Musings, Stories

a rose is a rose is a rose*

मेरा मन सिर्फ़ उस कल्पना से टूटता है जो कभी सच नहीं हो सकता और मैं सिर्फ़ इसलिए लिखती हूँ कि बहुत सारा कुछ एक कहानी में सच होता है।

***

‘तुम बिना चप्पल के चल सकते हो?’
‘हाँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है, कौन नहीं चल सकता है बिना चप्पल के!’ तुम्हारे अचरज पर मैं हँसती हूँ तो चाँदनी में मेरी हँसी बिखर जाती है। तुम्हारी आँखों में जो उजला उजला चमकता है वो मेरी हँसी ही है ना?

तुम्हें क्या ना जाने समझ कर बुला लायी हूँ देवघर। फिर हम अपनी एनफ़ील्ड से सौ किलोमीटर दूर अपने गाँव जाने को निकले हैं। रास्ते में हनमना डैम पड़ता है। मैं वहाँ रूकती हूँ। कैक्टस पर इस साल भी फूल आया है। तुम उसे छूने को अपना हाथ बढ़ाते ही हो कि मैं ज़ोर से तुम्हारा हाथ पकड़ कर खींच लेती हूँ तुम्हें अपनी ओर…’रे बुद्धू, कैक्टस के फूल में भी बहुत काँटे होते हैं। एकदम महीन काँटे। ख़ून में मिल जाएँगे और उम्र भर दुखेंगे जाने किधर किधर तो।’ तुम मुझे अचरज से देखते हो, मैं जानती हूँ तुम सोच रहे हो कि मेरे लहू में कैक्टस के कितने काँटे हैं जो कभी घुलते नहीं। कितना दुखते हैं मुझे जो मुझे ये बात मालूम है। संगमरमर का फ़र्श है और गोल संगमरमर के ऊँचे खम्भे। एकदम सफ़ेद। हम दूर तक फैला हुआ बाँध का पानी देखते हैं। झींगुरों की आवाज़ आ रही है और चम्पा की बहुत हल्की फीकी गंध हम आमने सामने के खम्बों पर पीठ टिकाए बैठे हैं। पैर हल्के हल्के हिला रहे हैं। कभी एक दूसरे को कुछ कहना होता है तो पैर से ही गुदगुदी करते हैं। मैं कोई धुन गुनगुनाने लगती हूँ, तुम पूछते हो, ‘क्या गा रही हो’…मैं गाने के स्थाई की पंक्तियाँ गुनगुनाती हूँ और तुम उसी धुन में बहते हो।

हम गाँव की ओर चल पड़े हैं तो शाम होने को आयी है। जब तक मासूमगंज आते हैं लगभग अँधेरा हो चुका होता है। गाँव के टूटे फूटे रास्ते में धीरे धीरे एनफ़ील्ड चलाते हुए आते हैं। कहीं कहीं जुगनू दिख रहे होते हैं। तुमने पकड़ रखा है मुझे पर तुम्हारी पकड़ हल्की है। तुम्हें मेरे बाइक चलाने से डर नहीं लगता है। हम शिवालय के पास पहुँच जाते हैं। यहाँ से आगे बाइक चला कर ले जाएँगे तो पूरा गाँव उठ जाएगा। एकदम ही सन्नाटा है। लाइट कटी हुयी है। एकदम ही चाँदनी रात है। हवा में कटे हुए पुआल की गंध है। ऊँघते घरों से कोई आवाज़ मुश्किल से आ रही है। कहीं कहीं शायद टीवी चल रहा हो। कोई फ़ोन पर बात कर रहा है किसी से, सिग्नल ख़राब होने की शिकायत।

गाँव में मेरा घर सबसे आख़िर में है। मैं एक घर पहले तुमसे जूते उतरवा देती हूँ और चहारदिवारी में बाहर की ओर बने ताखे पर रखवा देती हूँ। एक ज़माने में यहाँ लोग खेत से लौट कर आने पर लोटा रखा करते थे।

घर में सब लोग सो गए हैं, आठ बजे से ही। हम बिना चप्पल के एकदम दबे पाँव चलते हैं। घर के बरामदे पर मेरे चाचा सोए हुए हैं। डर के मारे मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा है कि लगता है उसकी ही आवाज़ सबको सुनायी पड़ जाएगी। मैंने तुम्हारा हाथ ज़ोर से पकड़ रखा है। यहाँ एकदम अँधेरा है। मैं पहली बार तुम्हारे हाथ की पकड़ पर ग़ौर करती हूँ। हम दोनों दीवाल से टिके हुए हैं। सामने लकड़ी का उढ़का हुआ किवाड़ है जिसके पल्लों के बीच से एक व्यक्ति एक बार में जा सकता है। तुम्हारी साँस से पता चल रहा है कि तुम्हारी धड़कन भी बढ़ी हुयी है। तुम मेरी हथेली अपने सीने पर रखते हो। मेरी हथेली तुम्हारी धड़कन की बदहवासी में वही पागलपन पहचानती है जिसके कारण हम आज यहाँ आए हुए हैं। वही पागलपन जो हमें जोड़ता है। धीरे धीरे तुम्हारे दिल की धड़कन भी थोड़ी सम्हलती है और मैं भी थोड़ा सा गहरी साँस लेती हूँ। किवाड़ की फाँक में एक पैर रखने के पहले ईश्वर से मनाती हूँ कि फाँक और मोटापे की लड़ाई में फाँक जीत जाए। ईश्वर इस छोटी मनौती को मान लेता है और मैं दरवाज़े के उस पार होती हूँ। इस तरफ़ आ कर मैं तुम्हारे माथे पर हाथ रखती हूँ ताकि तुम झुक कर अंदर आते वक़्त छोटे दरवाज़े की चौखट से न टकरा जाओ। अंदर आँगन भर चाँदनी है। हम खड़े आँगन देख रहे होते हैं कि ठीक एक बादल का टुकड़ा चाँद के आगे आ जाता है और सब तरफ़ गहरा अँधेरा हो जाता है। तुलसी चौरे पर जलता दिया एक छोटा सा पीलापन लिए मुस्कुराता है, जैसे उसने ही मेरी चोरी पकड़ ली है। आंगन में अब भी निम्बू लगा हुआ है। मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर बैठती हूँ ईंट की बनी सीढ़ी पर। तुम देखते हो दायीं तरफ़ का पूजाघर और उससे लगा हुआ चौका। तुम देखते हो वो खंबा। जब मैं पैदा हुयी थी तो पापा दादी को ख़बर सुनाने यही आँगन लाँघ कर पूजा घर की ओर बढ़े थे। इसी खम्बे के पास खड़ी दादी पूजा के बाद अपने हाथ धो रही थीं। पापा ने कहा, ‘पोती हुयी है’। दादी बहुत ख़ुश हुयी, ‘कि बेटा बहुत अच्छा ख़बर सुनाए, एकदम पूजा करके उठे हैं, पोती का नाम पूजा ही रख दो’।

तुम मेरा हाथ पकड़ कर उस आधी चाँदनी वाली धुँधली रात में आगे बढ़ते हो। ठीक वहाँ खड़े होते हो जहाँ पापा खड़े थे। उस लम्हे को जीते हुए। तलवों ने कई दिन बाद मिट्टी महसूसी है। हवा चल रही है हल्की हल्की। बादल पूरी तरह हट गया है और चाँद एकदम से भौंचक हो कर झाँक रहा है आँगन में। धमका रहा है एक तरह से। बाबू देखा ना कोई तो पीटेगा नहीं, सीधे गाँव से उठा कर बाहर फेंक देगा। फिर ई ओसारा ज़िंदगी भर भूल जाना।

हमारे हाथ एक दूसरे को जाने कौन सी कथा कह रहे हैं। मैंने देखा नहीं है, पर जानती हूँ। आँगन में आँसू गिरे हैं। मेरी आँख से, तुम्हारी आँख से भी। हम एकदम ही चुप वहाँ से ठीक वैसे ही वापस आते हैं। जूते पहनते हैं और गाँव से बाहर शिवालय तक तेज़ चलते आते हैं। एनफ़ील्ड स्टार्ट और इस बार तुम्हारी पकड़ से मैं जानती हूँ कि तुम्हें कितना डर लग रहा है।
लगभग दो घंटे में हम देवघर पहुँच गए हैं। इतने थके हैं कि सोचने की हिम्मत नहीं बची है। जिसकी चाभी हाथ में आयी है, उसके कमरे का दरवाज़ा खोले हैं और सीधे बेड पर पड़ के बेहोश सो गए हैं।

सुबह नींद साथ में खुली है। तुम्हें ऊनींदी देख रही हूँ। तुम्हारी आँखों की धूप से कमरा सुनहला है। मैं जानती हूँ कि तुम सच में हो फिर भी तुम्हें छूना चाहती हूँ। मगर इस लम्हे के बाद, ज़िंदगी है। होटल की केटली में पानी गरम करके दो कप कॉफ़ी बनाती हूँ। एक अजीब सा घरेलूपन है हमारे बीच। जैसे हम एक ही गाँव के बचपन वाले हैं। तुम मेरे गाँव एक बार जा के मेरे हो गए हो।

तुम अब मुझे कहानी सुनाते हो कि क्यूँ तुम्हें ठीक उस जगह होना था जहाँ मेरा नामकरण हुआ था। देवघर के ही एक पंडा जी ने तुम्हारे बचपन में तुमसे एक बार कहा था कि तुम्हारी ज़िंदगी में ‘प’ अक्षर बहुत प्रेम लेकर आएगा। ज़िंदगी भर तुम्हारा इस नाम से कोई रिश्ता नहीं रहा। ना तुम पानीपत, पटना, पटियाला, प्रयाग जैसे शहरों में कभी रहे, ना कभी तुम्हें प नाम से शुरू होने वाली किसी लड़की से कभी प्रेम हुआ, यहाँ तक कि शादी भी जिससे हुयी, उसके नाम में कहीं भी ये अक्षर नहीं था। जब तक तुम मुझसे नहीं मिले थे तुम भूल भी चुके थे तुम्हारे बचपन में ऐसी कोई बात कभी किसी ने कही थी। मुझसे मिलना तुम्हें कई चीज़ों के बारे में दुबारा सोचने को मजबूर करता है। शादी। घर। गिरहस्थी। प्रेम। भविष्यवाणी। देवघर के पंडे।

तुम उस जगह खड़े होकर उस एनर्जी को महसूसना चाहते थे जो तुम्हें इस बेतरह अफ़ेक्ट करती है। कि ठीक उसी लम्हे मैं तुमसे जुड़ गयी थी, तुम्हारे जाने बिना। तुम हँसते रहे हो हमेशा, कि मेरे नाम में जाना लिखा है और तुम दुखते रहे हमेशा कि मैं लौट लौट कर आती रही। कि मैं तुम्हारे पागलपन से कभी घबराती नहीं, ना सवाल पूछती हूँ। कि मैंने जाने कौन सा प्रेम तुम्हारे हिस्से का जोग रखा है।

प्रेम अपने शुद्ध स्वरूप में निश्छल और निर्दोष होता है। मैं हँसती हूँ तुम्हें देख कर।
‘अब पंडाजी का ख़बर भी लेने चलोगे?’
‘नहीं रे। तुमको देख कर बोल दिया कि यही है प अक्षर वाली, तो मैं बाल बच्चों वाला आदमी इस धर्मसंकट में मर ही जाऊँगा। इतना काफ़ी है कि मेरा दिल जानता है।’
‘क्या जानता है?’
‘कि एक अक्षर भर का प्रेम जो मेरे नाम लिखा था। तुम्हारे नाम से शुरू होकर, तुम पर ही ख़त्म होगा।’
‘इतने से में जी लोगे तुम?’
‘मुझे बहुत की ख़्वाहिश कभी नहीं रही। और ये, इतना सा नहीं, है काफ़ी है’।
‘यूँ भी, सब मोह माया है’
‘नहीं, मोह से ज़्यादा है रे। प्यार है, तुमको भी, हमको भी। लेकिन हाँ, तुम्हारे इस प्यार पर हक़ है मेरा। और कि तुमसे दूर जाने का तकलीफ़ उठाना बंद कर देंगे अब’
‘बाबा नगरी में आ के तुमरा बुद्धि खुल गया’
‘रे पागल लड़की, सुनो। तुम अपना नाम कभी मत बदलना’।
‘कौन सा नाम? पूजा?’
‘नहीं। पागल’

[अगली बार वो पूछे कि तुमको पागल बुलाने में बेसी अच्छा लगता है, तो उसको यही कहानी सुनाएँगे]

*as said by Stein

Musings, Stories

चुनना पलाश

तुमने कभी ग़ौर किया है कि अब हमारी बातों में, गीतों में, फ़िल्मों में…फूलों का ज़िक्र कितना कम आता है?fullsizeoutput_e81.jpeg

तुमने आख़िरी बार किसी फूल को कब देखा था ग़ौर से…मतलब वैलेंटायन डे पर फूल देने की जेनेरिक रस्म से इतर। कि गुलाब के सिवा कितने और फूलों के नाम पता हैं तुम्हें? कोई पूछ ले कि तुम्हारा पसंदीदा फूल कौन सा है तो कह सकोगे? कि तुम्हें फूल पसंद ही नहीं हैं…या कि तुम तो लड़के हो, तुम्हें कभी किसी ने फूल दिए ही नहीं तो तुम्हें क्या ही करना है फूलों का?

