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इश्क़। नीम अंधेरे में थकी आँखों से कहती हूँ। खुलो मुझ पर। महबूब। लिखो कोई ख़त कि जिसके जवाब में एक पूरी किताब लिख देने को जी चाहे। कि हमेशा जिस स्याह को तलाशती हूँ वो तुम्हारी आँखों में ही मिलता है। तुम्हारे हिज्र में। मैं तलाशती हूँ तुम्हारे इर्द गिर्द की वो ख़ुशबू। इस शहर से कितना ही दूर है तुम्हारा ख़्वाब भी…मैं सच की दुनिया को भूलना चाहती हूँ…समंदर में फ़्लोट करना चाहती हूँ। किनारे की बालू पर भीगते हुए समंदर का शोर सुनना चाहती हूँ…बंद आँखों में दिखे कुछ भी ना लेकिन उँगलियों में तुम्हारी उँगलियाँ उलझी रहें… मैं तुम्हारे स्पर्श को पहचान लूँ बिलकुल अच्छी तरह…कि कभी याद आए बेतरह तो याद से तुम्हारे स्पर्श को ज़िंदा कर सकूँ अपनी हथेलियों में। 

काग़ज़ पर लिखते लिखते मन करता है तुम्हें ख़त लिखना शुरू कर दूँ… लेकिन वो पीले काग़ज़ मिल नहीं रहे जिन पर तुम्हें लिखने में सुख हो। नए काग़ज़ ख़रीदूँगी सिर्फ़ तुम्हें ख़त लिखने के लिए। 

तुम लिखते हो तो मेरी दुनिया में भी नए रंग खिलते हैं। पता है जानां, इस शहर से दूर एक बहुत पुराना शिव मंदिर है… यहाँ दक्षिण के मंदिरों में बीच में जल कुंड हुआ करते हैं… वहाँ एक बड़ा सा चौकोर कुंड है, ख़ूब सी सीढ़ियों से घिरा हुआ और ऊपर की ओर चहारदीवारी है और खम्बे हैं… ढलती शाम एक बार वहाँ गयी थी। थोड़ी देर खम्बे से पीठ टिका कर बैठी। धूप सुंदर और नरम थी। सब कुछ शांत था मंदिर के भीतर। कहीं से कोई आवाज़ नहीं। उन पत्थरों पर बैठे बैठे लगता है मैं भी कई सौ साल पुरानी हूँ… तुमसे मेरा प्रेम भी… वहाँ मन शांत होने लगता है… इच्छाएँ ईश्वर के सामने सर झुका कर मंदिर से बाहर चली जाती हैं…पूरी होने की ज़िद नहीं बाँधती। तुम्हें पढ़ना वहाँ जा कर उस शांति को महसूसने जैसा है। एक लम्बी ड्राइव। थोड़ी सी शाम। धूप। पुराने पत्थर, उससे भी पुराने ईश्वर… जाने कितना ही पुराना प्रेम और शायद उससे भी पुराने तुम्हारे शब्द… कि जैसे कुछ हमेशा रहेगा तो तुम्हारी लेखनी। हमारे तुम्हारे बाद भी। जब भी कोई प्रेम में निशब्द महसूस करेगा तो तुम्हारे शब्द उसका हाथ थाम लेंगे… जब कोई तन्हाई में हो तो तुम्हें पढ़ना उसे थोड़ा कम तन्हा महसूस कराएगा। 

तुम लिखो कि मेरी दुनिया बनती रहे…नए पुराने शहर खुलते रहें और ख़्वाहिशें मिट मिट कर ख़ुद को बनाती रहें। हमेशा। हमेशा। 

लव यू।

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जाने मुझे वो चाहिए, उसका शहर या कि उसके शहर का मौसम।

इंसान को किसी भी चीज़ से शिकायत हो सकती है। किसी भी चीज़ से। कि जैसे मुझे बैंगलोर के अच्छे मौसम से शिकायत है।

बैंगलोर में इन दिनों मौसम इतना सुंदर है कि उत्तर भारत के लोगों को अक्सर रश्क़ होता है। कि ज़रा अपने शहर का मौसम भेज दो। सुबह को अच्छी प्यारी हवा चलती है। दिन को थोड़े थोड़े बादल रहते हैं। सफ़ेद फूल खिले हैं बालकनी में। दोपहर गर्म होती है, लेकिन पंखा चलाना काफ़ी होता है। कूलर की ज़रूरत नहीं पड़ती। रातें ठंडी हो जाती हैं, बारह बजे के आसपास सोने जाएँ तो पंखा चलाने के बाद पतला कम्बल ओढ़ना ज़रूरी होता है। 

