Musings, Stories

a rose is a rose is a rose*

मेरा मन सिर्फ़ उस कल्पना से टूटता है जो कभी सच नहीं हो सकता और मैं सिर्फ़ इसलिए लिखती हूँ कि बहुत सारा कुछ एक कहानी में सच होता है।

***

‘तुम बिना चप्पल के चल सकते हो?’
‘हाँ, इसमें कौन सी बड़ी बात है, कौन नहीं चल सकता है बिना चप्पल के!’ तुम्हारे अचरज पर मैं हँसती हूँ तो चाँदनी में मेरी हँसी बिखर जाती है। तुम्हारी आँखों में जो उजला उजला चमकता है वो मेरी हँसी ही है ना?

तुम्हें क्या ना जाने समझ कर बुला लायी हूँ देवघर। फिर हम अपनी एनफ़ील्ड से सौ किलोमीटर दूर अपने गाँव जाने को निकले हैं। रास्ते में हनमना डैम पड़ता है। मैं वहाँ रूकती हूँ। कैक्टस पर इस साल भी फूल आया है। तुम उसे छूने को अपना हाथ बढ़ाते ही हो कि मैं ज़ोर से तुम्हारा हाथ पकड़ कर खींच लेती हूँ तुम्हें अपनी ओर…’रे बुद्धू, कैक्टस के फूल में भी बहुत काँटे होते हैं। एकदम महीन काँटे। ख़ून में मिल जाएँगे और उम्र भर दुखेंगे जाने किधर किधर तो।’ तुम मुझे अचरज से देखते हो, मैं जानती हूँ तुम सोच रहे हो कि मेरे लहू में कैक्टस के कितने काँटे हैं जो कभी घुलते नहीं। कितना दुखते हैं मुझे जो मुझे ये बात मालूम है। संगमरमर का फ़र्श है और गोल संगमरमर के ऊँचे खम्भे। एकदम सफ़ेद। हम दूर तक फैला हुआ बाँध का पानी देखते हैं। झींगुरों की आवाज़ आ रही है और चम्पा की बहुत हल्की फीकी गंध हम आमने सामने के खम्बों पर पीठ टिकाए बैठे हैं। पैर हल्के हल्के हिला रहे हैं। कभी एक दूसरे को कुछ कहना होता है तो पैर से ही गुदगुदी करते हैं। मैं कोई धुन गुनगुनाने लगती हूँ, तुम पूछते हो, ‘क्या गा रही हो’…मैं गाने के स्थाई की पंक्तियाँ गुनगुनाती हूँ और तुम उसी धुन में बहते हो।

हम गाँव की ओर चल पड़े हैं तो शाम होने को आयी है। जब तक मासूमगंज आते हैं लगभग अँधेरा हो चुका होता है। गाँव के टूटे फूटे रास्ते में धीरे धीरे एनफ़ील्ड चलाते हुए आते हैं। कहीं कहीं जुगनू दिख रहे होते हैं। तुमने पकड़ रखा है मुझे पर तुम्हारी पकड़ हल्की है। तुम्हें मेरे बाइक चलाने से डर नहीं लगता है। हम शिवालय के पास पहुँच जाते हैं। यहाँ से आगे बाइक चला कर ले जाएँगे तो पूरा गाँव उठ जाएगा। एकदम ही सन्नाटा है। लाइट कटी हुयी है। एकदम ही चाँदनी रात है। हवा में कटे हुए पुआल की गंध है। ऊँघते घरों से कोई आवाज़ मुश्किल से आ रही है। कहीं कहीं शायद टीवी चल रहा हो। कोई फ़ोन पर बात कर रहा है किसी से, सिग्नल ख़राब होने की शिकायत।

गाँव में मेरा घर सबसे आख़िर में है। मैं एक घर पहले तुमसे जूते उतरवा देती हूँ और चहारदिवारी में बाहर की ओर बने ताखे पर रखवा देती हूँ। एक ज़माने में यहाँ लोग खेत से लौट कर आने पर लोटा रखा करते थे।

