् त्वम असि।

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कई बार सोचती हूँ तो लगता है हमारा पूरा जीवन ही एक तरह से हमारे बचपन से गाइडेड होता है। हमें बचपन में जो चीज़ें अच्छी लगती थीं, जिनसे हमारी अच्छी याद जुड़ी होती है हम उन चीज़ों के प्रति एक पॉज़िटिव बायस… एक मोह से जुड़े होते हैं।

इस घर में ट्रेन की आवाज़ आती है। एकदम पास तो नहीं, लेकिन कुछ दूर में ट्रेन की पटरी बिछी हुयी है। रात को ख़ास तौर से इंजन की सीटी साफ़ सुनायी पड़ती है। ट्रेन की आवाज़, रेल की पटरियाँ, खोमचे वाले, रेल की पटरी…इन सबके साथ अच्छी यादें जुड़ी हुयी हैं। पटना में मेरे नानी घर के ठीक सामने से सड़क थी और सड़क के छोर पर रेल की पटरी। नानाजी उन दिनों आरा में काम करते थे और रोज़ शाम को ट्रेन से घर लौटते थे। हम लोग अपने घर से ट्रेन को आते देखते थे और जानते थे अब नानाजी घर आ जाएँगे और हमारे लिए मिठाई लाएँगे। ट्रेन की आवाज़ अब भी किसी मीठे की उम्मीद होती है।

उन्हीं रेल की पटरियों पर भाई लोगों के साथ सिंगल पटरी पर बैलेन्स बना कर कितनी दूर बिना गिरे चल सकते हो का कॉम्पटिशन भी होता था। ख़ाली रेल की पटरी मिल जाए तो आज भी हमको उसपर पैर जमा जमा कर चलने में और लोगों से शर्त लगाने में ख़ूब मज़ा आता है।

हम हर गरमी छुट्टी में नानीघर जाते थे। देवघर से पटना अक्सर पाटली में जाते थे या कभी कभी तूफ़ान मेल जो हमेशा लेट ही होती थी। उन दिनों सफ़र हमेशा सुहाना ही होता था। साल की दो ट्रिप नानीघर – दशहरा और गरमी छुट्टी और हर चार साल में एक बार महीने भर का भारत भ्रमण। हम उसे एलऐपसी कहते थे। ट्रेन में जेनरल कंपार्टमेंट में भीड़ होने पर भी जगह लगभग मिल ही जाती थी। हम बच्चों का अतिशय क्यूट होना भी इसका एक कारण रहा होगा। वरना VIP तो था ही। जिसपर दोनों लोग आराम से दो दिशा में मुंडी कर के बैठ जाते थे। दो दिशा में, वरना लड़ते ही रहते सारे टाइम।

फ़ैमिली छुट्टी का एक महीना कमाल होता था। उन दिनों हम स्लीपर कम्पार्ट्मेंट में सफ़र करते थे। पापा हमको ट्रेन से दिखते सारी फ़सलों के बारे में बताते जाते थे। धान, गेहूँ, चना, मक्का, बाजरा, सूरजमुखी… जिस खेत में जो लगा हो, सब पापा को पता होता था। शादी के बाद हम जब ऐसे सवाल अक्सर कुछ और लोगों से करते हैं वो अचरज करते हैं कि हमको क्या ही मतलब है कि खेत में कौन सी फ़सल लगी है। सफ़र में हमको दो चीज़ भरपूर मात्रा में चाहिए – गप्प और भोजन। मुँह चलता रहना चाहिए। बतिया रहे हैं या खा रहे हैं। बहुत कम ऐसा होता है कि मैं चुपचाप कहीं जाना चाहूँ।

देर रात नींद खुल जाती है। कुछ समय में ट्रेन की आवाज़ से वक़्त का पता चल जाएगा। इन दिनों ट्रेन की आवाज़ आती है और हम एक मिठास महसूस करते हैं, उन सारी यात्राओं को याद करके जिन्होंने हमें कितना कुछ सिखाया, कितना प्यार लिखा हमारे हिस्से।

फिर वो एक क़िस्सों वाला जादूगर याद आता है जिसका घर ट्रेन की पटरी के किनारे हुआ करता था और जिनसे फ़ोन पर बात करते हुए हमारे बीच के क़िस्सों में शाम की ट्रेन अपनी मौजूदगी दर्ज कर देती थी।

मैं शब्दों तक लौटती हूँ और ज़रा ज़रा सुख रचती हूँ अपने जीने के लिए।

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तुम्हें पता है जानां, तुम्हारे शहर पर तुम जो ताला लगा के रखे हो…हम जाने कितनी रात से सपने में जाते हैं और शहर को बाहर से देख कर आ जाते हैं। शहर की चहारदिवारी के आसपास भटकते हैं कितनी कितनी देर। खड़े खड़े इंतज़ार करते हैं तुम्हारा।