लेकिन मुझे गर्म मौसम बेहद पसंद है और मुझे उस मौसम की याद आती है। मेरा बचपन देवघर में और फिर कॉलेज पटना में था, आगे की पढ़ाई दिल्ली और पहली नौकरी भी वहीं। मुझे उस मौसम की आदत थी। दस साल हो गए बैंगलोर में, मैं अभी भी इस मौसम सहज नहीं होती हूँ। लगता है कुछ है जो छूट रहा है। 

दिल्ली में उन दिनों कपड़े के मामले में बहुत एक्स्पेरिमेंट नहीं किए थे और अक्सर जींस और टी शर्ट ही पहना करती थी। उन दिनों गर्मी के कारण इतना पसीना आता था कि दो तीन दिन के अंदर जींस नमक के कारण धारदार हो जाती थी और घुटने के पीछे का नर्म हिस्सा छिल सा जाता था। तो हफ़्ते में लगभग तीन जींस बदलनी पड़ती थी, कि कपड़े धोने का वक़्त सिर्फ़ इतवार को मिलता था। मुझे याद है कि ऑटो में बैठते थे तो पूरी पीठ तर ब तर और जींस घुटनों के पीछे वाली जगह अक्सर गीली हो जाती थी। चेहरे पर न बिंदी ना काजल टिकता था ना कोई तरह की क्रीम लगाती थी। बहुत गरमी लगी तो जा के चेहरा धो लिया। दिन भर दहकता ही रहता था चेहरा, दोस्त कहते थे, तुम लाल टमाटर लगती हो। 

उन दिनों बायीं कलाई पर सफ़ेद रूमाल बांधा करती थी कि कौन हमेशा पॉकेट से रूमाल निकाल के पसीना पोंछे और फिर वापस रखे। दायीं कलाई पर घड़ी बाँधने की आदत थी। माथे का पसीना कलाई पर बंधे रूमाल से पोंछना आसान था। लिखते हुए उँगलियों में पसीना बहुत आता था, तो वो भी बाएँ हाथ में बंधे रूमाल में पोंछ सकती थी। कभी कभी ज़्यादा गरमी लगी तो रूमाल गीला कर के गले पर रख लेने की आदत थी… या उससे ही चेहरा पोंछने की भी। जैसे चश्मा कभी नहीं खोता, उसी तरह रूमाल भी कभी नहीं खोता था कि उसकी हमेशा ज़रूरत पड़ती थी। 

दस साल में रूमाल रखने की आदत छूट गयी। अब रोना आए तो आँसू पोंछने में दिक्कत और खाने के बाद हाथ धोए तो भी हाथ पोंछने की दिक्कत। याद नहीं पिछली बार क्या हुआ था, पर किसी लड़के ने अपना रूमाल निकाल कर दिया था तो अचानक से उसका इम्प्रेशन बड़ा अच्छा बन गया था। कि वाह, तुम रूमाल रखते हो। अब इतने साल में याद नहीं कि लड़का था कौन और रूमाल की ज़रूरत क्यूँ पड़ी। 

जिस उम्र में पहली बार रोमैन्स के बारे में सोचा होगा, वो उम्र ठीक याद नहीं, पर मौसम साल के अधिकतर समय गर्म ही रहता था, तो पहली कल्पना भी वैसी ही कोई थी। कि स्कूल में पानी पीने का चापाकल था और ज़ाहिर तौर से, एक व्यक्ति को हैंडिल चलाना पड़ता था ताकि दूसरा पानी पी सके। कोई दिखे तो वहीं दिखे…बदमाश ने चुल्लु में पानी भर कर फेंका था मेरी ओर…कि वो नॉर्मल बदमाशी थी…पानी पीने के बाद चेहरे पर पानी मारना भी एकदम स्वाभाविक था…लेकिन उस पानी मारते हुए को देखती हुयी लड़की, पागल ही थी… कि लड़के भी ख़ूबसूरत होते हैं, उस भयानक गरमी में दहकते चेहरे पर पानी के छींटे मारते हुए लड़के को देख कर पता चला था। गीले बालों में उँगलियाँ फिरो कर पानी झटकाता हुआ लड़का उस लम्हे में फ़्रीज़ हो गया था। कलाई से रूमाल एक बार में खोला और बढ़ाया उसकी ओर…’रूमाल’… उसने रूमाल लिया…चेहरा पोंछा…मुस्कुराते हुए मुझे देखा और रूमाल फ़ोल्ड कर के अपने पॉकेट में रख लिया। 

