Musings, Shorts
इक रोज़ इस दुखती दुनिया को बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल हो गया तो मैंने ईश्वर के नाम एक चिट्ठी लिखी और चूँकि ईश्वर का पता मुझे मालूम नहीं था, मैंने वो चिट्ठी एक कवि को भेज दी। मैंने उसे बहुत पढ़ा नहीं था लेकिन जितना पढ़ा था, उतने में वो अच्छा लगा था। अपना सा कोई। जैसे ३३ करोड़ देवी देवताओं में भी हम चुनते हैं अपने पसंद के देवाधिदेव, महादेव, शिव। दुनिया के इतने हज़ार कवियों में जैसे अचानक वो मिला। जब कि मैं कवि को नहीं, ईश्वर को ढूँढ रही थी।
 
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मुझ दो दुनियाओं में बसी हुयी स्त्री को इस बात का संतोष है कि मैंने तुम्हें इतना जानने के पहले इतना पढ़ा नहीं। वरना, कवि, तुमसे प्रेम होना तुम्हें जानने से इतर होता। तुम्हारे प्रेम में होते हुए तुम्हें जानती तो प्रेम करती तुमसे, तुम्हारी कविताओं के बावजूद। मेरी झूठी कहानी का सच्चा किरदार तुम सा नहीं होता।
 
मुझे इस बात की भी राहत है कि तुमने नहीं पढ़ी मेरी कच्ची कविताएँ और कोरी कहानियाँ। तुमने नहीं जाना उन शहरों के बारे में जिनसे मुझे प्यार है।
 
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मुझे बारिश बहुत पसंद है, कितनी बार मैंने दोस्त को सिर्फ़ बारिश की आवाज़ रेकर्ड कर के भेज दी है। मुझे नहीं मालूम, सिर्फ़ बारिश सुनने में कैसी लगती है। आज मैंने चिट्ठियों के लिए बने बक्से में हाथ डाला…फुहार सी थी अंदर, हथेली भर बारिश जमा हो गयी। किसी ने मेरे नाम बारिशें भेज दीं थी। इनमें कितनी लय थी, जैसे कोई रेलगाड़ी जा रही हो। दूर कूकती कोयल नाम ले रही हो किसी पुराने महबूब का। मैं सुनती रही बारिश की आवाज़। जाना पहली बार, बारिश मन के सारे गड्ढे समतल कर देती है। रिपीट पर सुना बारिश के उस टुकड़े को। कभी कभी यूँ भी लगा क्या हम सब महज़ एक बंजर खेत हैं, बारिश के इंतज़ार में।
 
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कवियों से हर कोई प्रेम करता है। अपनी अपनी परिभाषा में बाँध कर। हमें जिस क्षण इस बात कर डर लगता है कि हमें प्रेम हो जाएगा, हम अप्रेम की दहलीज़ लाँघ चुके होते हैं।
 
तुम्हें पढ़ना तुम्हारी प्रेमिकाओं से प्रेम करना है। तुम्हारे शहर का चौक चौबारा देखना है। तुम्हारे इष्टदेव के नाम तुम्हारी माँगी मन्नतों की पैरवी करना है।
 
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ये अच्छा है कि तुमने मुझे पढ़ा नहीं है। मुझे ज़रा भी जाना नहीं है। मुझे डर लगता है कि तुम अगर मुझे पढ़ोगे तो यूँ ही मेरे शब्दों से लिपट कर सोना चाहोगे रात को, जैसे मैं तुम्हारे शब्दों की छतरी ताने छत से बारिश देख रही हूँ, फ़िलहाल। लिखना हमारी आत्मा को एक्स्पोज़ करता है। लेकिन इसे देखने की नज़र सबके पास नहीं होती। उसकी चौंध से नॉर्मल इंसान की आँखों में विरह का बिरवा फूट पड़ता है। तुम लेकिन पढ़ लोगे मेरे लिखे में मेरी तन्हाई, मेरा अंतर्द्वंद, मेरा उदास शहर…तुम होना चाहोगे मेरे लिए शहर दिल्ली, मीठी कविताओं की किताब और इस शहर का ओढ़ा हुआ आसमान।
 
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प्रेम को समय की इकाई से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।
वो लम्हे में भी उम्र भर जिए जाने लायक ऊष्मा दे सकता है। ऊर्जा दे सकता है।
और फिर एक लम्हे के प्रेम के बदले उम्र भर का दुःख भी दे सकता है, जिसकी चुभन जीते जी नहीं जाती।
 
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मैं सोचती हूँ तुम्हारी हँसी कैसी है।
बालकनी पर बैठे बारिश की शिकायत सुनते हुए तुम कैसी चाय पीना पसंद करते हो?
अब तुम्हें चिट्ठियाँ तो नहीं ही लिखूँगी।
सिगरेट पीते हो तुम?
और जो इत्ति सी बारिश भर इत्ता सा प्रेम लिखा तुम्हारे हिस्से, उसका क्या करोगे तुम?
 
