Waking up anxious is a regular pattern all my life. These days, sometimes I wake up bitter too. Angry against the world, the people, the blank noise in my head…it could be anything. I want to break things…like smash a couple of glasses and plates, throw somethings down the terrace… you get an idea.
I try yoga. God knows if it helps. And I come back to my table to write something. Mostly in my diary or in a spare notebook I keep. Very rarely does it spill on to my page. Specially because this page restricts me in my language. There is no reason to…but humans are creatures of habit. Most readers are quite startled when they see some English post on this page. Also, the act of writing with a pen is calming to the nerves, while the sound made by typing, however soft it might be, fires up my anxiety, even further.
I write in English when I am a bit bamboozled. Angry too. English is the language for anger and confusion. Sometimes the words are too convoluted and do not fall straight. They keep bumping off the walls of my mind like some crazy, drunk driver driving a car. It reminds me of those game areas where the cars were all having air-filled tubes around them and people used to bump each other. I rode them in Essel World in Bombay for the first time, if I correctly remember.
Every such morning, I ask myself a why. Is there something wrong with me physically? Mentally? Because my diaries go back to 96 and even then I find the word depressed at one place. When I read it, I laughed at my naivety. Maybe I didn’t know what it was like to be depressed. Maybe I knew. There is no clear way to find out. But I do know that the world was always overwhelming for me. I was always overtly curious. And since forever, people have let me down.
On such days I know. There is an ancient hurt in my soul that all the love of this life cannot cure. रूह को कलपा देने वाले जन्मपार के दुःख। जिनका कोई इलाज नहीं। जीते जी कुछ ही बार हुआ है कि किसी ने लगाया है सीने से और मैं भूल गयी हूँ कि कुछ दुखता भी है।
What do I seek? Every morning I ask myself this question. And the reply is still ‘escape’. I still want to run away from my life. Start over. Clean slate.
I want a life in which I do not wake up anxious. In which I wake up and breathe normally. I write about happy people. Suicides and such other stories do not find their way to me – in story, movies or television series.
It seems like they have injected a happiness inhibitor in my system. I don’t remember the last time I felt happy. Or the whole f***king problem is, that I remember too much what I should forget. And I forget what I should remember. That there is actually no problem in my life. I am loved. I am financially secure. I live in a beautiful house that has a terrace, I bloody have a sky of my own to look up to when I feel like. I have a Royal Enfield that has my name on the RC. What else can a person want?
Conversations. That’s what I miss. The reason I write. And the reason when I first started blogging I was happy to see, there were a few that felt like friends. Those who would understand the rambling about why and how paintings talk to me. Why I can stand in front of a Monet painting and almost be reduced to tears.
Too much darkness in my soul. Too gloomy a morning today, no sunshine.
I should drink some hot chocolate. And I will be posting this on my blog. But also here. And anyone with advice on this post. You’ve been warned. I am a in a seriously bad mood today, don’t cross me.
#rambling #randommood #earlymorninganxiety

Musings, Shorts

There is something wrong with the way I love. Maybe there is some right way to love people, cities, objects… a way that makes you immensely happy when you are around them and gives you strength to endure their absence. 

A way in which you do not become a raving lunatic every time the name crops up in normal everyday conversations. Maybe some people love without getting so attached to their object of desire and get less hurt when they have to let go. Do I obsess too much? Have I given undue importance to love in my life? Making it the centre of everything there is. Poetry I read, films I watch, sunsets that become a part of my city…maybe they are not about love.  Maybe love actually should just be a part of life. Maybe we should do things with a certain detachment to begin with. 

Love is not about pain. It should not be. If loving would hurt so much every time, eventually, I would be and should be afraid to love. Maybe being sarcastic or cynic has its benefits. Maybe creating a self defence wall around the heart helps. 

Maybe. There might be a love in the world that hurts a little less.