तुम्हें पता है जानां…सपने के इस इंतज़ार से भर दिन मेरे घुटने दर्द करते हैं। मैं कितनी कितनी देर भटकती रहती हूँ शहर के बाहर वाले रास्ते पर। कभी कभी तो यूँ भी हुआ है कि गयी हूँ तुम्हारे शहर और दूर हूँ बहुत तुमसे। मैं चलती हूँ आती हूँ मगर सड़क है की बढ़ती ही चली जाती है.. कई कई मील। मैं सपने में चलते चलते, सच की ज़िंदगी में थक जाती हूँ।

जानां। सपनों में खोलो दरवाज़ा। मुझे आने दो तुम्हारे शहर। मुझे घुमाओ ज़रा सा कोई ख़ुशगवार मौसम। तुम्हारी कमी बदन में दर्द होकर दुखती है। मिलो मुझसे सपने में। दिखाओ मुझे कोई ख़ाली पड़ी बेंच कि जिसपर बैठ कर तुम्हारे साथ पी सकूँ कॉफ़ी। दूर हो मेरा सर दर्द। मिले मेरे सफ़र को मंज़िल कोई।

मिलो सपने में। मिलो सपने के शहर में। कि इस दर्द में कितना चलूँ मैं, मेरी जान! तुम्हारे हिस्से का ढेर सारा प्यार लिए दिल जो धड़कता है…दुखने लगता है। सम्हालो अपने हिस्से का प्यार, मुझे लौटाओ मेरे हिस्से का प्यार। थोड़ा अदला बदली कर लेते हैं। थोड़ा मेरा मन शांत हो, थोड़ा तुम्हारा मन अशांत। थोड़ा सुख का एक क़तरा, मेरे शहर के आसमान में मुस्कुराए। थोड़ा मेरे दुःख का बादल तुम्हारे शहर को भिगो दे।

ज़रा से तुम मेरे हुए जाओ, थोड़ा सा तुम्हारा शहर किसी और के नाम लिख दो। थोड़ा सा याद रखो मुझे। थोड़ा सा भूल जाऊँ मैं कि कितना दर्द है।

जानां। सपनों के उस शहर के दरवाज़े पर इंतज़ार लिखा है। उसे मिटा कर मेरे आने के लिए ‘स्वागतम’ लिख दो। मैं आऊँ तुम्हारे शहर तो मिलो मुझसे। कहो कि ख़त्म हुआ सफ़र। कि मैं लौट सकूँ ज़िंदगी में, क़दमों में तेज़ी और दिल में धड़कता हुआ तुम्हारा नाम लेकर।

ढेर सारा प्यार।

#soulrunes #daysofbeingwild #inthemoodforlove #thegirlthatwas#midnightmadness #cityshots #almostlovers

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#अप्रेम

मैं सोचती हूँ तुम्हारे बारे में। अक्सर। बहुत दर्द और नीमबेहोशी की चीख़ों के बीच भी। मैं सोचती हूँ हम क्या हो सकते थे। क्या हम कुछ हो सकते थे एक दूसरे के?

मैं सोचती हूँ कि तुमने कभी सोचा होगा कि तुम्हारी ज़िंदगी में इतने सारे लोग हैं, लेकिन फिर भी मेरी कुछ जगह बना सकते थे तुम। शायद नहीं। तुम व्यस्त हो। अपनी कविताओं। अपने जीवंत रंगों में। अपने श्वेत श्याम में। कभी तुमने अपने धरे हुए कपड़ों में से कोई काली शर्ट निकाली होगी और पहनने के बाद कभी सोचा, कि एक सेल्फ़ी लेकर भेज दें… उस पागल लड़की को?

मैं तुम्हारी अपरिभाषित होना चाहती थी। जिसके बारे में कोई पूछे तो उलझ जाओ। कि नहीं, पता नहीं। उसके जैसा कोई रिश्ता जिया नहीं है मैंने तो कह नहीं सकता। पर वो मेरी कुछ तो है। कभी बारिश हो तो चाय बनाते हुए दुष्यंत का शेर याद आए, ‘तेरी ज़िंदगी में अक्सर, मैं कोई वजह रहा हूँ’। फिर गुनगुनाने लगो, कि तुम्हें आदत है कि कवि होते हुए कविता हुए जाते हो। पूरी ही ग़ज़ल ख़ूबसूरत है…

ये ज़मीन तप रही थी ये मकान तप रहे थे
तेरा इंतज़ार था जो मैं इसी जगह रहा हूँ

तेरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं
तेरी ज़िन्दगी में अक्सर मैं कोई वजह रहा हूँ

मैं सोचती रही कि तुम्हारे होने की वजह होनी चाहिए थी। तुम्हारे जाने की वजह होनी चाहिए थी। मैं कम लोगों से जुड़ती हूँ। मैं तुमसे जुड़े रहना चाहती थी। तुम्हारी फ़्रेंडलिस्ट में होना सिर्फ़ इसलिए अच्छा था कि मैं तुम्हारी कुछ तस्वीरें देख सकती थीं। कभी कभी तुम्हारी पुरानी मुस्कुराती हुयी तस्वीरों को देख कर मैंने तुम्हारे सुख की कल्पना की है।