#अप्रेम #lovingstrangers #daysofbeingwild #thegirlthatwas
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एक बहुत ही सुफ़ेद दोपहर थी। नीले आसमान और सफ़ेद बादलों वाली। चमकीली। हवा की खुनक यादों के साथ मिल कर जी को उदास कर रही थी। ये दिल्ली की फ़रवरी का मौसम था। इसी मौसम उसने पहली बार किसी से गुज़ारिश की थी, ‘मेरे साथ एक सिगरेट पिएँगे आप? प्लीज़’। एक सिगरेट बाँट के पीते हुए पहली बार उनकी उँगलियाँ छू गयी थीं। उसने याद करने की कोशिश की कि उसने कौन से कपड़े पहने थे। मगर चमकीली धूप में आँखें चुंधिया रहीं थीं और दिख नहीं रहा था कुछ साफ़। 

धूप पीली नहीं, एकदम सफ़ेद थी। उसने ईंट लाल सूती साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी। आज शहर से दूर एक मंदिर जाने का प्रोग्राम था…उसका मूड बहुत अच्छा था। सब कुछ उसने सोच रखा था। मंदिर के पत्थर के किसी स्तम्भ से टिक कर बैठे रहना। पत्थर की गरमी। मंदिर से दिखता नंदी हिल्ज़। सामने का सीढ़ियों वाले कुंड का हरा पानी। मंदिर की गंध जिसमें अगरबत्ती का धुआँ, कपूर, गुलाब और बेली के फूल, और घी की मिलीजुली महक थी। वहाँ की शांति, हवा की हल्की सरसराहट। खुले बालों को पीछे करते हुए कलाई में काँच की चूड़ियों की खनक। सब कुछ उसकी आँखों के सामने था। गाड़ी की सारी खिड़कियाँ खोल कर गुनगुनाती हुयी ड्राइव कर रही थी वो कि तभी रास्ते में एक पागल ट्रक वाले ने कार पीछे से ठोक दी। सारा सपना किर्च किर्च बिखरा। वो अपने घबराए जी को सम्हाले हुए घर लौट आयी थी। मन की थकान थी कुछ। 

किताबों के साथ रहने पर तन्हाई का अहसास कुछ कम होता था। उसने बेड पर दो तीन किताबें बिखेर दीं। एक उपन्यास पढ़ना शुरू किया। हिंदी का ये उपन्यास बहुत दिन बाद फिर से उठाया था, दो तीन बार पढ़ने की कोशिश कर के रख चुकी थी। कश्मीरी केसर के ज़िक्र से उसे २००५ की कश्मीर ट्रिप याद आयी। केसर के फूलों वाले खेत। बैंगनी फूल और उनके अंदर केसर का रंग और उँगलियों के बीच रह गयी ज़रा सी उनकी ख़ुशबू। 

नींद नहीं आती दोपहरों में। जब दर्द की जगह नहीं मालूम हो तो दर्द बदन में नहीं, आत्मा में होता है। आँख से निकले आँसू अगर ज़मीन पर नहीं गिरते तो आत्मा में जज़्ब हो जाते हैं। उसका जी किया कि आत्मा को धूप भरी खिड़की पर परदे की तरह डाल कर सूखने के लिए छोड़ दे। 

थोड़ी किताब। थोड़ी याद। थोड़ा शहर। थोड़ा डर।

बहुत दिन बाद उसके मन में वाक्य उभरा। ‘मैं तुमसे प्यार करती हूँ’। ऐसा लगा कि वो अपनी ही कहानी का किरदार है कोई। उसे रूद्र की याद आयी। ऐसे जैसे कोई बहुत प्यारा खो गया हो ज़िंदगी से। उसने चाहा कि रूद्र वाक़ई में होता तो उसके सीने से लग कर रोती बहुत सा। उसे इतने दिन में पहली बार उस प्यार का अहसास हुआ जो रूद्र उससे करता है। जैसे धूप करती है उसकी आँखों से प्यार। एक गर्माहट की तरह। उसे अच्छा लगा कि उसने ऐसा कोई किरदार रचा है। 