घर में सब लोग सो गए हैं, आठ बजे से ही। हम बिना चप्पल के एकदम दबे पाँव चलते हैं। घर के बरामदे पर मेरे चाचा सोए हुए हैं। डर के मारे मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा है कि लगता है उसकी ही आवाज़ सबको सुनायी पड़ जाएगी। मैंने तुम्हारा हाथ ज़ोर से पकड़ रखा है। यहाँ एकदम अँधेरा है। मैं पहली बार तुम्हारे हाथ की पकड़ पर ग़ौर करती हूँ। हम दोनों दीवाल से टिके हुए हैं। सामने लकड़ी का उढ़का हुआ किवाड़ है जिसके पल्लों के बीच से एक व्यक्ति एक बार में जा सकता है। तुम्हारी साँस से पता चल रहा है कि तुम्हारी धड़कन भी बढ़ी हुयी है। तुम मेरी हथेली अपने सीने पर रखते हो। मेरी हथेली तुम्हारी धड़कन की बदहवासी में वही पागलपन पहचानती है जिसके कारण हम आज यहाँ आए हुए हैं। वही पागलपन जो हमें जोड़ता है। धीरे धीरे तुम्हारे दिल की धड़कन भी थोड़ी सम्हलती है और मैं भी थोड़ा सा गहरी साँस लेती हूँ। किवाड़ की फाँक में एक पैर रखने के पहले ईश्वर से मनाती हूँ कि फाँक और मोटापे की लड़ाई में फाँक जीत जाए। ईश्वर इस छोटी मनौती को मान लेता है और मैं दरवाज़े के उस पार होती हूँ। इस तरफ़ आ कर मैं तुम्हारे माथे पर हाथ रखती हूँ ताकि तुम झुक कर अंदर आते वक़्त छोटे दरवाज़े की चौखट से न टकरा जाओ। अंदर आँगन भर चाँदनी है। हम खड़े आँगन देख रहे होते हैं कि ठीक एक बादल का टुकड़ा चाँद के आगे आ जाता है और सब तरफ़ गहरा अँधेरा हो जाता है। तुलसी चौरे पर जलता दिया एक छोटा सा पीलापन लिए मुस्कुराता है, जैसे उसने ही मेरी चोरी पकड़ ली है। आंगन में अब भी निम्बू लगा हुआ है। मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर बैठती हूँ ईंट की बनी सीढ़ी पर। तुम देखते हो दायीं तरफ़ का पूजाघर और उससे लगा हुआ चौका। तुम देखते हो वो खंबा। जब मैं पैदा हुयी थी तो पापा दादी को ख़बर सुनाने यही आँगन लाँघ कर पूजा घर की ओर बढ़े थे। इसी खम्बे के पास खड़ी दादी पूजा के बाद अपने हाथ धो रही थीं। पापा ने कहा, ‘पोती हुयी है’। दादी बहुत ख़ुश हुयी, ‘कि बेटा बहुत अच्छा ख़बर सुनाए, एकदम पूजा करके उठे हैं, पोती का नाम पूजा ही रख दो’।

तुम मेरा हाथ पकड़ कर उस आधी चाँदनी वाली धुँधली रात में आगे बढ़ते हो। ठीक वहाँ खड़े होते हो जहाँ पापा खड़े थे। उस लम्हे को जीते हुए। तलवों ने कई दिन बाद मिट्टी महसूसी है। हवा चल रही है हल्की हल्की। बादल पूरी तरह हट गया है और चाँद एकदम से भौंचक हो कर झाँक रहा है आँगन में। धमका रहा है एक तरह से। बाबू देखा ना कोई तो पीटेगा नहीं, सीधे गाँव से उठा कर बाहर फेंक देगा। फिर ई ओसारा ज़िंदगी भर भूल जाना।

हमारे हाथ एक दूसरे को जाने कौन सी कथा कह रहे हैं। मैंने देखा नहीं है, पर जानती हूँ। आँगन में आँसू गिरे हैं। मेरी आँख से, तुम्हारी आँख से भी। हम एकदम ही चुप वहाँ से ठीक वैसे ही वापस आते हैं। जूते पहनते हैं और गाँव से बाहर शिवालय तक तेज़ चलते आते हैं। एनफ़ील्ड स्टार्ट और इस बार तुम्हारी पकड़ से मैं जानती हूँ कि तुम्हें कितना डर लग रहा है।
लगभग दो घंटे में हम देवघर पहुँच गए हैं। इतने थके हैं कि सोचने की हिम्मत नहीं बची है। जिसकी चाभी हाथ में आयी है, उसके कमरे का दरवाज़ा खोले हैं और सीधे बेड पर पड़ के बेहोश सो गए हैं।

सुबह नींद साथ में खुली है। तुम्हें ऊनींदी देख रही हूँ। तुम्हारी आँखों की धूप से कमरा सुनहला है। मैं जानती हूँ कि तुम सच में हो फिर भी तुम्हें छूना चाहती हूँ। मगर इस लम्हे के बाद, ज़िंदगी है। होटल की केटली में पानी गरम करके दो कप कॉफ़ी बनाती हूँ। एक अजीब सा घरेलूपन है हमारे बीच। जैसे हम एक ही गाँव के बचपन वाले हैं। तुम मेरे गाँव एक बार जा के मेरे हो गए हो।

तुम अब मुझे कहानी सुनाते हो कि क्यूँ तुम्हें ठीक उस जगह होना था जहाँ मेरा नामकरण हुआ था। देवघर के ही एक पंडा जी ने तुम्हारे बचपन में तुमसे एक बार कहा था कि तुम्हारी ज़िंदगी में ‘प’ अक्षर बहुत प्रेम लेकर आएगा। ज़िंदगी भर तुम्हारा इस नाम से कोई रिश्ता नहीं रहा। ना तुम पानीपत, पटना, पटियाला, प्रयाग जैसे शहरों में कभी रहे, ना कभी तुम्हें प नाम से शुरू होने वाली किसी लड़की से कभी प्रेम हुआ, यहाँ तक कि शादी भी जिससे हुयी, उसके नाम में कहीं भी ये अक्षर नहीं था। जब तक तुम मुझसे नहीं मिले थे तुम भूल भी चुके थे तुम्हारे बचपन में ऐसी कोई बात कभी किसी ने कही थी। मुझसे मिलना तुम्हें कई चीज़ों के बारे में दुबारा सोचने को मजबूर करता है। शादी। घर। गिरहस्थी। प्रेम। भविष्यवाणी। देवघर के पंडे।

