Musings, Shorts

तुम्हें पता है जानां, तुम्हारे शहर पर तुम जो ताला लगा के रखे हो…हम जाने कितनी रात से सपने में जाते हैं और शहर को बाहर से देख कर आ जाते हैं। शहर की चहारदिवारी के आसपास भटकते हैं कितनी कितनी देर। खड़े खड़े इंतज़ार करते हैं तुम्हारा।

तुम्हें पता है जानां…सपने के इस इंतज़ार से भर दिन मेरे घुटने दर्द करते हैं। मैं कितनी कितनी देर भटकती रहती हूँ शहर के बाहर वाले रास्ते पर। कभी कभी तो यूँ भी हुआ है कि गयी हूँ तुम्हारे शहर और दूर हूँ बहुत तुमसे। मैं चलती हूँ आती हूँ मगर सड़क है की बढ़ती ही चली जाती है.. कई कई मील। मैं सपने में चलते चलते, सच की ज़िंदगी में थक जाती हूँ।

जानां। सपनों में खोलो दरवाज़ा। मुझे आने दो तुम्हारे शहर। मुझे घुमाओ ज़रा सा कोई ख़ुशगवार मौसम। तुम्हारी कमी बदन में दर्द होकर दुखती है। मिलो मुझसे सपने में। दिखाओ मुझे कोई ख़ाली पड़ी बेंच कि जिसपर बैठ कर तुम्हारे साथ पी सकूँ कॉफ़ी। दूर हो मेरा सर दर्द। मिले मेरे सफ़र को मंज़िल कोई।

मिलो सपने में। मिलो सपने के शहर में। कि इस दर्द में कितना चलूँ मैं, मेरी जान! तुम्हारे हिस्से का ढेर सारा प्यार लिए दिल जो धड़कता है…दुखने लगता है। सम्हालो अपने हिस्से का प्यार, मुझे लौटाओ मेरे हिस्से का प्यार। थोड़ा अदला बदली कर लेते हैं। थोड़ा मेरा मन शांत हो, थोड़ा तुम्हारा मन अशांत। थोड़ा सुख का एक क़तरा, मेरे शहर के आसमान में मुस्कुराए। थोड़ा मेरे दुःख का बादल तुम्हारे शहर को भिगो दे।

ज़रा से तुम मेरे हुए जाओ, थोड़ा सा तुम्हारा शहर किसी और के नाम लिख दो। थोड़ा सा याद रखो मुझे। थोड़ा सा भूल जाऊँ मैं कि कितना दर्द है।

जानां। सपनों के उस शहर के दरवाज़े पर इंतज़ार लिखा है। उसे मिटा कर मेरे आने के लिए ‘स्वागतम’ लिख दो। मैं आऊँ तुम्हारे शहर तो मिलो मुझसे। कहो कि ख़त्म हुआ सफ़र। कि मैं लौट सकूँ ज़िंदगी में, क़दमों में तेज़ी और दिल में धड़कता हुआ तुम्हारा नाम लेकर।

ढेर सारा प्यार।

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Musings

हर लड़का समंदर नहीं होता

‘तुमसे किसी को भी डर लगेगा’
‘डर। कुछ भी। डर क्यूँ लगेगा?’

‘मुश्किल सवाल है। धैर्य से सुनो। समझाने की कोशिश करता हूँ। क्यूँकि मेरे सिवा किसी और इंटेलिजेंट इंसान को तुम जानती नहीं जो तुमको ये बात समझा सके। सिम्पल बात है, लेकिन सामने से दिखती नहीं। देखो। तुम्हारे जैसी भयानक तरीक़े से इंडिपेंडेंट लड़की कि जो अपने मूड और मिज़ाज का हाल मौसम तक को अफ़ेक्ट नहीं करने देती। कि जो बारिश को मन का मौसम समझती है। कि जो जानती है कि सब कुछ उसकी भीतरी दुनिया से कंट्रोल होता है और उस हिसाब से जीती है। जो अपनी ख़ुशी और अपने ग़म के लिए ख़ुद से रेस्पॉन्सिबिलिटी लेती है…