Musings, Shorts

फ़ासले ऐसे भी होंगे

आज सुबह नींद खुली और आदतन फ़ोन की ओर हाथ नहीं गया। कि आदत सिर्फ़ बनने में ही वक़्त नहीं लगता, छूटने में भी तो वक़्त लगता है। रोज़ लगता था कि आज सुबह फ़ोन में तुम्हारा मेसेज होगा। कि तुमने कुछ कहा होगा। कोई तस्वीर होगी। कोई कविता का टुकड़ा होगा। कोई वजह होगी। कई सालों की आदत थी। लेकिन शायद आज दिल ने आख़िरकार मान लिया कि कोई मेसेज नहीं होगा। इस तरह उम्मीद टूट जाती है। इंतज़ार चुक जाता है।

अब हम बात करेंगे भी तो उस रोज़ की तरह नहीं जैसे पिछले कुछ सालों से करते आ रहे थे। कि हर ख़ुशी में तुम्हारा हिस्सा निकाल के रख देना ज़रूरी नहीं लगेगा। हर ख़ूबसूरत चीज़ को तुमसे बाँटने की हूक नहीं सालेगी। होगा ये सब भी, धीरे धीरे होगा।
यूँ तुम्हें भुलाने को हज़ार तरीक़े हैं। काम है, पढ़ना लिखना है, घूमने की जगहें हैं, कोई नया शौक़ पाल सकती हूँ, इस घर में तो गमले ही इतने हैं कि फूल लगा दूँ तो हज़ार रंगो में भूल जाऊँगी तुम्हारी आँखों का रंग… बहुत कुछ है जिससे ख़ुद को इस तरह व्यस्त रखा जा सके कि तुम्हारी याद नहीं आए। हालाँकि ऐसे व्यस्त रहने के बावजूद याद जिन दिनों आती है, उन दिनों आ ही जाती है। लेकिन ज़िद्दी मन ऐसा कुछ करना नहीं चाहता था। उसे तुम्हारी मौजूदगी का आश्वासन चाहिए था। तुम्हारी ज़रूरत थी। मुझे ऐसे ज़िंदगी नहीं चाहिए जिसमें लोग नहीं हों। मुझे ऐसे सुख नहीं चाहिए जिनके बारे में हुलस कर किसी को फ़ोन नहीं किया जा सके।
कि फ़िलासफ़ी पढ़ने से समझ में आ जाती है सारी चीज़ें भी। गीता का ठीक से अध्ध्ययन करने से समझ में आएगा, ‘नष्टोमोह’। लेकिन मुझे वैसी ज़िंदगी नहीं चाहिए। ‘रहने दो हे देव, अरे यह मेरा मिटने का अधिकार’ की तरह, मेरे लिए मेरा ये चोटिल और नाज़ुक मन ज़रूरी है जो प्रेम कर सकता हो। प्रेम में टूट सकता हो। मैं निष्ठुर नहीं होना चाहती। हर बार टूट कर भी फिर जुड़ने की क्षमता ही जिजीविषा है। मैं मोह-माया छोड़ना नहीं चाहती। जीवन जीने भर को प्रेम की चाह क्या बहुत ज़्यादा है?
ख़ुश रहने की किताब मिलती है बाज़ार में। एक ऐसी किताब है, हैप्पीनेस हायपोथेसिस, उसमें लिखा है कि अगर कोई रिश्ता टूटा हो और आप इस बात पर यक़ीन करना चाहते हैं कि जीवन प्रेम के बिना ही बेहतर है तो आपको फ़लसफ़े पढ़ने चाहिए। उसी किताब में लिखा है कि जब आपको प्रेम हुआ हो और आप प्रेम के अतिरेक में हों, तो आपको कविता पढ़नी चाहिए।
मैं कविता हमेशा ही पढ़ती हूँ। कविता मेरा घर है। मैं उस तक लौट कर आती हूँ थोड़े सुकून की तलाश में। मेरे सिरहाने हमेशा कविता की किताबें रहती हैं। मेरे हर बैग में कमोबेश एक ना एक कविता की किताब ज़रूर ही। मैं प्रेम में ही होती हूँ, हमेशा। अतिरेक ठीक ठीक नहीं मालूम।
लेकिन तड़प कर किसी ईश्वर से तुम्हें माँगने का मन नहीं करता। आने वाले को और जाने वाले को कौन रोक सका है। मैं दुःख के साथ विरक्ति भी महसूस करती हूँ। मेरे जीवन में तुम्हारी जगह इतनी ही थी। एक मौसम की तरह। जाड़ों का मौसम। कि तुम्हारे आने पर थोड़ी सी गरम कॉफ़ी की ज़रूरत और थोड़ी थरथराहट महसूस हुयी।
मुझसे कहते थे कुछ लोग, तुम्हें छोड़ कर कैसे रह लेते हैं लोग। तुमसे भी कोई रिश्ता तोड़ सकता है! अचरज होता था मुझे पहले भी। अब नहीं होता। अब तो मालूम होता है कि ऐसा ही होगा। अब डर लगता है। हर नए व्यक्ति से बात करने में एक दूरी बना के रखती हूँ। कभी थोड़ा जुड़ाव लगता भी है तो जान बूझ कर कुछ दिन बात करना बंद कर देती हूँ। टूटते टूटते कितना ही हौसला रखें कि ख़ुद को सम्हाल लेंगे। फिर लोगों में इतनी तमीज़ कहाँ होती कि अलविदा कह के जाएँ ज़िंदगी से दूर। जब तुम जा सकते हो बिना अलविदा कहे हुए, तो अब हमको किसी से कोई उम्मीद करनी ही नहीं है।
दुःख तुम्हारे जाने का है। बदला अपने दिल से और पूरी दुनिया से लेंगे।