काश कि मेरे पास देने को प्रेम होता तो मैं तुम्हारे हिस्से लिख देती। लेकिन कवि, तुम मेरे जीवन में बहुत देर से आए। अब मेरे पास सिर्फ़ थोड़े से दुःख हैं। कभी कभी बारिश होती है तो बारिश का शोर, कुछ विंडचाइम्ज़ वाली खिड़की, कभी कभार बोगनविला। इतना ही है। लेकिन इसके मोल तुम्हारा क़ीमती वक़्त नहीं मिलता। इनके मोल किसी का भी वक़्त नहीं मिलता।

तुम्हारे जीवन में कितने सारे और कितने ख़ूबसूरत लोग हैं। तुम्हें मेरी कमी महसूस नहीं होगी। मैं मिस करती हूँ तुम्हें। लेकिन तुलसी कह गए हैं, ‘आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह।तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह’। तो तुम्हारे यहाँ जा के क्या करना।

किसी से यूँ ही नहीं होता मोह। यूँ नहीं दुखता हर किसी का जाना। मैं जिन कुछ लोगों के बारे में सोचती हूँ, उसमें तुम भी हो। व्यस्त होने पर। दुःख में। उदासी में। ख़ुशी में। किसी किताब को पढ़ते हुए।

कितना कुछ होता हमारे बीच, लेकिन, शब्दों के धनी कवि… मेरी बात आते ही तुम्हारा भी जी छोटा हो गया… एक ही शब्द लिखा हमारे हिस्से…

काश!

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a rose is a rose is a rose*

मेरा मन सिर्फ़ उस कल्पना से टूटता है जो कभी सच नहीं हो सकता और मैं सिर्फ़ इसलिए लिखती हूँ कि बहुत सारा कुछ एक कहानी में सच होता है।

***

‘तुम बिना चप्पल के चल सकते हो?’
‘हाँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है, कौन नहीं चल सकता है बिना चप्पल के!’ तुम्हारे अचरज पर मैं हँसती हूँ तो चाँदनी में मेरी हँसी बिखर जाती है। तुम्हारी आँखों में जो उजला उजला चमकता है वो मेरी हँसी ही है ना?

तुम्हें क्या ना जाने समझ कर बुला लायी हूँ देवघर। फिर हम अपनी एनफ़ील्ड से सौ किलोमीटर दूर अपने गाँव जाने को निकले हैं। रास्ते में हनमना डैम पड़ता है। मैं वहाँ रूकती हूँ। कैक्टस पर इस साल भी फूल आया है। तुम उसे छूने को अपना हाथ बढ़ाते ही हो कि मैं ज़ोर से तुम्हारा हाथ पकड़ कर खींच लेती हूँ तुम्हें अपनी ओर…’रे बुद्धू, कैक्टस के फूल में भी बहुत काँटे होते हैं। एकदम महीन काँटे। ख़ून में मिल जाएँगे और उम्र भर दुखेंगे जाने किधर किधर तो।’ तुम मुझे अचरज से देखते हो, मैं जानती हूँ तुम सोच रहे हो कि मेरे लहू में कैक्टस के कितने काँटे हैं जो कभी घुलते नहीं। कितना दुखते हैं मुझे जो मुझे ये बात मालूम है। संगमरमर का फ़र्श है और गोल संगमरमर के ऊँचे खम्भे। एकदम सफ़ेद। हम दूर तक फैला हुआ बाँध का पानी देखते हैं। झींगुरों की आवाज़ आ रही है और चम्पा की बहुत हल्की फीकी गंध हम आमने सामने के खम्बों पर पीठ टिकाए बैठे हैं। पैर हल्के हल्के हिला रहे हैं। कभी एक दूसरे को कुछ कहना होता है तो पैर से ही गुदगुदी करते हैं। मैं कोई धुन गुनगुनाने लगती हूँ, तुम पूछते हो, ‘क्या गा रही हो’…मैं गाने के स्थाई की पंक्तियाँ गुनगुनाती हूँ और तुम उसी धुन में बहते हो।

हम गाँव की ओर चल पड़े हैं तो शाम होने को आयी है। जब तक मासूमगंज आते हैं लगभग अँधेरा हो चुका होता है। गाँव के टूटे फूटे रास्ते में धीरे धीरे एनफ़ील्ड चलाते हुए आते हैं। कहीं कहीं जुगनू दिख रहे होते हैं। तुमने पकड़ रखा है मुझे पर तुम्हारी पकड़ हल्की है। तुम्हें मेरे बाइक चलाने से डर नहीं लगता है। हम शिवालय के पास पहुँच जाते हैं। यहाँ से आगे बाइक चला कर ले जाएँगे तो पूरा गाँव उठ जाएगा। एकदम ही सन्नाटा है। लाइट कटी हुयी है। एकदम ही चाँदनी रात है। हवा में कटे हुए पुआल की गंध है। ऊँघते घरों से कोई आवाज़ मुश्किल से आ रही है। कहीं कहीं शायद टीवी चल रहा हो। कोई फ़ोन पर बात कर रहा है किसी से, सिग्नल ख़राब होने की शिकायत।

