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दुनिया के कई शहरों के सबसे उदास हिस्सों को मिला कर एक शहर रचा गया। कहीं की अनथक बारिश, कहीं का सर्द समंदर, कहीं का निविड़ एकांत, कहीं युद्ध की विभीषिका तो कहीं की आकस्मिक, प्राकृतिक आपदाएँ। एक तरह का शरणार्थी शिविर, ठीक ऐसा जहाँ कोई ज़्यादा दिन रहना न चाहे। अपने अपने घरों से उजड़ कर कई नर्म दिल लोग यहाँ आए। गुज़रते वक़्त के साथ इस शहर की तासीर उन्हें बदल देती। सर्द और क्रूर के बीच कांपते हुए अपना स्थान तलाशते अस्थिर ही रहे, बस नहीं पाए। 

उदासी की धुन्ध फैलती है मेरे इर्द गिर्द। बेतहाशा बारिश होती है इस बेहद ठंडे शहर में। पतझर के बाद के पेड़ों पर सिर्फ़ काली, जली हुयी सी शाखें बची हैं। तापमान शून्य से नीचे नहीं गिरता वरना बर्फ़ का रूमान इस उदासी को शायद विदा कर देता। शाम फीकी, बेरंग होती है। सूरज कई कई दिन तक बाहर नहीं निकलता। कुछ दिखता नहीं है धुन्ध के पार। 

ठंड जब बहुत ज़्यादा हो जाती है तो हेड्फ़ोन पर तुम्हारी कोई कविता प्ले कर देती हूँ। तुम्हारी आवाज़ एक फर वाला गर्म कनटोप है, जिससे गुज़र कर ठंड मुझे छू नहीं सकती। ज़रा सी तुम्हारी आवाज़ और मिल सकती तो उसके दस्ताने बुन लेती। मेरी हथेलियाँ गर्म होतीं तो तुम्हें चिट्ठी भी लिख पाती। 

तुम्हारी आवाज़ की तासीर बेहद गर्म है। ज़रा सा कॉफ़ी पर बुरक देती हूँ, दालचीनी पाउडर के साथ। कितना बचा बचा कर ख़र्च करना पड़ता है तुम्हारी आवाज़ को, कौन बताए तुम्हें। कभी जो देर तक बातें करते मुझसे कि मैं इस बात से डरती नहीं कि ख़त्म हो जाएगी मर्तबान में रखी तुम्हारी एक छटाँक आवाज़। 

यूँ इस शहर को छोड़ कर जा सकती हूँ मैं, मगर मुझे अक्सर लगता है कि तुम्हारे दिल का माहौल कुछ ऐसा ही होगा। शरणार्थी शिविर जैसा। वहाँ बसने को न सही, कुछ दिन ज़िंदा बचने की ख़ातिर ही इस उदासी की आदत हो जाए तो बेहतर। 

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तुम धूप में कुम्हलाना मत

धूप से कुम्हलाता पौधा देखा है? जो कहीं थोड़ी सी छाँव तलाशता दिखे? कैसे पता होता है पौधे को कि छाँव किधर होगी… उधर से आती हवा में थोड़ी रौशनी कम होगी, थोड़ी ठंड ज़्यादा? किसी लता के टेंड्रिल हवा में से माप लेंगे थोड़ी छाँव?

भरी दुनिया की तन्हाई और उदासी में में तुम्हें कैसे तलाशती हूँ? ज़रा तुम्हारी आवाज़ का क़तरा? सालों से उतने की ही दरकार है।

हम ख़ुद को समझाते हैं, कि हमें आदत हो गयी है। कि हम नहीं चाहेंगे ज़रा कोई हमारा हाल पूछ ले। कि नहीं माँगेंगे किसी के शहर का आसमान। लेकिन मेरे सपनों में उसके शहर का समंदर होता है। मैं नमक पानी के गंध की कमी महसूस करती हूँ। बहुत बहुत दिन हो गए समंदर देखे हुए।