माना कि गमले में फूल उगाना और मौसमों के साथ उनकी ख़ुशबू चीन्हना सबके क़िस्मत में नहीं होता। लेकिन फूलदान में लगे फूलों की तासीर पहचानने के लिए किसी लड़की की ज़रूरत क्यूँ रही तुम्हें? कितनी सारी ख़ूबसूरती तुम्हारी आँखों के सामने रही और तुमने कभी देखा नहीं। फिर फ़ालतू का उलाहना देते फिरोगे कि ये दुनिया बहुत ही बदसूरत जगह है। 

तुम जानते हो कि लैवेंडर किस रंग का होता है? या कि ठीक ठीक लैवेंडर की ख़ुशबू ही? तुम्हें लगता है ना कि तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो कुछ इस तरह कि मेरे बारे में सब कुछ ही मालूम है तुम्हें…तो बताओ मुझे कौन कौन से फूल पसंद हैं और क्यूँ? नहीं मालूम ना तुम्हें…

चलो, कुछ फूलों को याद करते हैं फिर से…मेरे बचपन में बहुत फूल थे…बहुत रंगों के…

सबसे पहले एक जंगली फूल का नाम, पुटुश…ये फूल मैंने पूरी दुनिया के जंगलों में देखे हैं। हम जब बच्चे हुआ करते थे तो ये फूल सबसे ज़्यादा दिखते थे आसपास। ये एक छोटे छोटे फूलों का गुच्छा होता है जिसके काले रंग के फल होते हैं। फूलों को निकाल कर चूसने से हल्का मीठा मीठा सा स्वाद आता है। बचपन से लेकर अब तक, मैं अक्सर ये काम किया करती हूँ। इसकी गंध के साथ इतनी सारी यादें हैं कि तुम सुनोगे तो पागल हो जाओगे, लेकिन ख़ैर। कोई फूल हमारी ज़िंदगी में कैसे रचा-बसा-गुंथा होता है ये हम बचपन में कहाँ जानते हैं। दिल्ली गयी थी तो अपने छोटे शहर को बहुत मिस कर रही थी। इतनी इमारतों के बीच रहने की कभी आदत नहीं रही थी। IIMC, JNU कैम्पस का हिस्सा है। पहले ही दिन से PSR की कहानियाँ सुनने लगते हैं हम। मैं उस लड़के को जानती भी नहीं थी, उन दिनों। बस इतना कि वो मेरी एक दोस्त का दोस्त है। उसने JNU से फ़्रेंच किया था। अगस्त की हल्की बारिश की एक शाम उसने पूछा, PSR देखने चलोगी…हम चल दिए। JNU की सड़कों से होते हुए जब PSR पहुँचे तो पुटुश की झाड़ियों के बीच से एक पगडंडी जाती थी। बारिश हुयी थी थोड़ी देर पहले, एकदम फुहारों वाली। तेज़ गंध थी पुटुश के पत्तों की…मीठी और जंगली…दीवानी सी गंध…जैसी की मनमर्जियों की होती है। बेपरवाहियों की भी। पुटुश मुझे कई जगह मिलता रहा है। अलग अलग सफ़र में। अलग अलग क़िस्सों के साथ। बस। मीठा होता है इसके इर्द गिर्द होना, हमेशा। जंगल के इर्द गिर्द का पुटुश मुझे बेहद पसंद है। लेकिन देखो, बुद्धू। मेरे लिए पुटुश तोड़ कर मत लाना, काँटे होते हैं इसकी झाड़ियों में। तुम्हारे हाथ ज़ख़्मी हुए तो क़सम से, दिल मेरा दुखेगा। 

दसबजिया/नौबजिया फूल: छोटे छोटे फूल जो सुबह सुबह खिल जाते थे और बहुत रंग में आते थे। बहुत आसानी से उगते थे और देर तक रहते थे। (कभी कभी सोचती हूँ ये एक घंटे का अंतर किसी अमेरिकन टाइम टेबल के हिसाब से होगा। DST अजस्ट करने के लिए)

गुलदाउदी: उन दिनों मेहनत करने वाले लोगों के बाग़ में बड़े बड़े गुलदाउदी खिला करते थे। बाक़ी लोगों के यहाँ छोटे छोटे अक्सर सफ़ेद या पीले जिसमें से जाड़ों की धूप, ऊन वाले स्वेटर और रात के अलाव की की ख़ुशबू आती थी।

रजनीगंधा: मेरे घर में कुआँ था और घर से कुआँ जाने के रास्ते में दोनों तरफ़ रजनीगंधा लगा हुआ था। जब ये फूलता था तो रास्ते में छोटा छोटे भुकभुकिया बल्ब जैसा लगता था। घर के हर शादी, फ़ंक्शन में गजरा के लिए सबको रजनीगंधा की लड़ियाँ ही मिलती थीं। जब पहली बार घर से बाहर अकेले रहना शुरू किए तो बिजलरी की बोतल में रखने के लिए पहली बार बेर सराय से ख़रीद कर रजनीगंधा का एक स्टिक रखे। पहला फूलदान ख़रीदे तो उसमें एक रजनीगंधा की स्टिक और एक लाल गुलाब रखा करते थे। इन दिनों रजनीगंधा कभी नहीं ख़रीदते कि वो एक कमरा इतना याद आता है कि दुखने लगता है। ये उस वक़्त की ख़ुशबू है जब जीवन में कोई दुःख नहीं था। 

कारनेशंस: मैं उस लड़के से प्यार करती थी। वो मुझे सोलमेट कहता था। हम बहुत दूर के शहरों में रहते थे। उसके शहर का समंदर मुझे उसकी याद दिलाता था, गीतों में नमकीन होता हुआ। उसने एक बार मुझे फ़ोन किया, उसे अपने किसी दोस्त के जन्मदिन पर फूल देने थे। मैंने पूछे, कौन से…उसने कहा, कारनेशंस…मैंने पूछा, कौन से रंगे के…उसने कहा सफ़ेद। मैंने पहली बार कारनेशंस का गुलदस्ता बनवाया और उसके उस दोस्त के लिए डेस्क पर रखा। गुलदस्ते की एक तस्वीर खींच कर भेजी उसे। उसका मेसेज आया, ‘ब्यूटिफ़ुल, जस्ट लाइक यू’। फूल सिर्फ़ बहाना था। उसे कहना था मुझे कि मैं कारनेशंस की तरह ख़ूबसूरत हूँ। वो रक़ीब है तुम्हारा। उतना प्यार तुम मुझसे कभी नहीं कर सकोगे। फिर उसने कभी मेरे लिए फूल नहीं ख़रीदे…तो सुनो, मेरे लिए कारनेशंस कभी ख़रीद कर मत लाना। 

लिली: वही लड़का, उफ़। मतलब क्या कहें तुमसे। जादू ही था। पहली बार उसने लिली ख़रीदी थी, सफ़ेद। मेरी कलीग की सीट पर रखा था एक काँच के गिलास में। लिली का बंद फूल, कली यू नो। एक पूरे हफ़्ते नहीं खिली वो। मुझे लगा नहीं खिलेगी। वो रोज़ उसका पानी बदलता। वीकेंड आया। मैं कमरे में आयी तो एक अनजान ख़ुशबू आयी। मैं ये गंध नहीं पहचानती थी। कमरे में आयी तो उसे देखा। धूप देखी। उसकी आँखें देखी। उसने कहा, देखो, तुम आयी ना, अभी अभी लिली खिली है। ये वाक़या झूठ है हालाँकि। मैंने ख़ुद के लिए कई बार सफ़ेद लिली ख़रीदी। मुझे उसकी गंध इतनी पसंद थी जितना वो लड़का। लेकिन फिर प्यार भी बहुत ज़्यादा था और लिली की गंध भी कुछ ज़्यादा ही सांद्र। तो बर्दाश्त नहीं होता अब। तो देखो, मेरे लिए लिली मत लाना। 

बोगनविला: लहक के खिलते पूरे JNU के वसंत में कि जैसे मेरे जीवन का आख़िर वसंत हो। मैं हैंडीकैम लिए बौराती रहती सड़क दर सड़क। सोचती कि रख लूँगी आँख भर बोगनविला के सारे शेड्स। मुहब्बत की कितनी मिठास तो। बेलौस धुन कोई। उड़ता रहेगा दुपट्टा यूँ ही आज़ाद हवा में और मेरे दिल को नहीं आएगा किसी एक का होकर रहना। बहुत साल बाद बोगनविला से दुबारा मिली तो जाना कि जंगली ही नहीं ज़िद्दी पौधा भी है। घर के दरवाज़े पर लगा बोगनविला मुहब्बत की तरह पुनर्नवा है। दो महीने में पूरा सूख कर दो महीने में फिर से लौट भी आता है। इक शाम साड़ी पहन मुहब्बत में डूबी इतराते हुए चली तो जूड़े में बोगनविला के फूल लगा लिए। इस अफ़ोस के साथ कि उम्र भर इतने ख़ूबसूरत बाल रहे लेकिन तुम्हारे जैसे नालायक लड़कों से दुनिया भरी है कि किसी ने कभी बालों में लगाने के लिए फूल नहीं ला के लिए। बोगनविला अगर तुमने लगा रखे हों घर में, तो ही लाना मेरे लिए बोगनविला के फूल। वरना रहने दो। मुझ बेपरवाह औरत के घर में हमेशा खिला रहता है बोगनविला। बाक़ी समय किताबों में बुक्मार्क हुये रहते हैं रंग वाले सूखे फूल। सफ़ेद बोगवानविला पसंद हैं मुझे। उनपर फ़ीरोज़ी स्याही से तुम्हारा नाम लिख के सबिनास की प्रेम कविताओं की किताब में रख दूँगी। अगर जो तुम्हें याद रहे तो। 

ट्युलिप: बहुत्ते महँगा फूल है। आकाशकुसुम जैसा। पहली बार देखे थे तो छू कर तस्दीक़ किए थे कि सच का फूल है। मैंने आज तक कभी ख़ुद के लिए ट्युलिप नहीं ख़रीदे। एक बार बीज देखे थे इसके। लेकिन इसलिए नहीं ख़रीदे कि यहाँ उगाने बहुत मुश्किल होंगे। तुमसे तो उग जाते हैं लेकिन। पता है, न्यू यॉर्क के सेंट्रल पार्क में तुम अपने किसी प्यारे व्यक्ति के नाम पर ट्यूलिप्स लगवा सकते हो। इसके लिए मेरे मरने और मेरी क़ब्र पर ट्युलिप लगाने जैसी मेहनत नहीं है। ना तो मैं अभी मर रही, ना मेरी क़ब्र होगी। तो रहने दो। कॉफ़ी मग में एक छोटा सा ट्युलिप मेरे नाम पर उगा दो ना!