उसे वो दोपहर याद आयी जब उसने पहली बार रूद्र की सुनहली आँखें देखी थीं। धूप उगाती आँखें। जो एक बार तुम पर पड़ें तो लगे कि तुम दुनिया की हर मुश्किल से लड़ सकते हो। उसे मालूम नहीं था उसकी आँखों का रंग कैसा होगा। उसने फ़ोन पर कैमरा ओपन किया तो उसकी नज़र पिछली दोपहर की खींची एक तस्वीर पर पड़ी। 

तब उसने जाना, आप प्रेम में उन किरदारों की तरह हो जाते हो जिनसे आपने प्यार किया है। 

जिन्होंने रूद्र को नहीं देखा है कभी, उसकी आँखें ऐसी दिखती हैं। मेरी आँखें भी। 

Musings, Poetry

जो रंग तुम्हारे हैं, मेरे पास रहने दो…

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सब कुछ बीत जाने के बाद
सिर्फ़ एक रंग में बचा रह जाता है प्रेम

तुम बिसर गए हो
मौसम अब ऊँगली थाम कर
नहीं ले जाते तुम्हारे शहर

कोई अच्छी कविता
पढ़ लेती हूँ अकेली
और दुखता नहीं

फ़िल्में, गाने, किताबें
कुछ भी तुमसे साझा करने को
अब हूक नहीं उठती

ज़िंदगी में बहुत रंग हैं
और हर रंग के हज़ार क़िस्से
लेकिन नीला
हमेशा उस शर्ट का रंग रहेगा
जो तुमने आख़िरी मुलाक़ात में पहनी थी।

Poetry

पुराने, उदार शहरों के नाम

शहरों के हिस्से
सिर्फ़ लावारिस प्रेम आता है
नियति की नाजायज़ औलाद
जिसका कोई पिता नहीं होता
याद के अनाथ क़िस्सों को
कोई कवि अपनी कविता में पनाह नहीं देता
कोई लेखक छद्म नाम से नहीं छपवाता
कोई अखबारी रिपोर्टर भी उन्हें दुलराता नहीं
इसलिए मेरी जान,
आत्महत्या हमेशा अपने पैतृक शहर में करना
वहाँ तुम्हारी लाश को ठिकाना लगाने वाले भी
तुम्हें अपना समझेंगे
***
बाँझ औरत
दुःख अडॉप्ट करती है
और करती है उन्हें अपने बच्चों से ज़्यादा प्यार
लिखती है प्रेम भरे पत्र
पुराने, उदार शहरों के नाम
कि कुछ शहर बच्चों से उनके पिता का नाम नहीं पूछते
***
असफल प्रेमी
मरने के लिए जगह नहीं तलाशते
जगहें उन्हें ख़ुद तलाश लेती हैं
दुनिया की सबसे ऊँची बिल्डिंग के टॉप फ़्लोर पर
उसके दिल में एक यही ख़याल आया
***
उस शहर को भूल जाने का श्राप
तुम्हारे दिल ने दिया था
इसलिए, सिर्फ़ इसलिए,
मैंने इतना टूट कर चाहा
हफ़्ते भर में हो चुकी है कितनी बारिश
तुम्हें याद है जानां, सड़कों के नाम?
स्टेशनों के नाम? कॉफ़ी शाप, व्हिस्की, सिगरेट की ब्राण्ड?
तो फिर उस लड़की का क्या ही तो याद होगा तुमको
भूल जाना कभी कभी श्राप नहीं, वरदान होता है
***
बंद मुट्ठी से भी छीजती रही
तुम्हारी हथेली की गरमी
दिल के बंद दरवाज़े से
रिस रिस बह गया कितना प्रेम
कैलेंडेर के निशान को कहाँ याद
बाइस सितम्बर किस शहर में थी मैं
रूह को याद है मगर एक वादा
अब इस महीने को, ‘सितम’ बर कभी ना कहूँगी
Musings

