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दिक्कत ये है मेरी जान कि ये दुनिया गोल है।
तुम मेरे शहर में आए तो शहर को और मुझे, दोनों को तुमसे एक साथ प्यार हो गया। उस वक़्त ये सोचा नहीं कि तुम चले भी जाओगे। मेरे शहर की हर साँस लेती चीज़ को अपने अपने रंग में रंग के। आसमान, मौसम, ख़ुशबुएँ, गालियाँ, बारिश… सब कुछ ही तो तुम्हारा होता गया है। शहर मेरा नहीं रहा, और तुम लौट गए अपने शहर, तो बस, लावारिस हो गया है। दुनिया के ठीक दूसरे छोर पर तुम रहते हो। Diametrially opposite. धरती पर रहते हुए इससे ज़्यादा दूरी नहीं आ सकती हमारे बीच। यहाँ से किसी भी दिशा में एक क़दम भी बढ़ाऊँगी तो तुम्हारे क़रीब ही जाऊँगी।

तुम्हारे इश्क़ में ये शहर मेरी जान ले लेगा। बस। इतना ही होगा हमारा क़िस्सा।

23rd November

ज़िंदगी ने माथे को चूम कर रहा, सारे रंग तुम्हारे…

कि Monet ने अभी अभी मेरी आँखें रंगी हैं…इसी धुएँ से… और रंग गीले हैं…

27th November

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हम दो दुनियाओं के लोग हैं। हमसे सीधी बातों की उम्मीद मत करो। हमसे शहर के रंग पूछोगे तो तुम्हें दिल के क़िस्सों में उलझा देंगे… कि ज़रा बताओ, कितना आसान है उस लड़के के लिए तुम्हें भूल कर जीना, हँसना, सपने देखना … हमसे दिल के क़िस्से पूछोगे तो दुनिया के हसीन शहरों में ले जाएँगे और दुनिया की सबसे रहस्यमयी मुस्कान दिखा कर कहेंगे, वो मेरे इंतज़ार में कितने सालों से है, देखो… दुनिया आज भी इश्क़ में यूँ सिरफिरे, मुस्कुराते लोगों के मुस्कियाने को मोनालिसा स्माइल कहती है…

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जाने कौन सा शहर तुम्हारे पास हो। नदी किनारे क़तार से तमीज़दार पेड़ लगे हुए थे। पतझर के इन आख़िरी दिनों में बस ठूँठ ही दिखते थे। बस एक आध पेड़ कहीं कहीं होता था, सुलगते पीले पत्तों में, ज़िद्दी। जैसे दिल मेरा, भूलता नहीं तुम्हें। 

पूरे शहर में कई सारी बेंचें मिलीं। मैं वहाँ बैठ कर इत्मीनान से चिट्ठियाँ लिखना चाहती थी। जाने कैसे कैसे बातों का ज़िक्र करके, कि जैसे पहली बार भूने हुए चेस्टनट खाए… उनका सोंधा स्वाद बहुत अच्छा लगा मुझे। 

मेरे किसी दोस्त को स्ट्रीटलैम्प बहुत पसंद हैं। मुझे याद नहीं किसे। लेकिन एक स्ट्रीट लैम्प की फ़ोटो ले ली। जब याद आएगा दोस्त का नाम लिए बग़ैर उसे कह देंगे, कि याद आ रही थी तुम्हारी। कि हिचकियाँ भी आ रहीं थीं। कि जिसके याद करने से हिचकियाँ आ जाएँ, ऐसे बहुत कम लोग हैं ज़िंदगी में। 

तुम्हारे होने से मेरी शाम में रंग होते हैं। तुम कभी कभी अपने शहर के रंग भेज दिया करो मेरे शहर। 

शुक्रिया। प्यार।

1st December, Paris

एक वृत्त खिंचता है। तुम्हारे होने के दर्मयान, तुम्हारे अनहुए में। जो चीज़ें हो नहीं सकतीं, उनका। जो शहर धीरे धीरे लुप्त हो रहे हैं, उनका एक नक़्शा खिंचता है। जिन शहरों से मैं प्यार करती हूँ, उनमें मुझे भूल चुके लोग रहते हैं। 