तुम उस जगह खड़े होकर उस एनर्जी को महसूसना चाहते थे जो तुम्हें इस बेतरह अफ़ेक्ट करती है। कि ठीक उसी लम्हे मैं तुमसे जुड़ गयी थी, तुम्हारे जाने बिना। तुम हँसते रहे हो हमेशा, कि मेरे नाम में जाना लिखा है और तुम दुखते रहे हमेशा कि मैं लौट लौट कर आती रही। कि मैं तुम्हारे पागलपन से कभी घबराती नहीं, ना सवाल पूछती हूँ। कि मैंने जाने कौन सा प्रेम तुम्हारे हिस्से का जोग रखा है।

प्रेम अपने शुद्ध स्वरूप में निश्छल और निर्दोष होता है। मैं हँसती हूँ तुम्हें देख कर।
‘अब पंडाजी का ख़बर भी लेने चलोगे?’
‘नहीं रे। तुमको देख कर बोल दिया कि यही है प अक्षर वाली, तो मैं बाल बच्चों वाला आदमी इस धर्मसंकट में मर ही जाऊँगा। इतना काफ़ी है कि मेरा दिल जानता है।’
‘क्या जानता है?’
‘कि एक अक्षर भर का प्रेम जो मेरे नाम लिखा था। तुम्हारे नाम से शुरू होकर, तुम पर ही ख़त्म होगा।’
‘इतने से में जी लोगे तुम?’
‘मुझे बहुत की ख़्वाहिश कभी नहीं रही। और ये, इतना सा नहीं, है काफ़ी है’।
‘यूँ भी, सब मोह माया है’
‘नहीं, मोह से ज़्यादा है रे। प्यार है, तुमको भी, हमको भी। लेकिन हाँ, तुम्हारे इस प्यार पर हक़ है मेरा। और कि तुमसे दूर जाने का तकलीफ़ उठाना बंद कर देंगे अब’
‘बाबा नगरी में आ के तुमरा बुद्धि खुल गया’
‘रे पागल लड़की, सुनो। तुम अपना नाम कभी मत बदलना’।
‘कौन सा नाम? पूजा?’
‘नहीं। पागल’

[अगली बार वो पूछे कि तुमको पागल बुलाने में बेसी अच्छा लगता है, तो उसको यही कहानी सुनाएँगे]

*as said by Stein

Musings, Stories

चुनना पलाश

तुमने कभी ग़ौर किया है कि अब हमारी बातों में, गीतों में, फ़िल्मों में…फूलों का ज़िक्र कितना कम आता है?fullsizeoutput_e81.jpeg

तुमने आख़िरी बार किसी फूल को कब देखा था ग़ौर से…मतलब वैलेंटायन डे पर फूल देने की जेनेरिक रस्म से इतर। कि गुलाब के सिवा कितने और फूलों के नाम पता हैं तुम्हें? कोई पूछ ले कि तुम्हारा पसंदीदा फूल कौन सा है तो कह सकोगे? कि तुम्हें फूल पसंद ही नहीं हैं…या कि तुम तो लड़के हो, तुम्हें कभी किसी ने फूल दिए ही नहीं तो तुम्हें क्या ही करना है फूलों का?

माना कि गमले में फूल उगाना और मौसमों के साथ उनकी ख़ुशबू चीन्हना सबके क़िस्मत में नहीं होता। लेकिन फूलदान में लगे फूलों की तासीर पहचानने के लिए किसी लड़की की ज़रूरत क्यूँ रही तुम्हें? कितनी सारी ख़ूबसूरती तुम्हारी आँखों के सामने रही और तुमने कभी देखा नहीं। फिर फ़ालतू का उलाहना देते फिरोगे कि ये दुनिया बहुत ही बदसूरत जगह है। 

तुम जानते हो कि लैवेंडर किस रंग का होता है? या कि ठीक ठीक लैवेंडर की ख़ुशबू ही? तुम्हें लगता है ना कि तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो कुछ इस तरह कि मेरे बारे में सब कुछ ही मालूम है तुम्हें…तो बताओ मुझे कौन कौन से फूल पसंद हैं और क्यूँ? नहीं मालूम ना तुम्हें…