सुख का स्वांग

लड़की आधी नींद में है। कि पूरी नींद आती नहीं। उसके सीने में कोई फाँस चुभी हुयी है। अंग्रेज़ी का एक शब्द। heartbroken. हिंदी में यह एक शब्द नहीं है। है भी तो उतना धारदार, उतना नुकीला नहीं है कि नींद में चुभे।

उसके सीने में अवसाद जमता जा रहा है। एक पत्थर की तरह। अवसाद की नदी जागने में, सोने में, अनलिखे में पूरे बदन में घूमती है और ठहरती जा रही है सीने में…ग्लेशियर हो रहा है कोई। कठोर और ठंढा।

ठहराव में जीना नहीं आता उसे। ठहराव में साँस भी नहीं आती। लिखना तो क्या ही होगा।

उसे समझाते हैं सब, let go. live in the moment. वह सुनती है लेकिन समझती नहीं। ये सब तब ही अच्छा लगता है जब हम इनका चुनाव करते हैं। जब हम चुनते हैं हर लम्हे को पूरी तरह जीना, बिना किसी अतीत और भविष्य के। लेकिन यही निर्णय जब मजबूरी में लिया जाए कि अतीत के डरावने साये नींद में दम घोंटते हैं और भविष्य की ज़मीन ठोस नहीं है…तब लम्हे में जीना तकलीफ़ का बायस होता है।

लिखने के लिए मन निर्मल होना ज़रूरी है। साफ़, बहते पानी की तरह। शब्द भी तब ही आते हैं जब मन में जगह जगह बाँध ना बने हुए हों।

वो इक टूटे सपने की धार से मरते मरते बची और इक रोज़ बहुत रोयी। इतना कि आँखें सूज गयीं। इतना कि धार से चुभने लगे आँखों के आगे के सारे मंज़र ही। इतना कि एक शहर हूक हो गया…साँस साँस में चुभता। सपने सारे किरमिच किरमिच हो गए।

वे दिन बहुत अच्छे थे जब जीवन के केंद्र में प्रेम था। प्रेम एक छलावा है जो बहुत से ज़रूरी दुखों से हमें बचा लेता है। प्रेम में होते हुए बाक़ी चीज़ों पर ध्यान नहीं जाता। आज़ादी पर, चुनाव पर, अपनी ज़िंदगी की दिशाहीनता पर। अपनी अकर्मण्यता पर। अपने गुनाहों पर।

वो चाहती है कि उसकी ज़िंदगी में कुछ उसकी मर्ज़ी का भी हो। अपनी मर्ज़ी के सुख ना सही, अपनी मर्ज़ी के दुःख हों…कि अपनी मर्ज़ी के कुछ लोग तो हों। वह बार बार अपनी मर्ज़ी की मृत्यु चुनने के बारे में सोचती है। कि ज़िंदगी की बेबसी उसे बेतरह परेशान करती है। उसके दुस्वप्नों में कलाई काटने के मंज़र होते हैं। उसकी चुप्पी में सिसकियाँ होती हैं।

जिन शहरों को वह जानती है, इन दिनों उस सारे शहरों का मौसम ख़ूबसूरत है। वसंत अपने साथ रंग और ख़ुशबुएँ लेकर आया है। आसमान गहरा नीला है। हल्की सी मन को भाने वाली खुनक है।

मगर मन का मौसम…मन पर उदास मौसम हैं। गहरे काले बादल। बर्फ़बारी। तूफ़ान। बेतरह ठंढ। और नाउम्मीदी। ऐसे मन में रंग नहीं होते। गर्माहट नहीं होती। किसी के आने का कोई दिन नहीं होता।

लड़की कहीं उलाहना देना चाहती है किसी को, तुम बिसरते हो। जैसे थे नहीं कभी। और मैं नहीं लिखती हूँ तुम्हें, जैसे कि सच में भूल गयी हूँ। जब प्रेम था जीवन में तो दुःख बर्दाश्त करने को एक उम्मीद थी। इन दिनों प्रेम नहीं है लेकिन दुःख फिर भी उतना ही है। तो दुःख का प्रेम से कोई सम्बंध नहीं था कभी।

आह रे मन, काश के मैं प्रेम ही करती तुमसे!
इस दुखते कलेजे के साथ सुख का स्वांग।आह, इससे भयावह भी कुछ होगा जीवन में! आह रे आह रे आह!

