Musings, Shorts

मेरे पागल हो जाने का सब सामान इसी दुनिया में है।

तुमसे मुहब्बत… खुदा ख़ैर करे… जानां, मुझे तो तुम्हारे बारे में लिखने में भी डर लगता है। कुछ अजीब जादू है हमारे बीच कि जब भी कुछ लिखती हूँ तुम्हारे बारे में, हमेशा सच हो जाता है। कोई ऑल्टर्नट दुनिया जो उलझ गयी है तुम्हारे नाम पर आ कर…डर लगता है, लिखते लिखते लिख दिया कि तुम मेरे हो गए हो तो… या कि लो, आज की रात तुम्हारे नाम… या कि किसी शहर अचानक मिल गए हैं हम…क्या करोगे फिर?

यूँ ही ख़्वाहिश हुयी दिल में कि हर बार मुझे ही इश्क़ ज़्यादा क्यूँ हो… कभी तो हो कि चाँदभीगे फ़र्श पर तड़पो तुम और ख़्वाब में बहती नदी के पानी के प्यास से जाग में जान जाती रहे…

के बदन कहानियों का बना है और रूह कविताओं से … मैं तुम्हारे शब्दों की बनी हूँ जानां… तुम्हारी उँगलियों की छुअन ने मुझमें जीवन भरा है…किसी रोज़ जान तुम्हारे हाथों ही जाएगी… इतना तो ऐतबार है मुझे…

तुम इश्क़ की दरकार न करो…बाँधो अपना जिरहबख़्तर… भूल जाओ मेरे शहर का रास्ता…भूल जाओ मेरे दिल का रास्ता। लिखती हूँ और ख़ुद को कोसने भेजती हूँ। कि ऐसा क्यूँ। तुम्हारी ख़ातिर…इश्क़ में थोड़ा तुम भी तड़प लो तो क्या हर्ज है। मगर तुम्हारी तड़प मुझे ही चुभती है…कि मेरे हिस्से की नींद तुम्हारे शहर चली गयी है और उन ख़्वाबों में मुझे भी तो जाना था… तुम जाने किस मोड़ पर इंतज़ार कर रहे होगे…

मेरी हथेलियों में प्यास भर आती है। ऐसा इनके साथ कभी नहीं होता… कभी भी नहीं, सिवाए तब कि जब बात तुम्हारी हो। मेरे हाथों को वरना सिर्फ़ काग़ज़ क़लम की दरकार होती है… छुअन की नहीं… किसी भी और बदन की नहीं। तो फिर कौन सा दरिया बहता है तुम्हारे बदन में जानां कि जिसे ओक में भर पीने को रतजगे लिखाते हैं मेरे शहर में। मैं डरती हूँ इस ख़याल से कि तुम्हें छूने को जी चाहता है… तुम्हें छू लेना तुम्हें काग़ज़ के पन्नों से ज़िंदा कर कमरे में उतार लाना है…तुम ख़यालों में हो फिर भी तुम्हारे इश्क़ में साँस रुक जाती है…तुम मूर्त रूप में आ जाओगे तो जाने क्या ही हो… मैं सोच नहीं पाती… मैं सोचने से डरती हूँ। तुम समझ रहे हो मेरा डर, जानां?

तुम्हें चूमना पहाड़ी नदी हुए जाना है कि जिसका ठहराव तुम्हारी बाँहों के बाँध में है…मगर फिर लगता है, तुम्हें तोड़ न डालूँ अपने आवेग में… बहा न लूँ… मिटा न दूँ… कि जाने तुम क्या चाहते हो… कि जाने मैं क्या लिखती हूँ… 

कि देर रात अमलतास के पीछे झाँकता है चाँद… मैं सपने में में तलाश रही होती हूँ तुम्हारी ख़ुशबू…हम यूँ ही नहीं जीते इश्क़ में बौराए हुए।

के जानां, मेरे पागल हो जाने का सब सामान इसी दुनिया में है। 

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मेरे पास फूल और तितलियों के सिवा कुछ भी नहीं है।