कुछ शब्दों को उच्चारण करते हुए वे जी उठते हैं। क्यूँकि हमने उनका प्रयोग लिखने या पढ़ने के बजाए, बोलने में अधिक किया है। इसलिए कुछ नाम हमारे इतने क़रीबी होते हैं। हम उनकी आवाज़ से प्यार करते हैं। उनका नाम लेते हुए जो एक कोमलता आती है हमारी वाणी में, उस कोमलता से प्रेम करते हैं। उसी कोमलता से हम उनसे प्रेम भी करते हैं। 

हिंदी के कुछ शब्द प्रयोग से बाहर हैं, जैसे अनुपस्थिति… हम कहते हैं, तुम्हारा न होना… इसलिए इंग्लिश शब्द ऐब्सेन्स हमारे लिए रियल है क्यूँकि हमने उसका बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया है।

लेकिन कुछ शब्द अलग होते हैं। जैसे तुम्हारा नाम।

आवाज़ के पत्थर पर घिस कर शब्द चमक उठते हैं और ज़्यादा धारदार हो जाते हैं। इसलिए तुम्हारे नाम से काटी जा सकती है कलाइयाँ। तुम्हारा नाम एक शार्प औज़ार है जिससे मेरी हत्या की जा सकती है।

9 December, Bangalore

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There is something wrong with the way I love. Maybe there is some right way to love people, cities, objects… a way that makes you immensely happy when you are around them and gives you strength to endure their absence. 

A way in which you do not become a raving lunatic every time the name crops up in normal everyday conversations. Maybe some people love without getting so attached to their object of desire and get less hurt when they have to let go. Do I obsess too much? Have I given undue importance to love in my life? Making it the centre of everything there is. Poetry I read, films I watch, sunsets that become a part of my city…maybe they are not about love.  Maybe love actually should just be a part of life. Maybe we should do things with a certain detachment to begin with. 

Love is not about pain. It should not be. If loving would hurt so much every time, eventually, I would be and should be afraid to love. Maybe being sarcastic or cynic has its benefits. Maybe creating a self defence wall around the heart helps. 

Maybe. There might be a love in the world that hurts a little less.

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फ़ासले ऐसे भी होंगे

आज सुबह नींद खुली और आदतन फ़ोन की ओर हाथ नहीं गया। कि आदत सिर्फ़ बनने में ही वक़्त नहीं लगता, छूटने में भी तो वक़्त लगता है। रोज़ लगता था कि आज सुबह फ़ोन में तुम्हारा मेसेज होगा। कि तुमने कुछ कहा होगा। कोई तस्वीर होगी। कोई कविता का टुकड़ा होगा। कोई वजह होगी। कई सालों की आदत थी। लेकिन शायद आज दिल ने आख़िरकार मान लिया कि कोई मेसेज नहीं होगा। इस तरह उम्मीद टूट जाती है। इंतज़ार चुक जाता है।