चलो, कुछ फूलों को याद करते हैं फिर से…मेरे बचपन में बहुत फूल थे…बहुत रंगों के…

सबसे पहले एक जंगली फूल का नाम, पुटुश…ये फूल मैंने पूरी दुनिया के जंगलों में देखे हैं। हम जब बच्चे हुआ करते थे तो ये फूल सबसे ज़्यादा दिखते थे आसपास। ये एक छोटे छोटे फूलों का गुच्छा होता है जिसके काले रंग के फल होते हैं। फूलों को निकाल कर चूसने से हल्का मीठा मीठा सा स्वाद आता है। बचपन से लेकर अब तक, मैं अक्सर ये काम किया करती हूँ। इसकी गंध के साथ इतनी सारी यादें हैं कि तुम सुनोगे तो पागल हो जाओगे, लेकिन ख़ैर। कोई फूल हमारी ज़िंदगी में कैसे रचा-बसा-गुंथा होता है ये हम बचपन में कहाँ जानते हैं। दिल्ली गयी थी तो अपने छोटे शहर को बहुत मिस कर रही थी। इतनी इमारतों के बीच रहने की कभी आदत नहीं रही थी। IIMC, JNU कैम्पस का हिस्सा है। पहले ही दिन से PSR की कहानियाँ सुनने लगते हैं हम। मैं उस लड़के को जानती भी नहीं थी, उन दिनों। बस इतना कि वो मेरी एक दोस्त का दोस्त है। उसने JNU से फ़्रेंच किया था। अगस्त की हल्की बारिश की एक शाम उसने पूछा, PSR देखने चलोगी…हम चल दिए। JNU की सड़कों से होते हुए जब PSR पहुँचे तो पुटुश की झाड़ियों के बीच से एक पगडंडी जाती थी। बारिश हुयी थी थोड़ी देर पहले, एकदम फुहारों वाली। तेज़ गंध थी पुटुश के पत्तों की…मीठी और जंगली…दीवानी सी गंध…जैसी की मनमर्जियों की होती है। बेपरवाहियों की भी। पुटुश मुझे कई जगह मिलता रहा है। अलग अलग सफ़र में। अलग अलग क़िस्सों के साथ। बस। मीठा होता है इसके इर्द गिर्द होना, हमेशा। जंगल के इर्द गिर्द का पुटुश मुझे बेहद पसंद है। लेकिन देखो, बुद्धू। मेरे लिए पुटुश तोड़ कर मत लाना, काँटे होते हैं इसकी झाड़ियों में। तुम्हारे हाथ ज़ख़्मी हुए तो क़सम से, दिल मेरा दुखेगा। 

दसबजिया/नौबजिया फूल: छोटे छोटे फूल जो सुबह सुबह खिल जाते थे और बहुत रंग में आते थे। बहुत आसानी से उगते थे और देर तक रहते थे। (कभी कभी सोचती हूँ ये एक घंटे का अंतर किसी अमेरिकन टाइम टेबल के हिसाब से होगा। DST अजस्ट करने के लिए)

गुलदाउदी: उन दिनों मेहनत करने वाले लोगों के बाग़ में बड़े बड़े गुलदाउदी खिला करते थे। बाक़ी लोगों के यहाँ छोटे छोटे अक्सर सफ़ेद या पीले जिसमें से जाड़ों की धूप, ऊन वाले स्वेटर और रात के अलाव की की ख़ुशबू आती थी।

रजनीगंधा: मेरे घर में कुआँ था और घर से कुआँ जाने के रास्ते में दोनों तरफ़ रजनीगंधा लगा हुआ था। जब ये फूलता था तो रास्ते में छोटा छोटे भुकभुकिया बल्ब जैसा लगता था। घर के हर शादी, फ़ंक्शन में गजरा के लिए सबको रजनीगंधा की लड़ियाँ ही मिलती थीं। जब पहली बार घर से बाहर अकेले रहना शुरू किए तो बिजलरी की बोतल में रखने के लिए पहली बार बेर सराय से ख़रीद कर रजनीगंधा का एक स्टिक रखे। पहला फूलदान ख़रीदे तो उसमें एक रजनीगंधा की स्टिक और एक लाल गुलाब रखा करते थे। इन दिनों रजनीगंधा कभी नहीं ख़रीदते कि वो एक कमरा इतना याद आता है कि दुखने लगता है। ये उस वक़्त की ख़ुशबू है जब जीवन में कोई दुःख नहीं था। 

कारनेशंस: मैं उस लड़के से प्यार करती थी। वो मुझे सोलमेट कहता था। हम बहुत दूर के शहरों में रहते थे। उसके शहर का समंदर मुझे उसकी याद दिलाता था, गीतों में नमकीन होता हुआ। उसने एक बार मुझे फ़ोन किया, उसे अपने किसी दोस्त के जन्मदिन पर फूल देने थे। मैंने पूछे, कौन से…उसने कहा, कारनेशंस…मैंने पूछा, कौन से रंगे के…उसने कहा सफ़ेद। मैंने पहली बार कारनेशंस का गुलदस्ता बनवाया और उसके उस दोस्त के लिए डेस्क पर रखा। गुलदस्ते की एक तस्वीर खींच कर भेजी उसे। उसका मेसेज आया, ‘ब्यूटिफ़ुल, जस्ट लाइक यू’। फूल सिर्फ़ बहाना था। उसे कहना था मुझे कि मैं कारनेशंस की तरह ख़ूबसूरत हूँ। वो रक़ीब है तुम्हारा। उतना प्यार तुम मुझसे कभी नहीं कर सकोगे। फिर उसने कभी मेरे लिए फूल नहीं ख़रीदे…तो सुनो, मेरे लिए कारनेशंस कभी ख़रीद कर मत लाना। 