ज़िंदगी के किसी मोड़ पर हम खड़े होते है और देखते हैं कि हमारे पास शायद वो सब कुछ है जो हमने किसी उम्र में चाहा होगा। फिर लगता है कि वो ख़ुशी कहाँ गयी जिसका कि हमने ख़ुद से वादा किया था। उदासी कैसे फ़ितरत का हिस्सा बनती चली गयी और भूल गए कि बेवजह ख़ुश होना कोई इतनी अजीब बात नहीं थी। 

कब होता है कि हम अपने सबसे क़रीबी लोगों की ख़ुशी देखते देखते भूल जाते हैं कि हमें ख़ुद का ख़याल ख़ुद से रखना पड़ता है। रखना चाहिए। कि हमारी ख़ुशी का ख़याल रखे कोई… ऐसा नहीं होता है। हमने इतने दिनों में आदत बना ली है कि किसी के ऊपर अपनी ख़ुशी के लिए निर्भर नहीं रहेंगे। 

कि अब भी आइने के सामने खड़े हो कर ख़ुद से पूछो कि तुम्हें किस चीज़ में ख़ुशी मिलती है तो जवाब अब भी सिर्फ़ एक होगा… लिखने में। जैसे बाक़ी लोग छुट्टियाँ मनाने जाते हैं… हम उस तरह लिखते हैं। इस दुनिया के नियमों से अलग… इस दुनिया के दुखों से दूर। कुछ अपनी पसंद के लोगों के पास… कुछ अपने बनाए शहरों में। 

और जानां… इन दिनों ऐसा लगता है कि तुम मेरे शहर का रास्ता भूल चुके हो। इतने हज़ार सालों में अगर इक मुहब्बत है जिसे मैं अब भी अपने क़िस्सों के शहर में अधूरा देखती हूँ तो वो हमारी ही है…

मुझे कभी कभी लगता है कि मैं ही भूल गयी हूँ अपने क़िस्सों के शहर का रास्ता… और चूँकि तुम भी लिखते हो, सोचती हूँ पूछ लूँ… कुछ दिन तुम्हारे क़िस्सों के शहर में पनाह मिलेगी?

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इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है 

दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात 

यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ 

ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात 

  • फ़ैज़ 

इक़बाल बानो की आवाज़ में इसे पहली बार कब सुना था याद नहीं… लेकिन जानां… अभी यूँ ही ‘इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है … दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात’ … पंखा चलता है तो हल्की ठंड लगती है… पैरों पर हल्की सी चादर रख के बैठी हूँ। कपास की गंध आती है कलाइयों से। जाने कब तुम्हारी वो ब्लैक चेक की शर्ट देखी थी ख़्वाब में। उँगलियों पर थोड़ी थोड़ी कपास की महसूसियत है। तुम्हें देखने को तड़प सी गयी हूँ। जब भी सोचती हूँ कि मर जाऊँगी तुम्हारे इश्क़ में…आवाज़ यही आती है दिल से कि तुम्हें तो मर जाना ही चाहिए। 

रात को नींद आधी होती है आँख में और चाँद पूरा होता है आसमान में…सोचती हूँ कि जाने कभी कुछ सोचते होगे तुम भी। मेरे शहर के बारे में। मेरे दिल के मौसम के बारे में? कभी फ़ैज़ पढ़ते हुए सोचा होगा मुझे… जाने कब… किसी ख़ाली लम्हे में सही। मैं चाहती हूँ इतना व्यस्त हो जाना… घर के सारे परदे धो दूँ… किचन रीअरेंज कर दूँ… किताबें रंग के हिसाब से लगा दूँ बुक रैक में… घर को चमका दूँ एकदम ही… इस साढ़े चार हज़ार स्क्वेर फ़ीट के घर को रगड़ के साफ कर दूँ… कि हाथ व्यस्त रहेंगे तो क्या मन भी व्यस्त रहेगा? कि मुझे लिखने के सिवा कुछ आता भी तो नहीं… और मेरे लिखने में इतने साल से सबसे ख़ूबसूरत ज़िक्र तुम्हारा है। मैं तुम्हारे ख़याल की ख़ुशबू से भी इश्क़ करती हूँ। 