आज बहुत दिन बाद एक नाम लिया। किसी से मिली जिसने तुम्हें वाक़ई देखा था कभी। ऐसा लगा कि तुम्हारा नाम कहीं अब भी ज़िंदा है मुझमें। हमें मिले अब तो बारह साल से ऊपर होने को आए। बहुत साल तक whatsapp में तुम्हारी फ़ोटो नहीं दिखती थी, अब दिखने लगी है। मैं कभी कभी सोचती हूँ कि तुमने शायद अपने फ़ोन में मेरा नम्बर इसलिए सेव करके रखा होगा कि ग़लती से उठा न लो। तुम मेरे शहर में हो, या कि तुम्हारे होने से शहर मेरा अपना लगने लगा है? मुझे ज़िंदगी पर ऐतबार है…कभी अचानक से सामने होगे तुम। शायद हम कुछ कह नहीं पाएँगे एक दूसरे से। मैंने बोल कर तक़रीबन बारह साल बाद तुम्हारा नाम लिया था…पहली बार महसूस किया। हम किस तरह किसी का नाम लेना भूल जाते हैं।

ईश्वर ने कितनी गहरी उदासी की स्याही से मेरा मन रचा है। धूप से नज़र फेर लेने वाला मिज़ाज। बारिश में छाता भूल जाने की उम्र बीत गयी अब। आज एक दोस्त अपने किसी दोस्त के बारे में बता रहा था जिसकी उम्र 38 साल थी, मुझे लगा उसका दोस्त कितना उम्रदराज़ है। फिर अपनी उम्र याद करके हँसी आयी। मैंने कहा उससे, अभी कुछ ही साल पहले 40s वाले लोग हमसे दस साल बड़े हुआ करते थे। हम अब उस उम्र में आ गए हैं जब दोस्तों के हार्ट अटैक जैसी बातें सुनें… उन्हें चीनी कम खाने की और नियमित एक्सर्सायज़ करने की सलाह दें। जो कहना चाहते हैं ठीक ठीक, वो ही कहाँ कह पाते हैं। कि तुम्हारे होने से मेरी ज़िंदगी में काफ़ी कुछ अपनी जगह पर रहता है। कि खोना मत। कि मैं प्यार करती हूँ तुमसे। 

अब वो उम्र आ गयी है कि कम उम्र में मर जाने वाले लोगों से जलन होने लगे। मेरे सबसे प्यारे किरदार मेरी ज़िंदगी के सबसे प्यारे लोगों की तरह रूठ कर चले गए हैं, बेवजह। अतीत तक जाने वाली कोई ट्रेन, बस भी तो नहीं होती। 

क़िस्से कहानियों के दिन बहुत ख़ूबसूरत थे। हर दुःख रंग बदल कर उभरता था किसी किरदार में। मैं भी तलाशती हूँ दुआएँ बुनने वाले उस उदास जुलाहे को। अपने आत्मा के धागे से कर दे मेरे दिल की तुरपाई भी। लिखना हमेशा दुःख के गहरे स्याह से होता था। लेकिन मेरे पास हमेशा कोरे पन्ने हुआ करते थे। धूप से उजले। इन दिनों इतना दुःख है कि अंधेरे में मॉर्फ़ कर जाता है। देर रात अंधेरे में भी ठीक ठीक लिखने की आदत अब भी बरक़रार है। लेकिन अब सुबह उठ कर भी कुछ पढ़ नहीं पाती। स्याह पन्ने पर स्याह लिखाई दिखती नहीं। 

नींद फिर से ग़ायब है। इन रातों को जागे रहने का अपराध बोध भी होता है। कि जैसे आदत बनती चली गयी है। बारह से एक से दो से तीन से चार से पाँच से छह बजने लगते हैं। मैं सो नहीं पाती। इन दिनों कार्पल टनल सिंड्रोम फिर से परेशान कर रहा है। सही तरीके से लिखना ज़रूरी है। पीठ सीधी रख के, ताकि नस न दबे। spondilytis के दर्द वाले बहुत भयानक दिन देखे हैं मैंने। सब उँगलियों की झनझनाहट से शुरू होता है। 

पिछले कई महीनों से बहुत ख़ूबसूरत काग़ज़ देखा था ऐमज़ान पर। लेकिन इंपोर्ट ड्यूटी के कारण महँगा था काफ़ी। सोच रहे थे अमरीका जाएँगे तो ख़रीद लेंगे। फिर ये भी लगता रहा, इतने ख़ूबसूरत काग़ज़ पर किसे ख़त लिखेंगे। आइवरी रंग में दो फ़िरोज़ी ड्रैगनफ़्लाई बनी हुई हैं। आज ख़रीद लिया। फिर चेरी ब्लॉसम के रंग की जापानी स्याही ख़रीदी, गुलाबी। जब काग़ज़ आएगा तो शायद कोई इजाज़त दे भी दे, कि लिख लो ख़त मुझे। तुम्हें इतना अधिकार तो दे ही सकते हैं। 