Musings, Shorts
वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार-सू

मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था

याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’

भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था


बता ज़िंदगी। ऐसा ही होगा क्या। हमेशा। कि हम अकेले रह जाएँगे किसी के होने और ना होने का हिसाब करते हुए? बहुत दिन इंतज़ार करने के बाद इक सुबह सोचते कि अब शायद एक तारीख़ मुक़र्रर करनी होगी, जिस तारीख़ तक उसे याद किया जाए और फिर भूलने की क़वायद शुरू हो। कि कितना डर लगता है ऐसी किसी तारीख़ से।

हमने कौन सा कुनबा माँग लिया? मतलब, भगवान क़सम, हमसे ज़्यादा लो-मेंट्नेन्स होना नामुमकिन है। दोस्ती में, प्रेम में… किसी भी और रिश्ते में। हथेली फैला कर कुछ नहीं माँगते। जितना सा हक़ है, उससे एक ज़रा ज़्यादा नहीं माँगा कभी, भले कम में ही एडजस्ट कर लिए कभी ज़रूरत पड़ी तो। हमेशा सामने वाला का हालत समझे, रियायत बरते। हम तो दर्द मरते रहे लेकिन परिवार से भी कभी अपने हिस्से का वक़्त, प्रेम, मौजूदगी के लिए लड़ाई नहीं की। एक ग्लास पानी माँग कर नहीं पिया कभी। 

यही तुम्हारा न्याय है? किसी को हमारी याद नहीं आएगी और हम बिसरते जाएँगे इंतज़ार में। कितनी बार यही बात दोहरायी जाएगी? किसी को दूर जाना है तो क़रीबी होने के बाद क्यूँ? फ़ासला हमेशा से क्यूँ नहीं रख सकते। चाह इतनी ही है ना कि कभी एक फ़ोन करने के पहले सोचना ना पड़े। कि whatsapp पर भेजा कोई मेसेज महीने भर तक ग्रे ना रहे… नीले टिक्स आ जाएँ कि पढ़ लिया गया है। कि बातें रहें। थोड़ी सी सुख की, थोड़ी सी दुःख की। शहर के मौसम, पढ़ी गयी कविताएँ और जिए गए दिन, दोपहर, शामें रहें… थोड़ी बारिश, थोड़ा विंडचाइम की आवाज़ भेज सकूँ। फिर जाना है तो कह क्यूँ नहीं सकते? कितना मुश्किल है इतना भर कह देना कि आजकल हम बहुत व्यस्त होते जा रहे हैं… या कि एक आख़िरी बार बहुत सी बात कर ली जाए… बात जिसमें अलविदा का स्वाद हो… खारा। बात करते हुए गला रूँध जाए। आँख बेमौसम भर आए। इतना सा अलविदा ही तो माँगे, हम तो किसी के रुकने तक का नहीं कहते। 

हमें कब आएगा अपने दिल को किसी इमोशन-टाइट-प्रूफ़ डिब्बे में बंद करके दफ़ना देना। हम कब हो सकेंगे ऐसे कि अपनी तन्हाई के साथ बिना रोए कलपे रह सकें। इस शहर की चुप्पी को आत्मसात कर सकें। सह सकें दुःख। 

बता ज़िंदगी। खेलती ही रहोगी हमारे काँच दिल से? टूटता ही रहेगा, उम्र भर? दुखता ही रहेगा ऐसे? हम कब सीखेंगे अपने हालात के साथ सामंजस्य बिठाना। 

कि इससे अच्छा तो कर लिए होते गुनाह कुछ। तोड़ा होता बेरहम होकर दिल किसी का। किसी की दोस्ती ठुकरायी होती। किसी के स्नेह पर सवाल किए होते। किसी को आदर की जगह दुत्कार दिए होते। कमसेकम ये तो लगता कि ये हमारी सज़ा है। 

निर्दोष होने का गुनाह है हमारा?