इतनी गहराई से समंदर चाहने पर एक झील तो मिल ही सकती है किसी शहर में… किसी शाम… जाने तुम कब मिलोगे। ज़िंदगी में सब कुछ स्लो मोशन है। तुम्हें बिसराना भी। इक रोज़ तुम्हें कम याद करूँगी। किसी ग़ज़ल की नज़ाकत से नहीं याद आएगी तुम्हारे माथे पर की झूलती हुयी लट। कि मालूम, जानां, कैमरा उठाया ही नहीं है दिल्ली से लौट कर इस बार… कि कुछ शूट करने का मन नहीं करता… 

मैं किसी कहानी में मर जाना चाहती हूँ। 

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इंतज़ार सा तवील और मुहब्बत सा मुकम्मल…

कई गुनाहों की सज़ा नहीं होती, लेकिन होनी चाहिए। मेरा बस चले तो जिन्होंने तुम्हारी ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें उतारी हैं, उन कम्बख़तों को गोली मार दूँ। कि ये क्या ज़ुल्म है कि हम सोचें कि तुम्हारी आँखों का रंग कैसा है, हलकान होएँ, सो न पाएँ रात भर? जाने कितना वक़्त बीतेगा कि फिर देख सकेंगे तुम्हें जनवरी के किसी दिन, शायद हल्की धूप और मुहब्बत वाले शहर में। कहाँ हमारी मजाल कि चूम सकें तुम्हारी आँखें…कि सोच भी सकें ऐसा कुछ… कि इतने सालों में इस बार पहली बार तुम्हारे बाल छुए थे, वो भी बहाने से…गुलमोहर के पत्ते बेमौसम झर रहे थे और तुम्हारे बालों में उलझ गए थे…मैंने कितनी हिम्मत जुटायी होगी और कहा होगा तुमसे…ज़रा झुकना…तुम्हारे बालों में पत्ते उलझ गए हैं। कि ऐसा तो कर नहीं सकती कि उचक कर उँगलियाँ फिरो तुम्हारे बालों को यूँ ही बिगाड़ दूँ और हँस पड़ूँ…मेरी इतनी मजाल कहाँ। मैं सोचती हूँ तो मेरी उँगलियाँ खिलखिला उठती हैं, उन्हें गुदगुदी होती है उस एक लम्हे को याद कर के…इतने दिन बाद भी। कितने ख़ूबसूरत हैं तुम्हारे बाल। दिलचोर एकदम। 

मैं कभी कभी तुम्हारे शहर का आसमान होना चाहती हूँ।

मुझे रंग कन्फ़्यूज़ करते हैं। कितनी बार कोशिश की है कि कलर में शूट करूँ लेकिन बीच में फिर मोनोक्रोम पर शिफ़्ट कर ही जाती हूँ। अमलतास को ब्लैक एंड वाइट में शूट करना एक्स्ट्रीम बेवक़ूफ़ी है। क्या ही करें हम। प्यार न करें अमलतास से…शूट न करें? फिर? पेंट करें अमलतास…उँगलियों को पीले रंग में डुबो कर कुछ धब्बे सफ़ेद कैनवास पर। जैसे तुम्हारी आँखें याद आती हैं। धूप में वसंत की हल्की गर्माहट लिए हुए। 

सुबह आँख खुलती है तो तुम याद आते हो और रात को आँखों में थकान और तुम, दोनों लड़ रहे होते हो, ‘साड्डा हक़ ऐत्थे रख’ चीख़ते हुए। 

जानां। मैं कभी कभी तुम्हारी कविताएँ पढ़ती हूँ…मेरी आवाज़ में वो थोड़ी कमसिन लगती हैं। जैसे मैंने तुम्हें सोलह की उम्र में चाहा हो। 