मेरी चिट्ठियों से प्यार हो जाता है किसी को भी…क्या ही कहूँ, मनहूस भी नहीं कह सकती उन्हें…बेइमानी होगी। 

आज फ़राज़ का शेर पढ़ा कहीं। लगा जान चली ही जाएगी अब।
“दिल को तेरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है 
और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता”

मुझे प्यार मुहब्बत यारी दोस्ती कुछ नहीं चाहिए। जब ऑर्डर वाला काग़ज़ आ जाए, मुझे ख़त लिखने की इजाज़त दे देना, बस। 
प्यार।

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प्रेम की भाषा के सारे शब्द प्रेम के पर्यायवाची ही होते हैं।

देर रात तक बारिश हुयी। अभी थोड़ी देर पहले बंद हुयी है। मैं घर की सीढ़ियों पर बैठी बारिश देखती रही। मरहम होती है बारिश। कुछ देर तक सब दुःख बिसरने लगता है। तेज़ बारिश में सामने की सड़क पर बहुत सा पानी बहने लगा। काग़ज़ की नाव तैराने का जी चाहा। नंगे पाँव पानी में छपछप करने का भी। आज फिर निर्मल वर्मा की एक चिथड़ा सुख याद आयी कि उसमें पानी के चहबच्चों का बहुत ज़िक्र है। 

आधी रात लगभग बाहर टहल रही थी। जमे हुए पानी में औंधे मुँह लैम्पपोस्ट्स आधे डूबे हुए दिखे … उनकी परछाईं वाली दुनिया में सब कुछ थोड़ी देर भर का था। मुहब्बत कोई भरम हो जैसे। 

आज किसी से बात करते हुए चाहा कि मुनव्वर राना का वो शेर कहूँ, ‘तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको … तमाम खेल मोहब्बत में इंतिज़ार का है’। लेकिन कहा नहीं। कि उनसे बात करते हुए अपने शब्द मिलते ही नहीं। जी चाहता है कि पूरे पूरे दिन बारिश होती रहे और मैं खिड़की पर हल्की फुहार में भीगती उनसे बात करती रहूँ। इन दिनों मुहब्बत बारिश हुयी जाती है। 

मुझे सिगरेट की कभी लत नहीं लगी। मैंने सिगरेट हमेशा शौक़िया पी। कभी मौसम, कभी साथी, कभी किसी कविता का ख़ुमार रहा…बस तभी। आज बारिश ने बेतरह सब कुछ एक साथ याद दिला दिया। वोही शहर, वो मौसम, वो जो कि ब्लैक में जिस बेतरह का क़ातिल दिखता है…सफ़ेद में उतना ही सलीक़ेदार… कि हम हर रंग में उसके हाथों मर जाना चाहते हैं। उसकी इतनी याद आयी कि देर तक उसे पढ़ा। फिर अपनी कई कई साल पुरानी चिट्ठियाँ पढ़ीं। मैं उसके होने में ज़रा सा होना चाहती हूँ। उसके शहर, उसकी सुबह, उसकी कॉफ़ी, उसकी क़लम में… ना कुछ तो उसके ऐबसेंस में ही। वो कब सोचता है मुझे? उसके जैसी मुहब्बत आसान होती, काश, मेरे लिए भी।

कैमरा स्टडी में रखा है और मैं नीचे टहल रही हूँ। अब तीन तल्ले चढ़ के कौन कैमरा लाए और रात बारह बजे सड़क पर जमे पानी में रेफ़्लेक्ट होते लैम्प पोस्ट को शूट करे… मैं जानती हूँ, मैं ख़ुद को ये कह कर बहलाती हूँ। सच सिर्फ़ इतना है कि इस साल उनकी तस्वीरें खींचने के बाद कोई सबजेक्ट पसंद ही नहीं आता। मैं कैमरा के व्यू फ़ाइंडर से देखती हूँ तो उन्हें देखना चाहती हूँ। बस। इक बार जो फ़ुर्सत से कोई शहर मुकम्मल हो…उन्हें जी भर के हर नज़र से देख लूँ, कैमरा के बहाने, कैमरा के थ्रू… मुहब्बत की इतनी सी तस्वीर है, ब्लैक एंड वाइट। 