अब हम बात करेंगे भी तो उस रोज़ की तरह नहीं जैसे पिछले कुछ सालों से करते आ रहे थे। कि हर ख़ुशी में तुम्हारा हिस्सा निकाल के रख देना ज़रूरी नहीं लगेगा। हर ख़ूबसूरत चीज़ को तुमसे बाँटने की हूक नहीं सालेगी। होगा ये सब भी, धीरे धीरे होगा।
यूँ तुम्हें भुलाने को हज़ार तरीक़े हैं। काम है, पढ़ना लिखना है, घूमने की जगहें हैं, कोई नया शौक़ पाल सकती हूँ, इस घर में तो गमले ही इतने हैं कि फूल लगा दूँ तो हज़ार रंगो में भूल जाऊँगी तुम्हारी आँखों का रंग… बहुत कुछ है जिससे ख़ुद को इस तरह व्यस्त रखा जा सके कि तुम्हारी याद नहीं आए। हालाँकि ऐसे व्यस्त रहने के बावजूद याद जिन दिनों आती है, उन दिनों आ ही जाती है। लेकिन ज़िद्दी मन ऐसा कुछ करना नहीं चाहता था। उसे तुम्हारी मौजूदगी का आश्वासन चाहिए था। तुम्हारी ज़रूरत थी। मुझे ऐसे ज़िंदगी नहीं चाहिए जिसमें लोग नहीं हों। मुझे ऐसे सुख नहीं चाहिए जिनके बारे में हुलस कर किसी को फ़ोन नहीं किया जा सके।
कि फ़िलासफ़ी पढ़ने से समझ में आ जाती है सारी चीज़ें भी। गीता का ठीक से अध्ध्ययन करने से समझ में आएगा, ‘नष्टोमोह’। लेकिन मुझे वैसी ज़िंदगी नहीं चाहिए। ‘रहने दो हे देव, अरे यह मेरा मिटने का अधिकार’ की तरह, मेरे लिए मेरा ये चोटिल और नाज़ुक मन ज़रूरी है जो प्रेम कर सकता हो। प्रेम में टूट सकता हो। मैं निष्ठुर नहीं होना चाहती। हर बार टूट कर भी फिर जुड़ने की क्षमता ही जिजीविषा है। मैं मोह-माया छोड़ना नहीं चाहती। जीवन जीने भर को प्रेम की चाह क्या बहुत ज़्यादा है?
ख़ुश रहने की किताब मिलती है बाज़ार में। एक ऐसी किताब है, हैप्पीनेस हायपोथेसिस, उसमें लिखा है कि अगर कोई रिश्ता टूटा हो और आप इस बात पर यक़ीन करना चाहते हैं कि जीवन प्रेम के बिना ही बेहतर है तो आपको फ़लसफ़े पढ़ने चाहिए। उसी किताब में लिखा है कि जब आपको प्रेम हुआ हो और आप प्रेम के अतिरेक में हों, तो आपको कविता पढ़नी चाहिए।
मैं कविता हमेशा ही पढ़ती हूँ। कविता मेरा घर है। मैं उस तक लौट कर आती हूँ थोड़े सुकून की तलाश में। मेरे सिरहाने हमेशा कविता की किताबें रहती हैं। मेरे हर बैग में कमोबेश एक ना एक कविता की किताब ज़रूर ही। मैं प्रेम में ही होती हूँ, हमेशा। अतिरेक ठीक ठीक नहीं मालूम।
लेकिन तड़प कर किसी ईश्वर से तुम्हें माँगने का मन नहीं करता। आने वाले को और जाने वाले को कौन रोक सका है। मैं दुःख के साथ विरक्ति भी महसूस करती हूँ। मेरे जीवन में तुम्हारी जगह इतनी ही थी। एक मौसम की तरह। जाड़ों का मौसम। कि तुम्हारे आने पर थोड़ी सी गरम कॉफ़ी की ज़रूरत और थोड़ी थरथराहट महसूस हुयी।
मुझसे कहते थे कुछ लोग, तुम्हें छोड़ कर कैसे रह लेते हैं लोग। तुमसे भी कोई रिश्ता तोड़ सकता है! अचरज होता था मुझे पहले भी। अब नहीं होता। अब तो मालूम होता है कि ऐसा ही होगा। अब डर लगता है। हर नए व्यक्ति से बात करने में एक दूरी बना के रखती हूँ। कभी थोड़ा जुड़ाव लगता भी है तो जान बूझ कर कुछ दिन बात करना बंद कर देती हूँ। टूटते टूटते कितना ही हौसला रखें कि ख़ुद को सम्हाल लेंगे। फिर लोगों में इतनी तमीज़ कहाँ होती कि अलविदा कह के जाएँ ज़िंदगी से दूर। जब तुम जा सकते हो बिना अलविदा कहे हुए, तो अब हमको किसी से कोई उम्मीद करनी ही नहीं है।
दुःख तुम्हारे जाने का है। बदला अपने दिल से और पूरी दुनिया से लेंगे।

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वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार-सू

मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था

याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’

भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था

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बता ज़िंदगी। ऐसा ही होगा क्या। हमेशा। कि हम अकेले रह जाएँगे किसी के होने और ना होने का हिसाब करते हुए? बहुत दिन इंतज़ार करने के बाद इक सुबह सोचते कि अब शायद एक तारीख़ मुक़र्रर करनी होगी, जिस तारीख़ तक उसे याद किया जाए और फिर भूलने की क़वायद शुरू हो। कि कितना डर लगता है ऐसी किसी तारीख़ से।

हमने कौन सा कुनबा माँग लिया? मतलब, भगवान क़सम, हमसे ज़्यादा लो-मेंट्नेन्स होना नामुमकिन है। दोस्ती में, प्रेम में… किसी भी और रिश्ते में। हथेली फैला कर कुछ नहीं माँगते। जितना सा हक़ है, उससे एक ज़रा ज़्यादा नहीं माँगा कभी, भले कम में ही एडजस्ट कर लिए कभी ज़रूरत पड़ी तो। हमेशा सामने वाला का हालत समझे, रियायत बरते। हम तो दर्द मरते रहे लेकिन परिवार से भी कभी अपने हिस्से का वक़्त, प्रेम, मौजूदगी के लिए लड़ाई नहीं की। एक ग्लास पानी माँग कर नहीं पिया कभी। 