उस रोज़ ज़िंदगी में पहला रूमाल ही नहीं खोया था, दिल भी वहीं फ़ोल्ड हो कर चला गया था उसके साथ रूमाल में। हमारे बीच इतनी ही मुहब्बत रही। फिर उन दिनों कहते भी तो थे, रूमाल देने से दोस्ती टूट जाती है। 

गर्मी में ये ख़्वाहिश बाक़ी रही, कि कभी मिलूँ, किसी महबूब या कि म्यूज़ से ही। कूलर का ठंडा पानी चेहरे पर मारते हुए आए वो क़रीब, कि तुम्हें न यही पागल मौसम मिला है शहर घूमने को…मैं मुस्कुराते हुए बढ़ाऊँ सुर्ख़ साड़ी का आँचल…कि जनाब चेहरा पोंछिए…वो कहे कि ज़रूरत नहीं है…हमें इस मौसम की आदत है…और हम कहें कि हमारा ईमान डोल रहा है, नालायक़, चुपचाप इंसानों जैसे दिखो… इस मौसम से ज़्यादा हॉट दिखने की ज़रूरत नहीं है। 

जाने मुझे वो चाहिए, उसका शहर या कि उसके शहर का मौसम। 

इस सुहाने मौसम में लगता है कुछ छूट रहा है। मैं चाहती हूँ कि गरमी में आँचल से पोंछ सकूँ अपना माथा। हवा कर सकूँ उसे ज़रा सा। पंखा झलने का मौसम। आम का मौसम। नानीघर जाने का मौसम। गर्मी छुट्टियाँ। कि मौसम सिर्फ़ मौसम थोड़े है…एक पूरी पूरी उम्र का रोज़नामचा है। इस रोजनामचे के हाशिए पर मैं लिखना चाहती हूँ…ये हमारा मौसम है। इस मौसम मिलो हमसे…जानां!

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और उन राजकुमारों का क्या? वे भी तो कभी सोचते होंगे कि कोई बहादुर राजकुमारी आएगी और उन्हें उनकी बोरिंग ज़िंदगी से बचा लेगी। जिससे मिलने का ख़याल ऑफ़िस के पॉवर पोईंट प्रेज़ेंटेशन को भी थोड़ा एनर्जी, रंग और ऐनिमेशन से भरेगा। कोई जो वाइल्ड हो…क्रेज़ी थोड़ी सी…कभी फ़्राइडे की शाम फ़ोन करे कि मैं बाइक पर इंतज़ार कर रही हूँ तुम्हारा…चलो जल्दी, हम रोड ट्रिप पर जा रहे हैं, और वो मीटिंग से चुपचाप निकल ले, बॉस को टेक्स्ट कर के…इमर्जन्सी कॉल है। जाना पड़ेगा। प्रिन्सेस जो जिरहबख़्तर नहीं फ़ुल बाइकिंग गियर पहने। व्हिस्की पीने में सारे दोस्तों को पीछे छोड़ सके। किसी भी अजनबी इंसान से बात कर ले। बारिश में माचिस से सिगरेट जलाना आये जिसे। ख़तरनाक वाली राजकुमारी। आए कभी…

हैं…उन लड़कों का क्या कि बेचारे वे ही हमेशा राजकुमारी को ड्रैगन से बचाते रहें? ये तो नाइंसाफ़ी है ना। ऐसी राजकुमारियाँ थोड़ी ज़्यादा हों इस दुनिया में और मासूम राजकुमार उनके होने पर यक़ीन करें…इसी दुआ में 🙂