तुम्हारे जैसी लड़की…जब ज़रा सा किसी लड़के के साथ वक़्त बिताती है। देखती है उसे मुस्कुरा कर। लम्हे भर को रिलैक्स होती है, अपना सर टिकाती है उसके कंधे पर और कहती है एक उसाँस भर के…मैं ख़ुश हूँ तुम्हारे साथ…तो लड़का डर जाता है…तुम्हारी ख़ुशी का कारण बनने से…ये इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि उसके कंधे सोच के ही दुखने लगते हैं। उसे लगता है कि आज ख़ुशी है तो कल ग़म भी होगा। वो तुम्हारे ख़ुशी ग़म किसी का कारण नहीं बनना चाहता। तुम लड़की नहीं, नदी हो। पहाड़ी नदी…फ़िलहाल तो तुम कहीं नहीं रुक सकती। बहुत ज़िंदगी, कई शहर देखोगी तो थमोगी थोड़ा। ठहरोगी।

एक नदी जैसी लड़की के ठहरने की अंतिम जगह समंदर ही होता है। और हर लड़का समंदर नहीं होता कि तुम्हें अपने बाँहों में समेट कर कह सके। ये तुम्हारा घर है। तुम यहाँ रह सकती हो। हमेशा के लिए।

तुम बहुत मज़बूत हो। तुम्हारे क़रीबी लोगों को तुम्हारे टूटने का डर लगता है कि तुम्हें सम्हालने के लिए तुमसे ज़्यादा मज़बूत होना पड़ेगा। ये जो अपनी ज़िंदगी इतने कटघरों में बाँट के जीती हो, हर सही ग़लत का क्षण क्षण हिसाब लगाते हुए, तुम्हारे काँधे का ये बोझ ज़रा सा कम करना बहुत मुश्किल है। अपने गुनाहों के स्याह में जब घुल कर तुम लिखती हो क़िस्सा कोई तो कौन तुम्हारे लिए सूर्य बन जलेगा। इतना आसान नहीं होता।

तुम्हारा प्रेम साँस लेने की जगह भी छोड़ता है? तुम्हें किनारे पर से बैठ कर देखा भी नहीं जा सकता, ऐसा घातक आकर्षण है तुम में। तुमसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है। तो जब तक चाँदनी रात में तुम्हारे होने की कलकल ध्वनि सुनी थी, तुम्हारे घाट पर बैठ कर लालटेन की रौशनी में किताब पढ़ने को जी चाहा था। लेकिन सुबह की धूप में तुम्हारा वेग देख कर मैं भी चौंक गया हूँ। तुम्हारे प्रेम में अवश होना पड़ेगा। और हर व्यक्ति तुम्हारी तरह कंट्रोल फ़्रीक नहीं होता, लेकिन सब तुम्हारी धार में बह भी नहीं सकते। इसलिए वे डरते हैं। तुम्हारे चपेट में आने से। तुम्हारे प्रेम को ज़रा भी महसूसने से। तुम्हारे क़रीब आने से। समझी अब?’

‘समझ के क्या ही होगा। थोड़े ना बदल जाऊँगी कोई शांत झील या जलकुंड में कि कोई भी नहा ले। ऐसे ही ठीक है। शहर शहर का क़िस्सा सुनना कोई बुरा तो नहीं है। और अंत में होगा ही कोई सागर। जहाँ जा के ठहर सकूँगी मैं। तो फिर उसके पहले जितना भी भटकाव हो। ठीक है। लेकिन ऐसा भी क्या डरना। डूब जाना हमेशा मर जाना थोड़े होता है। कंट्रोल करके डाइव भी तो मारते हैं लोग। डूबने के बात उतराना भी तो होता है। तुम भी चले जाओगे अब?’

