Musings, Shorts

फ़ासले ऐसे भी होंगे

आज सुबह नींद खुली और आदतन फ़ोन की ओर हाथ नहीं गया। कि आदत सिर्फ़ बनने में ही वक़्त नहीं लगता, छूटने में भी तो वक़्त लगता है। रोज़ लगता था कि आज सुबह फ़ोन में तुम्हारा मेसेज होगा। कि तुमने कुछ कहा होगा। कोई तस्वीर होगी। कोई कविता का टुकड़ा होगा। कोई वजह होगी। कई सालों की आदत थी। लेकिन शायद आज दिल ने आख़िरकार मान लिया कि कोई मेसेज नहीं होगा। इस तरह उम्मीद टूट जाती है। इंतज़ार चुक जाता है।

अब हम बात करेंगे भी तो उस रोज़ की तरह नहीं जैसे पिछले कुछ सालों से करते आ रहे थे। कि हर ख़ुशी में तुम्हारा हिस्सा निकाल के रख देना ज़रूरी नहीं लगेगा। हर ख़ूबसूरत चीज़ को तुमसे बाँटने की हूक नहीं सालेगी। होगा ये सब भी, धीरे धीरे होगा।
यूँ तुम्हें भुलाने को हज़ार तरीक़े हैं। काम है, पढ़ना लिखना है, घूमने की जगहें हैं, कोई नया शौक़ पाल सकती हूँ, इस घर में तो गमले ही इतने हैं कि फूल लगा दूँ तो हज़ार रंगो में भूल जाऊँगी तुम्हारी आँखों का रंग… बहुत कुछ है जिससे ख़ुद को इस तरह व्यस्त रखा जा सके कि तुम्हारी याद नहीं आए। हालाँकि ऐसे व्यस्त रहने के बावजूद याद जिन दिनों आती है, उन दिनों आ ही जाती है। लेकिन ज़िद्दी मन ऐसा कुछ करना नहीं चाहता था। उसे तुम्हारी मौजूदगी का आश्वासन चाहिए था। तुम्हारी ज़रूरत थी। मुझे ऐसे ज़िंदगी नहीं चाहिए जिसमें लोग नहीं हों। मुझे ऐसे सुख नहीं चाहिए जिनके बारे में हुलस कर किसी को फ़ोन नहीं किया जा सके।
कि फ़िलासफ़ी पढ़ने से समझ में आ जाती है सारी चीज़ें भी। गीता का ठीक से अध्ध्ययन करने से समझ में आएगा, ‘नष्टोमोह’। लेकिन मुझे वैसी ज़िंदगी नहीं चाहिए। ‘रहने दो हे देव, अरे यह मेरा मिटने का अधिकार’ की तरह, मेरे लिए मेरा ये चोटिल और नाज़ुक मन ज़रूरी है जो प्रेम कर सकता हो। प्रेम में टूट सकता हो। मैं निष्ठुर नहीं होना चाहती। हर बार टूट कर भी फिर जुड़ने की क्षमता ही जिजीविषा है। मैं मोह-माया छोड़ना नहीं चाहती। जीवन जीने भर को प्रेम की चाह क्या बहुत ज़्यादा है?
ख़ुश रहने की किताब मिलती है बाज़ार में। एक ऐसी किताब है, हैप्पीनेस हायपोथेसिस, उसमें लिखा है कि अगर कोई रिश्ता टूटा हो और आप इस बात पर यक़ीन करना चाहते हैं कि जीवन प्रेम के बिना ही बेहतर है तो आपको फ़लसफ़े पढ़ने चाहिए। उसी किताब में लिखा है कि जब आपको प्रेम हुआ हो और आप प्रेम के अतिरेक में हों, तो आपको कविता पढ़नी चाहिए।
मैं कविता हमेशा ही पढ़ती हूँ। कविता मेरा घर है। मैं उस तक लौट कर आती हूँ थोड़े सुकून की तलाश में। मेरे सिरहाने हमेशा कविता की किताबें रहती हैं। मेरे हर बैग में कमोबेश एक ना एक कविता की किताब ज़रूर ही। मैं प्रेम में ही होती हूँ, हमेशा। अतिरेक ठीक ठीक नहीं मालूम।
लेकिन तड़प कर किसी ईश्वर से तुम्हें माँगने का मन नहीं करता। आने वाले को और जाने वाले को कौन रोक सका है। मैं दुःख के साथ विरक्ति भी महसूस करती हूँ। मेरे जीवन में तुम्हारी जगह इतनी ही थी। एक मौसम की तरह। जाड़ों का मौसम। कि तुम्हारे आने पर थोड़ी सी गरम कॉफ़ी की ज़रूरत और थोड़ी थरथराहट महसूस हुयी।
मुझसे कहते थे कुछ लोग, तुम्हें छोड़ कर कैसे रह लेते हैं लोग। तुमसे भी कोई रिश्ता तोड़ सकता है! अचरज होता था मुझे पहले भी। अब नहीं होता। अब तो मालूम होता है कि ऐसा ही होगा। अब डर लगता है। हर नए व्यक्ति से बात करने में एक दूरी बना के रखती हूँ। कभी थोड़ा जुड़ाव लगता भी है तो जान बूझ कर कुछ दिन बात करना बंद कर देती हूँ। टूटते टूटते कितना ही हौसला रखें कि ख़ुद को सम्हाल लेंगे। फिर लोगों में इतनी तमीज़ कहाँ होती कि अलविदा कह के जाएँ ज़िंदगी से दूर। जब तुम जा सकते हो बिना अलविदा कहे हुए, तो अब हमको किसी से कोई उम्मीद करनी ही नहीं है।
दुःख तुम्हारे जाने का है। बदला अपने दिल से और पूरी दुनिया से लेंगे।
Musings, Shorts
वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार-सू

मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था

याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’

भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था

***

बता ज़िंदगी। ऐसा ही होगा क्या। हमेशा। कि हम अकेले रह जाएँगे किसी के होने और ना होने का हिसाब करते हुए? बहुत दिन इंतज़ार करने के बाद इक सुबह सोचते कि अब शायद एक तारीख़ मुक़र्रर करनी होगी, जिस तारीख़ तक उसे याद किया जाए और फिर भूलने की क़वायद शुरू हो। कि कितना डर लगता है ऐसी किसी तारीख़ से।

हमने कौन सा कुनबा माँग लिया? मतलब, भगवान क़सम, हमसे ज़्यादा लो-मेंट्नेन्स होना नामुमकिन है। दोस्ती में, प्रेम में… किसी भी और रिश्ते में। हथेली फैला कर कुछ नहीं माँगते। जितना सा हक़ है, उससे एक ज़रा ज़्यादा नहीं माँगा कभी, भले कम में ही एडजस्ट कर लिए कभी ज़रूरत पड़ी तो। हमेशा सामने वाला का हालत समझे, रियायत बरते। हम तो दर्द मरते रहे लेकिन परिवार से भी कभी अपने हिस्से का वक़्त, प्रेम, मौजूदगी के लिए लड़ाई नहीं की। एक ग्लास पानी माँग कर नहीं पिया कभी। 

यही तुम्हारा न्याय है? किसी को हमारी याद नहीं आएगी और हम बिसरते जाएँगे इंतज़ार में। कितनी बार यही बात दोहरायी जाएगी? किसी को दूर जाना है तो क़रीबी होने के बाद क्यूँ? फ़ासला हमेशा से क्यूँ नहीं रख सकते। चाह इतनी ही है ना कि कभी एक फ़ोन करने के पहले सोचना ना पड़े। कि whatsapp पर भेजा कोई मेसेज महीने भर तक ग्रे ना रहे… नीले टिक्स आ जाएँ कि पढ़ लिया गया है। कि बातें रहें। थोड़ी सी सुख की, थोड़ी सी दुःख की। शहर के मौसम, पढ़ी गयी कविताएँ और जिए गए दिन, दोपहर, शामें रहें… थोड़ी बारिश, थोड़ा विंडचाइम की आवाज़ भेज सकूँ। फिर जाना है तो कह क्यूँ नहीं सकते? कितना मुश्किल है इतना भर कह देना कि आजकल हम बहुत व्यस्त होते जा रहे हैं… या कि एक आख़िरी बार बहुत सी बात कर ली जाए… बात जिसमें अलविदा का स्वाद हो… खारा। बात करते हुए गला रूँध जाए। आँख बेमौसम भर आए। इतना सा अलविदा ही तो माँगे, हम तो किसी के रुकने तक का नहीं कहते। 

हमें कब आएगा अपने दिल को किसी इमोशन-टाइट-प्रूफ़ डिब्बे में बंद करके दफ़ना देना। हम कब हो सकेंगे ऐसे कि अपनी तन्हाई के साथ बिना रोए कलपे रह सकें। इस शहर की चुप्पी को आत्मसात कर सकें। सह सकें दुःख। 

बता ज़िंदगी। खेलती ही रहोगी हमारे काँच दिल से? टूटता ही रहेगा, उम्र भर? दुखता ही रहेगा ऐसे? हम कब सीखेंगे अपने हालात के साथ सामंजस्य बिठाना। 

कि इससे अच्छा तो कर लिए होते गुनाह कुछ। तोड़ा होता बेरहम होकर दिल किसी का। किसी की दोस्ती ठुकरायी होती। किसी के स्नेह पर सवाल किए होते। किसी को आदर की जगह दुत्कार दिए होते। कमसेकम ये तो लगता कि ये हमारी सज़ा है। 

निर्दोष होने का गुनाह है हमारा?