#storiesinmyhead

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इन दिनों किंडल ऐप डाउनलोड कर लिया है और उसपर एक किताब गाहे बगाहे पढ़ती रहती हूँ। उसमें एक दूसरी किताब की बात है जो कि एक उपन्यास के बारे में। इस उपन्यास का नाम है lost city radio, एक रेडीओ प्रेज़ेंटर है जो युद्ध के बाद रेडीओ स्टेशन में काम करती है और सरकार के हिसाब से ख़बरें पढ़ती है… लेकिन उसका एक कार्यक्रम है जिसमें वो खोए हुए लोगों के नाम और उसके बारे में और जानकारियाँ देती है। युद्ध के बाद खोए हुए अनेक लोग हैं। पूरे देश में उसका प्रोग्राम सबसे ज़्यादा लोग सुनते हैं…उसका चेहरा कभी मीडिया के सामने उजागर नहीं किया जाता। 

मैं इस उपन्यास को कभी पढ़ूँगी। लेकिन उसके पहले इसकी दो थीम्स जो कि मुझे बहुत आकर्षित करती हैं। आवाज़ें और खो जाना या तलाश लिया जाना। मैं आवाज़ों के पीछे बौरायी रहती हूँ। जितने लोगों को मैंने डेट किया, कई कई साल उनसे बात नहीं करने के बावजूद उनकी आवाज़ मैं एक हेलो में पहचान सकती हूँ… जबकि बाक़ी किसी की आवाज़ मैं फ़ोन पर कभी नहीं पहचान पाती, किसी की भी नहीं। लड़कों की आवाज़ तो मुझे ख़ास तौर से सब की एक जैसी ही लगती है। गायकों में भी सिर्फ़ सोनू निगम की आवाज़ पहचानती हूँ…वो भी आवाज़ नहीं, वो गाते हुए जो साँस लेता है वो मुझे पहचान में आ जाती है… पता नहीं कैसे। मुझे आवाज़ों का नशा होता है। मैं महीने महीने, सालों साल एक ही गाना रिपीट पर सुन सकती हूँ… सालों साल किसी एक आवाज़ के तिलिस्म में डूबी रह सकती हूँ। 

बारिश की दोपहर मिट्टी की ख़ुशबू को अपने इर्द गिर्द महसूसते हुए सोचती रही, उसकी आवाज़ का एक धागा मिलता तो कलाई पर बाँध लेती…मौली… कच्चे सूत की। उसकी आवाज़ में ख़ुशबू है। गाँव की। रेत की। बारिश की। ऐतबार की। ऐसा लगता है वो मेरा कभी का छूटा कोई है। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं…जन्मपार के रिश्ते। मैं उसके साथ का कोई शहर तलाशती हूँ। एक दिन न, मैं आपको समंदर दिखाने ले चलूँगी। मुझे सब मालूम है, उसके घर के सबसे पास कौन सा समंदर है, वहाँ तक जाते कैसे हैं। एक दिन मैं अपने उड़नखटोला पर आऊँगी और कहूँगी, ऐसे ही चल लो, रास्ते में कपड़े ख़रीद देंगे आपको। बस, अभी चल लो। फिर सोचती हूँ कि ऐसे शहर क्यूँ मालूम हैं मुझे। कि रात जब गहराती है तो बातें कितने पीछे तक जाती हैं। बचपन तक, दुखों तक, ख़ुशी के सबसे चमकीले लम्हे तक। दिन में हम वैसी बातें नहीं करते जैसी रात में करते हैं। मैं समंदर की आवाज़ में उलझे हुए सुनना चाहती हूँ उन्हें…कई कई पूरी रात। चाँद भर की रोशनी रहे और क़िस्से हों। सच्चे, झूठे, सब। मुझे उन लड़कों से जलन होती है जो उनके साथ रोड ट्रिप पर जाते हैं और पुराने मंदिर, क़िले, महल, दुकानें देखते चलते हैं। जो उन्हें गुनगुनाते हुए अपना पसंद का कोई गीत सुना पाते हैं। उनसे बात करते हुए लगता है कि ज़िंदगी कितनी छोटी है और उसमें भी कितना कम वक़्त बिताया हमने साथ। मगर कितना सुंदर। कि बाक़ी लोग पूरी उम्र में भी कोई ऐसी शाम जी पाते होंगे… मैं सोचती हूँ, पूछती हूँ और ख़ुद में ही कहती हूँ, कि नहीं। कि कोई दो लोग दूसरे दो लोगों की तरह नहीं होते। न कोई शाम, शहर या धुन्ध ख़ुद को कभी दोहराती है। 