‘लग तो रहा है। डर लगता है तुमसे। तुम इतनी ख़ुश रहती हो मेरे साथ। तुम्हारी आदत बनने से डर लगता है।’

‘अलविदा कह के जाना। अचानक से ग़ायब मत हो जाना’

‘अलविदा कह के जाना सम्भव नहीं है, ऐसे सिर्फ़ लौटना होता है। जाना तो अचानक ही पड़ेगा। तुम्हें यूँ ही, किसी कच्चे चाँद की रात को, कच्ची नींद के बीच छोड़ कर। तुम फ़ोन रखना और काश कि भूल जाना कि मैं था।’

‘सपना था। सपना था सब।’

***
लड़की अलार्म की तीखी आवाज़ से हड़बड़ा के उठती है। दौड़ते हुए फ़ोन तक जाती है और अलार्म बंद करती है। उसकी हथेलियों में समंदर का पानी है जिसमें चाँद घुला है। वो हथेलियाँ खोलती हैं तो कमरे भर में चाँद रंग का समंदर का पानी छिलकते जाता है।

लड़का नींद पूरी करके जागता है। उसे तीखी प्यास लगी हुयी है। जैसे रात भर समंदर में डूबता उतराता रहा हो।

Musings

Loving strangers

हम मर रहे होते हैं और किसी को पढ़ कर थोड़ा सा जीने लगते हैं। इतना ही कर सकता है कोई कवि या लेखक हमारे लिए। हम अंधेरे में बैठे होते हैं और अनजान शब्द रौशनी के जुगनुओं की तरह टिमटिमाने लगते हैं। इनसे रात छोटी नहीं होती, बस अवसाद थोड़ा कम होता है।

हम कि जो अपने पागलखाने में किसी तरह बस अपने सोचने की क्षमता को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहे होते हैं, [preserving our sanity] वैसे में किसी कवि का लिखा हुआ हमारा हाथ थाम कर हमें सोच की एक दिशा देता है। हम मन में रामचरित मानस की ही कोई चौपायी याद करते हैं, उस राम को बसाना चाहते हैं अपने मन में, ‘हृदय राखि कोसलपुर राजा’। मंत्र हमारा हाथ शायद अंतिम क्षण तक नहीं छोड़ते। मैं बेहद उदासी, तन्हाई, अंधेरे और मृत्यु के समीप भी महामृत्युंजय का एक एक शब्द छू सकती हूँ।

सुबह का झुटपुटा अँधेरा है। मौसम गर्म होता जा रहा है। धूप अब जलाने लगी है। मैंने खिड़की पर रेशमी पर्दा खींच दिया है। परदे से छन कर अँधेरा कमरे में गिर रहा है। मेरे पौधे मुझसे नाराज़ हैं कि मैं इन दिनों जाने कहाँ रहती हूँ। वैसे भी ये कमरा जल्दी ही ग़ायब हो जाने वाला है। मेरी कहानियों की तरह।

कहानी लिखने की कई वजहें होती हैं जो हमें ठीक ठीक मालूम नहीं होतीं अक्सर। हम लिख रहे होते हैं कि हमें लिखना होता है। जैसे हम प्रेम में होते हैं तो कोई वजह नहीं होती। लेकिन प्रेम के रीत जाने की कोई वजह कभी कभी मिल जाती है। जैसे लिखने की वजह होती है, कभी कभी। हम लिखते हैं क्यूँकि इस दुनिया में रोने की कोई भी जगह नहीं मिलती।

कई कई सालों से आँसुओं का एक ग्लेशियर है। सीने के बीच जमा हुआ। उस लड़की को देर तक बाँहों में थामे रहे कोई। कुछ भी ना कहे। इंतज़ार करे। उस पहले गर्म आँसू का…उस पहली हिचकी का। वो नहीं जानती कि किरदारों का रोना कैसे लिखे कि उसने कितने कितने सालों से सब कुछ एक बेहद सर्द आह में जमा रखा है।