मुझे ज़रबेरा पसंद हैं। सिम्पल ख़ुश फूल। कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए उन्हें। बहुत महँगे भी नहीं होते। मैं हमेशा तीन ज़रबेरा ख़रीदती हूँ। अक्सर दो पीले और एक सफ़ेद। या कभी दो सफ़ेद, एक पीला। मूड के हिसाब से सफ़ेद और पिंक या कभी लाल और पीले भी। पिछले दस साल से एक ही दुकान से ले रही हूँ। सोचती हूँ, अब जो मैं नयी लोकैलिटी में शिफ़्ट हो रही हूँ…उस दुकान का एक रेग्युलर कस्टमर कम हो जाएगा। जीवन में कितने दुःख हैं। 

और पलाश। कि जीवन में सबसे रंगभरा, सुंदर, और मीठा जो फूल है वो है पलाश। एक इश्क़ की याद कि जो अधूरा है लेकिन टीसता नहीं, सुलगता है मन के जंगल में। गहरा लाल रंग। फूलता है टेसु और जैसे हर महीना ही मार्च हुआ जाता है। मिज़ाज फागुन, और गाल गुलाल से रंगते लाल, पीले, हरे…कोई होता है लड़का गहरे डिम्पल वाला जिसकी हँसी में डूब जाती हूँ। सच का होता तो साँस अटक जाती, क़सम से! इनावरण में हुआ करता था पलाश का जंगल जो कि होली में लहकता था ऐसे जैसे कि कोई दूसरा साल या वसंत कभी आएगा ही नहीं। उसी से मिल कर पता चला, सपनों के राजकुमारों के मोटरसाइकल रेसिंग स्कूल होते हैं, उसका वो नम्बर वन रेसर था। बाइक ऐसी तेज़ चलाता था कि उतनी तेज़ बस दिल धड़कता था। इक दिन जाना है उसके छूटे हुए शहर और वापसी में पूरे रास्ते रोपते आना है पलाश के पौधे कि कभी वो मुझ तक लौटना चाहे तो मार्च में लौटे, वसंत से गलबहियाँ डाले हुए। उसे चूमना वायलेंट हो कि होठों के किनार पर उभर आए ख़ून का गहरा लाल रंग। वो होंठ फिरा कर चखे बदन में दौड़ते ख़ून का स्वाद और मुस्कुराते हुए पूछे, इश्क़? मेरी आँखों में मौसम बदल कर हो जाए सावन और मैं कहूँ, अफ़सोस। मगर वो बाँहों में भरे ऐसे कि मन कच्चा हरा होता जाए, पलाश की कोंपल जैसा। वो कह सके, तुम या तो एक बार काफ़ी हो या उम्र भर भी नहीं। 

तुम ठीक कहते हो कि मेरी बातें कभी ख़त्म नहीं होंगी। जितनी लम्बी फूलों की लिस्ट है, इतना तो प्यार भी नहीं करते हो तुम मुझसे। उसपे कुछ ज़्यादा ही मीठी हूँ मैं। ये तुम्हारी उम्र नहीं इतने मीठे में ख़ुद को इंडल्ज करने की। हमसे इश्क़ करोगे तो कहे देते हैं, डाइअबीटीज़ से मरोगे तुम!

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तुम्हारे इंतज़ार में में चंदन में घुली बैठी हूँ। भर दोपहर तरतीब से चाँद बुझाने के तरीक़े सीखते बीती है। मुझसे पहले कई प्रेमियों ने चाँद के प्रकाश पर अपनी आपत्ति जतायी है, तो मुझे इसमें कोई अपराधबोध नहीं हो रहा। मुझे कोई ख़ास शिकायत नहीं है, सिवाए इसके कि तुम्हें चाँद इतना पसंद है कि तुम पूरी रात देखते रह सकते हो उसे। एकदम चुप चाँदनी में भीगते हुए। ना कोई बात कहते हो, ना कोई धुन गुनगुनाते हो। बस चाँद की शीतलता और मुझसे उठती चंदन की गंध। इतनी ही ख़्वाहिश होती है तुम्हारी।
 
लेकिन इतने से मेरा जी कहाँ भरता। मैं प्यास में जलती उठती हूँ। मुझे तुमसे कविताएँ सुनने की आदत हो गयी है। तुमने इतना बिगाड़ क्यूँ रखा है मुझे?
 
अंधेरे में जब तुम कविता पढ़ते हो तो मेरी बंद आँखें कुछ नहीं खोजतीं। मेरे हाथों को तुम्हारा पता मालूम रहता है। मेरी दायीं हथेली तुम्हारे सीने स्थिर तुम्हारी धड़कन को कविता की लय में गूँथती रहती है। मौसम में हल्की ठंढ होती है तो तुम्हारे काँधे पर एक हथकरघे पर बनी थोड़ी मोटे धागों वाली चादर रहती है जिसमें जहाँ तहाँ गाँठें होती हैं। मक्खन रंग की इन चादरों के लिए भागलपुर नामी हुआ करता था। भले घर की लड़कियाँ बहुत गरमी में भी बिना चादर ओढ़े नहीं सोती थीं। मैं इस चादर को छू कर पहचान सकती हूँ। ये मेरे उन दिनों की याद दिलाता है जब कि कच्ची मिट्टी का घर होता था और हम बिना चप्पल अक्सर घूमा करते थे। ख़यालों में डूबती उतराती रहती हूँ और पैरों की उँगलियाँ भी गुँथती रहती हैं तुम्हारे पैर की उँगलियों से। ना सही गुदगुदी लगाती रहती हूँ तुम्हें। तुम नाराज़ होते कहते हो, देखो, फिर कोई कविता नहीं सुनाऊँगा तुम ऐसे बदमाशी करोगी तो।
 
मुझे ऐसा लगता है कि चाँद को ऐसे एकटक देखते हुए तुम किसी और के बारे में सोच रहे होते हो। मेरे बालों में उलझी तुम्हारी उँगलियाँ किसी और के बालों की छुअन तलाश रही होती हैं। तुम चंदन की गंध में होते हुए भी किसी बेतरह बारिश वाले दिन में भीगे जंगली गुलाबों की किसी गंध का पीछा करते हो। इतना स्थिर और शांत कोई प्रेम में ही हो सकता है।
 
सबसे पहले तुम्हारे हाथ अजनबी हुए और मेरे बदन पर बने तुम्हारे ठिकाने भूल गए। फिर तुम्हारी भाषा, जो कविता से चुप्पी में बदल गयी। फिर तुमने दिन भर मुझे बारिश में भिगोए रखा कि तुम चाहते थे कि चंदन की गंध धुल जाए। अच्छा बताओ, क्या बारिश में धुली, भीगी, सारी औरतें बारिश जैसी महकती हैं? पानी और आँसुओं जैसीं। मुझे याद नहीं तुम्हारी आँखें कब अजनबी हुयीं। मैंने जब पूरनमासी को तुम्हारी आँखें देखीं तो उनमें मैं नहीं चाँद था।
 
आज रात चाँद को आँसुओं में डुबा दूँगी, ऐसा इरादा है। मेरे साथ राहु और केतू की बात हो चुकी है। मगर इसमें मेरा कोई दोष नहीं। ये तुम्हारा ही करतूत है। तुम ही बता दो, तुम मुझे चाँद से ज़्यादा प्यार क्यूँ नहीं कर सकते?
 
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फिर कभी…

यातना शिविर के नाज़ी गार्ड पागल हो रहे थे। हवा की सुगबुगाहट पर जैसे कोई उम्मीद की धुन उड़ती आ रही थी। ‘ज़दीकिम निस्तारिम…ज़दीकिम निस्तारिम’। एक लोककथा ये थी कि जब तक इस दुनिया में ३६ भले लोग बचे रहेंगे, चाहे बाक़ी दुनिया कितनी भी बर्बर और क्रूर हो जाए, ईश्वर इस दुनिया को ख़त्म नहीं करेगा। छत्तीस लोगों की अच्छाई इस दुनिया को बचाए रक्खेगी। दो हफ़्ते पहले की घटना थी, एक क़ैदी फ़रार हो गया था और नियम के अनुसार उसके बंकर के दस लोगों को भूखा मार देने के लिए सेल में भेजा जाना था। दस चुने हुए लोगों में एक रोने और चीख़ने लगा, ‘मेरे बीवी बच्चों का क्या होगा’। उसी बंकर में एक पादरी भी था, वो पादरी आगे आया और उसने अफ़सर से कहा, उसकी जगह मैं मरना चाहता हूँ। अफ़सर ने इस अदला बदली की इजाज़त दे दी।

दो हफ़्ते में बाक़ी ९ लोग तो मर गए थे लेकिन पादरी अभी भी जीवित था। आख़िर ज़हरीला इंजेक्शन देना पड़ा ताकि वो मर सके और उसी कालकोठरी में किसी और क़ैदी को डाला जा सके। जब से पादरी के मृत होने की ख़बर यातना शिविर में फैली थी, क़ैदी लोक कथा ‘ज़दीकिम’ की बात करने लगे थे। जिन लोगों के होने से दुनिया बची रहेगी। ये फुसफुसाहट हर ओर सुनायी देने लगी थी। नींद में, भूखे मरते लोगों के आख़िरी शब्दों में, चीख़ में, चुप्पी में। कुछ ऐसा करना ज़रूरी हो गया था कि क़ैदी चुपचाप मर जाया करें। रोज़ रोज़ लोगों को गोली मारते मारते फ़ाइअरिंग स्क्वॉड भी थक रही थी। नए तरीक़े इजाद करना ज़रूरी था।

अपना मन लगाए रखने के लिए भी ज़रूरी था कोई नया कौतुक शुरू हो। दो एसएस गार्ड्ज़ में शर्त लग गयी कि क्या एक गोली से दो लोगों को मारा जा सकता है। सुबह के नाश्ते के पहले रोल-कॉल के लिए क़ैदी लाइन में लगे हुए थे। गार्ड्ज़ ने पब्लिक अनाउनसेमेंट सिस्टम पर क़िस्सा सुनाया, ‘बात सुनने में आ रही इसी श्रम शिविर में ज़दीकिम निस्तारिम हैं – छुपे हुए भले लोग – इसलिए हम उन्हें बाहर निकालेंगे – देखते हैं दुनिया कब तक बचाए रखते हैं भले लोग’। यहूदी पवित्र संख्या ३० और ६ वाले दो क़ैदी तलाशे गए। यहीं पास में वो ख़ूनी दीवार थी जिसकी ओर मुँह कर के क़ैदियों को गोली मारी जाती थी।

एक कमसिन पोलिश लड़की और एक युवा पोलिश लड़का एक दूसरे के आमने सामने खड़े थे। वे अपना नाम तो कई दिनों पहले भूल चुके थे। उनकी पहचान अब उनकी कलाई में बने टैटू वाली संख्या ही थी। मरने के पहले वे ठीक एक दूसरे के सामने खड़े थे।

लड़का इस शिविर में आने के पहले एक छोटे से स्कूल में संगीत सिखाया करता था। एक पहाड़ी पर उसका छोटा सा गाँव था जहाँ पाँच भाई बहनों वाला उनका ख़ुशहाल परिवार रहता था। उसके पिता दूर के शहर में एक बैंक में काम करते थे और हर इतवार घर आया करते थे। उसे कैम्प में आए कितने दिन हुए थे उसे याद नहीं। बहुत पहले की धुँधली याद में उसने पूरा चाँद देखा था, लेकिन वो इसलिए कि उस दिन ऊँचे वाले बिस्तर के क़ैदी की मौत हो गयी थी और वो ऊपर वाले बिस्तर पर सोने चला गया था। निचले बिस्तर पर पानी का जमाव रहता था और माँसाहारी चूहे काट खाते थे। ऊपर वाले बिस्तर से छत पर का छेद दिखता था जिससे बर्फ़ गिरती थी। जिस पहली रात वो ऊपर के बिस्तर पर गया था, भूख के कारण उसे नींद नहीं आ रही थी और थकान के कारण उसका बदन टूट रहा था। उसी समय उसने देखा कि छत पर के छेद के पीछे पूरा गोल चाँद है। बहुत समय तो उसे चाँद को पहचानने में लग गया। इन दिनों उसे हर चीज़ सिर्फ़ खाने के लिए चाहिए होती थी लेकिन किसी तरह वो चाँद को पहचान गया। उस दिन बहुत दिन बाद उसने एक लोकगीत के बारे में सोचा।