Musings, Poetry

कविता पढ़ते हुए
उसके काग़ज़ी होंठ
नहीं मैच करते उसकी आवाज़ से।

थिर हो पढ़ता है कविता
आवाज़ रह जाती है
सुनने वाले की चुप्पी में आजीवन।

जी उठते हैं उसके होंठ
चूमने की हड़बड़ाहट में
छिनी जा रही होती है उम्र।

नहीं पड़ते हैं निशान
कि लौटानी भी तो होती है
उधार पर लायी प्रेमिका।

उसके प्रेम में उलझी स्त्रियों की
नश्वर देह में भी जीता है
उसका कालजयी कवि मन।

वो कविता पढ़ते हुए
कुछ और होता है
चूमते हुए कुछ और।


जाते हुए वह नहीं रुकता
शब्दों से, कविता से, या किताबों से ही
वो रुकता है सिर्फ़ देह पर।

इसलिए पिछली बार उसके जाते हुए
मैंने उसे लंघी मार दी
वो देहरी पर ऐसा गिरा कि कपार फूट गया
और कई कविताएँ बह गयीं टप टप उसके माथे से बाहर।

उस बार वह कई दिन रुका रहा था
शाम की सब्ज़ी, सुबह की चाय, और
दुनिया के सबसे अच्छे कवि कौन हैं
पर बक-झक करते हुए।

Musings, Shorts

एक दिन सफ़ेद फूलों का मौसम ख़त्म हो जाएगा। फिर मैं पूरे साल इंतज़ार करूँगी उनके आने का। कि कुछ नहीं रहता हमेशा के लिये, सिवाए इंतज़ार के। इंतज़ार हमेशा रहता है। सीने में दुखता। लिखते हुए उँगलियों में रगड़ खाता। आँखों से बहता। कितने रंग का तो होता है इंतज़ार।

मैं जाने कैसा अजीब सपना देखती हूँ। आज सुबह से दोपहर तक सोती रही और एक लम्बा सपना देखा। तुम्हारे शहर का। तुम्हारा। तुम्हारी बीवी और तुम्हारी बेटी भी थे सपने में। मेरे कुछ घर वाले भी। लेकिन सब लोगों के होने के बावजूद भी उस सपने में बस मैं और तुम थे। हँसते। जैसे कि कुछ बचा हुआ हो हमारे बीच। कोई शहर, ज़िंदा।

तुम्हें सपने में देखना ऐसा सुख है जो दुःख लिए आता है डुबोने के लिए। मैं जितना ही चाहती हूँ कि सहेज लूँ ज़रा तुम्हारी हथेली का स्पर्श, सोफ़े पर के सफ़ेद कुशन की नर्माहट या कि तुम्हारी आँखें। मगर याद कुछ नहीं रहता है।

क्यूँ लगता है कि तुम आसपास हो। इस देश या इस शहर में या कि इस दिल में ही। ये कैसा प्रेम है कि ख़ालीपन में उगता है। कैसी हूक है कि लिखने को नहीं आती। दुखने को आती है बस।

कुछ ख़त्म नहीं होता लिख कर। ना दुःख। ना तन्हाई। ना छलावा। तुम्हारी चाह कोई ऐसी अद्भुत वस्तु की लालसा तो है नहीं कि जिसके लिए तपस्या करनी पड़े। ये तो आसान होना था ना। जैसे कि फूल थोड़ी सी धूप माँगे, खेत ज़रा सी बारिश और गरमियों में नानीघर जाने का प्लान बने। ये तो इतना स्वाभाविक था…नैचुरल। हम जाने क्या माँग बैठते हैं कि ईश्वर का हिसाब गड़बड़ हो जाता है।

मैं बस इतना चाहती हूँ कि ज़रा कम दुखे। हालाँकि अब लगता है कि शायद डॉक्टर को दिखाने की नौबत आ गयी है। कोई दुःख है कि एकदम ही छलका छलका रहता है। ज़रा ज़रा सी बात पर आँख भर आती है। फ़िल्म देख कर रो देती हूँ। कविता पढ़ कर कलप जाती हूँ। मौसम भी अच्छा हो जाए तो जैसे दुखने लगता है।