Musings

हर लड़का समंदर नहीं होता

‘तुमसे किसी को भी डर लगेगा’
‘डर। कुछ भी। डर क्यूँ लगेगा?’

‘मुश्किल सवाल है। धैर्य से सुनो। समझाने की कोशिश करता हूँ। क्यूँकि मेरे सिवा किसी और इंटेलिजेंट इंसान को तुम जानती नहीं जो तुमको ये बात समझा सके। सिम्पल बात है, लेकिन सामने से दिखती नहीं। देखो। तुम्हारे जैसी भयानक तरीक़े से इंडिपेंडेंट लड़की कि जो अपने मूड और मिज़ाज का हाल मौसम तक को अफ़ेक्ट नहीं करने देती। कि जो बारिश को मन का मौसम समझती है। कि जो जानती है कि सब कुछ उसकी भीतरी दुनिया से कंट्रोल होता है और उस हिसाब से जीती है। जो अपनी ख़ुशी और अपने ग़म के लिए ख़ुद से रेस्पॉन्सिबिलिटी लेती है…

तुम्हारे जैसी लड़की…जब ज़रा सा किसी लड़के के साथ वक़्त बिताती है। देखती है उसे मुस्कुरा कर। लम्हे भर को रिलैक्स होती है, अपना सर टिकाती है उसके कंधे पर और कहती है एक उसाँस भर के…मैं ख़ुश हूँ तुम्हारे साथ…तो लड़का डर जाता है…तुम्हारी ख़ुशी का कारण बनने से…ये इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि उसके कंधे सोच के ही दुखने लगते हैं। उसे लगता है कि आज ख़ुशी है तो कल ग़म भी होगा। वो तुम्हारे ख़ुशी ग़म किसी का कारण नहीं बनना चाहता। तुम लड़की नहीं, नदी हो। पहाड़ी नदी…फ़िलहाल तो तुम कहीं नहीं रुक सकती। बहुत ज़िंदगी, कई शहर देखोगी तो थमोगी थोड़ा। ठहरोगी।

एक नदी जैसी लड़की के ठहरने की अंतिम जगह समंदर ही होता है। और हर लड़का समंदर नहीं होता कि तुम्हें अपने बाँहों में समेट कर कह सके। ये तुम्हारा घर है। तुम यहाँ रह सकती हो। हमेशा के लिए।

तुम बहुत मज़बूत हो। तुम्हारे क़रीबी लोगों को तुम्हारे टूटने का डर लगता है कि तुम्हें सम्हालने के लिए तुमसे ज़्यादा मज़बूत होना पड़ेगा। ये जो अपनी ज़िंदगी इतने कटघरों में बाँट के जीती हो, हर सही ग़लत का क्षण क्षण हिसाब लगाते हुए, तुम्हारे काँधे का ये बोझ ज़रा सा कम करना बहुत मुश्किल है। अपने गुनाहों के स्याह में जब घुल कर तुम लिखती हो क़िस्सा कोई तो कौन तुम्हारे लिए सूर्य बन जलेगा। इतना आसान नहीं होता।

तुम्हारा प्रेम साँस लेने की जगह भी छोड़ता है? तुम्हें किनारे पर से बैठ कर देखा भी नहीं जा सकता, ऐसा घातक आकर्षण है तुम में। तुमसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है। तो जब तक चाँदनी रात में तुम्हारे होने की कलकल ध्वनि सुनी थी, तुम्हारे घाट पर बैठ कर लालटेन की रौशनी में किताब पढ़ने को जी चाहा था। लेकिन सुबह की धूप में तुम्हारा वेग देख कर मैं भी चौंक गया हूँ। तुम्हारे प्रेम में अवश होना पड़ेगा। और हर व्यक्ति तुम्हारी तरह कंट्रोल फ़्रीक नहीं होता, लेकिन सब तुम्हारी धार में बह भी नहीं सकते। इसलिए वे डरते हैं। तुम्हारे चपेट में आने से। तुम्हारे प्रेम को ज़रा भी महसूसने से। तुम्हारे क़रीब आने से। समझी अब?’

