Musings, Shorts

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
~ जां निसार अख़्तर
***
रात बहुत चुप्पी होती है। झींगुर जाने क्या क्या गुनगुनाते रहते हैं, या कि भुनभुनाते रहते हैं कि उनके हाथ में कुछ नहीं होता। बेमौसम बारिश होती है। धूप नहीं निकलती। मैं देर रात सोसाइटी के भीतर टहलते हुए चाह रही हूँ कि कहीं से मुट्ठी भर आवाज़ें चुन लूँ। कोई गीत का टुकड़ा, किसी सीरियल का डाइयलोग, किसी के गुनगुनाने की बेसुरी धुन, पानी की टपटप, पूल में बहते पानी की म्यूटेड लय…लेकिन कुछ सुनाई नहीं देता इस ओर। यहाँ शब्द नहीं हैं। लोग नहीं। हँसी नहीं।
फ़ोन में इतना स्पेस है। कितनी तस्वीरें हो सकती हैं लेकिन मैं क्लिक नहीं करती। गाने नहीं सुनती हूँ नए। तुम्हारी स्माइली कितने दिन से नहीं आयी। ब्लू टिक्स नहीं लगे। मेरा पिछला मेसेज वैसे रखा हुआ है बंद दरवाज़े की साँकल में फँसायी गयी चिट्ठी के जैसा।
एक दिन नियत करना है, तुम्हें याद करके भुलाने की कोशिश के लिए। उसके बाद किताबों में डूब कर मर जाऊँगी।
ढेर सारा प्यार।

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तुम्हें पता है जानां, तुम्हारे शहर पर तुम जो ताला लगा के रखे हो…हम जाने कितनी रात से सपने में जाते हैं और शहर को बाहर से देख कर आ जाते हैं। शहर की चहारदिवारी के आसपास भटकते हैं कितनी कितनी देर। खड़े खड़े इंतज़ार करते हैं तुम्हारा।

तुम्हें पता है जानां…सपने के इस इंतज़ार से भर दिन मेरे घुटने दर्द करते हैं। मैं कितनी कितनी देर भटकती रहती हूँ शहर के बाहर वाले रास्ते पर। कभी कभी तो यूँ भी हुआ है कि गयी हूँ तुम्हारे शहर और दूर हूँ बहुत तुमसे। मैं चलती हूँ आती हूँ मगर सड़क है की बढ़ती ही चली जाती है.. कई कई मील। मैं सपने में चलते चलते, सच की ज़िंदगी में थक जाती हूँ।

जानां। सपनों में खोलो दरवाज़ा। मुझे आने दो तुम्हारे शहर। मुझे घुमाओ ज़रा सा कोई ख़ुशगवार मौसम। तुम्हारी कमी बदन में दर्द होकर दुखती है। मिलो मुझसे सपने में। दिखाओ मुझे कोई ख़ाली पड़ी बेंच कि जिसपर बैठ कर तुम्हारे साथ पी सकूँ कॉफ़ी। दूर हो मेरा सर दर्द। मिले मेरे सफ़र को मंज़िल कोई।

मिलो सपने में। मिलो सपने के शहर में। कि इस दर्द में कितना चलूँ मैं, मेरी जान! तुम्हारे हिस्से का ढेर सारा प्यार लिए दिल जो धड़कता है…दुखने लगता है। सम्हालो अपने हिस्से का प्यार, मुझे लौटाओ मेरे हिस्से का प्यार। थोड़ा अदला बदली कर लेते हैं। थोड़ा मेरा मन शांत हो, थोड़ा तुम्हारा मन अशांत। थोड़ा सुख का एक क़तरा, मेरे शहर के आसमान में मुस्कुराए। थोड़ा मेरे दुःख का बादल तुम्हारे शहर को भिगो दे।

ज़रा से तुम मेरे हुए जाओ, थोड़ा सा तुम्हारा शहर किसी और के नाम लिख दो। थोड़ा सा याद रखो मुझे। थोड़ा सा भूल जाऊँ मैं कि कितना दर्द है।

जानां। सपनों के उस शहर के दरवाज़े पर इंतज़ार लिखा है। उसे मिटा कर मेरे आने के लिए ‘स्वागतम’ लिख दो। मैं आऊँ तुम्हारे शहर तो मिलो मुझसे। कहो कि ख़त्म हुआ सफ़र। कि मैं लौट सकूँ ज़िंदगी में, क़दमों में तेज़ी और दिल में धड़कता हुआ तुम्हारा नाम लेकर।

ढेर सारा प्यार।

#soulrunes #daysofbeingwild #inthemoodforlove #thegirlthatwas#midnightmadness #cityshots #almostlovers

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#अप्रेम

मैं सोचती हूँ तुम्हारे बारे में। अक्सर। बहुत दर्द और नीमबेहोशी की चीख़ों के बीच भी। मैं सोचती हूँ हम क्या हो सकते थे। क्या हम कुछ हो सकते थे एक दूसरे के?