दोस्त चिढ़ा कर हँस रहा होता है मुझपर। तुम्हें चाहिए क्या। एक औरत का अभिमान होता है कि उसपर कितने पुरुष मर मिटे… तुम भी डाइअरी मेंटेंन करती होगी। मन में ख़ुश होती होगी, कि वाह ये भी मर मिटा हम पर। कि तुम अचरज कर रही हो कि एक यही तो था कि जो दोस्त था…और इसको भी प्यार हो गया हमसे। मुझे ठीक मालूम नहीं कि लेखिका कह रही थी कि औरत, लेकिन कहा मैंने उससे। मैं सोलह की लड़की नहीं रही जो प्यार हो जाने पर भौंचक हो जाती थी। अब मिडलाइफ पहुँच रही हूँ। अब किसी चीज़ पर चकित होना बहुत मुश्किल है। और प्यार। वो तो सबको ही हो जाता है हमसे, इसमें अब हम चौंकते नहीं। वो दिन अब नहीं रहे कि जीवन में सबसे अद्भुत चीज़ हुआ करती थी प्यार। अब समझती हूँ कि फ़ैज़ ने क्यूँ लिखा, ‘और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’। हम मेरे दिखने पर बात कर रहे थे। कि मैं कह रही थी, इन दिनों मैं बिलकुल भी अच्छी नहीं दिखती और वो फिर से हँस रहा था, कि तुम कब समझोगी, दिखने से कुछ नहीं होता। पर इस पहली बार मैं समझ रही थी। कि हाँ, इससे कभी फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम दिख कैसे रहे हैं। हमेशा बात ये होगी कि हम हैं क्या…कौन…कैसे। कि प्यार हमेशा हमारे भीतर के किसी इंसान से होता है। पर जीवन में कितने रंग का दुःख है, ये भी देखना बाक़ी था। फिर वो पूछता है हमसे, कि तुमको जाने क्या चाहिए, और वो क़सम से, इस शहर में होता तो हम जा कर पीट आते उसको। कि हमको बात चाहिए। समझ नहीं आया तुमको इतने इतने साल में। भाड़ में गयी प्यार मुहब्बत। हो गया तो हो गया, ऐसा कौन सा आसमान टूट पड़ा। लेकिन हमसे बात करना बंद करने का क्या ज़रूरत था। हमको बात करनी है उससे। वो कह क्यूँ नहीं सकता हमसे। इतना कैसा मुश्किल हो जाता है। ये क्या ज़िंदगी भर ऐसे ही दोस्त छूटते रहेंगे हमसे।

ख़ूबसूरती मन की होती है। बातों की होती है। कुछ लोगों से बात करना अच्छा लगता है। उनके साथ होना अच्छा लगता है। उनके पास होने से मौसम अच्छा लगता है, शहर सुंदर लगता है…कॉफ़ी में, खाने में, स्वाद ज़्यादा आता है। कुछ लोग ख़ूबसूरत होते हैं जो हमें अच्छे लगते हैं। हम ठीक ठीक नहीं जानते इसमें ख़ूबसूरती कहाँ है। प्यार से देखने पर सब लोग ही सुंदर लगते हैं।

ग़ुस्सा किसी का, लड़ किसी और से रही थी। कि यार उससे इतना नहीं हो सकता कि कह दे। कि देखो, सॉरी नॉट सॉरी पर प्यार हो गया है तुमसे और जितना हो गया उतना भी बहुत है, अब तुमसे बात नहीं करेंगे। या कि देखो, अब तुमसे बात करने का मन नहीं करता है, सब बात सब ख़त्म हो गया हमारे बीच में। या कि कुछ भी कारण। कह काहे नहीं सकता है कि हमसे बात नहीं करना है। कितना मुश्किल होता है ऐसा कहना। हम तो कह देते हैं। कई बार कहे हैं…कि हमारा अभी मेंटल स्टेट नहीं है कि नयी दोस्ती कर सकें या तुम्हारे जैसे कॉम्प्लिकेटेड इंसान के साथ दोस्ती कर सकें या कि तुम्हारे जैसे सिम्पल इंसान से दोस्ती करें। कहना आसान होता है। दुखता भी एक ही बार है, लेकिन आख़िरी बार होता है वो।

यूँ बिना कहे चले जाने वाले लोग। उफ़। और ये हमको ही मिलने होते हैं!