गाँव में मेरा घर सबसे आख़िर में है। मैं एक घर पहले तुमसे जूते उतरवा देती हूँ और चहारदिवारी में बाहर की ओर बने ताखे पर रखवा देती हूँ। एक ज़माने में यहाँ लोग खेत से लौट कर आने पर लोटा रखा करते थे।

घर में सब लोग सो गए हैं, आठ बजे से ही। हम बिना चप्पल के एकदम दबे पाँव चलते हैं। घर के बरामदे पर मेरे चाचा सोए हुए हैं। डर के मारे मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा है कि लगता है उसकी ही आवाज़ सबको सुनायी पड़ जाएगी। मैंने तुम्हारा हाथ ज़ोर से पकड़ रखा है। यहाँ एकदम अँधेरा है। मैं पहली बार तुम्हारे हाथ की पकड़ पर ग़ौर करती हूँ। हम दोनों दीवाल से टिके हुए हैं। सामने लकड़ी का उढ़का हुआ किवाड़ है जिसके पल्लों के बीच से एक व्यक्ति एक बार में जा सकता है। तुम्हारी साँस से पता चल रहा है कि तुम्हारी धड़कन भी बढ़ी हुयी है। तुम मेरी हथेली अपने सीने पर रखते हो। मेरी हथेली तुम्हारी धड़कन की बदहवासी में वही पागलपन पहचानती है जिसके कारण हम आज यहाँ आए हुए हैं। वही पागलपन जो हमें जोड़ता है। धीरे धीरे तुम्हारे दिल की धड़कन भी थोड़ी सम्हलती है और मैं भी थोड़ा सा गहरी साँस लेती हूँ। किवाड़ की फाँक में एक पैर रखने के पहले ईश्वर से मनाती हूँ कि फाँक और मोटापे की लड़ाई में फाँक जीत जाए। ईश्वर इस छोटी मनौती को मान लेता है और मैं दरवाज़े के उस पार होती हूँ। इस तरफ़ आ कर मैं तुम्हारे माथे पर हाथ रखती हूँ ताकि तुम झुक कर अंदर आते वक़्त छोटे दरवाज़े की चौखट से न टकरा जाओ। अंदर आँगन भर चाँदनी है। हम खड़े आँगन देख रहे होते हैं कि ठीक एक बादल का टुकड़ा चाँद के आगे आ जाता है और सब तरफ़ गहरा अँधेरा हो जाता है। तुलसी चौरे पर जलता दिया एक छोटा सा पीलापन लिए मुस्कुराता है, जैसे उसने ही मेरी चोरी पकड़ ली है। आंगन में अब भी निम्बू लगा हुआ है। मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर बैठती हूँ ईंट की बनी सीढ़ी पर। तुम देखते हो दायीं तरफ़ का पूजाघर और उससे लगा हुआ चौका। तुम देखते हो वो खंबा। जब मैं पैदा हुयी थी तो पापा दादी को ख़बर सुनाने यही आँगन लाँघ कर पूजा घर की ओर बढ़े थे। इसी खम्बे के पास खड़ी दादी पूजा के बाद अपने हाथ धो रही थीं। पापा ने कहा, ‘पोती हुयी है’। दादी बहुत ख़ुश हुयी, ‘कि बेटा बहुत अच्छा ख़बर सुनाए, एकदम पूजा करके उठे हैं, पोती का नाम पूजा ही रख दो’।

तुम मेरा हाथ पकड़ कर उस आधी चाँदनी वाली धुँधली रात में आगे बढ़ते हो। ठीक वहाँ खड़े होते हो जहाँ पापा खड़े थे। उस लम्हे को जीते हुए। तलवों ने कई दिन बाद मिट्टी महसूसी है। हवा चल रही है हल्की हल्की। बादल पूरी तरह हट गया है और चाँद एकदम से भौंचक हो कर झाँक रहा है आँगन में। धमका रहा है एक तरह से। बाबू देखा ना कोई तो पीटेगा नहीं, सीधे गाँव से उठा कर बाहर फेंक देगा। फिर ई ओसारा ज़िंदगी भर भूल जाना।