मैं सोचती हूँ कि तुमने कभी सोचा होगा कि तुम्हारी ज़िंदगी में इतने सारे लोग हैं, लेकिन फिर भी मेरी कुछ जगह बना सकते थे तुम। शायद नहीं। तुम व्यस्त हो। अपनी कविताओं। अपने जीवंत रंगों में। अपने श्वेत श्याम में। कभी तुमने अपने धरे हुए कपड़ों में से कोई काली शर्ट निकाली होगी और पहनने के बाद कभी सोचा, कि एक सेल्फ़ी लेकर भेज दें… उस पागल लड़की को?

मैं तुम्हारी अपरिभाषित होना चाहती थी। जिसके बारे में कोई पूछे तो उलझ जाओ। कि नहीं, पता नहीं। उसके जैसा कोई रिश्ता जिया नहीं है मैंने तो कह नहीं सकता। पर वो मेरी कुछ तो है। कभी बारिश हो तो चाय बनाते हुए दुष्यंत का शेर याद आए, ‘तेरी ज़िंदगी में अक्सर, मैं कोई वजह रहा हूँ’। फिर गुनगुनाने लगो, कि तुम्हें आदत है कि कवि होते हुए कविता हुए जाते हो। पूरी ही ग़ज़ल ख़ूबसूरत है…

ये ज़मीन तप रही थी ये मकान तप रहे थे
तेरा इंतज़ार था जो मैं इसी जगह रहा हूँ

तेरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं
तेरी ज़िन्दगी में अक्सर मैं कोई वजह रहा हूँ

मैं सोचती रही कि तुम्हारे होने की वजह होनी चाहिए थी। तुम्हारे जाने की वजह होनी चाहिए थी। मैं कम लोगों से जुड़ती हूँ। मैं तुमसे जुड़े रहना चाहती थी। तुम्हारी फ़्रेंडलिस्ट में होना सिर्फ़ इसलिए अच्छा था कि मैं तुम्हारी कुछ तस्वीरें देख सकती थीं। कभी कभी तुम्हारी पुरानी मुस्कुराती हुयी तस्वीरों को देख कर मैंने तुम्हारे सुख की कल्पना की है।

काश कि मेरे पास देने को प्रेम होता तो मैं तुम्हारे हिस्से लिख देती। लेकिन कवि, तुम मेरे जीवन में बहुत देर से आए। अब मेरे पास सिर्फ़ थोड़े से दुःख हैं। कभी कभी बारिश होती है तो बारिश का शोर, कुछ विंडचाइम्ज़ वाली खिड़की, कभी कभार बोगनविला। इतना ही है। लेकिन इसके मोल तुम्हारा क़ीमती वक़्त नहीं मिलता। इनके मोल किसी का भी वक़्त नहीं मिलता।

तुम्हारे जीवन में कितने सारे और कितने ख़ूबसूरत लोग हैं। तुम्हें मेरी कमी महसूस नहीं होगी। मैं मिस करती हूँ तुम्हें। लेकिन तुलसी कह गए हैं, ‘आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह।तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह’। तो तुम्हारे यहाँ जा के क्या करना।

किसी से यूँ ही नहीं होता मोह। यूँ नहीं दुखता हर किसी का जाना। मैं जिन कुछ लोगों के बारे में सोचती हूँ, उसमें तुम भी हो। व्यस्त होने पर। दुःख में। उदासी में। ख़ुशी में। किसी किताब को पढ़ते हुए।

कितना कुछ होता हमारे बीच, लेकिन, शब्दों के धनी कवि… मेरी बात आते ही तुम्हारा भी जी छोटा हो गया… एक ही शब्द लिखा हमारे हिस्से…

काश!

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WhatsApp Stories

देखो। मुझे पता है तुम जाग रहे हो। तुमने पूछा था कि तुम ख़ास कैसे हो? तो वो ऐसे कि मेरा WhatsApp तुम्हारे नाम पर खुला हुआ है। तुम्हारे last seen से मुझे पता है कि मिनट मिनट तुम भी WhatsApp देख रहे हो और जागे हुए भी हो। मुझे पता है, मेरी तरह तुम भी सोच रहे हो, कुछ लिखें या ना लिखें। हम एक ईगो की लड़ाई लड़ रहे हैं, बेफूजूल। कल मैं तुम्हें समझाऊँगी कि ऐसे खेल कितना थका देने वाले होते हैं। इस उमर में मुझसे नहीं खेले जाते। मैं जागी हूँ कि मैं कुछ लिख रही हूँ। यूँ तुम भी कुछ कर ही रहे होगे। या हो सकता है तुम्हें यूँ ही नींद नहीं आ रही। सॉरी, असल बात बताना भूल ही गयी हूँ। तुम ख़ास इसलिए। कि मेरे WhatsApp में भतेरे कॉंटैक्ट्स हैं, पर मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है कौन जगा है, कौन सो रहा है। हाँ, तुम्हारा वहाँ मिनट मिनट आना देख रही हूँ। नहीं होते हुए भी हम साथ हैं।