लड़की चार भाइयों के बाद मन्नतों से माँगी हुयी इकलौती बहन थी। माँ पिता की आँखों का तारा। नीली आँखों वाली लड़की। नदी किनारे शहर में रहती थी। बहुत ऊँचे क़िले के पास छोटा सा घर था उनका। माँ नर्स थी और पिता चमड़े के कारख़ाने में काम करते थे। उसके भाई बहुत पढ़े-लिखे और समाज में सम्मानित व्यक्ति थे। उसका सबसे बड़ा भाई तो विदेश के कॉलेज में वक्तव्यों के लिए बुलाया भी जाता था। उससे ठीक बड़ा भाई एक हीरों के व्यापारी के यहाँ काम करता था। कहते थे उसके हाथ में बहुत हुनर था। लेकिन एक वक़्त पर इन सारी चीज़ों पर उनका धर्म भारी पड़ गया। जब उनके पूरे परिवार को ट्रेनों में भर कर कैम्प भेजा जा रहा था, ठीक उसी वक़्त ट्रेन स्टेशन से दौड़ता हुआ उसका बड़ा भाई लौटा था। उसे वहीं गोली मार दी गयी थी उसकी पत्नी और बच्चे के साथ। लड़की उसी समय भूल गयी थी कि उसने अपने हीरे के झुमके कहाँ रखे हैं। वो चाहती थी कि भूल जाए कि उसे अंधेरी कोठरी से रौशनी में क्यूँ लाया जाता था। कि दिन भर बाक़ी क़ैदियों के साथ काम करने के बाद वो बाक़ी औरतों की तरह सो क्यूँ नहीं सकती थी। कि गार्ड्ज़ सिर्फ़ बलात्कार नहीं करना चाहते थे, वे उसकी चीख़ भी सुनना चाहते थे। कि जिस रात उसने चीख़ना बंद करने की कोशिश की वो पहली रात थी जब वो बेहोश हो गयी थी और मालूम नहीं कितनी देर बाद होश में आयी थी। कि वो दिन भर एक शब्द नहीं कहती थी ताकि रात को चीख़ने के लिए अपनी आवाज़ और अपनी ऊर्जा बचा के रख सके। उसे गूँगे हो जाने का डर सताता था।

उन्होंने एक दूसरे की आँखों में देखा। उन्हें बात करने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। वे एक दूसरे को सुन सकते थे, पढ़ सकते थे। मृत्यु के पहले सारी इंद्रियाँ बहुत तेज़ हो जाती हैं।

‘ओह, इसकी आँखें कितनी नीली हैं। मुझे याद नहीं मैंने आख़िरी बार आसमान कब देखा था।’
‘ओह, इसकी आँखों में इतना ख़ालीपन क्यूँ है। कोई तो दुःख होना चाहिए था। क्या इस लड़के ने कभी प्रेम नहीं किया’

‘इसके माथे पर ये नीला निशान क्यूँ है? क्या किसी ने इसका सिर दीवार पर दे मारा था?’
‘इसके होंठ कैसे नीले पड़ गए हैं। ये ज़रूर अपनी बैरक में ऊपर वाले बिस्तर पर सोता है। क्या इसके बिस्तर के ऊपर भी कोई सुराख़ है। क्या कल पूरी रात की बर्फ़बारी में उसके बदन पर बर्फ़ गिरी है?’

‘इसकी आँखों में रौशनी टिमटिम करती है। काश मैं एक बार इसे अपना उकेलेले सुना पाता। जब बहुत तेज़ तेज़ नाचती तो इसके गाल कितने दहकने लगते और आँखों में एक गर्माहट का गोला घूमने लगता।’
‘अगर ये मुझे पिछले साल मेले में मिला होता तो मैं उस बेवक़ूफ़ टिम की जगह इसे चूम रही होती। शायद अब तक हमारी शादी हो चुकी होती। [लड़की की आँखें पनियाती हुयीं] ओह, नहीं…हमारे बच्चे को नाज़ियों ने मार दिया होता। और इस समय इसकी आँखें सुख में होतीं।

‘ये लड़की क्यूँ रो रही है। क्या उसे मौत से डर लग रहा है? क्या इसे अपने किसी पूर्व प्रेमी की याद आ रही है? क्या कोई उम्मीद है इसकी ज़िंदगी में, जिसके लिए इसका थोड़ा और जीने का मन है?’
‘मेरी आँखों में आँसू देख कर लड़के की आँखें थोड़ी कोमल हो आयी हैं। इसे मेरे मरने की चिंता हो रही है क्या?’

‘क्या इस लड़की को स्ट्रॉबेरीज़ पसंद होंगी? काश मैं इसे अपनी नानी के बग़ीचे वाली स्ट्रॉबेरीज़ खिला पाता। उनसे मीठी स्ट्रॉबेरीज़ दुनिया में कहीं नहीं होती हैं। हम दोनों नानी की आँख बचा कर चुपचाप बग़ीचे में घुस जाते और लड़की की फ़्रॉक में हम ख़ूब से स्ट्रॉबेरीज़ तोड़ लाते और बाद में क्रीम के साथ खाते’।
‘मैं इस लड़के के लिए ख़ूब गहरे नीले रंग का ऊन का मफ़लर बनाती। करोशिये का उतना सुंदर काम गाँव भर की किसी लड़की के बस का नहीं था। लड़का अपने गले में मफ़लर डालता और मेरे हाथ चूम लेता। उसके दोस्तों की गर्लफ़्रेंड्ज़ मुझसे सीखना चाहतीं कि कैसे बनाते हैं इतना सुंदर मफ़लर। मैं ढिठाई से हँसती और कहती, “प्रेम से” ’

‘माँ मुझे इस लड़की से शादी करने के लिए तुरंत हाँ कह देती। माँ को नीले रंग की आँखों वाली लड़कियाँ कितनी पसंद हैं’
‘मुझे ऐसा क्यूँ लगता है कि इस लड़के की आँखों में कोई धुन बह रही है। क्या इसे कोई वाद्ययंत्र बजाना आता है? मेरे भाइयों को एक उकेलेले बजाने वाले की कितनी ज़रूरत थी। अगर ये उकेलेले बजाता तो मेरे भाइयों के साथ मेले में जा सकता था। मैं इनकी धुनों पर कितना ख़ुश होकर नाचती’।

‘मैं इस लड़की के साथ वसंत देखना चाहता हूँ. कौन से फूल पसंद होंगे इसे। जब इसके बाल लम्बे होंगे तो मैं उनमें फूल गूँथ दूँगा’
‘क्या इस लड़के को चेरी वोदका पसंद होगी? गरमी के दिनों में हम कभी कभी स्कूल से भाग कर विस्तुला में नहाने चले जाते और फिर गर्म घास पर लेटे हुए एक दूसरे को चूमते और चेरी वोदका पीते। दीदियाँ कहती हैं वोदका पीने के बाद चूमने का स्वाद अलौकिक होता है’

‘जीवन में पहली बार प्रेम हुआ और वो भी इतने कम वक़्त के लिए’
‘प्रेम जीवन के आख़िरी लम्हे तक रहा। ये बुरा तो नहीं’

‘शादी के तोहफ़े में दादी इसे अपनी सबसे पसंदीदा नीले हीरों का झुमका देती। बचपन से हम सब भाई बहन लड़ते रहे कि दादी वो किसे देगी’
‘धूप वाली खिड़की में बैठ कर माँ मेरे लिए शादी का जोड़ा बना रही होती। उसके गले से कितना मीठा लोकगीत फूटता है। मैं बैठे बैठे रोने लगती तो मेरे भाई मेरी चोटियाँ खींचते और इस लड़के को भद्दी गालियाँ दे देकर चिढ़ाते, मैं उन्हें मारने के लिए उनके पीछे पीछे कितना दौड़ती’

‘अगर मेरी कोई बेटी हो तो एकदम इस लड़की जैसी हो, ऐसी नीली आँखों वाली’
‘__ ___ __ __ __ __’ [लड़की चुप रही। अजन्मे बच्चे का नाम सोच रही थी शायद]

[सैनिक अब आपस में बहस कर रहे थे कि बंदूक़ की नली किसके सर पर रखी जाए और दोनों को एक ही गोली से मारने के लिए बेहतर क्या होगा, वे एक दूसरे के सामने खड़े रहें, अग़ल-बग़ल खड़े रहें, या पीठ से पीठ टिका कर]

“__ __ __ __ __ __ __ __” [लड़के के देखने में चुप्पी थी। जैसे उसके सोचने में भी शब्द ख़त्म हो गए हों। वो बस चाहता था कि सैनिक जल्दी गोली चलाएँ और वह मर जाए। अब सोचना थका देने वाला था। दुखा देने वाला भी]
‘चाहे मैं मर जाऊँ। पर काश ये लड़का बच जाए। दुआ में ज़्यादा वक़्त कहाँ माँग सकती हूँ। लेकिन काश कि मुझे इसका मृत शरीर ना देखना पड़े। भले ही मुझसे एक लम्हा ज़्यादा जी सके।’

‘मैं इस लड़की को मरा हुआ नहीं देख सकता हूँ। अगर मैं अभी विद्रोह कर दूँ तो क्या सैनिक मुझे गोली मार देंगे? लेकिन ऐसा तो नहीं कि वे फिर इस खेल की जगह कोई और मनोरंजन तलाशने लगें? अगर उन्हें मेरी आँखों में इस लड़की के प्रति प्रेम दिख गया तो वे मेरी आँखों के सामने इसका बलात्कार करेंगे। बार बार। और बहुत तड़पा के मारेंगे मुझे। नहीं नहीं। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं आना चाहिए’।

[लड़की उसका कठोर होता चेहरा देखती है]
‘ओह। शायद ये ख़ुद को मज़बूत कर रहा है ताकि मृत्यु से ना डरे। मैं एक बार इसके बाल सहलाना चाहती हूँ। अगर मैं ऐसा करूँ तो क्या होगा? शायद सैनिकों को नया कौतुक मिल जाए। फिर वो मेरी आँखों के सामने इसे तड़पा कर मारेंगे। ओह। नहीं। मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। मृत्यु जितनी जल्दी आ जाए, बेहतर है। शायद मुझे भी अपना चेहरा एकदम कठोर कर लेना चाहिए।’

[लड़का उसके चेहरे की खिंचती नसें देखता है]
‘ओह। ये लड़की मेरा कठोर चेहरा देख कर कठोर होने की कोशिश कर रही है। शायद इसे लगे कि मैं मृत्यु से डर रहा हूँ। और ये मुझे संबल देने की कोशिश कर रही है।’
‘___ ___ ___ ___ ___’

[सैनिकों ने तय कर लिया है। लड़के के सिर के पीछे बंदूक़ की नली रखते हैं।
वे दोनों बहुत धीरे धीरे और एक साथ अपनी आँखें बंद करते और खोलते हैं।
दोनों एक आख़िरी बार एक दूसरे की आँखों में देखते हैं।]

‘फिर कभी’
‘फिर कभी’