कभी कभी लगता है मैं खो गयी तो वे किसी से पूछेंगे नहीं मेरे बारे में, बस किसी बहुत ख़ुशनुमा सी शाम ज़रा से उदास हो जाएँगे। आज एक बहुत साल पहले पढ़ा हुआ शब्द याद आ रहा है। अरबी शब्द है, ठीक पता नहीं कैसे लिखते हैं, एक लिस्ट में पढ़ा था, उन शब्दों के बारे में जो अनुवाद करने में बहुत मुश्किल हैं…यकबरनी… यानी तुम मुझे दफ़नाना… 

मुझे नहीं मालूम कि मुझे ऐसी छुट्टियाँ सिर्फ़ किसी कहानी में चाहिए या ऐसे लोग सिर्फ़ किसी क़िस्से में लेकिन उनसे बात करते हुए लगता है ज़िंदगी कहानियों जैसी होती है। कि कोई शहज़ादा होता है, किसी तिलिस्म के पार से झाँकता और हम अपनी रॉयल एनफ़ील्ड उड़ाते हुए उस तिलिस्म में गुम हो जाना चाहते हैं। 

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दिक्कत ये है मेरी जान कि ये दुनिया गोल है।
तुम मेरे शहर में आए तो शहर को और मुझे, दोनों को तुमसे एक साथ प्यार हो गया। उस वक़्त ये सोचा नहीं कि तुम चले भी जाओगे। मेरे शहर की हर साँस लेती चीज़ को अपने अपने रंग में रंग के। आसमान, मौसम, ख़ुशबुएँ, गालियाँ, बारिश… सब कुछ ही तो तुम्हारा होता गया है। शहर मेरा नहीं रहा, और तुम लौट गए अपने शहर, तो बस, लावारिस हो गया है। दुनिया के ठीक दूसरे छोर पर तुम रहते हो। Diametrially opposite. धरती पर रहते हुए इससे ज़्यादा दूरी नहीं आ सकती हमारे बीच। यहाँ से किसी भी दिशा में एक क़दम भी बढ़ाऊँगी तो तुम्हारे क़रीब ही जाऊँगी।

तुम्हारे इश्क़ में ये शहर मेरी जान ले लेगा। बस। इतना ही होगा हमारा क़िस्सा।

23rd November

ज़िंदगी ने माथे को चूम कर रहा, सारे रंग तुम्हारे…

कि Monet ने अभी अभी मेरी आँखें रंगी हैं…इसी धुएँ से… और रंग गीले हैं…

27th November

***

हम दो दुनियाओं के लोग हैं। हमसे सीधी बातों की उम्मीद मत करो। हमसे शहर के रंग पूछोगे तो तुम्हें दिल के क़िस्सों में उलझा देंगे… कि ज़रा बताओ, कितना आसान है उस लड़के के लिए तुम्हें भूल कर जीना, हँसना, सपने देखना … हमसे दिल के क़िस्से पूछोगे तो दुनिया के हसीन शहरों में ले जाएँगे और दुनिया की सबसे रहस्यमयी मुस्कान दिखा कर कहेंगे, वो मेरे इंतज़ार में कितने सालों से है, देखो… दुनिया आज भी इश्क़ में यूँ सिरफिरे, मुस्कुराते लोगों के मुस्कियाने को मोनालिसा स्माइल कहती है…

***

जाने कौन सा शहर तुम्हारे पास हो। नदी किनारे क़तार से तमीज़दार पेड़ लगे हुए थे। पतझर के इन आख़िरी दिनों में बस ठूँठ ही दिखते थे। बस एक आध पेड़ कहीं कहीं होता था, सुलगते पीले पत्तों में, ज़िद्दी। जैसे दिल मेरा, भूलता नहीं तुम्हें। 

पूरे शहर में कई सारी बेंचें मिलीं। मैं वहाँ बैठ कर इत्मीनान से चिट्ठियाँ लिखना चाहती थी। जाने कैसे कैसे बातों का ज़िक्र करके, कि जैसे पहली बार भूने हुए चेस्टनट खाए… उनका सोंधा स्वाद बहुत अच्छा लगा मुझे। 

मेरे किसी दोस्त को स्ट्रीटलैम्प बहुत पसंद हैं। मुझे याद नहीं किसे। लेकिन एक स्ट्रीट लैम्प की फ़ोटो ले ली। जब याद आएगा दोस्त का नाम लिए बग़ैर उसे कह देंगे, कि याद आ रही थी तुम्हारी। कि हिचकियाँ भी आ रहीं थीं। कि जिसके याद करने से हिचकियाँ आ जाएँ, ऐसे बहुत कम लोग हैं ज़िंदगी में। 