यही तुम्हारा न्याय है? किसी को हमारी याद नहीं आएगी और हम बिसरते जाएँगे इंतज़ार में। कितनी बार यही बात दोहरायी जाएगी? किसी को दूर जाना है तो क़रीबी होने के बाद क्यूँ? फ़ासला हमेशा से क्यूँ नहीं रख सकते। चाह इतनी ही है ना कि कभी एक फ़ोन करने के पहले सोचना ना पड़े। कि whatsapp पर भेजा कोई मेसेज महीने भर तक ग्रे ना रहे… नीले टिक्स आ जाएँ कि पढ़ लिया गया है। कि बातें रहें। थोड़ी सी सुख की, थोड़ी सी दुःख की। शहर के मौसम, पढ़ी गयी कविताएँ और जिए गए दिन, दोपहर, शामें रहें… थोड़ी बारिश, थोड़ा विंडचाइम की आवाज़ भेज सकूँ। फिर जाना है तो कह क्यूँ नहीं सकते? कितना मुश्किल है इतना भर कह देना कि आजकल हम बहुत व्यस्त होते जा रहे हैं… या कि एक आख़िरी बार बहुत सी बात कर ली जाए… बात जिसमें अलविदा का स्वाद हो… खारा। बात करते हुए गला रूँध जाए। आँख बेमौसम भर आए। इतना सा अलविदा ही तो माँगे, हम तो किसी के रुकने तक का नहीं कहते। 

हमें कब आएगा अपने दिल को किसी इमोशन-टाइट-प्रूफ़ डिब्बे में बंद करके दफ़ना देना। हम कब हो सकेंगे ऐसे कि अपनी तन्हाई के साथ बिना रोए कलपे रह सकें। इस शहर की चुप्पी को आत्मसात कर सकें। सह सकें दुःख। 

बता ज़िंदगी। खेलती ही रहोगी हमारे काँच दिल से? टूटता ही रहेगा, उम्र भर? दुखता ही रहेगा ऐसे? हम कब सीखेंगे अपने हालात के साथ सामंजस्य बिठाना। 

कि इससे अच्छा तो कर लिए होते गुनाह कुछ। तोड़ा होता बेरहम होकर दिल किसी का। किसी की दोस्ती ठुकरायी होती। किसी के स्नेह पर सवाल किए होते। किसी को आदर की जगह दुत्कार दिए होते। कमसेकम ये तो लगता कि ये हमारी सज़ा है। 

निर्दोष होने का गुनाह है हमारा?

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‘मुझे मरने की थोड़ी जगह चाहिए।’

अगर तुम इसे मेरी आवाज़ में सुनते तो पाते कि मैंने ‘थोड़ी’ पर ज़ोर दिया है। बचपन से दी गयी सीख के मुताबिक़, जितनी ज़रूरत है, उससे ज़्यादा माँगने की मेरी आदत नहीं रही। मैं कहाँ कह सकूँगी तुमसे कि किसी चिट्ठी की आख़िरी लाइन में मेरे लिए थोड़ी जगह रहे, कि मैं मरने के पहले वाली आख़िर चिट्ठी में लिख सकूँ, ‘ढेर सारा प्यार’ तुम्हारे नाम, और मर सकूँ। तुमने जाने कौन अधूरी चिट्ठी लिख रखी है मेरे नाम, कि मेरे मरने के बाद भेजोगे। तुम्हारी किसी कहानी में कोई छोटा सा किरदार लिखो मेरे नाम, कि जिसकी मृत्यु से न तुम्हारे उपन्यास के मुख्य किरदार को कोई तकलीफ़ पहुँचे, ना तुम्हें। एकदम साधारण मृत्यु। जब कि जीवन के सारे अधूरे काम पूरे कर लिए गए हों, जब कि ख़्वाहिशों का कोई नया हरा बिरवा ना उगा हो। किसी एक लम्हे जब कि हम ज़िंदगी से भरे भरे हों।

