Musings

सुख का स्वांग

लड़की आधी नींद में है। कि पूरी नींद आती नहीं। उसके सीने में कोई फाँस चुभी हुयी है। अंग्रेज़ी का एक शब्द। heartbroken. हिंदी में यह एक शब्द नहीं है। है भी तो उतना धारदार, उतना नुकीला नहीं है कि नींद में चुभे।

उसके सीने में अवसाद जमता जा रहा है। एक पत्थर की तरह। अवसाद की नदी जागने में, सोने में, अनलिखे में पूरे बदन में घूमती है और ठहरती जा रही है सीने में…ग्लेशियर हो रहा है कोई। कठोर और ठंढा।

ठहराव में जीना नहीं आता उसे। ठहराव में साँस भी नहीं आती। लिखना तो क्या ही होगा।

उसे समझाते हैं सब, let go. live in the moment. वह सुनती है लेकिन समझती नहीं। ये सब तब ही अच्छा लगता है जब हम इनका चुनाव करते हैं। जब हम चुनते हैं हर लम्हे को पूरी तरह जीना, बिना किसी अतीत और भविष्य के। लेकिन यही निर्णय जब मजबूरी में लिया जाए कि अतीत के डरावने साये नींद में दम घोंटते हैं और भविष्य की ज़मीन ठोस नहीं है…तब लम्हे में जीना तकलीफ़ का बायस होता है।

लिखने के लिए मन निर्मल होना ज़रूरी है। साफ़, बहते पानी की तरह। शब्द भी तब ही आते हैं जब मन में जगह जगह बाँध ना बने हुए हों।

वो इक टूटे सपने की धार से मरते मरते बची और इक रोज़ बहुत रोयी। इतना कि आँखें सूज गयीं। इतना कि धार से चुभने लगे आँखों के आगे के सारे मंज़र ही। इतना कि एक शहर हूक हो गया…साँस साँस में चुभता। सपने सारे किरमिच किरमिच हो गए।

वे दिन बहुत अच्छे थे जब जीवन के केंद्र में प्रेम था। प्रेम एक छलावा है जो बहुत से ज़रूरी दुखों से हमें बचा लेता है। प्रेम में होते हुए बाक़ी चीज़ों पर ध्यान नहीं जाता। आज़ादी पर, चुनाव पर, अपनी ज़िंदगी की दिशाहीनता पर। अपनी अकर्मण्यता पर। अपने गुनाहों पर।

वो चाहती है कि उसकी ज़िंदगी में कुछ उसकी मर्ज़ी का भी हो। अपनी मर्ज़ी के सुख ना सही, अपनी मर्ज़ी के दुःख हों…कि अपनी मर्ज़ी के कुछ लोग तो हों। वह बार बार अपनी मर्ज़ी की मृत्यु चुनने के बारे में सोचती है। कि ज़िंदगी की बेबसी उसे बेतरह परेशान करती है। उसके दुस्वप्नों में कलाई काटने के मंज़र होते हैं। उसकी चुप्पी में सिसकियाँ होती हैं।

जिन शहरों को वह जानती है, इन दिनों उस सारे शहरों का मौसम ख़ूबसूरत है। वसंत अपने साथ रंग और ख़ुशबुएँ लेकर आया है। आसमान गहरा नीला है। हल्की सी मन को भाने वाली खुनक है।

मगर मन का मौसम…मन पर उदास मौसम हैं। गहरे काले बादल। बर्फ़बारी। तूफ़ान। बेतरह ठंढ। और नाउम्मीदी। ऐसे मन में रंग नहीं होते। गर्माहट नहीं होती। किसी के आने का कोई दिन नहीं होता।

लड़की कहीं उलाहना देना चाहती है किसी को, तुम बिसरते हो। जैसे थे नहीं कभी। और मैं नहीं लिखती हूँ तुम्हें, जैसे कि सच में भूल गयी हूँ। जब प्रेम था जीवन में तो दुःख बर्दाश्त करने को एक उम्मीद थी। इन दिनों प्रेम नहीं है लेकिन दुःख फिर भी उतना ही है। तो दुःख का प्रेम से कोई सम्बंध नहीं था कभी।

आह रे मन, काश के मैं प्रेम ही करती तुमसे!
इस दुखते कलेजे के साथ सुख का स्वांग।आह, इससे भयावह भी कुछ होगा जीवन में! आह रे आह रे आह!