तुम्हारे होने से मेरी शाम में रंग होते हैं। तुम कभी कभी अपने शहर के रंग भेज दिया करो मेरे शहर। 

शुक्रिया। प्यार।

1st December, Paris

एक वृत्त खिंचता है। तुम्हारे होने के दर्मयान, तुम्हारे अनहुए में। जो चीज़ें हो नहीं सकतीं, उनका। जो शहर धीरे धीरे लुप्त हो रहे हैं, उनका एक नक़्शा खिंचता है। जिन शहरों से मैं प्यार करती हूँ, उनमें मुझे भूल चुके लोग रहते हैं। 

कुछ शब्दों को उच्चारण करते हुए वे जी उठते हैं। क्यूँकि हमने उनका प्रयोग लिखने या पढ़ने के बजाए, बोलने में अधिक किया है। इसलिए कुछ नाम हमारे इतने क़रीबी होते हैं। हम उनकी आवाज़ से प्यार करते हैं। उनका नाम लेते हुए जो एक कोमलता आती है हमारी वाणी में, उस कोमलता से प्रेम करते हैं। उसी कोमलता से हम उनसे प्रेम भी करते हैं। 

हिंदी के कुछ शब्द प्रयोग से बाहर हैं, जैसे अनुपस्थिति… हम कहते हैं, तुम्हारा न होना… इसलिए इंग्लिश शब्द ऐब्सेन्स हमारे लिए रियल है क्यूँकि हमने उसका बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया है।

लेकिन कुछ शब्द अलग होते हैं। जैसे तुम्हारा नाम।

आवाज़ के पत्थर पर घिस कर शब्द चमक उठते हैं और ज़्यादा धारदार हो जाते हैं। इसलिए तुम्हारे नाम से काटी जा सकती है कलाइयाँ। तुम्हारा नाम एक शार्प औज़ार है जिससे मेरी हत्या की जा सकती है।

9 December, Bangalore

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There is something wrong with the way I love. Maybe there is some right way to love people, cities, objects… a way that makes you immensely happy when you are around them and gives you strength to endure their absence. 

A way in which you do not become a raving lunatic every time the name crops up in normal everyday conversations. Maybe some people love without getting so attached to their object of desire and get less hurt when they have to let go. Do I obsess too much? Have I given undue importance to love in my life? Making it the centre of everything there is. Poetry I read, films I watch, sunsets that become a part of my city…maybe they are not about love.  Maybe love actually should just be a part of life. Maybe we should do things with a certain detachment to begin with. 

Love is not about pain. It should not be. If loving would hurt so much every time, eventually, I would be and should be afraid to love. Maybe being sarcastic or cynic has its benefits. Maybe creating a self defence wall around the heart helps. 

Maybe. There might be a love in the world that hurts a little less.

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फ़ासले ऐसे भी होंगे

आज सुबह नींद खुली और आदतन फ़ोन की ओर हाथ नहीं गया। कि आदत सिर्फ़ बनने में ही वक़्त नहीं लगता, छूटने में भी तो वक़्त लगता है। रोज़ लगता था कि आज सुबह फ़ोन में तुम्हारा मेसेज होगा। कि तुमने कुछ कहा होगा। कोई तस्वीर होगी। कोई कविता का टुकड़ा होगा। कोई वजह होगी। कई सालों की आदत थी। लेकिन शायद आज दिल ने आख़िरकार मान लिया कि कोई मेसेज नहीं होगा। इस तरह उम्मीद टूट जाती है। इंतज़ार चुक जाता है।