Musings, Shorts

तुम्हें पता है जानां, तुम्हारे शहर पर तुम जो ताला लगा के रखे हो…हम जाने कितनी रात से सपने में जाते हैं और शहर को बाहर से देख कर आ जाते हैं। शहर की चहारदिवारी के आसपास भटकते हैं कितनी कितनी देर। खड़े खड़े इंतज़ार करते हैं तुम्हारा।

तुम्हें पता है जानां…सपने के इस इंतज़ार से भर दिन मेरे घुटने दर्द करते हैं। मैं कितनी कितनी देर भटकती रहती हूँ शहर के बाहर वाले रास्ते पर। कभी कभी तो यूँ भी हुआ है कि गयी हूँ तुम्हारे शहर और दूर हूँ बहुत तुमसे। मैं चलती हूँ आती हूँ मगर सड़क है की बढ़ती ही चली जाती है.. कई कई मील। मैं सपने में चलते चलते, सच की ज़िंदगी में थक जाती हूँ।

जानां। सपनों में खोलो दरवाज़ा। मुझे आने दो तुम्हारे शहर। मुझे घुमाओ ज़रा सा कोई ख़ुशगवार मौसम। तुम्हारी कमी बदन में दर्द होकर दुखती है। मिलो मुझसे सपने में। दिखाओ मुझे कोई ख़ाली पड़ी बेंच कि जिसपर बैठ कर तुम्हारे साथ पी सकूँ कॉफ़ी। दूर हो मेरा सर दर्द। मिले मेरे सफ़र को मंज़िल कोई।

मिलो सपने में। मिलो सपने के शहर में। कि इस दर्द में कितना चलूँ मैं, मेरी जान! तुम्हारे हिस्से का ढेर सारा प्यार लिए दिल जो धड़कता है…दुखने लगता है। सम्हालो अपने हिस्से का प्यार, मुझे लौटाओ मेरे हिस्से का प्यार। थोड़ा अदला बदली कर लेते हैं। थोड़ा मेरा मन शांत हो, थोड़ा तुम्हारा मन अशांत। थोड़ा सुख का एक क़तरा, मेरे शहर के आसमान में मुस्कुराए। थोड़ा मेरे दुःख का बादल तुम्हारे शहर को भिगो दे।

ज़रा से तुम मेरे हुए जाओ, थोड़ा सा तुम्हारा शहर किसी और के नाम लिख दो। थोड़ा सा याद रखो मुझे। थोड़ा सा भूल जाऊँ मैं कि कितना दर्द है।

जानां। सपनों के उस शहर के दरवाज़े पर इंतज़ार लिखा है। उसे मिटा कर मेरे आने के लिए ‘स्वागतम’ लिख दो। मैं आऊँ तुम्हारे शहर तो मिलो मुझसे। कहो कि ख़त्म हुआ सफ़र। कि मैं लौट सकूँ ज़िंदगी में, क़दमों में तेज़ी और दिल में धड़कता हुआ तुम्हारा नाम लेकर।

ढेर सारा प्यार।

#soulrunes #daysofbeingwild #inthemoodforlove #thegirlthatwas#midnightmadness #cityshots #almostlovers

Musings, Shorts

एक बहुत ही सुफ़ेद दोपहर थी। नीले आसमान और सफ़ेद बादलों वाली। चमकीली। हवा की खुनक यादों के साथ मिल कर जी को उदास कर रही थी। ये दिल्ली की फ़रवरी का मौसम था। इसी मौसम उसने पहली बार किसी से गुज़ारिश की थी, ‘मेरे साथ एक सिगरेट पिएँगे आप? प्लीज़’। एक सिगरेट बाँट के पीते हुए पहली बार उनकी उँगलियाँ छू गयी थीं। उसने याद करने की कोशिश की कि उसने कौन से कपड़े पहने थे। मगर चमकीली धूप में आँखें चुंधिया रहीं थीं और दिख नहीं रहा था कुछ साफ़। 