‘समझ के क्या ही होगा। थोड़े ना बदल जाऊँगी कोई शांत झील या जलकुंड में कि कोई भी नहा ले। ऐसे ही ठीक है। शहर शहर का क़िस्सा सुनना कोई बुरा तो नहीं है। और अंत में होगा ही कोई सागर। जहाँ जा के ठहर सकूँगी मैं। तो फिर उसके पहले जितना भी भटकाव हो। ठीक है। लेकिन ऐसा भी क्या डरना। डूब जाना हमेशा मर जाना थोड़े होता है। कंट्रोल करके डाइव भी तो मारते हैं लोग। डूबने के बात उतराना भी तो होता है। तुम भी चले जाओगे अब?’

‘लग तो रहा है। डर लगता है तुमसे। तुम इतनी ख़ुश रहती हो मेरे साथ। तुम्हारी आदत बनने से डर लगता है।’

‘अलविदा कह के जाना। अचानक से ग़ायब मत हो जाना’

‘अलविदा कह के जाना सम्भव नहीं है, ऐसे सिर्फ़ लौटना होता है। जाना तो अचानक ही पड़ेगा। तुम्हें यूँ ही, किसी कच्चे चाँद की रात को, कच्ची नींद के बीच छोड़ कर। तुम फ़ोन रखना और काश कि भूल जाना कि मैं था।’

‘सपना था। सपना था सब।’

***
लड़की अलार्म की तीखी आवाज़ से हड़बड़ा के उठती है। दौड़ते हुए फ़ोन तक जाती है और अलार्म बंद करती है। उसकी हथेलियों में समंदर का पानी है जिसमें चाँद घुला है। वो हथेलियाँ खोलती हैं तो कमरे भर में चाँद रंग का समंदर का पानी छिलकते जाता है।

लड़का नींद पूरी करके जागता है। उसे तीखी प्यास लगी हुयी है। जैसे रात भर समंदर में डूबता उतराता रहा हो।

Musings

Loving strangers

हम मर रहे होते हैं और किसी को पढ़ कर थोड़ा सा जीने लगते हैं। इतना ही कर सकता है कोई कवि या लेखक हमारे लिए। हम अंधेरे में बैठे होते हैं और अनजान शब्द रौशनी के जुगनुओं की तरह टिमटिमाने लगते हैं। इनसे रात छोटी नहीं होती, बस अवसाद थोड़ा कम होता है।

हम कि जो अपने पागलखाने में किसी तरह बस अपने सोचने की क्षमता को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहे होते हैं, [preserving our sanity] वैसे में किसी कवि का लिखा हुआ हमारा हाथ थाम कर हमें सोच की एक दिशा देता है। हम मन में रामचरित मानस की ही कोई चौपायी याद करते हैं, उस राम को बसाना चाहते हैं अपने मन में, ‘हृदय राखि कोसलपुर राजा’। मंत्र हमारा हाथ शायद अंतिम क्षण तक नहीं छोड़ते। मैं बेहद उदासी, तन्हाई, अंधेरे और मृत्यु के समीप भी महामृत्युंजय का एक एक शब्द छू सकती हूँ।

सुबह का झुटपुटा अँधेरा है। मौसम गर्म होता जा रहा है। धूप अब जलाने लगी है। मैंने खिड़की पर रेशमी पर्दा खींच दिया है। परदे से छन कर अँधेरा कमरे में गिर रहा है। मेरे पौधे मुझसे नाराज़ हैं कि मैं इन दिनों जाने कहाँ रहती हूँ। वैसे भी ये कमरा जल्दी ही ग़ायब हो जाने वाला है। मेरी कहानियों की तरह।

कहानी लिखने की कई वजहें होती हैं जो हमें ठीक ठीक मालूम नहीं होतीं अक्सर। हम लिख रहे होते हैं कि हमें लिखना होता है। जैसे हम प्रेम में होते हैं तो कोई वजह नहीं होती। लेकिन प्रेम के रीत जाने की कोई वजह कभी कभी मिल जाती है। जैसे लिखने की वजह होती है, कभी कभी। हम लिखते हैं क्यूँकि इस दुनिया में रोने की कोई भी जगह नहीं मिलती।

कई कई सालों से आँसुओं का एक ग्लेशियर है। सीने के बीच जमा हुआ। उस लड़की को देर तक बाँहों में थामे रहे कोई। कुछ भी ना कहे। इंतज़ार करे। उस पहले गर्म आँसू का…उस पहली हिचकी का। वो नहीं जानती कि किरदारों का रोना कैसे लिखे कि उसने कितने कितने सालों से सब कुछ एक बेहद सर्द आह में जमा रखा है।