लिली: वही लड़का, उफ़। मतलब क्या कहें तुमसे। जादू ही था। पहली बार उसने लिली ख़रीदी थी, सफ़ेद। मेरी कलीग की सीट पर रखा था एक काँच के गिलास में। लिली का बंद फूल, कली यू नो। एक पूरे हफ़्ते नहीं खिली वो। मुझे लगा नहीं खिलेगी। वो रोज़ उसका पानी बदलता। वीकेंड आया। मैं कमरे में आयी तो एक अनजान ख़ुशबू आयी। मैं ये गंध नहीं पहचानती थी। कमरे में आयी तो उसे देखा। धूप देखी। उसकी आँखें देखी। उसने कहा, देखो, तुम आयी ना, अभी अभी लिली खिली है। ये वाक़या झूठ है हालाँकि। मैंने ख़ुद के लिए कई बार सफ़ेद लिली ख़रीदी। मुझे उसकी गंध इतनी पसंद थी जितना वो लड़का। लेकिन फिर प्यार भी बहुत ज़्यादा था और लिली की गंध भी कुछ ज़्यादा ही सांद्र। तो बर्दाश्त नहीं होता अब। तो देखो, मेरे लिए लिली मत लाना। 

बोगनविला: लहक के खिलते पूरे JNU के वसंत में कि जैसे मेरे जीवन का आख़िर वसंत हो। मैं हैंडीकैम लिए बौराती रहती सड़क दर सड़क। सोचती कि रख लूँगी आँख भर बोगनविला के सारे शेड्स। मुहब्बत की कितनी मिठास तो। बेलौस धुन कोई। उड़ता रहेगा दुपट्टा यूँ ही आज़ाद हवा में और मेरे दिल को नहीं आएगा किसी एक का होकर रहना। बहुत साल बाद बोगनविला से दुबारा मिली तो जाना कि जंगली ही नहीं ज़िद्दी पौधा भी है। घर के दरवाज़े पर लगा बोगनविला मुहब्बत की तरह पुनर्नवा है। दो महीने में पूरा सूख कर दो महीने में फिर से लौट भी आता है। इक शाम साड़ी पहन मुहब्बत में डूबी इतराते हुए चली तो जूड़े में बोगनविला के फूल लगा लिए। इस अफ़ोस के साथ कि उम्र भर इतने ख़ूबसूरत बाल रहे लेकिन तुम्हारे जैसे नालायक लड़कों से दुनिया भरी है कि किसी ने कभी बालों में लगाने के लिए फूल नहीं ला के लिए। बोगनविला अगर तुमने लगा रखे हों घर में, तो ही लाना मेरे लिए बोगनविला के फूल। वरना रहने दो। मुझ बेपरवाह औरत के घर में हमेशा खिला रहता है बोगनविला। बाक़ी समय किताबों में बुक्मार्क हुये रहते हैं रंग वाले सूखे फूल। सफ़ेद बोगवानविला पसंद हैं मुझे। उनपर फ़ीरोज़ी स्याही से तुम्हारा नाम लिख के सबिनास की प्रेम कविताओं की किताब में रख दूँगी। अगर जो तुम्हें याद रहे तो। 

ट्युलिप: बहुत्ते महँगा फूल है। आकाशकुसुम जैसा। पहली बार देखे थे तो छू कर तस्दीक़ किए थे कि सच का फूल है। मैंने आज तक कभी ख़ुद के लिए ट्युलिप नहीं ख़रीदे। एक बार बीज देखे थे इसके। लेकिन इसलिए नहीं ख़रीदे कि यहाँ उगाने बहुत मुश्किल होंगे। तुमसे तो उग जाते हैं लेकिन। पता है, न्यू यॉर्क के सेंट्रल पार्क में तुम अपने किसी प्यारे व्यक्ति के नाम पर ट्यूलिप्स लगवा सकते हो। इसके लिए मेरे मरने और मेरी क़ब्र पर ट्युलिप लगाने जैसी मेहनत नहीं है। ना तो मैं अभी मर रही, ना मेरी क़ब्र होगी। तो रहने दो। कॉफ़ी मग में एक छोटा सा ट्युलिप मेरे नाम पर उगा दो ना!

मुझे ज़रबेरा पसंद हैं। सिम्पल ख़ुश फूल। कुछ ज़्यादा नहीं चाहिए उन्हें। बहुत महँगे भी नहीं होते। मैं हमेशा तीन ज़रबेरा ख़रीदती हूँ। अक्सर दो पीले और एक सफ़ेद। या कभी दो सफ़ेद, एक पीला। मूड के हिसाब से सफ़ेद और पिंक या कभी लाल और पीले भी। पिछले दस साल से एक ही दुकान से ले रही हूँ। सोचती हूँ, अब जो मैं नयी लोकैलिटी में शिफ़्ट हो रही हूँ…उस दुकान का एक रेग्युलर कस्टमर कम हो जाएगा। जीवन में कितने दुःख हैं। 