लकड़ी के जलने की महक आयी और जाने कैसे टर्पंटायन की भी। हमारे यहाँ कहते हैं कि रात को अगर ऐसी ख़ुशबुएँ आएँ तो उनके पीछे नहीं जाना चाहिए। वे मायावी होती हैं। इस दुनिया की नहीं। आसपास के सभी घरों की बत्तियाँ बंद थीं। टर्पंटायन की गंध से मुझे दो चीज़ें याद आती हैं। दार्जीलिंग के जंगल में स्याह तने वाले पेड़। विस्की कि जिसमें जंगल की वही गंध घुली मिली थी। कई हज़ार पहले के सालों का कोई इश्क़ कि जिसके पहले सिप में लगा था कि रूह का एक हिस्सा स्याह है और मैं उससे कहानियाँ लिखूँगी। दूसरी चीज़ कैनवस और ओईल पेंटिंग। इतनी रात कौन अपने घर में क्या पेंट कर रहा होगा। इजल के सामने खड़ा रंगों के बारे में सोचता, वो किन ख़यालों में उलझा होगा। बदन के कैनवास पर कविता लिखी जाए या रंगी जाए? उसके काँधे से इंतज़ार की ख़ुशबू आती है…मुहब्बत ख़त्म हो जाए तो उसके काँधे से कैसी ख़ुशबू आएगी?

मैंने कहा। शुभ रात्रि। मुझे कहना था। मैं आपसे प्यार करती हूँ। आपके शब्दों से। आपकी ख़ामोशी से। आपकी तस्वीरों से। आपके शहर के मौसम से। उस हवा से जो आपको छू कर गुज़रती है। उस आसमान से जिसके सितारे आपकी ड्रिंक में रिफ़्लेक्ट होते हैं। लेकिन नहीं कह पायी ऐसी बेसिरपैर की बातें। मैंने कहा। शुभ रात्रि। 

प्रेम की भाषा के सारे शब्द प्रेम के पर्यायवाची ही होते हैं। 
फिर भी, je t’aime, ज़िंदगी। 

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इक उसी जादूगर के पास है, इंतज़ार का रंग। उसके पास हुनर है कि जिसे चाहे, उसे अपनी कूची से छू कर रंग दे इंतज़ार रंग में। 

शाम, शहर, मौसम… या कि लड़की का दिल ही। 

एकदम पक्का होता है इंतज़ार का रंग। बारिश से नहीं धुलता, आँसुओं से भी नहीं। गाँव के बड़े बूढ़े कहते हैं कि बहुत दूर देश में एक विस्मृति की नदी बहती है। उसके घाट पर लगातार सोलह चाँद रात जा कर डुबकियाँ लगाने से थोड़ा सा फीका पड़ता है इंतज़ार का रंग। लेकिन ये इस पर भी निर्भर करता है कि जादूगर की कूची का रंग कितना गहरा था उस वक़्त। अगर इंतज़ार का रंग गहरा है तो कभी कभी दिन, महीने, साल बीत जाते है। चाँद, नदी और आह से घुली मिली रातों के लेकिन इंतज़ार का रंग फीका नहीं पड़ता। 

एक दूसरी किमवदंति ये है कि दुनिया के आख़िर छोर पर भरम का समंदर है। वहाँ का रास्ता इतना मुश्किल है और बीच के शहरों में इतनी बरसातें कि जाते जाते लगभग सारे रंग धुल जाते हैं बदन से। प्रेम, उलाहना, विरह…सब, बस आत्मा के भीतरतम हिस्से में बचा रह जाता है इंतज़ार का रंग। भरम के समंदर का खारा पानी सबको बर्दाश्त नहीं होता। लोगों के पागल हो जाने के क़िस्से भी कई हैं। कुछ लोग उल्टियाँ करते करते मर जाते हैं। कुछ लोग समंदर में डूब कर जान दे देते हैं। लेकिन जो सख़्तज़ान पचा जाते हैं भरम के खारे पानी को, उनके इंतज़ार पर भरम के पानी का नमक चढ़ जाता है। वे फिर इंतज़ार भूल जाते हैं। लेकिन इसके साथ वे इश्क़ करना भी भूल जाते हैं। फिर किसी जादूगर का जादू उन पर नहीं चलता। किसी लड़की का जादू भी नहीं। 