हमारे हाथ एक दूसरे को जाने कौन सी कथा कह रहे हैं। मैंने देखा नहीं है, पर जानती हूँ। आँगन में आँसू गिरे हैं। मेरी आँख से, तुम्हारी आँख से भी। हम एकदम ही चुप वहाँ से ठीक वैसे ही वापस आते हैं। जूते पहनते हैं और गाँव से बाहर शिवालय तक तेज़ चलते आते हैं। एनफ़ील्ड स्टार्ट और इस बार तुम्हारी पकड़ से मैं जानती हूँ कि तुम्हें कितना डर लग रहा है।
लगभग दो घंटे में हम देवघर पहुँच गए हैं। इतने थके हैं कि सोचने की हिम्मत नहीं बची है। जिसकी चाभी हाथ में आयी है, उसके कमरे का दरवाज़ा खोले हैं और सीधे बेड पर पड़ के बेहोश सो गए हैं।

सुबह नींद साथ में खुली है। तुम्हें ऊनींदी देख रही हूँ। तुम्हारी आँखों की धूप से कमरा सुनहला है। मैं जानती हूँ कि तुम सच में हो फिर भी तुम्हें छूना चाहती हूँ। मगर इस लम्हे के बाद, ज़िंदगी है। होटल की केटली में पानी गरम करके दो कप कॉफ़ी बनाती हूँ। एक अजीब सा घरेलूपन है हमारे बीच। जैसे हम एक ही गाँव के बचपन वाले हैं। तुम मेरे गाँव एक बार जा के मेरे हो गए हो।

तुम अब मुझे कहानी सुनाते हो कि क्यूँ तुम्हें ठीक उस जगह होना था जहाँ मेरा नामकरण हुआ था। देवघर के ही एक पंडा जी ने तुम्हारे बचपन में तुमसे एक बार कहा था कि तुम्हारी ज़िंदगी में ‘प’ अक्षर बहुत प्रेम लेकर आएगा। ज़िंदगी भर तुम्हारा इस नाम से कोई रिश्ता नहीं रहा। ना तुम पानीपत, पटना, पटियाला, प्रयाग जैसे शहरों में कभी रहे, ना कभी तुम्हें प नाम से शुरू होने वाली किसी लड़की से कभी प्रेम हुआ, यहाँ तक कि शादी भी जिससे हुयी, उसके नाम में कहीं भी ये अक्षर नहीं था। जब तक तुम मुझसे नहीं मिले थे तुम भूल भी चुके थे तुम्हारे बचपन में ऐसी कोई बात कभी किसी ने कही थी। मुझसे मिलना तुम्हें कई चीज़ों के बारे में दुबारा सोचने को मजबूर करता है। शादी। घर। गिरहस्थी। प्रेम। भविष्यवाणी। देवघर के पंडे।

तुम उस जगह खड़े होकर उस एनर्जी को महसूसना चाहते थे जो तुम्हें इस बेतरह अफ़ेक्ट करती है। कि ठीक उसी लम्हे मैं तुमसे जुड़ गयी थी, तुम्हारे जाने बिना। तुम हँसते रहे हो हमेशा, कि मेरे नाम में जाना लिखा है और तुम दुखते रहे हमेशा कि मैं लौट लौट कर आती रही। कि मैं तुम्हारे पागलपन से कभी घबराती नहीं, ना सवाल पूछती हूँ। कि मैंने जाने कौन सा प्रेम तुम्हारे हिस्से का जोग रखा है।

प्रेम अपने शुद्ध स्वरूप में निश्छल और निर्दोष होता है। मैं हँसती हूँ तुम्हें देख कर।
‘अब पंडाजी का ख़बर भी लेने चलोगे?’
‘नहीं रे। तुमको देख कर बोल दिया कि यही है प अक्षर वाली, तो मैं बाल बच्चों वाला आदमी इस धर्मसंकट में मर ही जाऊँगा। इतना काफ़ी है कि मेरा दिल जानता है।’
‘क्या जानता है?’
‘कि एक अक्षर भर का प्रेम जो मेरे नाम लिखा था। तुम्हारे नाम से शुरू होकर, तुम पर ही ख़त्म होगा।’
‘इतने से में जी लोगे तुम?’
‘मुझे बहुत की ख़्वाहिश कभी नहीं रही। और ये, इतना सा नहीं, है काफ़ी है’।
‘यूँ भी, सब मोह माया है’
‘नहीं, मोह से ज़्यादा है रे। प्यार है, तुमको भी, हमको भी। लेकिन हाँ, तुम्हारे इस प्यार पर हक़ है मेरा। और कि तुमसे दूर जाने का तकलीफ़ उठाना बंद कर देंगे अब’
‘बाबा नगरी में आ के तुमरा बुद्धि खुल गया’
‘रे पागल लड़की, सुनो। तुम अपना नाम कभी मत बदलना’।
‘कौन सा नाम? पूजा?’
‘नहीं। पागल’

[अगली बार वो पूछे कि तुमको पागल बुलाने में बेसी अच्छा लगता है, तो उसको यही कहानी सुनाएँगे]

*as said by Stein

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चुनना पलाश

तुमने कभी ग़ौर किया है कि अब हमारी बातों में, गीतों में, फ़िल्मों में…फूलों का ज़िक्र कितना कम आता है?fullsizeoutput_e81.jpeg

तुमने आख़िरी बार किसी फूल को कब देखा था ग़ौर से…मतलब वैलेंटायन डे पर फूल देने की जेनेरिक रस्म से इतर। कि गुलाब के सिवा कितने और फूलों के नाम पता हैं तुम्हें? कोई पूछ ले कि तुम्हारा पसंदीदा फूल कौन सा है तो कह सकोगे? कि तुम्हें फूल पसंद ही नहीं हैं…या कि तुम तो लड़के हो, तुम्हें कभी किसी ने फूल दिए ही नहीं तो तुम्हें क्या ही करना है फूलों का?