और पलाश। कि जीवन में सबसे रंगभरा, सुंदर, और मीठा जो फूल है वो है पलाश। एक इश्क़ की याद कि जो अधूरा है लेकिन टीसता नहीं, सुलगता है मन के जंगल में। गहरा लाल रंग। फूलता है टेसु और जैसे हर महीना ही मार्च हुआ जाता है। मिज़ाज फागुन, और गाल गुलाल से रंगते लाल, पीले, हरे…कोई होता है लड़का गहरे डिम्पल वाला जिसकी हँसी में डूब जाती हूँ। सच का होता तो साँस अटक जाती, क़सम से! इनावरण में हुआ करता था पलाश का जंगल जो कि होली में लहकता था ऐसे जैसे कि कोई दूसरा साल या वसंत कभी आएगा ही नहीं। उसी से मिल कर पता चला, सपनों के राजकुमारों के मोटरसाइकल रेसिंग स्कूल होते हैं, उसका वो नम्बर वन रेसर था। बाइक ऐसी तेज़ चलाता था कि उतनी तेज़ बस दिल धड़कता था। इक दिन जाना है उसके छूटे हुए शहर और वापसी में पूरे रास्ते रोपते आना है पलाश के पौधे कि कभी वो मुझ तक लौटना चाहे तो मार्च में लौटे, वसंत से गलबहियाँ डाले हुए। उसे चूमना वायलेंट हो कि होठों के किनार पर उभर आए ख़ून का गहरा लाल रंग। वो होंठ फिरा कर चखे बदन में दौड़ते ख़ून का स्वाद और मुस्कुराते हुए पूछे, इश्क़? मेरी आँखों में मौसम बदल कर हो जाए सावन और मैं कहूँ, अफ़सोस। मगर वो बाँहों में भरे ऐसे कि मन कच्चा हरा होता जाए, पलाश की कोंपल जैसा। वो कह सके, तुम या तो एक बार काफ़ी हो या उम्र भर भी नहीं। 

तुम ठीक कहते हो कि मेरी बातें कभी ख़त्म नहीं होंगी। जितनी लम्बी फूलों की लिस्ट है, इतना तो प्यार भी नहीं करते हो तुम मुझसे। उसपे कुछ ज़्यादा ही मीठी हूँ मैं। ये तुम्हारी उम्र नहीं इतने मीठे में ख़ुद को इंडल्ज करने की। हमसे इश्क़ करोगे तो कहे देते हैं, डाइअबीटीज़ से मरोगे तुम!

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WhatsApp Stories

देखो। मुझे पता है तुम जाग रहे हो। तुमने पूछा था कि तुम ख़ास कैसे हो? तो वो ऐसे कि मेरा WhatsApp तुम्हारे नाम पर खुला हुआ है। तुम्हारे last seen से मुझे पता है कि मिनट मिनट तुम भी WhatsApp देख रहे हो और जागे हुए भी हो। मुझे पता है, मेरी तरह तुम भी सोच रहे हो, कुछ लिखें या ना लिखें। हम एक ईगो की लड़ाई लड़ रहे हैं, बेफूजूल। कल मैं तुम्हें समझाऊँगी कि ऐसे खेल कितना थका देने वाले होते हैं। इस उमर में मुझसे नहीं खेले जाते। मैं जागी हूँ कि मैं कुछ लिख रही हूँ। यूँ तुम भी कुछ कर ही रहे होगे। या हो सकता है तुम्हें यूँ ही नींद नहीं आ रही। सॉरी, असल बात बताना भूल ही गयी हूँ। तुम ख़ास इसलिए। कि मेरे WhatsApp में भतेरे कॉंटैक्ट्स हैं, पर मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है कौन जगा है, कौन सो रहा है। हाँ, तुम्हारा वहाँ मिनट मिनट आना देख रही हूँ। नहीं होते हुए भी हम साथ हैं।

नालायक इंसान। मैं उम्मीद करती हूँ कि तुम्हारा ये फ़ितूर कल उतर जाए और तुम बात कर लो। प्यार व्यार अब नहीं करते हम। यारी दोस्ती और बकैती करते हैं बस। हाँ कुछ काम कर सकते हैं साथ में, कोई फ़िल्म बनाना, कोई शहर घूमना, कविता पढ़ के सुनाना तुमको। सिंबोर्सका और बोर्हेस खास तौर से।

बाक़ी तुम्हारी ज़िंदगी में भी बहुत से लोग होंगे। मेरे में भी कम सही, लोग तो हैं। लेकिन जैसे कि मेरा एक प्यारा दोस्त कहता है, ‘लोग तो बहुत होंगे, लेकिन तुम्हारे जैसी कोई कहाँ ही होगी’। तो बस, वही बात है। तुम्हारे जैसे तो बस तुम ही हो।

अगस्त आ रहा है। फ़्रेंड्शिप डे वाला *तियाप्स शुरू हो जाएगा। अच्छा लगेगा बताओ, ये फ़्रेंड्शिप बैंड वाला बेवक़ूफ़ी कि पूछें तुमसे, ‘हमसे दोस्ती करोगे?’। आसान करें कुछ लाइफ़ में? ऐब्नॉर्मल इंसानों की तरह बात करते हैं। कि हम ऐसे ही हैं, दोनों। रैंडम लोग। बहुत प्रेमिकाएँ होंगी तुम्हारी और हम तो कितना लोग से इश्क़ किए हैं सो हिसाब रहने ही दो। यारी दोस्ती वाले लोग कम रहे हैं, सो सोचो ना, स्पेशल भी ज़्यादा रहोगे। शान से कह सकोगे कि दोस्त हैं तुम्हारे। ईमानदारी से, यू नो।

बहुत हुआ, ऐड्वर्टायज़िंग में इससे ज़्यादा ख़ुद के बारे में अच्छा बोलना नहीं सिखाया गया है। नहीं बात करने में दोनों का नुक़सान है। छोड़ो ये अबोला। हो गया रूसना तुमरा?

