Musings, Stories

चाँद मुहब्बत। इश्क़ गुनाह।

‘तुम वापस कब आ रही हो?’
‘जब दुखना बंद हो जाएगा तब।’
‘तुम्हें यक़ीन है कि दुखना बंद हो जाएगा?’
‘हाँ’
‘कब?’
‘जब प्रेम की जगह विरक्ति आ जाएगी तब।’
‘इस सबका हासिल क्या है?’
‘हासिल?’
‘हाँ’
‘जीवन का हासिल क्या होता है?’
‘Why are you asking me, you are the one here with all the answers. What’s the whole fu*king point of all this.’
‘Please don’t curse. I’m very sensitive these days.’
‘ठीक है। तो बस इतना बता दो। इस सबका हासिल है क्या?’
‘मुझसे कुछ मत पूछो। मैं प्रेम में हूँ। उसका नाम पूछो।’
‘क्या नाम है उसका?’
‘पूजा।’
‘This is narcissism.’
‘नहीं। ये रास्ता निर्वाण तक जाता है। मुझे मेरा बोधि वृक्ष मिल गया है।’
‘अच्छा। कहाँ है वह?’
‘नहीं। वो किसी जगह पर नहीं है। वो एक भाव में है।’
‘प्रेम?’
‘हाँ, प्रेम।’
‘तो फिर? गौतम से सिद्धार्थ बनोगी अब? राजपाट में लौटोगी? निर्वाण से प्रेम तक?
‘नहीं। ये कर्ट कोबेन वाला निर्वाण है।’
‘मज़ाक़ मत करो। कहाँ हो तुम?”
‘I am travelling from emptiness to nothingness.’
‘समझ नहीं आया।’
‘ख़ालीपन से निर्वात की ओर।
‘ट्रान्स्लेट करने नहीं समझाने बोले थे हम।’
‘मुझे दूर एक ब्लैक होल दिख रहा है। मैं उसमें गुम होने वाली हूँ।’
‘वापस आओगी?’
‘तुम इंतज़ार करोगे?’
‘मेरे जवाब से फ़र्क़ पड़ता है?’
‘शायद।’
‘Tell me why I’m in love with you.’
‘Because you hurt. All over.’
‘Do you need a hug?’
‘You are touch phobic. Write a letter to me instead.’
‘Will you please not come back. Die in the fu*king black hole. I can’t see you hurting like this.’
‘Are you sure?’
‘You are sure you don’t love me?’
‘Yes.’
‘मर जाओ’

उसकी हँसी। अचानक कंठ से फूटती। किसी देश के एयरपोर्ट पर अचानक से किसी दोस्त का मिल जाना जैसे।

याद में सुनहले से काले होते रंग की आँखें हैं…बीच के कई सारे शेड्स के साथ।
उसकी हँसी के साउंड्ट्रैक वाला एक मोंटाज है जिसमें क्रॉसफ़ेड होती हैं सारी की सारी। सुनहली। गहरी भूरी। कत्थई। कि जैसे वसंत के आने की धमक होती है। कि जैसे मौसमों के हिसाब से लगाए गए फूलों वाले शहर में सारे चेरी के पेड़ों पर एक साथ खिल जाएँ हल्के गुलाबी फूल। जैसे प्रेम हो और मन में किसी और भाव के लिए कोई जगह बाक़ी ना रहे। जैसे उसके होने से आसमान में खिलते जाएँ सफ़ेद बादलों के फूल। जैसे उसकी आँखों में उभर आए मेरे शहर का नक़्शा। जैसे उसकी उँगलियों को आदत हो मेरा नम्बर डायल करने की कुछ इस तरह कि अचानक ही कॉल आ जाए उसका।

उसी दुनिया में सब कुछ इतनी तेज़ी से घटता था जितनी तेज़ी से वो टाइप करती थी। सब कुछ ही उसकी स्पीड के हिसाब से चलता था। माय डार्लिंग, उसे तुम्हारे प्रेम रास नहीं आते। इसलिए उनका ड्यूरेशन इतनी तेज़ गति से लिखा जाता कि जैसे आसमान में टूटता हुआ तारा। शाम को टहलने जाते हुए दौड़ लगा ले पार्क के चारों ओर चार बार। टहलना भूल जाए कोई। उँगलियाँ भूल जाती थीं काग़ज़ क़लम से लिखना जब बात तुम्हारी प्रेमिकाओं की आती थी।

जैसे तेज़ होती जाए साँस लेने की आवाज़। तेज़ तेज़ तेज़।

कैसे हुआ है प्रेम तुमसे?