गोली चलती है और दोनों के सिरों के पार निकलती हुयी दीवार में जा के धँस जाती है। उनके बदन एक साथ गिरते हैं। उन्होंने आख़िरी लम्हे में एक दूसरे का हाथ पकड़ लिया था। गार्ड्ज़ बहुत कोशिश करते हैं पर लाशों की मुड़ी हुयी उँगलियाँ उलझ गयी हैं, हड्डियाँ खुलती नहीं। उन्हें एक साथ ही जलती भट्ठी में फेंकना पड़ता है।

एक उलझे हुए प्रेम से बची रह जाती है दुनिया। वक़्त से हारी हुयी लड़ाई से। एक ‘काश’ से।
उम्मीद की मीठी धुन पर गुनगुनाती है…जीवन के संजीवन मंत्र…प्रेम, आना, फिर कभी।

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इक अभागन का क़िस्सा

छह हफ़्ते के बच्चे को फीटस कहते हैं। एक नन्हें से दाने के बराबर होता है और उसका दिल बनना शुरू हो जाता है। ऐसा डॉक्टर बताती है। इसके साथ ये ज़रूरी जानकारी भी कि औरत इस बच्चे को जन्म नहीं दे सकती, बहुत ज़्यादा प्रॉबबिलिटी है कि बच्चा ऐब्नॉर्मल पैदा हो। लड़की का मैथ कमज़ोर होता है। उसे प्रॉबबिलिटी जैसी बड़ी बड़ी चीज़ें समझ नहीं आतीं। टकटकी बांधे देखती है चुपचाप। उसे लगता है वो ठीक से समझ नहीं पायी है।
तब से उसे मैथ बहुत ख़राब लगता है। उसने कई साल प्रॉबबिलिटी पढ़ने और समझने की कोशिश की लेकिन उसे कभी समझ नहीं आया कि जहाँ कर्मों की बात आ जाती है वहाँ फिर मैथ कुछ कर नहीं सकता। ९९ पर्सेंटिज होना कोई ज़्यादा सुकून का बायस कैसे हो सकता है किसी के लिए। वो जानना चाहती है कि कोई ऐसा ऐल्गोरिदम होता है जो बता सके कि उसने डॉक्टर की बात मान के सही किया था या नहीं। उसने ज़िंदगी में किसी का दिल नहीं दुखाया कभी। जैसा बचपन के संस्कारों में बताया गया, सिखाया गया था वैसी ज़िंदगी जीती आयी थी। कुछ दिन पहले तो ऐसा था कि दुनिया उसे साथ बुरा करती थी तो तकलीफ़ होती थी, फिर उसने अपने पिता से इस बारे में बात की…पिता ने उसे समझाया कि हमें अच्छा इसलिए नहीं करना चाहिए कि हम बदले में दुनिया से हमारे प्रति वैसा ही अच्छा होने की उम्मीद कर सकें। हम अच्छा इसलिए करते हैं कि हम अच्छे हैं, हमें अच्छा करने से ख़ुशी मिलती है और हमारी अंतरात्मा हमें कचोटती नहीं। इसके ठीक बाद वो दुनिया से ऐसी कोई उम्मीद बाँधना छोड़ देती है।
अजन्मे बच्चे के चेहरे की रेखाएँ नहीं उभरी होंगी लेकिन उसने लड़की से औरत बनते हुए हर जगह उसे तलाशा है। दस साल तक की उम्र के बच्चों को हँसते खेलते देख कर उसे एक अजीब सी तकलीफ़ होती है। वो अक्सर सोचती है इतने सालों में अगर उसका अपना एक बच्चा हुआ होता तो क्या वो उसे कम याद करती? या अपने मैथ नहीं जानने पर कम अफ़सोस करती?
दुनिया के सारे सुखों में से सबसे सुंदर सुख होता है किसी मासूम बच्चे के साथ वक़्त बिताना। उससे बातें करना। उसकी कहानियाँ सुनना और उसे कहानियाँ सुनाना। पाँच साल पहले ऐसा नहीं था। उसे बच्चे अच्छे लगते थे। वो सबसे पसंदीदा भाभी, दीदी, मौसी हुआ करती थी। छोटे बच्चे उससे सट कर बैठ जाया करते गरमियों में। वो उनसे बहुत दुलार से बात करती। उसके पास अपनी सबसे छोटी ननद की राक्षस की कहानी के लिए भी वैसी ही उत्सुकता थी जैसे ससुर के बनाए हुए साइंस के थीअरम्ज़ के लिए थी। बच्चे उसके इर्द गिर्द हँसते खिलखिलाते रहते। उसका आँचल छू छू के देखते। उसकी दो चोटियाँ खींचना चाहते लेकिन वो उन्हें आँख दिखा देते और वे बदमाश वाली मुस्कान मुस्कियाते।
अपनी मर्ज़ी और दूसरी जाति में शादी करने के कारण उसके मायक़े के ब्राह्मण समाज ने उसे बाहर कर दिया था। वो जब बहुत साल बाद लौट कर गयी तो लोग उसे खोद खोद कर उसके पति के बारे में पूछते। बड़ी बूढ़ी औरतें उसके ससुर का नाम पूछती और अफ़सोस जतातीं। जिस घर ने उस बिन माँ की बेटी को दिल में बसा लिया था, उसके पाप क्षमा करते हुए, उस घर को एक ही नज़र से देखतीं। औरतें। बच्चे। पुरुष। सब कोई ही। हर नया व्यक्ति उससे दो चीज़ें जानना चाहता। माँ के बारे में, कि जिसे जाए हुए साल दर साल बीतते जा रहे थे लेकिन जो इस लड़की की यादों में और दुखती हुयी बसी जा रही थी और ससुराल के बारे में।
औरत के ज़िंदगी के दो छोर होते हैं। माँ और बच्चा। औरत की ज़िंदगी में ये दोनों नहीं थे। वो सोचती अक्सर कि अगर उसकी माँ ज़िंदा होती या उसे एक बच्चा होता तो क्या वो कोई दूसरे तरह की औरत होती? एक तरह से उसने इन दोनों को बहुत पहले खो दिया था। खो देने के इस दुःख को वो अजीब चीज़ों से भरती रहती। बिना ईश्वर के होना मुश्किल होता तो एक दिन वह पिता के कहने पर एक छोटे से कृष्ण को अपने घर ले आयी। ईश्वर के सामने दिया जलाती औरत सोचती उन्हें मन की बात तो पता ही है, याचक की तरह माँगने की क्या ज़रूरत है। वो पूजा करती हुयी कृष्ण को देख कर मुस्कुराती। सच्चाई यही है जीवन की। हर महीने उम्मीद बाँधना और फिर उम्मीद का टूट जाना। कई सालों से वो एक टूटी हुयी उम्मीद हुयी जा रही थी बस।
एक औरत कि जिसकी माँ नहीं थी और जिसके बच्चे नहीं थे।
बहुत साल पीछे बचपन में जाती, अपने घर की औरतों को याद करती। दादी को। नानी को। जिन दिनों दादी घर पर रहा करती, दादी के आँचल के गेंठ में हमेशा खुदरा पैसे रहते। चवन्नी, अठन्नी, दस पैसा। पाँच पैसा भी। घर पर जो भी बच्चे आते, दादी कई बार उनको घर से लौटते वक़्त अपने आँचल की गेंठ खोल कर वो पैसा देना चाहती उनकी मुट्ठी में। गाँव के बच्चों को ऐसी दादियों की आदत होती होगी। शहर के बच्चे सकपका जाते। उन्हें समझ नहीं आता कि एक रुपए का वे क्या करेंगे। क्या कर सकते हैं। वो अपने बचपन में होती। वो उन दिनों चाहती कि कभी ख़ूब बड़ी होकर जब बहुत से पैसे कमाएगी तो दादी को अपने गेंठरी में रखने के लिए पाँच सौ के नोट देगी। ख़ूब सारे नोट। लेकिन नोट अगर दादी ने साड़ी धोते समय नहीं निकाले तो ख़राब हो जाएँगे ना? ये बड़ी मुश्किल थी। दादी थी भी ऐसी भुलक्कड़। अब इस उम्र में आदत बदलने को तो बोल नहीं सकती थी। दादी के ज़िंदा रहते तक गाँव में उसका एक घर था। बिहार में जब लोग पूछा करते थे कि तुम्हारा घर कहाँ है तो उन दिनों वो गाँव का नाम बताया करती थी। अपभ्रंश कर के। जैसे कि दादी कहा करती थी। दनयालपुर।
उसे कहानियाँ लिखना अच्छा लगता था। किसी किरदार को पाल पोस कर बड़ा करना। उसके साथ जीना ज़िंदगी। कहानियाँ लिखते हुए वो दो चोटी वाली लड़की हुआ करती थी। कॉलेज को भागती हुयी लड़की कि जिसकी माँ उसे हमेशा कौर कौर करके खाना खिला रही होती थी कि वो भुख्ले ना चली जाए कॉलेज। माँ जो हमेशा ध्यान देती थी कि आँख में काजल लगायी है कि नहीं घर से बाहर निकलने के पहले। कि दुनिया भर में सब उसकी सुंदर बेटी को नजराने के लिए ही बैठा है। माँ उसके कहे वाक्य पूरे करती। लड़की अपने बनाए किरदारों के लिए अपनी मम्मी हुआ करती। आँख की कोर में काजल लगा के पन्नों पर उतारा करती। ये उसके जीवन का इकमात्र सुख था।
सुख, दुःख का हरकारा होता है। औरत जानती। औरत हमेशा अपनी पहचान याद रखती। शादीशुदा औरत के प्यार पर सबका अधिकार बँटा हुआ होता। भरे पूरे घर में देवर, ननद, सास…देवरानी…कई सारे बच्चे और कई बार तो गाँव की बड़ी बूढ़ी औरतें भी होतीं जो उसके सिगरेट ला देने पर आशीर्वाद देते हुए सवाल पूछ लेतीं कि ई लाने से क्या होगा, ऊ लाओ ना जिसका हमलोग को ज़रूरत है।
ईश्वर के खेल निराले होते। औरत को बड़े दुःख को सहने के लिए एक छोटा सा सुख लिख देता। एक बड़ा सा शहर। बड़े दिल वाला शहर। शहर कि जिसके सीने में दुनिया भर की औरतों के दुःख समा जाएँ लेकिन वो हँस सके फिर भी कोई ऐसी हँसी कि जिसका होना उस एक लम्हे भर ही होता हो।
शहर में कोई नहीं पहचानता लड़की को। हल्की ठंढ, हल्की गरमी के बीच होता शहर। लड़की जूड़ा खोलती और शहर का होना मीठा हुआ जाता। शहर उसकी पहचान बिसार देता। वो हुयी जाती कोई खुल कर हँसने वाली लड़की कि जिसकी माँ ज़िंदा होती। कि जिसे बच्चे पैदा करने की फ़िक्र नहीं होती। कि जिसकी ज़िंदगी में कहानियाँ, कविताएँ, गीत और बातें होतीं। कि जिसके पास कोई फ़्यूचर प्लान नहीं होता। ना कोई डर होता। उसे जीने से डर नहीं लगता। वो देखती एक शहर नयी आँखों से। सपने जैसा शहर। कोई अजनबी सा लड़का होता साथ। जिसका होना सिर्फ़ दो दिन का सच होता। लड़की रंग भरे म्यूज़ीयम में जाती। लड़की मौने के प्रेम में होती। लड़की पौलक को देखती रहती अपलक। उसकी आँखों में मुखर हो जाते चुप पेंटिंग के कितने सारे तो रंग। सारे सारे रंग। लड़की देखती आसमान। लड़की पहचानती नीले और गुलाबी के शेड्स। शहर की सड़कों के नाम। ट्रेन स्टेशन पर खो जाती लेकिन घबराहट में पागल हो जाने के पहले उसे तलाश लेता वो लड़का कि जिसे शहर याद होता पूरा पूरा। लड़की ट्रेन में सुनाती क़िस्सा। मौने के प्रेम में होने को, कि जैसे भरे शहर में कोई नज़र खींचती है अपनी ओर, वैसे ही मौने की पेंटिंग बुलाती है उसे। बिना जाने भी खिंचती है उधर।
कुछ भी नहीं दुखता उन दिनों। सब अच्छा होता। शहर। शहर के लोग। मौसम। कपड़े। सड़क पर मिलते काले दुपट्टे। पैरों की थकान। गर्म पानी। प्रसाद में सिर्फ़ कॉफ़ी में डालने वाली चीनी फाँकते उसके कृष्ण भगवान।
शहर बसता जाता लड़की में और लड़की छूटती जाती शहर में। लौट आने के दिन लड़की एक थरथराहट होती। बहुत ठंढी रातों वाली। दादी के गुज़र जाने के बाद ट्रेन से उसका परिवार गाँव जा रहा था। बहुत ठंढ के दिन थे और बारिश हो रही थी। खिड़की से घुसती ठंढ हड्डियों के बीच तक घुस जा रही थी। वही ठंढ याद थी लड़की को। उसकी उँगलियों के पोर ठंढे पड़ते जाते। लड़की धीरे धीरे सपने से सच में लौट रही होती। कहती उससे, मेरे हाथ हमेशा गरम रहते थे। हमेशा। कितनी भी ठंढ में मेरे हाथ ठंढे नहीं पड़ते। लेकिन जब से माँ नहीं रही, पता नहीं कैसे तो मेरी हथेलियाँ एकदम ठंढी हो जाती हैं।
शहर को अलविदा कहना मुश्किल नहीं था। शहर वो सब कुछ हुआ था उसके लिए जो कि होना चाहिए था। लड़की लौटते हुए सुख में थी। जैसे हर कुछ जो चाहा था वो मिल गया हो। कोई दुःख नहीं छू पा रहा था उसकी हँसती हुयी आँखें। उसके खुले बालों से सुख की ख़ुशबू आती थी।
लौट आने के बाद शहर गुम होने लगा। लड़की कितना भी शहर के रंग सहेज कर रखना चाहती, कुछ ना कुछ छूट जाता। मगर सबसे ज़्यादा जो छूट रहा था वो कोई एक सपने सा लड़का था कि जिसे छू कर शिनाख्त करने की ख़्वाहिश थी, कि वो सच में था। हम अपने अतीत को लेकिन छू नहीं सकते। आँखों में रीप्ले कर सकते हैं दुबारा।
सुख ने कहा था कि दुःख आएगा। मगर इस तरह आसमान भर दुःख आएगा, ये नहीं बताया था उसने। लड़की समझ नहीं पाती कि हर सुख आख़िरकार दुःख में कैसे मोर्फ़ कर जाता है। दुःख निर्दयी होता। आँसुओं में उसे डुबो देता कि लड़की साँस साँस के लिए तड़पती। लड़की नहीं जानती कि उसे क्या चाहिए। लड़की उन डेढ़ दिनों को भी नहीं समझ पाती। कि कैसे कोई भूल सकता है जीवन भर के दुःख। अभाव। मृत्यु। कि वो कौन सी टूटन थी जिसकी दरारों में शहर सुनहले बारीक कणों की तरह भर गया है। जापानी फ़िलोस्फी – वाबी साबी। कि जिससे टूटन अपने होने के साथ भी ख़ूबसूरत दिखे।
महीने भर बाद जब हॉस्पिटल की पहली ट्रिप लगी तो औरत के पागलपन, तन्हाई और चुप्पी ने पूरा हथियारबंद होकर सुख के उस लम्हे पर हमला किया। नाज़ुक सा सुख का लम्हा था। अकेला। टूट गया। लड़की की उँगलियों में चुभे सुख के टुकड़े आँखों को छिलने लगे कि जब उसने आँसू पोंछने चाहे।
उसने देखा कि शहर ने उसे बिसार दिया है। कि शहर की स्मृति बहुत शॉर्ट लिव्ड होती है। औरत अपने अकेलेपन और तन्हाई से लड़ती हुयी भी याद करना चाहती सुख के किसी लम्हे को। लौट लौट कर जाना और लम्हे को रिपीट में प्ले करना उसे पागल किए दे रहा था। कई किलोमीटर गाड़ी बहुत धीरे चलाती हुयी औरत घर आयी और बिस्तर पर यूँ टूट के पड़ी कि बहुत पुराना प्यार याद आ गया। मौत से पहली नज़र का हुआ प्यार।
उसे उलझना नहीं चाहिए था लेकिन औरत बेतरह उलझ गयी थी। अतीत की गांठ खोल पाना नामुमकिन था। लम्हा लम्हा अलगा के शिनाख्त करना भी। सब कुछ इतने तीखेपन से याद था उसे। लेकिन उसे समझ कुछ नहीं आ रहा था। वो फिर से भूल गयी थी कि ज़िंदगी उदार हो सकती है। ख़्वाहिशें पूरी होती हैं। बेमक़सद भटकना सुख है। एक मुकम्मल सफ़र के बाद अलविदा कहना भी सुख है।
हॉस्पिटल में बहुत से नवजात बच्चे थे। ख़बर सुन कर ख़ुशी के आँसू रोते परिवार थे। औरत ख़ुद को नीले कफ़न में महसूस कर रही थी। उसे इंतज़ार तोड़ रहा था। दस साल से उसके अंदर किसी अजन्मे बच्चे का प्रेम पलता रहा था। दुःख की तरह। अफ़सोस की तरह। छुपा हुआ। कुछ ऐसा कि जिसकी उसे पहचान तक नहीं थी।
आख़िरकार वो खोल पायी गुत्थी कि सब इतना उलझा हुआ क्यूँ था। कि एक शादीशुदा औरत के प्यार पर बहुत से लोगों का हिस्सा होता है। उसका ख़ुद का पर्सनल कुछ भी नहीं होता। प्यार करने का, प्यार पाने का अधिकार होता है। कितने सारे रिश्तों में बँटी औरत। सबको बिना ख़ुद को बचाए हुए, बिना कुछ माँगे हुए प्यार करती औरत के हिस्से सिर्फ़ सवाल ही तो आते हैं। ‘ख़ुशख़बरी कब सुना रही हो?’ । सिवा इस सवाल के उसके कोई जवाब मायने नहीं रखते। उसका होना मायने नहीं रखता। वो सिर्फ़ एक औरत हो जाती है। एक बिना किनारे की नदी।
बिना माँ की बच्ची। बिना बच्चे की माँ।
दादी जैसा जीवन उसने नहीं जिया था कि सुख से छलकी हुयी किसी बच्चे की मुट्ठी पर अठन्नी धर सके लेकिन अपना पूरा जीवन खंगाल के उसने पाया कि एक प्यार है जो उसने अपने आँचर की गाँठ में बाँध रखा है। इस प्यार पर किसी का हिस्सा नहीं लिखाया है। किसी का हक़ नहीं।
वो सकुचाते हुए अपनी सूती साड़ी के आँचल से गांठ खोलती है और तुम्हारी हथेली में वो प्यार रखती है जो इतने सालों से उसकी इकलौती थाती है।
वो तुम्हारे नाम अपने अजन्मे बच्चे के हिस्से का प्यार लिखती है।
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लड़की धुएँ से टांक देती उसकी सफ़ेद शर्ट्स में अपना नाम