ज़िंदगी में ख़ुशी कितनी दुर्लभ होती है। कि मैं कोशिश करते हुए भी पाती हूँ कि किसी किताब में बंद कर के नहीं रख सकती ख़ुशी की चमकीली किरण को। किताब बंद होते ही सब अँधेरा हो जाता है।

मैं तुम्हें मिस करती हूँ। अपनी तन्हाई और उदासी में। अपनी बेगुनाही में। अपने मन के सादेपन में।

मैं जानती हूँ कि मैं अपना उपन्यास क्यूँ पूरा नहीं कर पा रही हूँ। क्यूँकि ज़िंदगी की बाक़ी कहानियों के सच हो जाने जैसी ही है ये कहानी भी। कि इसके बाद मेरे हिस्से सांसें बहुत कम बचेंगी।

यहाँ बाँस के पेड़ों का झुरमुट है जिससे हवा चलती है तो आवाज़ मुझे अपने बचपन में खींच कर ले जाती है। मैं अपने बचपन के क्लास्मेट्स से मिलती हूँ कई सालों बाद। अच्छा लगता है देर तक बातें करना।

कुछ लोगों की बहुत कमी महसूस होने लगी है इन दिनों। बस मेरे कहने से कोई भी तो लौट नहीं आता। इतनी एक्स्ट्रीम तन्हाई अब बहुत ज़्यादा दुखती है। तुम जाने कहाँ हो। लौट आओ। मेरे क़िस्सों के शहर तुम्हारा इंतज़ार करते हैं।

#soulrunes #daysofbeingwild

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एक दिन सफ़ेद फूलों का मौसम ख़त्म हो जाएगा। फिर मैं पूरे साल इंतज़ार करूँगी उनके आने का। कि कुछ नहीं रहता हमेशा के लिये, सिवाए इंतज़ार के। इंतज़ार हमेशा रहता है। सीने में दुखता। लिखते हुए उँगलियों में रगड़ खाता। आँखों से बहता। कितने रंग का तो होता है इंतज़ार।

मैं जाने कैसा अजीब सपना देखती हूँ। आज सुबह से दोपहर तक सोती रही और एक लम्बा सपना देखा। तुम्हारे शहर का। तुम्हारा। तुम्हारी बीवी और तुम्हारी बेटी भी थे सपने में। मेरे कुछ घर वाले भी। लेकिन सब लोगों के होने के बावजूद भी उस सपने में बस मैं और तुम थे। हँसते। जैसे कि कुछ बचा हुआ हो हमारे बीच। कोई शहर, ज़िंदा।

तुम्हें सपने में देखना ऐसा सुख है जो दुःख लिए आता है डुबोने के लिए। मैं जितना ही चाहती हूँ कि सहेज लूँ ज़रा तुम्हारी हथेली का स्पर्श, सोफ़े पर के सफ़ेद कुशन की नर्माहट या कि तुम्हारी आँखें। मगर याद कुछ नहीं रहता है।

क्यूँ लगता है कि तुम आसपास हो। इस देश या इस शहर में या कि इस दिल में ही। ये कैसा प्रेम है कि ख़ालीपन में उगता है। कैसी हूक है कि लिखने को नहीं आती। दुखने को आती है बस।

कुछ ख़त्म नहीं होता लिख कर। ना दुःख। ना तन्हाई। ना छलावा। तुम्हारी चाह कोई ऐसी अद्भुत वस्तु की लालसा तो है नहीं कि जिसके लिए तपस्या करनी पड़े। ये तो आसान होना था ना। जैसे कि फूल थोड़ी सी धूप माँगे, खेत ज़रा सी बारिश और गरमियों में नानीघर जाने का प्लान बने। ये तो इतना स्वाभाविक था…नैचुरल। हम जाने क्या माँग बैठते हैं कि ईश्वर का हिसाब गड़बड़ हो जाता है।

मैं बस इतना चाहती हूँ कि ज़रा कम दुखे। हालाँकि अब लगता है कि शायद डॉक्टर को दिखाने की नौबत आ गयी है। कोई दुःख है कि एकदम ही छलका छलका रहता है। ज़रा ज़रा सी बात पर आँख भर आती है। फ़िल्म देख कर रो देती हूँ। कविता पढ़ कर कलप जाती हूँ। मौसम भी अच्छा हो जाए तो जैसे दुखने लगता है।