जैसे काफ़ी ना हो मेरे नाम का मेरा नाम होना। जैसे डर मिट गया हो। जैसे अचानक ही आ गया हो तैरना। जैसे मिल जाए बाज़ार में यूँ ही बेवजह भटकते हुए इंद्रधनुष के रंगों वाला दुपट्टा कोई। कुछ भी ना हो तुम्हारा होना।

बिना परिभाषाओं में बंधे प्रेम करने की बातें सुनी थीं पर ऐसा प्रेम कभी ज़िंदगी में बिना दस्तक के प्रवेश कर जाएगा ऐसा कब सोचा था। यूँ सोचो ना। क्या है। सिवा इसके कि तुम्हें मेरा नाम लेना पसंद है, कि जैसे झील में पत्थर फेंकना और फिर इंतज़ार करना कि लहरें तुम्हें छू जाएँगी…भिगा जाएँगी मन का वो कोरा कोना कि जिसे तुमने हर बारिश में छुपा कर रखा है। ठीक वहाँ फूटेगी ओरिएंटल लिली की पहली कोपल और ठीक वहीं खिलेगा गहरे गुलाबी रंग की ओरिएंटल लिली का पहला फूल। कि जैसे प्रेम का रंग होगा…और तुमसे बिछोह का। गहरा गुलाबी। चोट का रंग। गहरा गुलाबी। और हमारे प्रेम का भी।

प्रेम कि जो अपनी अनुपस्थिति में अपने होने की बयानी लिखता है। तुम चलने लगो गीली मिट्टी में नंगे पाँव तो ज़मीन अपने गीत तुम्हारी साँस में रोप दे। तुम गहरा आलाप लो तो पूरे शहर में गहरे गुलाबी ओरिएंटल लिली की ख़ुशबू गुमस जाए जैसे भारी बारिश के बाद की ह्यूमिडिटी। तुम कोहरे में भी ना सुलगाना चाहो सिगरेट कोई। तुम्हारे होठों से नाम की गंध आए। तुम्हारी उँगलियों से भी।

और सोचो जानां, कोई कहे तुमसे, कि बदल गयी है दुनिया ज़रा ज़रा सी, ऑन अकाउंट औफ आवर लव। कि अब तुम्हारा नाम P से शुरू होगा। तुम्हारा रोल नम्बर बदल गया है क्लास में। और अब तुम क्लास में एग्जाम टाइम में ठीक मेरे पीछे बैठोगे। तुम्हारे ग्रेड्स सुधर जाएँगे इस ज़रा सी फेर बदल से[चीटर कहीं के]। और जो आधे नम्बर से तुम उस पेरिस वाले प्रोग्राम के लिए क्वालिफ़ाई नहीं कर पाए थे। वो नहीं होगा। तुम जाओगे पेरिस। तुम्हारे साथ चले जाएगा उस शहर में मेरी आँखों का गुलमोहर भी। पेरिस के अर्किटेक्ट लोग कि जिन पर उसके इमॉर्टल लुक को क़ायम रखने की ज़िम्मेदारी है, वे परेशान हो जायेंगे कि पेरिस में इतने सारे गुलमोहर के पेड़ थे कहाँ। और अगर थे भी तो कभी खिले क्यूँ नहीं थे। तुम्हारा नाम P से होने पर बहुत सी और चीज़ें बदलेंगी कि जैसे तुम अचानक से नोटिस करोगे की मेरे दाएँ कंधे पर एक बर्थमार्क है जो मेरे नाम का नहीं, तुम्हारे नाम का है।

वो सारे लव लेटर जो तुमने अपनी प्रेमिकाओं को लिखे हैं सिर्फ़ अपने नाम का पहला अक्षर इस्तेमाल करते हुए वे सारे बेमानी हो जाएँगे। मेरे कुछ किए बिना, तुम्हारे प्रेम पर मेरा एकाधिकार हो जाएगा। यूँ भी ब्रेक अप के बाद तुम्हें कौन तलाशने आता। टूटने की भी एक हद होती है। तुम्हारे प्रेम से गुज़रने के बाद, कॉन्सेंट्रेशन कैम्प के क़ैदी की तरह उनकी पहचान सिर्फ़ एक संख्या ही तो रह जाती है। सोलहवें नम्बर की प्रेमिका, अठारवें नम्बर का प्रेमी। परित्यक्ता। भारत के वृंदावन की उन विधवाओं की तरह जिनका कान्हा के सिवा कोई नहीं होता। किसी दूसरे शहर में भी नहीं। किसी दूसरी यमुना के किनारे भी नहीं।