अब हम बात करेंगे भी तो उस रोज़ की तरह नहीं जैसे पिछले कुछ सालों से करते आ रहे थे। कि हर ख़ुशी में तुम्हारा हिस्सा निकाल के रख देना ज़रूरी नहीं लगेगा। हर ख़ूबसूरत चीज़ को तुमसे बाँटने की हूक नहीं सालेगी। होगा ये सब भी, धीरे धीरे होगा।
यूँ तुम्हें भुलाने को हज़ार तरीक़े हैं। काम है, पढ़ना लिखना है, घूमने की जगहें हैं, कोई नया शौक़ पाल सकती हूँ, इस घर में तो गमले ही इतने हैं कि फूल लगा दूँ तो हज़ार रंगो में भूल जाऊँगी तुम्हारी आँखों का रंग… बहुत कुछ है जिससे ख़ुद को इस तरह व्यस्त रखा जा सके कि तुम्हारी याद नहीं आए। हालाँकि ऐसे व्यस्त रहने के बावजूद याद जिन दिनों आती है, उन दिनों आ ही जाती है। लेकिन ज़िद्दी मन ऐसा कुछ करना नहीं चाहता था। उसे तुम्हारी मौजूदगी का आश्वासन चाहिए था। तुम्हारी ज़रूरत थी। मुझे ऐसे ज़िंदगी नहीं चाहिए जिसमें लोग नहीं हों। मुझे ऐसे सुख नहीं चाहिए जिनके बारे में हुलस कर किसी को फ़ोन नहीं किया जा सके।
कि फ़िलासफ़ी पढ़ने से समझ में आ जाती है सारी चीज़ें भी। गीता का ठीक से अध्ध्ययन करने से समझ में आएगा, ‘नष्टोमोह’। लेकिन मुझे वैसी ज़िंदगी नहीं चाहिए। ‘रहने दो हे देव, अरे यह मेरा मिटने का अधिकार’ की तरह, मेरे लिए मेरा ये चोटिल और नाज़ुक मन ज़रूरी है जो प्रेम कर सकता हो। प्रेम में टूट सकता हो। मैं निष्ठुर नहीं होना चाहती। हर बार टूट कर भी फिर जुड़ने की क्षमता ही जिजीविषा है। मैं मोह-माया छोड़ना नहीं चाहती। जीवन जीने भर को प्रेम की चाह क्या बहुत ज़्यादा है?
ख़ुश रहने की किताब मिलती है बाज़ार में। एक ऐसी किताब है, हैप्पीनेस हायपोथेसिस, उसमें लिखा है कि अगर कोई रिश्ता टूटा हो और आप इस बात पर यक़ीन करना चाहते हैं कि जीवन प्रेम के बिना ही बेहतर है तो आपको फ़लसफ़े पढ़ने चाहिए। उसी किताब में लिखा है कि जब आपको प्रेम हुआ हो और आप प्रेम के अतिरेक में हों, तो आपको कविता पढ़नी चाहिए।
मैं कविता हमेशा ही पढ़ती हूँ। कविता मेरा घर है। मैं उस तक लौट कर आती हूँ थोड़े सुकून की तलाश में। मेरे सिरहाने हमेशा कविता की किताबें रहती हैं। मेरे हर बैग में कमोबेश एक ना एक कविता की किताब ज़रूर ही। मैं प्रेम में ही होती हूँ, हमेशा। अतिरेक ठीक ठीक नहीं मालूम।
लेकिन तड़प कर किसी ईश्वर से तुम्हें माँगने का मन नहीं करता। आने वाले को और जाने वाले को कौन रोक सका है। मैं दुःख के साथ विरक्ति भी महसूस करती हूँ। मेरे जीवन में तुम्हारी जगह इतनी ही थी। एक मौसम की तरह। जाड़ों का मौसम। कि तुम्हारे आने पर थोड़ी सी गरम कॉफ़ी की ज़रूरत और थोड़ी थरथराहट महसूस हुयी।
मुझसे कहते थे कुछ लोग, तुम्हें छोड़ कर कैसे रह लेते हैं लोग। तुमसे भी कोई रिश्ता तोड़ सकता है! अचरज होता था मुझे पहले भी। अब नहीं होता। अब तो मालूम होता है कि ऐसा ही होगा। अब डर लगता है। हर नए व्यक्ति से बात करने में एक दूरी बना के रखती हूँ। कभी थोड़ा जुड़ाव लगता भी है तो जान बूझ कर कुछ दिन बात करना बंद कर देती हूँ। टूटते टूटते कितना ही हौसला रखें कि ख़ुद को सम्हाल लेंगे। फिर लोगों में इतनी तमीज़ कहाँ होती कि अलविदा कह के जाएँ ज़िंदगी से दूर। जब तुम जा सकते हो बिना अलविदा कहे हुए, तो अब हमको किसी से कोई उम्मीद करनी ही नहीं है।
दुःख तुम्हारे जाने का है। बदला अपने दिल से और पूरी दुनिया से लेंगे।