कभी इक लम्बा ख़त लिखना…मेरे इंतज़ार सा तवील और मेरी मुहब्बत सा मुकम्मल…

लव यू।

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इश्क़। नीम अंधेरे में थकी आँखों से कहती हूँ। खुलो मुझ पर। महबूब। लिखो कोई ख़त कि जिसके जवाब में एक पूरी किताब लिख देने को जी चाहे। कि हमेशा जिस स्याह को तलाशती हूँ वो तुम्हारी आँखों में ही मिलता है। तुम्हारे हिज्र में। मैं तलाशती हूँ तुम्हारे इर्द गिर्द की वो ख़ुशबू। इस शहर से कितना ही दूर है तुम्हारा ख़्वाब भी…मैं सच की दुनिया को भूलना चाहती हूँ…समंदर में फ़्लोट करना चाहती हूँ। किनारे की बालू पर भीगते हुए समंदर का शोर सुनना चाहती हूँ…बंद आँखों में दिखे कुछ भी ना लेकिन उँगलियों में तुम्हारी उँगलियाँ उलझी रहें… मैं तुम्हारे स्पर्श को पहचान लूँ बिलकुल अच्छी तरह…कि कभी याद आए बेतरह तो याद से तुम्हारे स्पर्श को ज़िंदा कर सकूँ अपनी हथेलियों में। 

काग़ज़ पर लिखते लिखते मन करता है तुम्हें ख़त लिखना शुरू कर दूँ… लेकिन वो पीले काग़ज़ मिल नहीं रहे जिन पर तुम्हें लिखने में सुख हो। नए काग़ज़ ख़रीदूँगी सिर्फ़ तुम्हें ख़त लिखने के लिए। 

तुम लिखते हो तो मेरी दुनिया में भी नए रंग खिलते हैं। पता है जानां, इस शहर से दूर एक बहुत पुराना शिव मंदिर है… यहाँ दक्षिण के मंदिरों में बीच में जल कुंड हुआ करते हैं… वहाँ एक बड़ा सा चौकोर कुंड है, ख़ूब सी सीढ़ियों से घिरा हुआ और ऊपर की ओर चहारदीवारी है और खम्बे हैं… ढलती शाम एक बार वहाँ गयी थी। थोड़ी देर खम्बे से पीठ टिका कर बैठी। धूप सुंदर और नरम थी। सब कुछ शांत था मंदिर के भीतर। कहीं से कोई आवाज़ नहीं। उन पत्थरों पर बैठे बैठे लगता है मैं भी कई सौ साल पुरानी हूँ… तुमसे मेरा प्रेम भी… वहाँ मन शांत होने लगता है… इच्छाएँ ईश्वर के सामने सर झुका कर मंदिर से बाहर चली जाती हैं…पूरी होने की ज़िद नहीं बाँधती। तुम्हें पढ़ना वहाँ जा कर उस शांति को महसूसने जैसा है। एक लम्बी ड्राइव। थोड़ी सी शाम। धूप। पुराने पत्थर, उससे भी पुराने ईश्वर… जाने कितना ही पुराना प्रेम और शायद उससे भी पुराने तुम्हारे शब्द… कि जैसे कुछ हमेशा रहेगा तो तुम्हारी लेखनी। हमारे तुम्हारे बाद भी। जब भी कोई प्रेम में निशब्द महसूस करेगा तो तुम्हारे शब्द उसका हाथ थाम लेंगे… जब कोई तन्हाई में हो तो तुम्हें पढ़ना उसे थोड़ा कम तन्हा महसूस कराएगा। 

तुम लिखो कि मेरी दुनिया बनती रहे…नए पुराने शहर खुलते रहें और ख़्वाहिशें मिट मिट कर ख़ुद को बनाती रहें। हमेशा। हमेशा। 

लव यू।

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जाने मुझे वो चाहिए, उसका शहर या कि उसके शहर का मौसम।

इंसान को किसी भी चीज़ से शिकायत हो सकती है। किसी भी चीज़ से। कि जैसे मुझे बैंगलोर के अच्छे मौसम से शिकायत है।

बैंगलोर में इन दिनों मौसम इतना सुंदर है कि उत्तर भारत के लोगों को अक्सर रश्क़ होता है। कि ज़रा अपने शहर का मौसम भेज दो। सुबह को अच्छी प्यारी हवा चलती है। दिन को थोड़े थोड़े बादल रहते हैं। सफ़ेद फूल खिले हैं बालकनी में। दोपहर गर्म होती है, लेकिन पंखा चलाना काफ़ी होता है। कूलर की ज़रूरत नहीं पड़ती। रातें ठंडी हो जाती हैं, बारह बजे के आसपास सोने जाएँ तो पंखा चलाने के बाद पतला कम्बल ओढ़ना ज़रूरी होता है। 