पागलों की दुनिया का खुदा एक ही है। चाँद। तो तुम्हारा नाम चाँद के सिवा कुछ कैसे हो सकता था। मेरे क़रीब आते हो तो पागल लहरें उठती हैं। साँस के भीतर कहीं। तुम्हें बताया किसी ने, तुम्हारा नया नाम? सोच रही हूँ तुम नाराज़ होगे क्या इस बात को जान कर। मेरी दुनिया में सब तुम्हें चाँद ही कहते हैं। कोई पागल नहीं रहता मेरी दुनिया में। एक मेरे सिवा। तुम मेरे खुदा हो। सिर्फ़ मेरे। मुझे प्रेम की परवाह नहीं है तो मुझे तुम्हारी नाराज़गी की परवाह क्यूंकर हो। बाग़ी हुए जा रही हूँ इश्क़ में। रगों में इंक़लाब दौड़ता है। कहता है कि चाँद को उसकी ही हुकूमत से निष्कासित कर कर ही थमेंगे। उसकी ख़्वाबगाह से भी। और मेरी क़ब्रगाह से तो शर्तिया।

मैंने तुम्हें देखने के पहले तुम्हारा प्रतिबिम्ब देखा था…आसमान के दर्पण में। बादलों के तीखे किनारों को बिजली से चमकाया गया था। उनके किनारे रूपहले थे।

मैं इस दुनिया से जा चुकी हूँ कि जहाँ सब कुछ नाम से ही जुड़ता था। इस रिश्ते का नाम नहीं था। मेरे लिए भी नाम ज़रूरी नहीं था। मेरे लिए मेरा नाम ही प्रेम है। उसकी आवाज़ ही हूँ मैं। और जानेमन, आवाज़ों का क्या रह जाता है।

वो तलाशे अगर तो कहना, ‘मैं उसकी प्रतिध्वनि थी’।

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आँखों के आखिरी यातना शिविर

स्टैंडिंग सेल्स
२ बाय २ बाय ६ फुट के टेलेफोन बूथ नुमा कमरे थे जिन्हें स्टैंडिंग सेल्स कहा जाता था. यहाँ कैदी बमुश्किल खड़े हो सकते थे. इन में प्रवेश करने के लिए नीचे की ओर एक छोटा सा दो फुट बाय दो फुट का लोहे की सलाखों वाला दरवाज़ा होता था. हवा के आने जाने को भी बस इतनी ही जगह होती थी. इन में बैठ कर घुसना होता था और फिर खड़े हो जाना होता था. कई बार इन सेल्स में चार कैदी तक भर दिए जाते थे. इन में न सांस लेने भर हवा होती थी न रौशनी भर उम्मीद. सबसे ज्यादा आत्महत्याएं इन स्टैंडिंग सेल्स वाले कैदी ही करते थे.
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तुमने उसकी आँखें देखीं? उसकी आँखों में यही स्टैंडिंग सेल्स हैं. उसकी आँखों को न देखो तो उसके पूरे वजूद में पनाह जैसा महसूस होता है. उसकी हंसी, उसका रेशम का स्कार्फ…उसकी ऊँगली में चमकती गहरे लाल पत्थर की अंगूठी…और उसकी बातों का सम्मोहन…मगर उसके करीब मत जाना. उसकी आँखें टूरिस्म के लिए नहीं हैं. वहां कैद हो गए तो बस मौत ही तुम्हें मुक्ति देगी.

तुमसे बात करते हुए अगर वह दूर, किसी बिना पत्तियों वाले पेड़ को देख रही है तो खुदा का शुक्र मनाओ कि वह तुम पर मेहरबान है. शायद उसे तुम्हारी मुस्कराहट बहुत नाज़ुक लगी हो और वह अपने श्रम शिविर से तुम्हें बचाना चाहती हो. उससे ज्यादा देर बातें न करो. उसका मूल स्वाभाव इस तरह क्रूर हो चूका है कि वह खून करने के पहले सोचती भी नहीं. She kills on autopilot. But isn’t that how all mercenaries are? All, but women. तुम्हें कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़े पता हैं? After a point of time it should stop hurting. But it doesn’t.

स्टैंडिंग सेल्स की दीवारों पर जंग लगे ताले हैं. गुमी हुयी चाभियाँ हैं. भूल गए जेलर्स हैं. भूख, प्यास और विरक्ति है. नाज़ी अमानवीय यातनाएं दे कर यहूदियों को जानवर बना देना चाहते थे मगर उन्होंने बचाए रक्खी जरा सी रंगीन चौक…बत्तखें, खरगोश और अपने अजन्मे, मृत और मृत्पाय बच्चों की किलकारी.