Musings

बनाएँगे काग़ज़ की गौरैय्या लेटर पैड के सुंदर काग़ज़ से और हथेलियों में भर तुम्हारे नाम का कोई जादू मंतर, भेज देंगे उनको नीले आसमान में

हम इतनी तन्हाई में जीते हैं कि ऐसी शिकायत भी नहीं कर सकते कि ‘जाना ही था तो आए ही क्यूँ थे’। हम सीखेंगे कम में ख़ुश होना। जितना मिला है उतने में जीना। हम सीखेंगे बिना अलविदा कहे चले गए लोगों के हिस्से की दिल की ज़मीन पर रोपना सुर्ख़ बोगनविला के पौधे…

भले ही प्रेम कितनी भी गहराई से करें…अलविदा को आसान करना सीखना बाक़ी रहेगा शायद बहुत बहुत सालों तक भी। हम स्टेप बाई स्टेप सीखेंगे। जैसे कि पहला स्टेप होगा कि सब कुछ इतना ज़्यादा ना दुखे, थोड़ा कम दुखे…बस थोड़ा सा कम।

हम सीखेंगे साँस लेना…कुछ ऐसे साँस लेना कि सीने के बीच कुछ ना चुभे। ख़ास तौर से कविताएँ, किसी की हँसी, कोई अबोला, किसी शहर की धूप…कुछ भी ना चुभे साँस की रफ़्तार में। आसान हो साँस लेना।

लिखे में, पढ़े में, जिए में से उनकी छेकी हुयी जगह ख़ाली करना। थोड़ा थोड़ा कर के। मिटाएँगे किताबों के हाशिए पर लिखे उनके नाम ख़त। बनाएँगे काग़ज़ की गौरैय्या लेटर पैड के सुंदर काग़ज़ से और हथेलियों में भर तुम्हारे नाम का कोई जादू मंतर, भेज देंगे उनको नीले आसमान में।

हम जितनी आसानी से करते हैं प्रेम…काश उतनी ही आसानी से बिसार भी सकते तुम्हें। तुम्हारी हँसी को। तुम्हारे शहर के मौसम को। तुम्हारी आवाज़ को। तुम्हारे गले लग कर अपने हिस्से लिखा लाए बहुत से सुख को।

हम सीखेंगे ख़ुद को माफ़ करना…इतने ज़्यादा प्रेम के लिए। कि हमारा कोई दोष नहीं है। हमारे हिस्से कुछ ज़्यादा लोग होते तो शायद हर एक के हिस्से थोड़ा कम कम प्यार आता। इतने कम लोग हैं कि सबके हिस्से दिल भर भर आने तक प्यार आता है।

जब अतीत में हम ज़्यादा लौटते हैं तो इसका मतलब हम अपने वर्तमान में नहीं होना चाहते। तो हम शुरू करेंगे एक ऐसा वर्तमान बनाना जिसके रंग ख़ुश हों। जिसका आसमान अपना हो। जिसमें रहने वाले लोगों को कुछ भी आए या नहीं आए, अलविदा कहना ज़रूर आए। लेकिन अगर इतना ना हो सके तो हमें थोड़ा सा अपने दिल को दुखना कम करना आ जाए, बस।

तुम्हें जिस रोज़ पूरी तरह भूल जाएँगे, उस दिन बहुत दुखेगा। हमको याद नहीं किसी को बहुत सालों में भी इतना और बिना कुछ चाहे, माँगे, या डरे हुए, बेमतलब ही प्यार किए थे, बेतरह। तुमसे अपनी बेगुनाही में प्यार किया था। अपने किसी किरदार की तरह। अपनी ईमानदारी में। बिना समझे या समझने की कोशिश किए हुए।

हम तो ये भी नहीं माँगते हैं कि हमको बताओ कि तुम गए क्यूँ हो…लेकिन इतना कह देना, कि जा रहे हो, और मैं तुम्हारा इंतज़ार ना करूँ। इतना चाहना तो ऐक्सेप्टबल है ना? कुछ नही कह सकते अब भी तुमसे। सिवाए एक ‘शुक्रिया’ के। मेरी ज़िंदगी में होने का शुक्रिया।

बहुत प्यार।