जिन दिनों तुम नहीं होते हो जानां। तलाशनी होती है अपने अंदर ही कोई अजस्र नदी। जिसका पानी हो प्यास से ज़्यादा मीठा। जिससे आँखें धो कर आए गाढ़ी नींद और पक्के रंग वाले सपने। जिस नदी के पानी में डूब मर कर की जा सके एक और जन्म की कामना।
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लड़की धुएँ से टांक देती उसकी सफ़ेद शर्ट्स में अपना नाम। लड़के की जेब से मिलती माचिस। उसके बैग में पड़े रहते लड़की की सिगरेट के ख़ाली डिब्बे। लड़की चेन स्मोकिंग करती और लड़के की दुनिया धुआँ धुआँ हो उठती। वो चाहता चखना उसके होंठ लेकिन नहीं छूना चाहता सिगरेट का एक कश भी। लड़के की उँगलियों में सिर्फ़ बुझी हुयी माचिस की तीलियाँ रहतीं। लड़की को लाइटर से सिगरेट जलाना पसंद नहीं था। लड़के को धुएँ की गंध पसंद नहीं थी। धुएँ के पीछे गुम होती लड़की की आँखें भी नहीं। लड़की के बालों से धुएँ की गंध आती। लड़का उसके बालों में उँगलियाँ फिराता तो उसकी उँगलियों से भी सिगरेट की गंध आने लगती। लड़के की मर्ज़ी से बादल नहीं चलते वरना वो उन्हें हुक्म देता कि तब तक बरसते रहें जब तक लड़की की सारी सिगरेटें गीली ना हो जाएँ। इत्ती बारिश कि धुल जाए लड़की के बदन से धुएँ की गंध का हर क़तरा। वो चाहता था कि जान सके जिन दिनों लड़की सिगरेट नहीं पीती, उन दिनों उससे कैसी गंध आती है। सिगरेट उसे रक़ीब लगता। लड़की धुएँ की गंध वाले घर में रहती। लड़का जानता कि इस घर का रास्ता मौत ने देख रखा है और वो किसी भी दिन कैंसर का हाथ पकड़ टहलती हुयी मेहमान की तरह चली आएगी और लड़की को उससे छीन कर ले जाएगी। वो लड़की से मुहब्बत करता तो उसका हक़ होता कि लड़की से ज़िद करके छुड़वा भी दे लेकिन उसे सिर्फ़ उसकी फ़िक्र थी…किसी को भी हो जाती। लड़की इतनी बेपरवाह थी कि उसके इर्द गिर्द होने पर सिर्फ़ उसे ज़िंदा रखने भर की दुआएँ माँगने को जी चाहता था।

वो खुले आसमान के नीचे सिगरेट पीती। उसके गहरे गुलाबी होठों को छू कर धुआँ इतराता हुआ चलता कि जैसे जिसे छू देगा वो मुहब्बत में डूब जाएगा। मौसम धुएँ के इशारों पर डोलते। जिस रोज़ लड़की उदास होती, बहुत ज़्यादा सिगरेट पीती…आँसू उसकी आँखों से वाष्पित हो जाते और शहर में ह्यूमिडिटी बढ़ जाती। सब कुछ सघन होने लगता। कोहरीले शहर में घुमावदार रास्ते गुम हो जाते। यूँ ये लड़की का जाना पहचाना शहर था लेकिन था तो तिलिस्म ही। कभी पहाड़ की जगह घाटियाँ उग आतीं तो कभी सड़क की जगह नदी बहने लगती। लड़की गुम होते शहर की रेलिंग पकड़ के चलती या कि लड़के की बाँह। लड़का कभी कभी काली शर्ट पहनता। उन दिनों वो अंधेरे का हिस्सा होता। सिर्फ़ माचिस जलाने के बाद वाले लम्हे में उसकी आँखें दिखतीं। शहद से मीठीं। शहद रंग की भीं। उससे मिल कर लड़की का दुखांत कहानियाँ लिखने का मन नहीं करता। ये बेइमानी होती क्यूँकि पहाड़ के क़िस्सों में हमेशा महबूब को किसी घाटी से कूद कर मरना होता था। लड़की को सुख की कल्पना नहीं आती थी ठीक से। प्रेम के लौट आने की कल्पना भी नहीं। यूँ भी पहाड़ों में शाम बहुत जल्दी उतर आती है। लड़की उससे कहती कि शाम के पहले आ जाया करे। वो जानती थी कि जब वो लड़के की शर्ट की बाँह पकड़ कर चलती है तो उसकी सिगरेट वाली गंध उसकी काली शर्ट में जज़्ब हो जाती है। फिर बेचारा लड़का रात को ही ठंढे पानी में पटक पटक कर सर्फ़ में शर्ट धोता था ताकि धुएँ की गंध उसके सीने से होते हुए उसके दिल में जज़्ब ना हो जाए। धुएँ की कोई शक्ल नहीं होती, जहाँ रहता है उसी की शक्ल अख़्तियार कर लेता है। अक्सर लड़की से मिल कर लौटते हुए लड़का देखता कि घरों की चिमनी से उठता धुआँ भी लड़की की शक्ल ले ले रहा है।