माना कि गमले में फूल उगाना और मौसमों के साथ उनकी ख़ुशबू चीन्हना सबके क़िस्मत में नहीं होता। लेकिन फूलदान में लगे फूलों की तासीर पहचानने के लिए किसी लड़की की ज़रूरत क्यूँ रही तुम्हें? कितनी सारी ख़ूबसूरती तुम्हारी आँखों के सामने रही और तुमने कभी देखा नहीं। फिर फ़ालतू का उलाहना देते फिरोगे कि ये दुनिया बहुत ही बदसूरत जगह है। 

तुम जानते हो कि लैवेंडर किस रंग का होता है? या कि ठीक ठीक लैवेंडर की ख़ुशबू ही? तुम्हें लगता है ना कि तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो कुछ इस तरह कि मेरे बारे में सब कुछ ही मालूम है तुम्हें…तो बताओ मुझे कौन कौन से फूल पसंद हैं और क्यूँ? नहीं मालूम ना तुम्हें…

चलो, कुछ फूलों को याद करते हैं फिर से…मेरे बचपन में बहुत फूल थे…बहुत रंगों के…

सबसे पहले एक जंगली फूल का नाम, पुटुश…ये फूल मैंने पूरी दुनिया के जंगलों में देखे हैं। हम जब बच्चे हुआ करते थे तो ये फूल सबसे ज़्यादा दिखते थे आसपास। ये एक छोटे छोटे फूलों का गुच्छा होता है जिसके काले रंग के फल होते हैं। फूलों को निकाल कर चूसने से हल्का मीठा मीठा सा स्वाद आता है। बचपन से लेकर अब तक, मैं अक्सर ये काम किया करती हूँ। इसकी गंध के साथ इतनी सारी यादें हैं कि तुम सुनोगे तो पागल हो जाओगे, लेकिन ख़ैर। कोई फूल हमारी ज़िंदगी में कैसे रचा-बसा-गुंथा होता है ये हम बचपन में कहाँ जानते हैं। दिल्ली गयी थी तो अपने छोटे शहर को बहुत मिस कर रही थी। इतनी इमारतों के बीच रहने की कभी आदत नहीं रही थी। IIMC, JNU कैम्पस का हिस्सा है। पहले ही दिन से PSR की कहानियाँ सुनने लगते हैं हम। मैं उस लड़के को जानती भी नहीं थी, उन दिनों। बस इतना कि वो मेरी एक दोस्त का दोस्त है। उसने JNU से फ़्रेंच किया था। अगस्त की हल्की बारिश की एक शाम उसने पूछा, PSR देखने चलोगी…हम चल दिए। JNU की सड़कों से होते हुए जब PSR पहुँचे तो पुटुश की झाड़ियों के बीच से एक पगडंडी जाती थी। बारिश हुयी थी थोड़ी देर पहले, एकदम फुहारों वाली। तेज़ गंध थी पुटुश के पत्तों की…मीठी और जंगली…दीवानी सी गंध…जैसी की मनमर्जियों की होती है। बेपरवाहियों की भी। पुटुश मुझे कई जगह मिलता रहा है। अलग अलग सफ़र में। अलग अलग क़िस्सों के साथ। बस। मीठा होता है इसके इर्द गिर्द होना, हमेशा। जंगल के इर्द गिर्द का पुटुश मुझे बेहद पसंद है। लेकिन देखो, बुद्धू। मेरे लिए पुटुश तोड़ कर मत लाना, काँटे होते हैं इसकी झाड़ियों में। तुम्हारे हाथ ज़ख़्मी हुए तो क़सम से, दिल मेरा दुखेगा। 

दसबजिया/नौबजिया फूल: छोटे छोटे फूल जो सुबह सुबह खिल जाते थे और बहुत रंग में आते थे। बहुत आसानी से उगते थे और देर तक रहते थे। (कभी कभी सोचती हूँ ये एक घंटे का अंतर किसी अमेरिकन टाइम टेबल के हिसाब से होगा। DST अजस्ट करने के लिए)

गुलदाउदी: उन दिनों मेहनत करने वाले लोगों के बाग़ में बड़े बड़े गुलदाउदी खिला करते थे। बाक़ी लोगों के यहाँ छोटे छोटे अक्सर सफ़ेद या पीले जिसमें से जाड़ों की धूप, ऊन वाले स्वेटर और रात के अलाव की की ख़ुशबू आती थी।