तुमने कभी जादूगर की बनायी तस्वीरें देखी हैं? वे तिलिस्म होती हैं जिनमें जा के लौटना नहीं होता। कोई आधा खुला दरवाज़ा। पेड़ की टहनियों में उलझा चाँद। पाल वाली नाव। बारिश। उसके सारे रंग जादू के हैं। तुमसे मिले कभी तो कहना, तुम्हारी कलाई पर एक सतरंगी तितली बना दे… फिर तुम दुनिया में कहीं भी हो, जब चाहो लौट कर अपने महबूब तक आ सकोगे। हाँ लेकिन याद रखना, तितलियों की उम्र बहुत कम होती है। कभी कभी इश्क़ से भी कम। 

अधूरेपन से डर न लगे, तब ही मिलना उससे। कि उसके पास तुम्हारा आधा हिस्सा रह जाएगा, हमेशा के लिए। उसके रंग लोगों को घुला कर बनते हैं। आधे से तुम रहोगे, आधा सा ही इश्क़। लेकिन ख़ूबसूरत। चमकीले रंगों वाला। ऐब्सलूट प्योर। शुद्ध। ऐसा जिसमें अफ़सोस का ज़रा भी पानी न मिला हो। 

हाँ, मिलोगे इक उलाहना दे देना, उसे मेरी शामों को इतने गहरे रंग के इंतज़ार से रंगने की ज़रूरत नहीं थी। 

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कच्चे रंग धुला पानी

अक्सर लगता है कि देर रात जब नींद न आ रही हो…या आधी आ रही हो पर बची खुची ग़ायब हो तो दिमाग़ में जो फ़िल्म चलती है…वो सबसे सच्ची होती है। 

जैसे अभी कोई दो घंटे से नींद आ नहीं रही, जबकि बहुत देर हो चुकी है…तब से ही पानी के रंगों से पेंट करने का मन कर रहा है। छोटे छोटे नीले पहाड़, एक आधी सुनहरी ज़मीन पर पेड़ और ज़रा सी घास। क़ायदे से ऐसी तस्वीर में हमेशा एक नदी होती थी और चाँद…एक नाव होती थी पाल वाली और उसमें अकेली बैठी एक लड़की, जाने क्या सोचती हुयी। मैं छोटी थी तो ये वाली पेंटिंग ख़ूब बनाती थी। मेरे घर के पीछे एक पोखर था और पूर्णिमा में चाँद बड़ा सा दिखता था पोखर के पाने के ऊपर से। मैं बड़ी सी झील की कल्पना करती थी और उसमें किसी नाव में देर रात तक अकेले जा रही होती थी। उन दिनों ऐसे अकेले अकेले चले जाने में या रात को इस तरह झील पर नाव में बैठे होने में डर नहीं लगता था। मैं छोटी थी। डर मेरे लिए कोई किताब की चीज़ थी। टैंजिबल नहीं। काल्पनिक। 

मेरे लिए चीज़ों के सच होने की शर्त इतनी ही है कि मैं उसे छू सकूँ। पहली बार उससे मिली थी तो हाथ मिलाया था। उसने मेरा हाथ थामे रखा था जितनी देर, वो सच लगा था। फिर हम जब उस हॉल से बाहर निकल आए और उसका हाथ छूट गया…वो फिर से किसी कहानी का किरदार लगने लगा। 

मैं रंग घोल कर उनमें उँगलियाँ डुबो कर पेंट किया करती थी। पहले मुझे रंग बहुत पसंद थे। अब भी उँगलियों में इंक लगी ही रहती है अक्सर। इतनी देर रात अब पेंट करने जाऊँगी तो नहीं… लेकिन मन कर रहा है। कुछ ऐब्स्ट्रैक्ट बनाने का इस बार। कुछ रंग हों जो उसके शहर की याद दिलाएँ…थोड़ा सलेटी, सिगरेट के धुएँ की तरह, काले रंग से कुछ आउट्लायन बनाऊँ कि जैसे उसके जानने में कुछ हिस्से प्रतिबंधित कर देना चाहती हूँ…बहुत ईमानदार नहीं होना चाहिए। थोड़े से फ़रेब से बचा रहता है जीवन का उत्साह। उल्लास। 