धूप पीली नहीं, एकदम सफ़ेद थी। उसने ईंट लाल सूती साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी। आज शहर से दूर एक मंदिर जाने का प्रोग्राम था…उसका मूड बहुत अच्छा था। सब कुछ उसने सोच रखा था। मंदिर के पत्थर के किसी स्तम्भ से टिक कर बैठे रहना। पत्थर की गरमी। मंदिर से दिखता नंदी हिल्ज़। सामने का सीढ़ियों वाले कुंड का हरा पानी। मंदिर की गंध जिसमें अगरबत्ती का धुआँ, कपूर, गुलाब और बेली के फूल, और घी की मिलीजुली महक थी। वहाँ की शांति, हवा की हल्की सरसराहट। खुले बालों को पीछे करते हुए कलाई में काँच की चूड़ियों की खनक। सब कुछ उसकी आँखों के सामने था। गाड़ी की सारी खिड़कियाँ खोल कर गुनगुनाती हुयी ड्राइव कर रही थी वो कि तभी रास्ते में एक पागल ट्रक वाले ने कार पीछे से ठोक दी। सारा सपना किर्च किर्च बिखरा। वो अपने घबराए जी को सम्हाले हुए घर लौट आयी थी। मन की थकान थी कुछ। 

किताबों के साथ रहने पर तन्हाई का अहसास कुछ कम होता था। उसने बेड पर दो तीन किताबें बिखेर दीं। एक उपन्यास पढ़ना शुरू किया। हिंदी का ये उपन्यास बहुत दिन बाद फिर से उठाया था, दो तीन बार पढ़ने की कोशिश कर के रख चुकी थी। कश्मीरी केसर के ज़िक्र से उसे २००५ की कश्मीर ट्रिप याद आयी। केसर के फूलों वाले खेत। बैंगनी फूल और उनके अंदर केसर का रंग और उँगलियों के बीच रह गयी ज़रा सी उनकी ख़ुशबू। 

नींद नहीं आती दोपहरों में। जब दर्द की जगह नहीं मालूम हो तो दर्द बदन में नहीं, आत्मा में होता है। आँख से निकले आँसू अगर ज़मीन पर नहीं गिरते तो आत्मा में जज़्ब हो जाते हैं। उसका जी किया कि आत्मा को धूप भरी खिड़की पर परदे की तरह डाल कर सूखने के लिए छोड़ दे। 

थोड़ी किताब। थोड़ी याद। थोड़ा शहर। थोड़ा डर।

बहुत दिन बाद उसके मन में वाक्य उभरा। ‘मैं तुमसे प्यार करती हूँ’। ऐसा लगा कि वो अपनी ही कहानी का किरदार है कोई। उसे रूद्र की याद आयी। ऐसे जैसे कोई बहुत प्यारा खो गया हो ज़िंदगी से। उसने चाहा कि रूद्र वाक़ई में होता तो उसके सीने से लग कर रोती बहुत सा। उसे इतने दिन में पहली बार उस प्यार का अहसास हुआ जो रूद्र उससे करता है। जैसे धूप करती है उसकी आँखों से प्यार। एक गर्माहट की तरह। उसे अच्छा लगा कि उसने ऐसा कोई किरदार रचा है। 

उसे वो दोपहर याद आयी जब उसने पहली बार रूद्र की सुनहली आँखें देखी थीं। धूप उगाती आँखें। जो एक बार तुम पर पड़ें तो लगे कि तुम दुनिया की हर मुश्किल से लड़ सकते हो। उसे मालूम नहीं था उसकी आँखों का रंग कैसा होगा। उसने फ़ोन पर कैमरा ओपन किया तो उसकी नज़र पिछली दोपहर की खींची एक तस्वीर पर पड़ी। 

तब उसने जाना, आप प्रेम में उन किरदारों की तरह हो जाते हो जिनसे आपने प्यार किया है। 

जिन्होंने रूद्र को नहीं देखा है कभी, उसकी आँखें ऐसी दिखती हैं। मेरी आँखें भी। 

Musings, Shorts

एक बहुत ही सुफ़ेद दोपहर थी। नीले आसमान और सफ़ेद बादलों वाली। चमकीली। हवा की खुनक यादों के साथ मिल कर जी को उदास कर रही थी। ये दिल्ली की फ़रवरी का मौसम था। इसी मौसम उसने पहली बार किसी से गुज़ारिश की थी, ‘मेरे साथ एक सिगरेट पिएँगे आप? प्लीज़’। एक सिगरेट बाँट के पीते हुए पहली बार उनकी उँगलियाँ छू गयी थीं। उसने याद करने की कोशिश की कि उसने कौन से कपड़े पहने थे। मगर चमकीली धूप में आँखें चुंधिया रहीं थीं और दिख नहीं रहा था कुछ साफ़। 