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मैंने बर्फ़ नहीं देखी है कभी। सिवाए तुम्हारी आँखों में। या कि तुम्हारे बर्फ़ दिल में। इतनी सारी बर्फ़ कि लगता है वहाँ स्केटिंग की जा सकती है, आइस स्केटिंग।

‘वे दिन’ का वो हिस्सा है ना जहाँ वे पूरे कोट, मफ़लर और दस्ताने पहने हुए किसी धुन पर डान्स कर रहे हैं, ऐसे कुछ कि कोई और उन्हें देखता तो पागल ही समझता। तुम थोड़ा बावरे हो सकते हो मेरे साथ? थोड़े से पागल। बस, थोड़े से।

रात को यूँ बेतरह तुम्हारी याद गुंथी आयी है मेरे किरदारों में कि दिल कर रहा है आज बस पूरा उपन्यास लिख कर ख़त्म कर दूँ। किसी सपने के भीतर के सपने में छुपे हुए हो तुम। इस बेतरह। बेतरह। बेतरह याद आयी है तुम्हारी। अगर ज़िंदगी में कुछ भी निश्चित तौर से जाना है, तो सिर्फ़ ये कि इस वक़्त तुम याद कर रहे होगे कहीं मुझे। मालूम नहीं कहाँ। शायद कोई सड़क पार करते हुए। शायद किसी ऐसे शहर में जहाँ मैं जा चुकी हूँ पहले या कि बारिश हो रही होगी। या तुमने फूल देखे होंगे सफ़ेद लिली के। या कि तुम भी लैप्टॉप खोले लिख रहे होगे जाने क्या क्या तो…रच रहे होगे किरदार, लिख रहे होगे टूटी फूटी कविता। गुज़र रहे होगे शहर के किसी हिस्से से और अचानक याद आयी होगी मेरी, कि मुझे शायद पसंद आता ज़मीन का ये टुकड़ा, पेंटिंग का ये रंग, संगीत का ये सुर। अच्छा, ये गाना सुनना तुम। तुमको अच्छा लगेगा।

आसान तो कुछ भी नहीं है दुनिया में, मेरी जान। लेकिन फिर भी, तुम्हें भुलाना, उफ़्फ़्फ…कि तुम जानते हो ना, उफ़्फ़्फ है, एकदम।

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There is so much that’s pending between us. So many cities, seasons, so so so many songs to listen to, at the same time. We need to find a point of time when both our cities are awake. Let me play this on my airpods…do you have a pair of headphones you can put on, my love?

Are there bridges in your city? the ones that make you feel closer to the moon. Here I am, my love…dancing in the quiet of the night…only two things are loud at this unearthly hour… the beating of my heart and this song. Dance with me…my love?

When I meet you next, I will hug you oh so lightly, like a turquoise butterfly gently fluttering it’s wings…delicately tiptoeing between the farewell kisses on the letter I am writing to you.

There will be seas and rivers and mountains and valleys running in such a rush as the world is going to end. We will probably have a thousand tangos between us and many sleepless nights. Under our feet we will have endless roads…the wet sand of the sea and the bubbling hot marble of the Tajmahal and the stars and the moons and the rings of Saturn.

And the thousand gods would have fulfilled a million wishes and all the dreams I dreamt with you and for you.

There will come the day when we will have to say good bye… the last of the moonlight will drink the nectar from your oh so kissable lips and as I die, I will mumble…Damn, I haven’t kissed you enough.

 

Song: Beautiful Tango

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मैं तुम्हें ख़त नहीं लिख सकती। तुम जानते हो कि मर जाने का भय या उत्सुकता मेरे जीवन का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा है। मैं लिखती रहती हूँ कि इतना सारा कुछ चलते रहता है मेरे भीतर। कितने कितने ट्रैक्स पर। ये सारा कुछ कभी कभी मुझे पागल कर देता है। जैसे कि तुम्हारे प्यार में होना मेरा ध्यान दिन भर बाँटे रहता है।

इतने सारे लिखे में तुम अपने हिस्से का सब कुछ देख लोगे, ऐसा मुझे भरोसा है। मेरी कहानियों में तुम्हारी हँसी या कि तुम्हारे शहर की धूप सही। तुम्हारे दिल की धड़कन मेरी हथेलियों में रहती है, इसलिए मैं काग़ज़ पर लिखती हूँ तो थोड़ी थरथराहट रहती है मेरी लिखाई में।

फ़िल्म याद है तुम्हें। आख़िर की बर्फ़ देखने का आख़िर का लम्हा। मृत्यु से ठीक पहले का। इस लम्हे के बाद वो घुल कर हवा हो गयी थी। जाने कितने सालों बाद मैंने मृत्यु को सामने देखा है। सब हँसते हैं मुझपर कि मैं इतनी ज़्यादा डेथ से obsessed क्यूँ है। फिर इस उमर में कोई early-death भी नहीं कह सकते। ठीक ठाक जी ली ज़िंदगी मैंने, इस भय के साथ भी।