मगर दिक़्क़त ये है कि मुझे नींद की गोलियाँ नहीं मृत्यु की गोलियाँ चाहिए। मैं सोना नहीं, मर जाना चाहती हूँ।

सुबह उठ कर सोचूँगी कि लिख सकूँ एक शहर जिसमें कि मेरे जीने भर को सुख हो और मेरे हँसने भर को दोस्त।

#soulrunes #daysofbeingwild #almoststrangers

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ज़िंदगी में जो सारी चीज़ें कई कई बार लौट कर आती हैं, उनमें से एक है भूलना। निर्मल लिखते हैं कि कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है। लेकिन याद कभी कभी साँस में अटकने लगती है और लगता है कि भूले नहीं तो शायद जीना भूल जाएँगे। कि जीना भी कभी कभी अपनेआप नहीं होता। मेहनत करनी पड़ती है। याद दिलाना पड़ता है ख़ुद को बार बार कि ज़िंदगी जीने लायक है।
स्टडी टेबल पर रखी होती है कोई बुद्धिस्ट प्रेयर व्हील कि हमने एक दोस्त के लिए और ख़ुद के लिए साथ में ख़रीदी थी। कि मुझे चीज़ें जोड़ों में ख़रीदना अच्छा लगता है, जैसे कि हमारी दुनिया एकदम ही अलग अलग हो जाएगी फिर भी कुछ है जो हमारी ज़िंदगी में कॉमन रहेगा। कि हम शायद तुम्हें पूरी तरह कभी नहीं भूल पाएँ।
खिड़की पर विंडचाइम जिस दिन आए थे उसके कुछ दिन बाद ही टाँग दिए थे लेकिन खिड़की आज खुली है तो विंडचाइम चीख़ चीख़ कर आसमान को अपने होने की ख़बर दे रही है।
टकीला शॉट मारने के लिए ग्लास ख़रीदे गए थे। मिट्टी से गिरे सफ़ेद फूल उठा कर लायी हूँ सुबह सुबह और एक इकलौता पीला फूल तोड़ा है। कि ख़ुशी का रंग यही ख़ुशनुमा पीला है। कि भूलने की लिस्ट में उस लड़की का नाम भी तो आता है जिसे पीला रंग बहुत पसंद था।
सुबहों का थोड़ा सा डिसप्लिन खोज रही हूँ वापस कि जीने में आसान रहे। आज बहुत दिन बाद लिखने बैठी हूँ। इस नए मकान में सबसे ऊपर वाले कमरे को स्टडी के लिए इस्तेमाल कर सकें, ख़ास इसलिए ये घर किराए पर लिया था। इतने दिन सीढ़ियाँ चढ़ नहीं रही थी कि घुटनों में दर्द ना उठ जाए। आज ठीक दो महीने हो गए जब कि ये दर्द उठा था, ६ तारीख़ को ही प्लास्टर खुला था और तब से ही दर्द का ये सिलसिला शुरू हुआ। आज दर्द है, लेकिन कम है।
मौसम में खुनक है। ठंढ लग रही है लेकिन गरम कपड़े नीचे रखे हैं, तो लाने नहीं जा रही।
किरदार कुछ यूँ हैं कि जिन्हें लिखने के लिए भूलना पड़ेगा कितना सारा सच का जिया हुआ। ख़ुद को याद दिलाना पड़ेगा कि लिखने में इतनी तकलीफ़ नहीं होगी कि मर जाऊँ। कि लिखना मेरा नैचुरल स्टेट है। कि मैं सबसे सहज लिखते हुए होती हूँ। सबसे ईमानदार। कि ज़िंदगी में कुछ चीज़ें जो अब तक करप्ट नहीं हुयी हैं, उनमें से एक मेरी क़लम की निब है।
और आज शायद ज़िंदगी में पहली बार लिखने के पहले काग़ज़ के ऊपर ‘जय माँ सरस्वती’ लिखा है। कि याद, भूलने, मरने, जीने और किसी तरह लिख लेने की इस क़वायद में अकेली कुछ नहीं कर सकती। तो थोड़ा सा सपोर्ट।
इस कमरे और इस खिड़की के सामने कई क़िस्से ज़िंदा हो सकें, जी सकें अपने हिस्से का आसमान और दे सकें मुझे बस इतनी राहत कि जान ना दे दूँ।
अस्तु।
#soulrunes #daysofbeingwild #diaryofamadwriter