लड़की सिगरेट पीने जाती तो आँख के आगे बादल आते और धुआँ। वो चाहती कि बालों का जूड़ा बना ले। या कि गूँथ ले दो चोटियाँ कि जहाँ धुएँ की घुसपैठ ना हो सके। मगर उसकी ज़िद्दी उँगलियाँ खोल देतीं जो कुछ भी उसके बालों में लगा हुआ होता, क्लचर, रबर बैंड, जूड़ा पिन। खुले बालों में धुआँ जा जा के झूले झूलता। लड़के को समझ नहीं आता, क़त्ल का इतना सामान होते हुए भी लड़की ने सिगरेट को क्यूँ चुना है अपना क़ातिल। उससे कह देती। वो अपने सपनों में चाकू की धार तेज़ करता रहता। लड़की की सफ़ेद त्वचा के नीची दौड़ती नीली नसों में रक्त धड़कता रहता। लड़का उसके ज़रा पीछे चलता तो देखता उसके बाल कमर से नीचे आ गए हैं। उसकी कमर की लोच पर ज़रा ज़रा थिरकते। लड़की अक्सर किसी संगीत की धुन पर थिरकती चलती। उसके पीछे चलता हुआ वो हल्के से उसके बाल छूता…उसकी हथेली में गुदगुदी होती।

उन्हें आदत लग रही थी एक दूसरे की…लड़के को पासिव स्मोकिंग की…लड़की को रास्ता भटक जाने की। या कि उसके बैग में सिगरेट, माचिस वग़ैरह रख देने की। लड़की देखती धुआँ लड़के को चुभता। इक रोज़ जिस जगह लैम्पपोस्ट हुआ करता था वहाँ बड़े बड़े काँटों वाली कोई झाड़ी उग आयी। लड़के ने सिगरेट जलाने के लिए अंधेरे में माचिस तलाशी तो उसकी ऊँगली में काँटा चुभ गया। अगली सुबह लड़की की नींद खुली तो उसने देखा ऊँगली पर ज़ख़्म उभर आया है, ठीक उसी जगह जहाँ लड़के को काँटा चुभा था। ये शुरुआत थी। कई सारी चीज़ें जो लड़के को चुभती थीं, लड़की को चुभने लगीं। जैसे कि एक दूसरे से अलग होने का लम्हा। वे दिन जब उन्हें मिलना नहीं होता था। वे दिन जब लड़का शहर से बाहर गया होता था। कोई हफ़्ता भर हुआ था और लड़की बहुत ज़्यादा सिगरेट पीने लगी थी। ऐसे ही किसी दीवाने दिन लड़की जा के अपने बाल कटा आयी। एकदम छोटे छोटे। कान तक। उस दिन के बाद से शहर का मौसम बदलने लगा। तीखी धूप में लड़के की आँखें झुलसने लगी थीं। गरमी में वो काले कपड़े नहीं पहन सकता। जिन रातों में उसका होना अदृश्य हुआ करता था उन रातों में अब उसके सफ़ेद शर्ट से दिन की थकान उतरती। वो नहीं चाहता कि लड़की उसकी शर्ट की स्लीव पकड़ कर चले। यूँ भी गरमियों के दिन थे। वो अक्सर हाफ़ शर्ट या टी शर्ट पहन लिया करता। लड़की को उसका हाथ पकड़ कर चलने में झिझक होती। इसलिए बस साथ में चलती। सिगरेट पर सिगरेट पीती हुयी। अब ना बादल आते थे ना उसके बाल इतने घने और लम्बे थे कि धुआँ वहाँ छुप कर बादलों को बुलाने की साज़िश रचता। लड़का उसकी कोरी गर्दन के नीचे धड़कती उसकी नस देखता तो उसके सपने और डरावने हो जाते। लड़की के गले से गिरती ख़ून की धार में सिगरेटें गीली होती जातीं। लड़का सुबकता। लड़की के सर में दर्द होने लगता।

उनके बीच से धुआँ ग़ायब रहने लगा था। धुएँ के बग़ैर चीज़ें ज़्यादा साफ़ दिखने लगी थीं। जैसे लड़की को दिखने लगा कि लड़के की कनपटी के बाल सफ़ेद हो गए हैं। लड़के ने नोटिस किया कि लड़की के हाथों पर झुर्रियाँ पड़ी हुयी हैं। कई सारी छोटी छोटी चीज़ें उनके बीच कभी नहीं आती थीं क्यूँकि उनके बीच धुआँ होता था। लड़की ने सिगरेट पीनी कम करके वैसी होने की कोशिश की जैसी उसके ख़याल से लड़के को पसंद होनी चाहिए। चाहना का लेकिन कोई ओर छोर नहीं होता। लड़की ने सिगरेट पीनी लगभग बंद ही कर दी थी। लेकिन किसी किसी दिन उसका बहुत दिन करता। ख़ास तौर से उन दिनों जब धूप भी होती और बारिश भी। ऐसे में अगर वो सिगरेट पी लेती तो लड़का उससे बेतरह झगड़ता। सिगरेट को दोषी क़रार देता कि उन दोनों के बीच हमेशा किसी सिगरेट की मौजूदगी रहती है। लड़की कितना भी कम सिगरेट पीने की कोशिश करती, कई शामों को उसका अकेलापन उसे इस बेतरह घेरता कि वो फिर से धुएँ वाले घर में चली जाती। वहाँ से उसके लौटने पर लड़का बेवफ़ाई के ताने मारता। इन दिनों लड़के के बैग में ना माचिस होती थी, ना सिगरेट के ख़ाली डिब्बे। इन दिनों लड़की का दिल भी ख़ाली ख़ाली रहता। और मौसम भी।

वो एक बेहद अच्छी लड़की हो गयी थी इन दिनों…और इन्ही दिनों लड़के को लगता था, उसे किसी बुरी लड़की से इश्क़ हुआ था…किसी बुरी लड़की से इश्क़ हो जाना चाहिए।

Stories

मृत्यु की न दुखने वाली तीन कहानियाँ

शीर्षकहीन

मेरी मृत्यु को नकारो मत। उच्चारो इसे, ‘मैं मर जाऊँगी जल्दी ही’। दर्द की उठती जिस रेख से मैं तुम्हारा नाम लिखा करती थी अब उससे सिर्फ़ मृत्यु के आह्वान के मंत्र लिखती हूँ। मृत्यु तुम्हारा रक़ीब है। मैं उससे कहती हूँ कि समय की इस गहरी नदी को जल्दी से पार कर ले और मुझे आलिंगन में भींच ले। मृत्यु का हठ है कि मैं उसके लिए कविताओं की पाल वाली नाव लिख दूँ। मेरे मंत्रों में इतनी टीस होती है कि उसका ध्यान भटक जाता है और वह बार बार समय की नदी के उलटे बहाव में दूसरी ओर बह जाता है। समय भी तुम्हारा रक़ीब है शायद।

तुम्हारी इच्छा है और अगर सामर्थ्य है तो इस आसन्न मृत्यु से लड़ने के लिए आयुध तैय्यार करो। मेरे हृदय को सात सुरक्षा दीवारों वाले अभेद्य क़िले में बदल दो। मेरे इर्द गिर्द प्रेम के तिलिस्म बुनो। वो भी ना हो सके तो नागफनी का जंगल तो उगा ही दो कि मृत्यु की उँगलियाँ मुझे छूने में लहूलुहान हो जाएँ और वो उनके दर्द से तिलमिला कर कुछ दिनों के लिए मेरा हाथ छोड़ दे।

मेरे पैरों के इर्द गिर्द सप्तसिंधु बहती हैं। मेरे तलवे हमेशा ठंढे रहते हैं। तुम इतना ही करो कि मेरे तलवों को थोड़ा अपनी हथेलियों से रगड़ कर गर्म कर दो। तुमने कहा तो था कि तुम आग की कविताएँ लिखते हो। तुम्हारी हथेलियों में ज्वालामुखी हैं।

मुझे समंदर भी शरण नहीं देता। मुझे रास्ते भी छल लेते हैं। मैं इतने सालों की बंजारन, बिना रास्तों के कहाँ जाऊँ? मेरे प्रायश्चित्त का किसी वेद में विधान नहीं है, सिर्फ़ दंड है, मृत्युदंड।

शायद मैंने ही तुमसे कुछ ज़्यादा माँग लिया। बर्फ़ हुए पैरों की अभिशप्त बंजारन सिर्फ़ मृत्यु का प्रणय निवेदन स्वीकार सकती है। मृत्यु। मेरा प्रेम, मेरा पंच परमेश्वर। मेरा वधिक।

बस इतना करो कि इन आँखों को एक बार आसमान भर पलाश देखने की इच्छा है…इस अंतिम समय में, मेरी खिड़की पर…टहकते टेसु के रंग में फूल जाओ…

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स्टिल्बॉर्न
कुछ शब्दों का दर्द परायी भाषा में भी इतना घातक होता है कि हम अपनी भाषा में उसे छूना नहीं चाहते। उसकी प्राणरक्षा के लिए उसके शरीर में मरे हुए बच्चे को DNC से निकाला गया था। छोटे छोटे टुकड़ों में काट कर।

कोई उसकी बात नहीं मानता कि समंदर हत्यारा है। हर बार गर्भपात होने की पहली रात वो समंदर का सपना देखती।

तुम्हें कभी नहीं कहना चाहिए था कि तुम्हें मेरे किरदारों से इश्क़ हो जाता है। तुम मेरे किरदारों के बारे में कुछ नहीं जानते। मुझे नफ़रत है तुम्हारे जैसे लोगों से। तुम्हें छू कर लिजलिजा हो जाता है मेरा लिखने का कमरा। मैं तुम्हारे ख़त जला दूँगी।

तुम इतने उजले शहर में कैसे रह सकते हो? कौन भरता है तुम्हारी आत्मा में उजाला हर रोज़। कहाँ दफ़्न करके आते हो तुम अपने गुनाहों की लिस्ट? किसके सीने में छिपे हैं तुम्हारे घिनौने राज?