लेकिन मुझे गर्म मौसम बेहद पसंद है और मुझे उस मौसम की याद आती है। मेरा बचपन देवघर में और फिर कॉलेज पटना में था, आगे की पढ़ाई दिल्ली और पहली नौकरी भी वहीं। मुझे उस मौसम की आदत थी। दस साल हो गए बैंगलोर में, मैं अभी भी इस मौसम सहज नहीं होती हूँ। लगता है कुछ है जो छूट रहा है। 

दिल्ली में उन दिनों कपड़े के मामले में बहुत एक्स्पेरिमेंट नहीं किए थे और अक्सर जींस और टी शर्ट ही पहना करती थी। उन दिनों गर्मी के कारण इतना पसीना आता था कि दो तीन दिन के अंदर जींस नमक के कारण धारदार हो जाती थी और घुटने के पीछे का नर्म हिस्सा छिल सा जाता था। तो हफ़्ते में लगभग तीन जींस बदलनी पड़ती थी, कि कपड़े धोने का वक़्त सिर्फ़ इतवार को मिलता था। मुझे याद है कि ऑटो में बैठते थे तो पूरी पीठ तर ब तर और जींस घुटनों के पीछे वाली जगह अक्सर गीली हो जाती थी। चेहरे पर न बिंदी ना काजल टिकता था ना कोई तरह की क्रीम लगाती थी। बहुत गरमी लगी तो जा के चेहरा धो लिया। दिन भर दहकता ही रहता था चेहरा, दोस्त कहते थे, तुम लाल टमाटर लगती हो। 

उन दिनों बायीं कलाई पर सफ़ेद रूमाल बांधा करती थी कि कौन हमेशा पॉकेट से रूमाल निकाल के पसीना पोंछे और फिर वापस रखे। दायीं कलाई पर घड़ी बाँधने की आदत थी। माथे का पसीना कलाई पर बंधे रूमाल से पोंछना आसान था। लिखते हुए उँगलियों में पसीना बहुत आता था, तो वो भी बाएँ हाथ में बंधे रूमाल में पोंछ सकती थी। कभी कभी ज़्यादा गरमी लगी तो रूमाल गीला कर के गले पर रख लेने की आदत थी… या उससे ही चेहरा पोंछने की भी। जैसे चश्मा कभी नहीं खोता, उसी तरह रूमाल भी कभी नहीं खोता था कि उसकी हमेशा ज़रूरत पड़ती थी। 

दस साल में रूमाल रखने की आदत छूट गयी। अब रोना आए तो आँसू पोंछने में दिक्कत और खाने के बाद हाथ धोए तो भी हाथ पोंछने की दिक्कत। याद नहीं पिछली बार क्या हुआ था, पर किसी लड़के ने अपना रूमाल निकाल कर दिया था तो अचानक से उसका इम्प्रेशन बड़ा अच्छा बन गया था। कि वाह, तुम रूमाल रखते हो। अब इतने साल में याद नहीं कि लड़का था कौन और रूमाल की ज़रूरत क्यूँ पड़ी। 

जिस उम्र में पहली बार रोमैन्स के बारे में सोचा होगा, वो उम्र ठीक याद नहीं, पर मौसम साल के अधिकतर समय गर्म ही रहता था, तो पहली कल्पना भी वैसी ही कोई थी। कि स्कूल में पानी पीने का चापाकल था और ज़ाहिर तौर से, एक व्यक्ति को हैंडिल चलाना पड़ता था ताकि दूसरा पानी पी सके। कोई दिखे तो वहीं दिखे…बदमाश ने चुल्लु में पानी भर कर फेंका था मेरी ओर…कि वो नॉर्मल बदमाशी थी…पानी पीने के बाद चेहरे पर पानी मारना भी एकदम स्वाभाविक था…लेकिन उस पानी मारते हुए को देखती हुयी लड़की, पागल ही थी… कि लड़के भी ख़ूबसूरत होते हैं, उस भयानक गरमी में दहकते चेहरे पर पानी के छींटे मारते हुए लड़के को देख कर पता चला था। गीले बालों में उँगलियाँ फिरो कर पानी झटकाता हुआ लड़का उस लम्हे में फ़्रीज़ हो गया था। कलाई से रूमाल एक बार में खोला और बढ़ाया उसकी ओर…’रूमाल’… उसने रूमाल लिया…चेहरा पोंछा…मुस्कुराते हुए मुझे देखा और रूमाल फ़ोल्ड कर के अपने पॉकेट में रख लिया। 