नालायक इंसान। मैं उम्मीद करती हूँ कि तुम्हारा ये फ़ितूर कल उतर जाए और तुम बात कर लो। प्यार व्यार अब नहीं करते हम। यारी दोस्ती और बकैती करते हैं बस। हाँ कुछ काम कर सकते हैं साथ में, कोई फ़िल्म बनाना, कोई शहर घूमना, कविता पढ़ के सुनाना तुमको। सिंबोर्सका और बोर्हेस खास तौर से।

बाक़ी तुम्हारी ज़िंदगी में भी बहुत से लोग होंगे। मेरे में भी कम सही, लोग तो हैं। लेकिन जैसे कि मेरा एक प्यारा दोस्त कहता है, ‘लोग तो बहुत होंगे, लेकिन तुम्हारे जैसी कोई कहाँ ही होगी’। तो बस, वही बात है। तुम्हारे जैसे तो बस तुम ही हो।

अगस्त आ रहा है। फ़्रेंड्शिप डे वाला *तियाप्स शुरू हो जाएगा। अच्छा लगेगा बताओ, ये फ़्रेंड्शिप बैंड वाला बेवक़ूफ़ी कि पूछें तुमसे, ‘हमसे दोस्ती करोगे?’। आसान करें कुछ लाइफ़ में? ऐब्नॉर्मल इंसानों की तरह बात करते हैं। कि हम ऐसे ही हैं, दोनों। रैंडम लोग। बहुत प्रेमिकाएँ होंगी तुम्हारी और हम तो कितना लोग से इश्क़ किए हैं सो हिसाब रहने ही दो। यारी दोस्ती वाले लोग कम रहे हैं, सो सोचो ना, स्पेशल भी ज़्यादा रहोगे। शान से कह सकोगे कि दोस्त हैं तुम्हारे। ईमानदारी से, यू नो।

बहुत हुआ, ऐड्वर्टायज़िंग में इससे ज़्यादा ख़ुद के बारे में अच्छा बोलना नहीं सिखाया गया है। नहीं बात करने में दोनों का नुक़सान है। छोड़ो ये अबोला। हो गया रूसना तुमरा?

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मैंने बर्फ़ नहीं देखी है कभी। सिवाए तुम्हारी आँखों में। या कि तुम्हारे बर्फ़ दिल में। इतनी सारी बर्फ़ कि लगता है वहाँ स्केटिंग की जा सकती है, आइस स्केटिंग।

‘वे दिन’ का वो हिस्सा है ना जहाँ वे पूरे कोट, मफ़लर और दस्ताने पहने हुए किसी धुन पर डान्स कर रहे हैं, ऐसे कुछ कि कोई और उन्हें देखता तो पागल ही समझता। तुम थोड़ा बावरे हो सकते हो मेरे साथ? थोड़े से पागल। बस, थोड़े से।

रात को यूँ बेतरह तुम्हारी याद गुंथी आयी है मेरे किरदारों में कि दिल कर रहा है आज बस पूरा उपन्यास लिख कर ख़त्म कर दूँ। किसी सपने के भीतर के सपने में छुपे हुए हो तुम। इस बेतरह। बेतरह। बेतरह याद आयी है तुम्हारी। अगर ज़िंदगी में कुछ भी निश्चित तौर से जाना है, तो सिर्फ़ ये कि इस वक़्त तुम याद कर रहे होगे कहीं मुझे। मालूम नहीं कहाँ। शायद कोई सड़क पार करते हुए। शायद किसी ऐसे शहर में जहाँ मैं जा चुकी हूँ पहले या कि बारिश हो रही होगी। या तुमने फूल देखे होंगे सफ़ेद लिली के। या कि तुम भी लैप्टॉप खोले लिख रहे होगे जाने क्या क्या तो…रच रहे होगे किरदार, लिख रहे होगे टूटी फूटी कविता। गुज़र रहे होगे शहर के किसी हिस्से से और अचानक याद आयी होगी मेरी, कि मुझे शायद पसंद आता ज़मीन का ये टुकड़ा, पेंटिंग का ये रंग, संगीत का ये सुर। अच्छा, ये गाना सुनना तुम। तुमको अच्छा लगेगा।

आसान तो कुछ भी नहीं है दुनिया में, मेरी जान। लेकिन फिर भी, तुम्हें भुलाना, उफ़्फ़्फ…कि तुम जानते हो ना, उफ़्फ़्फ है, एकदम।

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There is so much that’s pending between us. So many cities, seasons, so so so many songs to listen to, at the same time. We need to find a point of time when both our cities are awake. Let me play this on my airpods…do you have a pair of headphones you can put on, my love?