माडर्न मेडिसिन के सिवा पढ़ती हूँ तो जानती हूँ कि मैं बीमार नहीं हूँ…मेरी आत्मा में कोई ज़ख़्म है…जिसकी टीस मेरे बदन में उभरती है। तुमसे मिली थी तो क्यूँ लगा था कि ना कोई ज़ख़्म है, ना कोई दर्द। कि तुम कोई चारागर होते तो फिर भी सह लेना मुमकिन था तुमसे यूँ बिछड़ना…पर तुम तो मसीहा हो गए। कोई देवदूत कि जिसके स्पर्श में हीलिंग पावर्ज़ है।

तुमसे प्यार ऐसा नहीं है जैसे बाक़ियों से होता है, मौसम की तरह। तुमसे प्यार ऐसा है जैसे मुझे अपने लिखने से है…कोई यूनिवर्स की एनर्जी बहती है मेरे भीतर जिसे शब्दों से मुझे dissipate करना पड़ता है वरना मैं शायद एनर्जी कणों में घुल जाऊँ। तुमसे प्यार ऐसा है जैसे मेरे इग्ज़िस्टेन्स के सबसे छोटे छोटे कणों में कोई ऊष्मा है। core में। कि हम जो इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन के बने हैं। तुम वहाँ का +१ वाला चार्ज हो।

क्या कहें। रहने दो तुम। इतना में दिमाग़ लगा के क्या करना है। तुमसे मिल कर बेहद उलझ गयी हूँ। जिस दिन थोड़ा भी समझूँगी, सबसे पहले तुम्हें बताउँगी। जो मर गयी उसके पहले…तो मेरे शब्द तुम्हें तलाश लेंगे, ऐसा मुझे यक़ीन है।

ढेर सारा प्यार।

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पिछले हफ़्ते मेरा फ़ोन खो गया था। icloud में जगह भर गयी थी और हम स्पेस ख़रीदे नहीं थे, इस दिक़्क़त में whatsapp का बहुत सारा बैकअप पेंडिंग था। कुछ दोस्तों से रिक्वेस्ट किए कि उनके पास जो तस्वीरें हैं मेरी, वो भेज दें।
 
इन तस्वीरों को देख कर लगता है कि कितनी छोटी छोटी चीज़ों से कितना ख़ुश हुयी हूँ मैं। चाय के कप से उठती भाप। फूलों के पीछे होती बारिश। विंडचाइम्ज़ की आवाज़। पोस्टकार्डस जो मैं लिखती हूँ, पर भेजने के लिए नहीं। Lamy के मेरे पेन। बस कुछ लोग, जिन्हें कुछ भेजने के पहले सोचना नहीं पड़ता।
 
लम्बी चिट्ठियाँ और लम्बे emails लिखना अच्छा लगता रहा है। मेरी चिट्ठियाँ ए4 काग़ज़ पर कमसे कम चार पन्नों की होती थीं। इतनी इतनी बातें हुआ करती थीं मेरे पास।
 
पर इतनी बातें होने पर भी मैं किससे बात कर रही हूँ इसको लेकर बहुत चूज़ी रही हूँ। मैं अकेले रहते हुए आसमान देखते हुए दोपहर बिता दूँगी लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति से बात नहीं करूँगी जो मुझे पसंद नहीं हो। मैं कैसे और किन शब्दों में कहूँ, कि ख़ास हो तुम…मेरी ज़िंदगी में आम लोग नहीं होते, भले ही आम कितना भी पसंद है मुझे (उफ़, अब मुझे सोना चाहिए, PJs मारने का मन कर रहा है, बहरहाल)।
 
तारतम्य नहीं है। लेकिन जो है, रहना चाहिए। जैसे कि दर्द। अभी पेनकिलर खाया है, लेकिन कमबख़्त असर नहीं कर रहा। राइट पैर में प्लास्टर हुआ है, जिसके कारण चाल बदल गयी है और बाएँ हिस्से पर ज़ोर ज़्यादा पड़ता है, जिसके कारण रीढ़ की वाट लग गयी है। अभी जैसे पूरा स्पाइनल कॉर्ड दुःख रहा है बुरी तरह से। पहले की तरह देर तक गरम पानी से नहाना भी मुश्किल है।
 
फ़िज़िकल पेन से मुझे कम दिक़्क़त होती है लेकिन इमोशनल ट्रॉमा बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल होता है। इन दिनों ऐसा है कि धड़कन दिन भर बढ़ी रहती है। साँस एकदम भी रिदम में नहीं।
 
समय में उलझी हुयी हूँ मैं। अतीत में जी रही होती हूँ या भविष्य में। कि फ़िलहाल का लम्हा दुखता है कि तुम दूर हो बहुत और मेरी हथेलियाँ ठंडी पड़ रही हैं और मुझे मर जाने का डर नहीं लगता, लेकिन तुमसे दुबारा मिले बिना मर जाने का डर ख़ूब ख़ूब लगता है।