लड़की कह नहीं सकती किसी से…इस आँखों के श्रम शिविर को बंद करो. गिराओ बमवर्षक विमानों से ठीक जगह बम. जला दो फाइलें. मैं भूल जाना चाहती हूँ अपने गुनाह. किसी न्यूरेमबर्ग कोर्ट में लगवाओ मेरा मुकदमा भी या कि सड़क पर ही पास करो फैसला मेरे अपराधी होने का.

प्रेम उसकी दुनिया का अक्षम्य और सबसे जघन्य अपराध है.
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लाइन से खड़े हैं लोग दीवार की ओर मुंह कर कर. मेरे साथ और भी कई लोगों को फायरिंग स्क्वाड से उड़ाने का फैसला सुनाया गया. हवा में एक अजीब, निविड़ स्तब्धता ठहरी हुयी है. कोई सांस नहीं लेता यहाँ. मुझे अपने पहले जन्मदिन पर लाया केक और फूँक मार कर मोमबत्तियां बुझाना याद आ रहा है. हर बार बन्दूक चलती है और बारूद का धुआं उड़ता है. आखिरी ख्वाहिश पूछने का रूमान बहुत पहले की दुनिया से छूट चूका है. मुझे कोई पूछे भी तो शायद मैं कोई इस तरह की ख्वाहिश बता नहीं पाऊँगी. मुझे जाने क्यूँ इक स्कूल के बच्चे याद आ रहे हैं. मैं वहां गयी नहीं हूँ शायद पर उस इकलौते स्कूल के बारे में पढ़ा है. नाजियों ने वहां मौजूद हर बच्चे को गोली मार दी थी. न उनका दोष पूछा गया था न उनकी आखिरी इच्छा. क्या ही होगी उन बच्चों की आखिरी इच्छा. कोई ख़ास फ्लेवर का आइसक्रीम…या चोकलेट…या शायद किसी दोस्त से किये गए झगड़े का समापन…मगर मेरी किताबें कहती हैं बच्चों को कमतर नहीं आंकना चाहिए. हो सकता है उनमें से किसी की ख्वाहिश देश का प्रधानमंत्री बनने की हो.

कायदे से मुझे अपने इन अंतिम क्षणों में जीवन एक फिल्म रील की तरह चलता हुआ दिखाई पड़ना चाहिए. करीबी लोग स्लो मोशन में. मगर मेरे सामने खून में डूबे हुए लकड़ी के तख्ते हैं. बेढब और आड़े टेढ़े सिरों वाले. उन्हें आरी से काटा नहीं गया है, तोड़ कर छोटा किया गया है. इनके नुकीले सिरे भुतहा और डरावने हैं. अचानक मेरा ध्यान इन तख्तों के जरा ऊपर गया है. वहाँ एक सुर्ख पीला फूल अभी अभी खिला है. गोली की आवाज़ आती है. मेरे पहले तीन लोग और हैं जो मेरी बायीं ओर खड़े हैं. हवा बारूद की गंध से भरी हुयी है मगर हर फायर के साथ जरा और सान्द्र हो जाती है कि सांस लेने में तकलीफ होती है. अगली फायर के साथ मेरे ठीक दायीं ओर का कैदी धराशायी होता है और खून से वह पीला फूल पूरी तरह नहा कर सुर्ख लाल हो जाता है. कैदियों को किसी क्रम में सिलसिलेवार गोली नहीं मारी जा रही. मुझे आश्चर्य और सुख होता है. जिंदगी अपने आखिरी लम्हे तक अप्रत्याशित रही. अगली गोली निशाना चूक जाती है. कोई नौसिखुआ सैनिक होगा. शायद उसके हाथ कांप गए हों. मैं मुस्कुरा कर पीछे देखना चाहती हूँ. उसका उत्साह बढ़ाना चाहती हूँ कि तुम अगले शॉट में कर लोगे ऐसा. देखो, मैं कहीं भागी नहीं जा रही. मिसफायर की गोली जूड़े को बेधती निकली थी और इस सब के दरमयान बालों की लट जैसे लड़ कर आँखों के सामने झूल गयी. उस क्षणिक अँधेरे में तुम्हारी आँखें कौंध गयीं. किसी ने तुम्हें ठीक इसी लम्हे बताया है कि मुझे आज गोली मार दी जायेगी. तुम अचानक खड़े हो गए हो. तुम्हारी आँखों में कितने जन्म के आँसू हैं. तुम जानते हो, सीने में चुभते दर्द का मतलब. अब. मेरे ठीक सामने हो तुम. अश्कबार आँखें.
आह! काश मैं ज़रा सा और जी पाती!