मगर दिक़्क़त ये है कि मुझे नींद की गोलियाँ नहीं मृत्यु की गोलियाँ चाहिए। मैं सोना नहीं, मर जाना चाहती हूँ।

सुबह उठ कर सोचूँगी कि लिख सकूँ एक शहर जिसमें कि मेरे जीने भर को सुख हो और मेरे हँसने भर को दोस्त।

#soulrunes #daysofbeingwild #almoststrangers

Musings, Shorts

ज़िंदगी में जो सारी चीज़ें कई कई बार लौट कर आती हैं, उनमें से एक है भूलना। निर्मल लिखते हैं कि कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है। लेकिन याद कभी कभी साँस में अटकने लगती है और लगता है कि भूले नहीं तो शायद जीना भूल जाएँगे। कि जीना भी कभी कभी अपनेआप नहीं होता। मेहनत करनी पड़ती है। याद दिलाना पड़ता है ख़ुद को बार बार कि ज़िंदगी जीने लायक है।
स्टडी टेबल पर रखी होती है कोई बुद्धिस्ट प्रेयर व्हील कि हमने एक दोस्त के लिए और ख़ुद के लिए साथ में ख़रीदी थी। कि मुझे चीज़ें जोड़ों में ख़रीदना अच्छा लगता है, जैसे कि हमारी दुनिया एकदम ही अलग अलग हो जाएगी फिर भी कुछ है जो हमारी ज़िंदगी में कॉमन रहेगा। कि हम शायद तुम्हें पूरी तरह कभी नहीं भूल पाएँ।
खिड़की पर विंडचाइम जिस दिन आए थे उसके कुछ दिन बाद ही टाँग दिए थे लेकिन खिड़की आज खुली है तो विंडचाइम चीख़ चीख़ कर आसमान को अपने होने की ख़बर दे रही है।
टकीला शॉट मारने के लिए ग्लास ख़रीदे गए थे। मिट्टी से गिरे सफ़ेद फूल उठा कर लायी हूँ सुबह सुबह और एक इकलौता पीला फूल तोड़ा है। कि ख़ुशी का रंग यही ख़ुशनुमा पीला है। कि भूलने की लिस्ट में उस लड़की का नाम भी तो आता है जिसे पीला रंग बहुत पसंद था।
सुबहों का थोड़ा सा डिसप्लिन खोज रही हूँ वापस कि जीने में आसान रहे। आज बहुत दिन बाद लिखने बैठी हूँ। इस नए मकान में सबसे ऊपर वाले कमरे को स्टडी के लिए इस्तेमाल कर सकें, ख़ास इसलिए ये घर किराए पर लिया था। इतने दिन सीढ़ियाँ चढ़ नहीं रही थी कि घुटनों में दर्द ना उठ जाए। आज ठीक दो महीने हो गए जब कि ये दर्द उठा था, ६ तारीख़ को ही प्लास्टर खुला था और तब से ही दर्द का ये सिलसिला शुरू हुआ। आज दर्द है, लेकिन कम है।
मौसम में खुनक है। ठंढ लग रही है लेकिन गरम कपड़े नीचे रखे हैं, तो लाने नहीं जा रही।
किरदार कुछ यूँ हैं कि जिन्हें लिखने के लिए भूलना पड़ेगा कितना सारा सच का जिया हुआ। ख़ुद को याद दिलाना पड़ेगा कि लिखने में इतनी तकलीफ़ नहीं होगी कि मर जाऊँ। कि लिखना मेरा नैचुरल स्टेट है। कि मैं सबसे सहज लिखते हुए होती हूँ। सबसे ईमानदार। कि ज़िंदगी में कुछ चीज़ें जो अब तक करप्ट नहीं हुयी हैं, उनमें से एक मेरी क़लम की निब है।
और आज शायद ज़िंदगी में पहली बार लिखने के पहले काग़ज़ के ऊपर ‘जय माँ सरस्वती’ लिखा है। कि याद, भूलने, मरने, जीने और किसी तरह लिख लेने की इस क़वायद में अकेली कुछ नहीं कर सकती। तो थोड़ा सा सपोर्ट।
इस कमरे और इस खिड़की के सामने कई क़िस्से ज़िंदा हो सकें, जी सकें अपने हिस्से का आसमान और दे सकें मुझे बस इतनी राहत कि जान ना दे दूँ।
#soulrunes #daysofbeingwild #diaryofamadwriter