उस रोज़ ज़िंदगी में पहला रूमाल ही नहीं खोया था, दिल भी वहीं फ़ोल्ड हो कर चला गया था उसके साथ रूमाल में। हमारे बीच इतनी ही मुहब्बत रही। फिर उन दिनों कहते भी तो थे, रूमाल देने से दोस्ती टूट जाती है। 

गर्मी में ये ख़्वाहिश बाक़ी रही, कि कभी मिलूँ, किसी महबूब या कि म्यूज़ से ही। कूलर का ठंडा पानी चेहरे पर मारते हुए आए वो क़रीब, कि तुम्हें न यही पागल मौसम मिला है शहर घूमने को…मैं मुस्कुराते हुए बढ़ाऊँ सुर्ख़ साड़ी का आँचल…कि जनाब चेहरा पोंछिए…वो कहे कि ज़रूरत नहीं है…हमें इस मौसम की आदत है…और हम कहें कि हमारा ईमान डोल रहा है, नालायक़, चुपचाप इंसानों जैसे दिखो… इस मौसम से ज़्यादा हॉट दिखने की ज़रूरत नहीं है। 

जाने मुझे वो चाहिए, उसका शहर या कि उसके शहर का मौसम। 

इस सुहाने मौसम में लगता है कुछ छूट रहा है। मैं चाहती हूँ कि गरमी में आँचल से पोंछ सकूँ अपना माथा। हवा कर सकूँ उसे ज़रा सा। पंखा झलने का मौसम। आम का मौसम। नानीघर जाने का मौसम। गर्मी छुट्टियाँ। कि मौसम सिर्फ़ मौसम थोड़े है…एक पूरी पूरी उम्र का रोज़नामचा है। इस रोजनामचे के हाशिए पर मैं लिखना चाहती हूँ…ये हमारा मौसम है। इस मौसम मिलो हमसे…जानां!

Poetry

जादूगर, जो खुदा है, रकीब़ भी और महबूब भी

वे तुम्हारे आने के दिन नहीं थे. मौसम उदास, फीका, बेरंग था. शाम को आसमान में बमुश्किल दो तीन रंग होते थे. हवा में वीतराग घुला था. चाय में चीनी कम होती थी. जिन्दगी में मिठास भी.
फिर एक शाम अचानक मौसम कातिल हो उठा. मीठी ठंढ और हवा में घुलती अफीम. सिहरन में जरा सा साड़ी का आँचल लहरा रहा था. कांधे पर बाल खोल दिये मैंने. सिगरेट निकाल कर लाइटर जलाया. उसकी लौ में तुम्हारी आँखें नजर आयीं. होठों पर जलते धुयें ने कहा कि तुमने भी अपनी सिगरेट इसी समय जलायी है.
ये वैसी चीज थी जिसे किसी तर्क से समझाया नहीं जा सकता था. जिस दूसरी दुनिया के हम दोनों बाशिंदे हैं वहाँ से आया था कासिद. कान में फुसफुसा कर कह रहा था, जानेमन, तुम्हारे सरकार आने वाले हैं.
‘सरकार’. बस, दिल के खुश रखने को हुज़ूर, वरना तो हमारे दिल पर आपकी तानाशाही चलती है.
खुदा की मेहर है सरकार, कि जो कासिद भेज देता है आपके आने की खबर ले कर. वरना तो क्या खुदा ना खास्ता किसी रोज़ अचानक आपको अपने शहर में देख लिया तो सदमे से मर ही जायेंगे हम.
जब से आपके शहर ने समंदर किनारे डेरा डाला है मेरे शब्दों में नमक घुला रहता है. प्यास भी लगती है तीखी. याद भी नहीं आखिरी बार विस्की कब पी थी मैंने. आजकल सरकार, मुझे नमक पानी से नशा चढ़ रहा है. बालों से रेत गिरती है. नींद में गूंजता है शंखनाद.
दूर जा रही हूँ. धरती के दूसरे छोर पर. वहाँ से याद भी करूंगी आपको तो मेरा जिद्दी और आलसी कासिद आप तक कोई खत ले कर नहीं जायेगा.
जाने कैसा है आपसे मिलना सरकार. हर अलविदा में आखिर अलविदा का स्वाद आता है. ये कैसा इंतज़ार है. कैसी टीस. गुरूर टूट गया है इस बार सारा का सारा. मिट्टी हुआ है पूरा वजूद. जरा सा कोई कुम्हार हाथ लगा दे. चाक पे धर दे कलेजा और आप के लिये इक प्याला बना दे. जला दे आग में. कि रूह को करार आये.
किसी अनजान भाषा का गीत
रूह की पोर पोर से फूटता
तुम्हारा प्रेम
नि:शब्द.
 