दोस्त चिढ़ा कर हँस रहा होता है मुझपर। तुम्हें चाहिए क्या। एक औरत का अभिमान होता है कि उसपर कितने पुरुष मर मिटे… तुम भी डाइअरी मेंटेंन करती होगी। मन में ख़ुश होती होगी, कि वाह ये भी मर मिटा हम पर। कि तुम अचरज कर रही हो कि एक यही तो था कि जो दोस्त था…और इसको भी प्यार हो गया हमसे। मुझे ठीक मालूम नहीं कि लेखिका कह रही थी कि औरत, लेकिन कहा मैंने उससे। मैं सोलह की लड़की नहीं रही जो प्यार हो जाने पर भौंचक हो जाती थी। अब मिडलाइफ पहुँच रही हूँ। अब किसी चीज़ पर चकित होना बहुत मुश्किल है। और प्यार। वो तो सबको ही हो जाता है हमसे, इसमें अब हम चौंकते नहीं। वो दिन अब नहीं रहे कि जीवन में सबसे अद्भुत चीज़ हुआ करती थी प्यार। अब समझती हूँ कि फ़ैज़ ने क्यूँ लिखा, ‘और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’। हम मेरे दिखने पर बात कर रहे थे। कि मैं कह रही थी, इन दिनों मैं बिलकुल भी अच्छी नहीं दिखती और वो फिर से हँस रहा था, कि तुम कब समझोगी, दिखने से कुछ नहीं होता। पर इस पहली बार मैं समझ रही थी। कि हाँ, इससे कभी फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम दिख कैसे रहे हैं। हमेशा बात ये होगी कि हम हैं क्या…कौन…कैसे। कि प्यार हमेशा हमारे भीतर के किसी इंसान से होता है। पर जीवन में कितने रंग का दुःख है, ये भी देखना बाक़ी था। फिर वो पूछता है हमसे, कि तुमको जाने क्या चाहिए, और वो क़सम से, इस शहर में होता तो हम जा कर पीट आते उसको। कि हमको बात चाहिए। समझ नहीं आया तुमको इतने इतने साल में। भाड़ में गयी प्यार मुहब्बत। हो गया तो हो गया, ऐसा कौन सा आसमान टूट पड़ा। लेकिन हमसे बात करना बंद करने का क्या ज़रूरत था। हमको बात करनी है उससे। वो कह क्यूँ नहीं सकता हमसे। इतना कैसा मुश्किल हो जाता है। ये क्या ज़िंदगी भर ऐसे ही दोस्त छूटते रहेंगे हमसे।

ख़ूबसूरती मन की होती है। बातों की होती है। कुछ लोगों से बात करना अच्छा लगता है। उनके साथ होना अच्छा लगता है। उनके पास होने से मौसम अच्छा लगता है, शहर सुंदर लगता है…कॉफ़ी में, खाने में, स्वाद ज़्यादा आता है। कुछ लोग ख़ूबसूरत होते हैं जो हमें अच्छे लगते हैं। हम ठीक ठीक नहीं जानते इसमें ख़ूबसूरती कहाँ है। प्यार से देखने पर सब लोग ही सुंदर लगते हैं।

ग़ुस्सा किसी का, लड़ किसी और से रही थी। कि यार उससे इतना नहीं हो सकता कि कह दे। कि देखो, सॉरी नॉट सॉरी पर प्यार हो गया है तुमसे और जितना हो गया उतना भी बहुत है, अब तुमसे बात नहीं करेंगे। या कि देखो, अब तुमसे बात करने का मन नहीं करता है, सब बात सब ख़त्म हो गया हमारे बीच में। या कि कुछ भी कारण। कह काहे नहीं सकता है कि हमसे बात नहीं करना है। कितना मुश्किल होता है ऐसा कहना। हम तो कह देते हैं। कई बार कहे हैं…कि हमारा अभी मेंटल स्टेट नहीं है कि नयी दोस्ती कर सकें या तुम्हारे जैसे कॉम्प्लिकेटेड इंसान के साथ दोस्ती कर सकें या कि तुम्हारे जैसे सिम्पल इंसान से दोस्ती करें। कहना आसान होता है। दुखता भी एक ही बार है, लेकिन आख़िरी बार होता है वो।

यूँ बिना कहे चले जाने वाले लोग। उफ़। और ये हमको ही मिलने होते हैं!