रजनीगंधा: मेरे घर में कुआँ था और घर से कुआँ जाने के रास्ते में दोनों तरफ़ रजनीगंधा लगा हुआ था। जब ये फूलता था तो रास्ते में छोटा छोटे भुकभुकिया बल्ब जैसा लगता था। घर के हर शादी, फ़ंक्शन में गजरा के लिए सबको रजनीगंधा की लड़ियाँ ही मिलती थीं। जब पहली बार घर से बाहर अकेले रहना शुरू किए तो बिजलरी की बोतल में रखने के लिए पहली बार बेर सराय से ख़रीद कर रजनीगंधा का एक स्टिक रखे। पहला फूलदान ख़रीदे तो उसमें एक रजनीगंधा की स्टिक और एक लाल गुलाब रखा करते थे। इन दिनों रजनीगंधा कभी नहीं ख़रीदते कि वो एक कमरा इतना याद आता है कि दुखने लगता है। ये उस वक़्त की ख़ुशबू है जब जीवन में कोई दुःख नहीं था। 

कारनेशंस: मैं उस लड़के से प्यार करती थी। वो मुझे सोलमेट कहता था। हम बहुत दूर के शहरों में रहते थे। उसके शहर का समंदर मुझे उसकी याद दिलाता था, गीतों में नमकीन होता हुआ। उसने एक बार मुझे फ़ोन किया, उसे अपने किसी दोस्त के जन्मदिन पर फूल देने थे। मैंने पूछे, कौन से…उसने कहा, कारनेशंस…मैंने पूछा, कौन से रंगे के…उसने कहा सफ़ेद। मैंने पहली बार कारनेशंस का गुलदस्ता बनवाया और उसके उस दोस्त के लिए डेस्क पर रखा। गुलदस्ते की एक तस्वीर खींच कर भेजी उसे। उसका मेसेज आया, ‘ब्यूटिफ़ुल, जस्ट लाइक यू’। फूल सिर्फ़ बहाना था। उसे कहना था मुझे कि मैं कारनेशंस की तरह ख़ूबसूरत हूँ। वो रक़ीब है तुम्हारा। उतना प्यार तुम मुझसे कभी नहीं कर सकोगे। फिर उसने कभी मेरे लिए फूल नहीं ख़रीदे…तो सुनो, मेरे लिए कारनेशंस कभी ख़रीद कर मत लाना। 

लिली: वही लड़का, उफ़। मतलब क्या कहें तुमसे। जादू ही था। पहली बार उसने लिली ख़रीदी थी, सफ़ेद। मेरी कलीग की सीट पर रखा था एक काँच के गिलास में। लिली का बंद फूल, कली यू नो। एक पूरे हफ़्ते नहीं खिली वो। मुझे लगा नहीं खिलेगी। वो रोज़ उसका पानी बदलता। वीकेंड आया। मैं कमरे में आयी तो एक अनजान ख़ुशबू आयी। मैं ये गंध नहीं पहचानती थी। कमरे में आयी तो उसे देखा। धूप देखी। उसकी आँखें देखी। उसने कहा, देखो, तुम आयी ना, अभी अभी लिली खिली है। ये वाक़या झूठ है हालाँकि। मैंने ख़ुद के लिए कई बार सफ़ेद लिली ख़रीदी। मुझे उसकी गंध इतनी पसंद थी जितना वो लड़का। लेकिन फिर प्यार भी बहुत ज़्यादा था और लिली की गंध भी कुछ ज़्यादा ही सांद्र। तो बर्दाश्त नहीं होता अब। तो देखो, मेरे लिए लिली मत लाना। 

बोगनविला: लहक के खिलते पूरे JNU के वसंत में कि जैसे मेरे जीवन का आख़िर वसंत हो। मैं हैंडीकैम लिए बौराती रहती सड़क दर सड़क। सोचती कि रख लूँगी आँख भर बोगनविला के सारे शेड्स। मुहब्बत की कितनी मिठास तो। बेलौस धुन कोई। उड़ता रहेगा दुपट्टा यूँ ही आज़ाद हवा में और मेरे दिल को नहीं आएगा किसी एक का होकर रहना। बहुत साल बाद बोगनविला से दुबारा मिली तो जाना कि जंगली ही नहीं ज़िद्दी पौधा भी है। घर के दरवाज़े पर लगा बोगनविला मुहब्बत की तरह पुनर्नवा है। दो महीने में पूरा सूख कर दो महीने में फिर से लौट भी आता है। इक शाम साड़ी पहन मुहब्बत में डूबी इतराते हुए चली तो जूड़े में बोगनविला के फूल लगा लिए। इस अफ़ोस के साथ कि उम्र भर इतने ख़ूबसूरत बाल रहे लेकिन तुम्हारे जैसे नालायक लड़कों से दुनिया भरी है कि किसी ने कभी बालों में लगाने के लिए फूल नहीं ला के लिए। बोगनविला अगर तुमने लगा रखे हों घर में, तो ही लाना मेरे लिए बोगनविला के फूल। वरना रहने दो। मुझ बेपरवाह औरत के घर में हमेशा खिला रहता है बोगनविला। बाक़ी समय किताबों में बुक्मार्क हुये रहते हैं रंग वाले सूखे फूल। सफ़ेद बोगवानविला पसंद हैं मुझे। उनपर फ़ीरोज़ी स्याही से तुम्हारा नाम लिख के सबिनास की प्रेम कविताओं की किताब में रख दूँगी। अगर जो तुम्हें याद रहे तो। 