–//–
वो
तुम्हारी आवाज़ में डुबोती अपनी रूह 
और पूरे शहर की सड़कों को रंगती रहती 
तुम्हारे नाम से
–//–
 
तर्क से परे सिर्फ दो चीज़ें हैं. प्रेम और कला. 
जिस बिंदु पर ये मिलते हैं, वो वहाँ मिला था मुझे. 
मुझे मालूम नहीं कि. क्यों.
–//–
उसने जाना कि प्रेम की गवाही सिर्फ़ हृदय देता है। वो भी प्रेमी का हृदय नहीं। उसका स्वयं का हृदय।
वह इसी दुःख से भरी भरी रहती थी।
इस बार उसने नहीं पूछा प्रेम के बारे में। क्यूंकि उसके अंदर एक बारामासी नदी जन्म ले चुकी थी। इस नदी का नाम प्रेम था। इसका उद्गम उसकी आत्मा थी।
–//–
उसने कभी समंदर चखा नहीं था मगर जब भी उसकी भीगी, खारी आँखें चूमता उसके होठों पर बहुत सा नमक रह जाता और उसे लगता कि वो समंदर में डूब रहा है।
–//–
तुम जानती हो, उसके बालों से नदी की ख़ुशबू आती थी। एक नदी जो भरे भरे काले बादलों के बीच बहती हो।
–//–
तुम मेरी मुकम्मल प्यास हो.
–//–
नमक की फितरत है कच्चे रंग को पक्का कर देता है. रंगरेज़ ने रंगी है चूनर…गहरे लाल रंग में…उसकी हौद में अभी पक्का हो रहा है मेरी चूनर का रंग…
और यूं ही आँखों के नमक में पक्का हो रहा है मेरा कच्चा इश्क़ रंग…
फिर न पूछना आँसुओं का सबब.
–//–
प्यास की स्याही से लिखना
उदास मन के कोरे खत
और भेज देना 
उस एक जादूगर के पास
जिसके पास हुनर है उन्हें पढ़ने का
जो खुदा है, रकीब़ भी और महबूब भी
–//–
वो मर कर मेरे अन्दर
अपनी आखिर नींद में सोया है
मैं अपने इश्वर की समाधि हूँ.
***
—-
***
मैं तुम्हारे नाम रातें लिख देना चाहती हूँ 
ठंडी और सीले एकांत की रातें 
नमक पानी की चिपचिपाहट लिए 
बदन को छूने की जुगुप्सा से भरी रातें 
ये मेरे मर जाने के दिन हैं मेरे दोस्त 
मैं खोयी हूँ ‘चीड़ों पर चाँदनी में’ 
और तुम बने हुए हो साथ
–/
मैं तुम्हारे नाम ज़ख़्म लिख देना चाहती हूँ
मेरे मर जाने के बाद…
तुम इन वाहियात कविताओं पर 
अपना दावा कर देना
तुमसे कोई नहीं छीन सकेगा 
मेरी मृत्यु शैय्या पर पड़ी चादर 
तुम उसमें सिमटे हुए लिखना मुझे ख़त 
मेरी क़ब्र के पते पर
वहाँ कोई मनाहट नहीं होगी 
वहाँ सारे ख़तों पर रिसीव्ड की मुहर लगाने 
बैठा होगा एक रहमदिल शैतान 
—/
मुझे कुछ दिन की मुक्ति मिली है 
मुझे कुछ लम्हे को तुम मिले हो
उम्र भर का हासिल
बस इतना ही है.