आज दोस्त से बात कर रही थी। बहुत दिन बाद। मैंने समझदार की तरह कहा, ‘वैसे भी, सब कुछ कहाँ मिलता है किसी को ज़िंदगी में’। उसने कहा, ‘मिलना चाहिए…तुम्हें तो वाक़ई सब कुछ मिलना चाहिए’। मैंने नहीं पूछा कि क्यूँ। ऐसा क्या ख़ास है मुझमें, कि मुझे ही सब कुछ मिलना चाहिए। मैं बस ख़ुश थी कि कितने दिन बाद उससे बात कर रही हूँ। चैट पर ख़ूब ख़ूब बतियाए बहुत दिन बीत जाते हैं। हमने बाक़ी दोस्तों की बात की। मैंने कहा, कि मैं उसे बहुत मिस करती हूँ। बस, एक उस दोस्त के जाने के बाद मन एकदम ही दुःख गया। अब किसी नए व्यक्ति से दूरी बना के रखती हूँ, जो लोग अच्छे लगते हैं, उनसे तो ख़ास तौर पर। 

कम कम लोग रहे ज़िंदगी में, जिनसे बहुत बहुत प्यार किया। अब उनके जाने के बाद के वे ख़ाली हिस्से भी मेरे हैं…वहाँ थोड़े ना नए किरायेदार रख लूँगी। ये जो ज़िंदगी का दस्तूर है, आने जाने वाला…वो अब नहीं पसंद। कोई न आए, सो भी बेहतर। 

और मुहब्बत…उसने पूछा नहीं, लेकिन मैंने ख़ुद ही कह दिया। यार, ७०% पर उपन्यास अटका है, एक छोटी सी लव स्टोरी नहीं लिखा रही…कि जैसी कहानी एक समय में आधी नींद में लिख दिया करती थी…हम बदल गए हैं। वाक़ई। उसने उदास होकर पूछा, किसने तोड़ा तुम्हारा दिल, दोस्त… हम क्या ही तुम्हारा नाम लेते, सो कह दिया, ज़िंदगी। लेकिन देखो। झूठ नहीं कहा ना?

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मेरे पागल हो जाने का सब सामान इसी दुनिया में है।

तुमसे मुहब्बत… खुदा ख़ैर करे… जानां, मुझे तो तुम्हारे बारे में लिखने में भी डर लगता है। कुछ अजीब जादू है हमारे बीच कि जब भी कुछ लिखती हूँ तुम्हारे बारे में, हमेशा सच हो जाता है। कोई ऑल्टर्नट दुनिया जो उलझ गयी है तुम्हारे नाम पर आ कर…डर लगता है, लिखते लिखते लिख दिया कि तुम मेरे हो गए हो तो… या कि लो, आज की रात तुम्हारे नाम… या कि किसी शहर अचानक मिल गए हैं हम…क्या करोगे फिर?

यूँ ही ख़्वाहिश हुयी दिल में कि हर बार मुझे ही इश्क़ ज़्यादा क्यूँ हो… कभी तो हो कि चाँदभीगे फ़र्श पर तड़पो तुम और ख़्वाब में बहती नदी के पानी के प्यास से जाग में जान जाती रहे…

के बदन कहानियों का बना है और रूह कविताओं से … मैं तुम्हारे शब्दों की बनी हूँ जानां… तुम्हारी उँगलियों की छुअन ने मुझमें जीवन भरा है…किसी रोज़ जान तुम्हारे हाथों ही जाएगी… इतना तो ऐतबार है मुझे…

तुम इश्क़ की दरकार न करो…बाँधो अपना जिरहबख़्तर… भूल जाओ मेरे शहर का रास्ता…भूल जाओ मेरे दिल का रास्ता। लिखती हूँ और ख़ुद को कोसने भेजती हूँ। कि ऐसा क्यूँ। तुम्हारी ख़ातिर…इश्क़ में थोड़ा तुम भी तड़प लो तो क्या हर्ज है। मगर तुम्हारी तड़प मुझे ही चुभती है…कि मेरे हिस्से की नींद तुम्हारे शहर चली गयी है और उन ख़्वाबों में मुझे भी तो जाना था… तुम जाने किस मोड़ पर इंतज़ार कर रहे होगे…