ट्युलिप: बहुत्ते महँगा फूल है। आकाशकुसुम जैसा। पहली बार देखे थे तो छू कर तस्दीक़ किए थे कि सच का फूल है। मैंने आज तक कभी ख़ुद के लिए ट्युलिप नहीं ख़रीदे। एक बार बीज देखे थे इसके। लेकिन इसलिए नहीं ख़रीदे कि यहाँ उगाने बहुत मुश्किल होंगे। तुमसे तो उग जाते हैं लेकिन। पता है, न्यू यॉर्क के सेंट्रल पार्क में तुम अपने किसी प्यारे व्यक्ति के नाम पर ट्यूलिप्स लगवा सकते हो। इसके लिए मेरे मरने और मेरी क़ब्र पर ट्युलिप लगाने जैसी मेहनत नहीं है। ना तो मैं अभी मर रही, ना मेरी क़ब्र होगी। तो रहने दो। कॉफ़ी मग में एक छोटा सा ट्युलिप मेरे नाम पर उगा दो ना!

मुझे ज़रबेरा पसंद हैं। सिम्पल ख़ुश फूल। कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए उन्हें। बहुत महँगे भी नहीं होते। मैं हमेशा तीन ज़रबेरा ख़रीदती हूँ। अक्सर दो पीले और एक सफ़ेद। या कभी दो सफ़ेद, एक पीला। मूड के हिसाब से सफ़ेद और पिंक या कभी लाल और पीले भी। पिछले दस साल से एक ही दुकान से ले रही हूँ। सोचती हूँ, अब जो मैं नयी लोकैलिटी में शिफ़्ट हो रही हूँ…उस दुकान का एक रेग्युलर कस्टमर कम हो जाएगा। जीवन में कितने दुःख हैं। 

और पलाश। कि जीवन में सबसे रंगभरा, सुंदर, और मीठा जो फूल है वो है पलाश। एक इश्क़ की याद कि जो अधूरा है लेकिन टीसता नहीं, सुलगता है मन के जंगल में। गहरा लाल रंग। फूलता है टेसु और जैसे हर महीना ही मार्च हुआ जाता है। मिज़ाज फागुन, और गाल गुलाल से रंगते लाल, पीले, हरे…कोई होता है लड़का गहरे डिम्पल वाला जिसकी हँसी में डूब जाती हूँ। सच का होता तो साँस अटक जाती, क़सम से! इनावरण में हुआ करता था पलाश का जंगल जो कि होली में लहकता था ऐसे जैसे कि कोई दूसरा साल या वसंत कभी आएगा ही नहीं। उसी से मिल कर पता चला, सपनों के राजकुमारों के मोटरसाइकल रेसिंग स्कूल होते हैं, उसका वो नम्बर वन रेसर था। बाइक ऐसी तेज़ चलाता था कि उतनी तेज़ बस दिल धड़कता था। इक दिन जाना है उसके छूटे हुए शहर और वापसी में पूरे रास्ते रोपते आना है पलाश के पौधे कि कभी वो मुझ तक लौटना चाहे तो मार्च में लौटे, वसंत से गलबहियाँ डाले हुए। उसे चूमना वायलेंट हो कि होठों के किनार पर उभर आए ख़ून का गहरा लाल रंग। वो होंठ फिरा कर चखे बदन में दौड़ते ख़ून का स्वाद और मुस्कुराते हुए पूछे, इश्क़? मेरी आँखों में मौसम बदल कर हो जाए सावन और मैं कहूँ, अफ़सोस। मगर वो बाँहों में भरे ऐसे कि मन कच्चा हरा होता जाए, पलाश की कोंपल जैसा। वो कह सके, तुम या तो एक बार काफ़ी हो या उम्र भर भी नहीं। 

तुम ठीक कहते हो कि मेरी बातें कभी ख़त्म नहीं होंगी। जितनी लम्बी फूलों की लिस्ट है, इतना तो प्यार भी नहीं करते हो तुम मुझसे। उसपे कुछ ज़्यादा ही मीठी हूँ मैं। ये तुम्हारी उम्र नहीं इतने मीठे में ख़ुद को इंडल्ज करने की। हमसे इश्क़ करोगे तो कहे देते हैं, डाइअबीटीज़ से मरोगे तुम!