Are there bridges in your city? the ones that make you feel closer to the moon. Here I am, my love…dancing in the quiet of the night…only two things are loud at this unearthly hour… the beating of my heart and this song. Dance with me…my love?

When I meet you next, I will hug you oh so lightly, like a turquoise butterfly gently fluttering it’s wings…delicately tiptoeing between the farewell kisses on the letter I am writing to you.

There will be seas and rivers and mountains and valleys running in such a rush as the world is going to end. We will probably have a thousand tangos between us and many sleepless nights. Under our feet we will have endless roads…the wet sand of the sea and the bubbling hot marble of the Tajmahal and the stars and the moons and the rings of Saturn.

And the thousand gods would have fulfilled a million wishes and all the dreams I dreamt with you and for you.

There will come the day when we will have to say good bye… the last of the moonlight will drink the nectar from your oh so kissable lips and as I die, I will mumble…Damn, I haven’t kissed you enough.

 

Song: Beautiful Tango

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मैं तुम्हें ख़त नहीं लिख सकती। तुम जानते हो कि मर जाने का भय या उत्सुकता मेरे जीवन का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा है। मैं लिखती रहती हूँ कि इतना सारा कुछ चलते रहता है मेरे भीतर। कितने कितने ट्रैक्स पर। ये सारा कुछ कभी कभी मुझे पागल कर देता है। जैसे कि तुम्हारे प्यार में होना मेरा ध्यान दिन भर बाँटे रहता है।

इतने सारे लिखे में तुम अपने हिस्से का सब कुछ देख लोगे, ऐसा मुझे भरोसा है। मेरी कहानियों में तुम्हारी हँसी या कि तुम्हारे शहर की धूप सही। तुम्हारे दिल की धड़कन मेरी हथेलियों में रहती है, इसलिए मैं काग़ज़ पर लिखती हूँ तो थोड़ी थरथराहट रहती है मेरी लिखाई में।

फ़िल्म याद है तुम्हें। आख़िर की बर्फ़ देखने का आख़िर का लम्हा। मृत्यु से ठीक पहले का। इस लम्हे के बाद वो घुल कर हवा हो गयी थी। जाने कितने सालों बाद मैंने मृत्यु को सामने देखा है। सब हँसते हैं मुझपर कि मैं इतनी ज़्यादा डेथ से obsessed क्यूँ है। फिर इस उमर में कोई early-death भी नहीं कह सकते। ठीक ठाक जी ली ज़िंदगी मैंने, इस भय के साथ भी।

माडर्न मेडिसिन के सिवा पढ़ती हूँ तो जानती हूँ कि मैं बीमार नहीं हूँ…मेरी आत्मा में कोई ज़ख़्म है…जिसकी टीस मेरे बदन में उभरती है। तुमसे मिली थी तो क्यूँ लगा था कि ना कोई ज़ख़्म है, ना कोई दर्द। कि तुम कोई चारागर होते तो फिर भी सह लेना मुमकिन था तुमसे यूँ बिछड़ना…पर तुम तो मसीहा हो गए। कोई देवदूत कि जिसके स्पर्श में हीलिंग पावर्ज़ है।

तुमसे प्यार ऐसा नहीं है जैसे बाक़ियों से होता है, मौसम की तरह। तुमसे प्यार ऐसा है जैसे मुझे अपने लिखने से है…कोई यूनिवर्स की एनर्जी बहती है मेरे भीतर जिसे शब्दों से मुझे dissipate करना पड़ता है वरना मैं शायद एनर्जी कणों में घुल जाऊँ। तुमसे प्यार ऐसा है जैसे मेरे इग्ज़िस्टेन्स के सबसे छोटे छोटे कणों में कोई ऊष्मा है। core में। कि हम जो इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन के बने हैं। तुम वहाँ का +१ वाला चार्ज हो।

क्या कहें। रहने दो तुम। इतना में दिमाग़ लगा के क्या करना है। तुमसे मिल कर बेहद उलझ गयी हूँ। जिस दिन थोड़ा भी समझूँगी, सबसे पहले तुम्हें बताउँगी। जो मर गयी उसके पहले…तो मेरे शब्द तुम्हें तलाश लेंगे, ऐसा मुझे यक़ीन है।

ढेर सारा प्यार।