मेरी हथेलियों में प्यास भर आती है। ऐसा इनके साथ कभी नहीं होता… कभी भी नहीं, सिवाए तब कि जब बात तुम्हारी हो। मेरे हाथों को वरना सिर्फ़ काग़ज़ क़लम की दरकार होती है… छुअन की नहीं… किसी भी और बदन की नहीं। तो फिर कौन सा दरिया बहता है तुम्हारे बदन में जानां कि जिसे ओक में भर पीने को रतजगे लिखाते हैं मेरे शहर में। मैं डरती हूँ इस ख़याल से कि तुम्हें छूने को जी चाहता है… तुम्हें छू लेना तुम्हें काग़ज़ के पन्नों से ज़िंदा कर कमरे में उतार लाना है…तुम ख़यालों में हो फिर भी तुम्हारे इश्क़ में साँस रुक जाती है…तुम मूर्त रूप में आ जाओगे तो जाने क्या ही हो… मैं सोच नहीं पाती… मैं सोचने से डरती हूँ। तुम समझ रहे हो मेरा डर, जानां?

तुम्हें चूमना पहाड़ी नदी हुए जाना है कि जिसका ठहराव तुम्हारी बाँहों के बाँध में है…मगर फिर लगता है, तुम्हें तोड़ न डालूँ अपने आवेग में… बहा न लूँ… मिटा न दूँ… कि जाने तुम क्या चाहते हो… कि जाने मैं क्या लिखती हूँ… 

कि देर रात अमलतास के पीछे झाँकता है चाँद… मैं सपने में में तलाश रही होती हूँ तुम्हारी ख़ुशबू…हम यूँ ही नहीं जीते इश्क़ में बौराए हुए।

के जानां, मेरे पागल हो जाने का सब सामान इसी दुनिया में है। 

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मेरे पास फूल और तितलियों के सिवा कुछ भी नहीं है।

ज़िंदगी के किसी मोड़ पर हम खड़े होते है और देखते हैं कि हमारे पास शायद वो सब कुछ है जो हमने किसी उम्र में चाहा होगा। फिर लगता है कि वो ख़ुशी कहाँ गयी जिसका कि हमने ख़ुद से वादा किया था। उदासी कैसे फ़ितरत का हिस्सा बनती चली गयी और भूल गए कि बेवजह ख़ुश होना कोई इतनी अजीब बात नहीं थी। 

कब होता है कि हम अपने सबसे क़रीबी लोगों की ख़ुशी देखते देखते भूल जाते हैं कि हमें ख़ुद का ख़याल ख़ुद से रखना पड़ता है। रखना चाहिए। कि हमारी ख़ुशी का ख़याल रखे कोई… ऐसा नहीं होता है। हमने इतने दिनों में आदत बना ली है कि किसी के ऊपर अपनी ख़ुशी के लिए निर्भर नहीं रहेंगे। 

कि अब भी आइने के सामने खड़े हो कर ख़ुद से पूछो कि तुम्हें किस चीज़ में ख़ुशी मिलती है तो जवाब अब भी सिर्फ़ एक होगा… लिखने में। जैसे बाक़ी लोग छुट्टियाँ मनाने जाते हैं… हम उस तरह लिखते हैं। इस दुनिया के नियमों से अलग… इस दुनिया के दुखों से दूर। कुछ अपनी पसंद के लोगों के पास… कुछ अपने बनाए शहरों में। 

और जानां… इन दिनों ऐसा लगता है कि तुम मेरे शहर का रास्ता भूल चुके हो। इतने हज़ार सालों में अगर इक मुहब्बत है जिसे मैं अब भी अपने क़िस्सों के शहर में अधूरा देखती हूँ तो वो हमारी ही है…

मुझे कभी कभी लगता है कि मैं ही भूल गयी हूँ अपने क़िस्सों के शहर का रास्ता… और चूँकि तुम भी लिखते हो, सोचती हूँ पूछ लूँ… कुछ दिन तुम्हारे क़िस्सों के शहर में पनाह मिलेगी?