औरत ने कपड़ों में सूखे हुए रक्त को धोया नहीं। ख़ून में रंगी हुयी चादरें किसी नदी में नहीं बहायी गयीं। उसके अजन्मे बच्चों की आत्मा उसकी नींद में उससे मिलने आती। वो गूगल कर के पढ़ती कि कितने महीने में बच्चों के अंदर आत्मा आ जाती है मगर गूगल के पास ऐसे जवाब नहीं होते। जवाब होते भी तो उसे उनपर यक़ीन नहीं होता। ये बात शायद किसी पुराण, किसी वेद, किसी स्मृति में लिखी हो। लेकिन वो एकदम साधारण स्त्री थी। उसके पास इतना कुछ समझने को अक़्ल नहीं थी। कोई ऐसा था नहीं प्रकाण्ड पंडित कि उसे बता दे ठीक ठीक कि जो बच्चे जन्म नहीं लेते उनकी आत्मा की शुद्धि हो सकती है या नहीं।

वो टुकड़ा टुकड़ा अपने बच्चों का चेहरा अपने मन में बना रही होती। आँखें। नाक। होंठ। सिर के बाल। लम्बाई। रंग। वज़न। उसकी आवाज़। उसकी हँसी। जिन दिनों वह गर्भवती होती उसकी आँखों में दो रंग दिखते। एक वर्तमान का। एक भविष्य का। दूसरी DNC के पूरे साल भर बाद उसे गर्भ ठहरा था। इस बार उसने कोई सपने नहीं देखे। इस बार बच्चों को देख कर वो ख़ुशी या अचरज नहीं, दहशत से भर जाती। हर गुज़रते महीने के साथ उसकी आँखों का अंधकार और गहराता गया। नवें महीने तो ये हाल था कि पूजाघर में फ़र्श पर बैठ कर पूजा भी नहीं कर पाती थी।
लेबर पेन के पहले ही डॉक्टर ने उसे अड्मिट करा लिया। वो कोई चांस नहीं लेना चाहती थी। सिजेरियन ओपेरेशन के बाद जब उसे होश आया तो बेड के इर्द गिर्द सब लोग जमा थे मगर चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसके पति ने जब उसे उसकी माँ के मर जाने की ख़बर दी थी, तब उसने उसकी आँखों में इतना अँधेरा पहली बार देखा था। उसके कान में बच्चे की आवाज़ गूँज रही थी। किलकारियाँ। आँखें। रंग। बाल। मुस्कान।

बिस्तर के बग़ल में टेबल पर एक सफ़ेद पोटली रखी थी। डॉक्टर ने कहा। ‘स्टिल बॉर्न’। औरत को इस टर्म का मतलब पता नहीं था। उसने पति की ओर देखा। पति ने टेबल से पोटली उठा कर उसके हाथ में रख दी। बच्चा गोरा एकदम। चेहरा बिलकुल औरत से मिलता। बाल काले। आँखें बंद। और साँस नहीं। नर्स ने भावहीन और कठोर आवाज़ में कहा, ‘मैडम बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ है’। औरत चुप।

इसमें किससे कहे कि मृत बच्चे की पलकें खोल दे। वो उसकी आँखों का रंग देखना चाहती है।

 

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Vigilante
मालूम हिंदी में ऐसा कोई शब्द क्यूँ नहीं है? क्यूँकि हमारे देश में अच्छा काम करने के बाद छुपने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हालाँकि हिंदी फ़िल्मों में कुछ और दिखाया जाता है। लेकिन समाज का सच ये है कि अच्छा करने वाले लोग डंके की चोट पर काम करते हैं। मर भी जाते हैं ऐसे।

उसका नाम नहीं दे सकती। मेट्रो में मिला था मुझे। उसकी आँखों में एक मासूम वहशत थी। छोटे, क़ातिल बच्चों में जैसी होती है। वैसी। क्या? आपने बच्चों के क़ातिल इरादे नहीं देखे? किसी बच्चे को कुत्ते के पिल्ले को मार देते देखा है? पानी में डुबो कर? गरम पानी में? आपको क्या लगा ये उसकी मासूमियत है? उसे सब मालूम था। वो बस मौत को चख रहा था। उसे छेड़ रहा था। अपना साइडकिक बनाने को। जैसे बैटमैन का है ना- रॉबिन। वैसे ही, कि जो काम उससे ना हो सकें, वे मौत के ज़िम्मे सौंप दे…छोटे छोटे क़त्ल। प्राकृतिक क़त्ल। जैसे पानी में किसी को फेंक देने के बाद उसे बचाने ना जाना जैसे- सीधे- साधारण- बोरिंग।

उसकी आँखें देख कर लगा कि उसे क़त्ल के ऊपर मासूमियत का पर्दा डालना आता है। चुप्पा लड़का। इंट्रोवर्ट जैसा। भीड़ में गुम हो जाने का खेल गिरगिट से सीखता। Camouflage. उसका चेहरा ऐसा आइना था जिसमें सिर्फ़ एक क़ातिल अपना चेहरा देख सकता था। मुझे वो दिखा कि मुझे बहुत सालों से उसकी तलाश थी। मैं जानती ये भी थी कि उसे भी मेरी तलाश थी। एक कंफ़ेशन बॉक्स की नहीं…एक ऐसे साथी की जो उसके डार्क ह्यूमर के पीछे का सच जनता हो। जिसे मालूम हो कि कोई भी लतीफ़ा सच की पहली सुराख़ है और अगर मैं उसे सही तरीक़े से प्रोत्साहन दे सकूँ तो मुझे अपने क़त्ल करने के तरीक़े से अवगत कराएगा। मैंने बहुत ख़ूनी देखे थे। लेकिन उसके जैसा मासूम ख़ूनी कोई नहीं देखा था। उसके हाथों पर ख़ून का एक भी धब्बा नहीं था। उसकी आत्मा पर भी नहीं।

आपको लगता है कि आपने वहशत देखी है? कि आप ख़ूनी को भीड़ में पहचान सकते हैं। नहीं साहब। वे पारदर्शी आँखों वाले लोग होते हैं। उनकी आँखों से उनकी रूह का ब्लैकहोल दिखता है। जहाँ से कुछ भी वापस नहीं लौटता।

देश की पहली सुसाइड हेल्पलाइन में काम करता था वो। सोचिए इतना बड़ा देश। फ़ोन कॉल्ज़ इंसान की जान के बाद सबसे सस्ती चीज़। दिन भर अनगिनत फ़ोन आते थे। उस कॉल सेंटर में उसके सिवा पच्चीस लोग और थे। सब पार्ट-टाइमर। कि सिर्फ़ ये काम करने से लोगों के अंदर आत्मघाती प्रवित्ति बनने लगती थी। जितने फ़ोन आते उसके बाद वे अक्सर फ़ॉलो अप कॉल भी करते थे। अपने जीवन की सारी पॉज़िटिव ऊर्जा झोंक देने के बाद भी वे सिर्फ़ ५० प्रतिशत लोगों को बचा पाते थे। उनके लाख कोशिश करने पर भी उन्हें वे कॉल्ज़ याद नहीं रहती थीं जिसमें व्यक्ति ने मरने के बारे में सोचना बंद कर दिया। लेकिन उनसे बात करने के बावजूद जो लोग अगले कुछ दिनों में जान दे देते थे, उसका बोझ उस हेल्पलाइन में काम करने वाला कोई भी व्यक्ति सम्हाल नहीं पाता था। नियमों के हिसाब से उनके रेग्युलर चेकअप हुआ करते थे। शारीरिक ही नहीं। मानसिक भी। उनके यहाँ आने वाले मनोचिकित्सक बहुत नर्म दिल और सख़्तजान हुआ करते थे।

आप तो जानते हैं कि देश का क़ानून आत्महत्या करने वाले को दोषी क़रार देता है। सारे धर्म भी।

लड़का उस हेल्पलाइन में कभी भी ऑफ़िस से कॉल नहीं लेता था। ये कॉल्ज़ प्राइवट रखने बहुत ज़रूरी थे इसलिए फोन कभी भी रेकर्ड नहीं होते थे। उसे वर्क फ्रौम होम पसंद था। उसने अपने पूरे घर को वाइफ़ाई से कनेक्ट कर रखा था। जब फ़ोन आता तो आवाज़ स्पीकर्स के रास्ते पूरे घर में सुनाई देती थी। वो पूरी तन्मयता से फ़ोन कॉल करने वाले की कहानी सुनता था। अपनी आवाज़ में मीठापन और दृढ़ता का बैलेन्स रखता था।

उसे दो चीज़ों से बहुत कोफ़्त होती थी। आत्महत्या करने की कोशिश करने के बाद अपने मंसूबे में असफल व्यक्तियों से और fencesitters। वे लोग जो अभी तक मन नहीं बना पाए थे कि वे ज़िंदगी से ज़्यादा प्यार करते हैं या मौत से। इस ऊँची दीवार पर बैठे हुए लोगों को काले गहरे अंधेरे में धक्का देना उसे बहुत दिलचस्प लगता था। इसको बात करने का नेगेटिव स्टाइल भी कहते हैं। इसका कई बार सही असर भी होता है। कोई कह रहा है कि मैं सूयसायड करना चाहता हूँ तो वो उसकी पूरी कहानी ध्यान से सुनता था और फिर उसे उकसाता था। कि ऐसी स्थिति में बिलकुल आत्महत्या कर ही लेनी चाहिए। वो अक्सर लोगों को कायर करके चिढ़ाता था। उन्हें उद्वेलित करता था। उनकी उदासी को और गहरा करता था। उन्हें ‘लूज़र’ जैसी गालियों से नवाजता था। उनकी कमज़ोरियों को उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल करता था। ऐसे अधिकतर लोग उससे बात करके आत्महत्या के लिए एकदम तैयार हो जाते थे। कई बार तो वे फ़ोन पर रहते हुए अपनी कलाई काट लेते थे या छत या पुल से छलाँग लगा देते थे। उसे ‘live’ मृत्यु को छूना एक अड्रेनलिन रश देता था। यही उसका नशा था। यही उसके जीवन का मक़सद।

पहली जिस चीज़ से उसे कोफ़्त होती थी वो इस बात से कि लोग इंटर्नेट और गूगल के ज़माने में इतने बेवक़ूफ़ कैसे रह जाते हैं। कलाई कैसे काटी जाती है। फंदा कैसे डाला जाता है। कितनी फ़ीट से कूदने पर जान चली जाने की गारंटी है। शहर में कौन कौन सी गगनचुंबी इमारतें हैं जिनके छत पर कोई सुरक्षा नहीं है। मेडिकल स्टोर से नींद की गोलियाँ ख़रीदने के लिए कितनी घूस देनी पड़ती है। हाइवे का कौन सा ख़तरनाक ब्लाइंड टर्न है जहाँ अचानक खड़े हो जाने पर ट्रक उन्हें कुचल देगा। कार्बन monoxide poisoning क्या होती है। वे कौन से स्टोर हैं जो ऐसे किसी व्यक्ति के संदिग्ध आचरण को पुलिस के पास रिपोर्ट नहीं करेंगे। कुछ भी काम करने के पहले तैय्यारी ज़रूरी है। ये निहायत बेवक़ूफ़ लोग जिन्हें ना जीने का सलीक़ा आता है ना मौत की फूल-प्रूफ़ प्लानिंग। इन लोगों की मदद करने में उसका इतना ख़ून खौलता था कि कभी कभी उसका जी करता था कि चाक़ू से गोद गोद कर इन्हें मार दे।

सूयसायड हेल्पलाइन के जितने कॉल्ज़ उसके पास जाते थे। उसमें से नब्बे प्रतिशत लोग ज़िंदा नहीं बचते थे। ये उसका टैलेंट था। वो अपने आप को vigilante समझता था। मृत्यु का रक्षक। उसके हिस्से के इंसान उसके पास भेजने का कांट्रैक्ट धारी। अंधेरे में काम करता था। अपनी पहचान सब से छुपाता था। लेकिन मुझसे नहीं। उसका कहना था धरती पर उन सब लोगों की जगह है जो यहाँ रहना चाहते हैं। जिन्हें नर्क जाने की हड़बड़ी है तो हम कौन होते हैं उनका रास्ता रोकने वाले। उसे वे सारे लोग ज़बानी याद थे जो उसे फ़ोन करते थे। उनके फ़ोन नम्बर। उनके घर। उनके पसंद के कपड़े। वो उनका सबसे अच्छा दुश्मन हुआ करता था।

कल ही रात को मैंने फ़ोन किया था उसे। उसने मुझे दवा का नाम भी बताया और मेडिकल स्टोर का भी। स्लीपिंग पिल्ज़। आपको मालूम है कि स्लीपिंग पिल्ज़ को पीने के पहले पानी में घोलना पड़ता है? अगर आप यूँ ही उन्हें निगल गए तो आपका शरीर उल्टियाँ कर कर के सारी दवाई बाहर फेंक देगा।

मगर आपने तो कभी आत्महत्या के बारे में सोचा ही नहीं होगा। मुझे वे लोग समझ नहीं आते जिन्होंने कभी आत्महत्या के बारे में नहीं सोचा। रेज़र ब्लेड से ऊँगली के नाख़ून काटते हुए जिन्हें नीली नसों में दौड़ते ख़ून को बहते देखने का चस्का नहीं लगा कभी। जो पहाड़ों की चोटी से नीचे कूदने का सपना मुट्ठी में बंद करके नहीं सोते।

मेरे ख़त में आख़िरी दुआ उन सब लोगों के नाम जिन्होंने कभी मृत्युगंध को पर्फ़्यूम की तरह अपनी कलाई पर नहीं रगड़ा है। ईश्वर आपकी आँखों का उजाला सलामत रखे।