धूप पीली नहीं, एकदम सफ़ेद थी। उसने ईंट लाल सूती साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी। आज शहर से दूर एक मंदिर जाने का प्रोग्राम था…उसका मूड बहुत अच्छा था। सब कुछ उसने सोच रखा था। मंदिर के पत्थर के किसी स्तम्भ से टिक कर बैठे रहना। पत्थर की गरमी। मंदिर से दिखता नंदी हिल्ज़। सामने का सीढ़ियों वाले कुंड का हरा पानी। मंदिर की गंध जिसमें अगरबत्ती का धुआँ, कपूर, गुलाब और बेली के फूल, और घी की मिलीजुली महक थी। वहाँ की शांति, हवा की हल्की सरसराहट। खुले बालों को पीछे करते हुए कलाई में काँच की चूड़ियों की खनक। सब कुछ उसकी आँखों के सामने था। गाड़ी की सारी खिड़कियाँ खोल कर गुनगुनाती हुयी ड्राइव कर रही थी वो कि तभी रास्ते में एक पागल ट्रक वाले ने कार पीछे से ठोक दी। सारा सपना किर्च किर्च बिखरा। वो अपने घबराए जी को सम्हाले हुए घर लौट आयी थी। मन की थकान थी कुछ। 

किताबों के साथ रहने पर तन्हाई का अहसास कुछ कम होता था। उसने बेड पर दो तीन किताबें बिखेर दीं। एक उपन्यास पढ़ना शुरू किया। हिंदी का ये उपन्यास बहुत दिन बाद फिर से उठाया था, दो तीन बार पढ़ने की कोशिश कर के रख चुकी थी। कश्मीरी केसर के ज़िक्र से उसे २००५ की कश्मीर ट्रिप याद आयी। केसर के फूलों वाले खेत। बैंगनी फूल और उनके अंदर केसर का रंग और उँगलियों के बीच रह गयी ज़रा सी उनकी ख़ुशबू। 

नींद नहीं आती दोपहरों में। जब दर्द की जगह नहीं मालूम हो तो दर्द बदन में नहीं, आत्मा में होता है। आँख से निकले आँसू अगर ज़मीन पर नहीं गिरते तो आत्मा में जज़्ब हो जाते हैं। उसका जी किया कि आत्मा को धूप भरी खिड़की पर परदे की तरह डाल कर सूखने के लिए छोड़ दे। 

थोड़ी किताब। थोड़ी याद। थोड़ा शहर। थोड़ा डर।

बहुत दिन बाद उसके मन में वाक्य उभरा। ‘मैं तुमसे प्यार करती हूँ’। ऐसा लगा कि वो अपनी ही कहानी का किरदार है कोई। उसे रूद्र की याद आयी। ऐसे जैसे कोई बहुत प्यारा खो गया हो ज़िंदगी से। उसने चाहा कि रूद्र वाक़ई में होता तो उसके सीने से लग कर रोती बहुत सा। उसे इतने दिन में पहली बार उस प्यार का अहसास हुआ जो रूद्र उससे करता है। जैसे धूप करती है उसकी आँखों से प्यार। एक गर्माहट की तरह। उसे अच्छा लगा कि उसने ऐसा कोई किरदार रचा है। 

उसे वो दोपहर याद आयी जब उसने पहली बार रूद्र की सुनहली आँखें देखी थीं। धूप उगाती आँखें। जो एक बार तुम पर पड़ें तो लगे कि तुम दुनिया की हर मुश्किल से लड़ सकते हो। उसे मालूम नहीं था उसकी आँखों का रंग कैसा होगा। उसने फ़ोन पर कैमरा ओपन किया तो उसकी नज़र पिछली दोपहर की खींची एक तस्वीर पर पड़ी। 

तब उसने जाना, आप प्रेम में उन किरदारों की तरह हो जाते हो जिनसे आपने प्यार किया है। 

जिन्होंने रूद्र को नहीं देखा है कभी, उसकी आँखें ऐसी दिखती हैं। मेरी आँखें भी। 

***

वसंत हमारा दुलरुआ मौसम है, हमसे उतना ही लाड़ करता है जितना हम उससे। जब बुलाते हैं चला आता है, कोई नख़रा नहीं, कोई शैतानी नहीं। कभी कोई साड़ी पहन लेते हैं पीली तो लगता है वसंत आया हुआ है। कभी आँखों में धूप उगने लगती है, अमलतास रंग में। हम ज़रा सा पलाश की लहक माँगते हैं मुस्कुराहटों के लिए और मन के बौराएपन को होलियाना कहते हैं। 

वसंत कभी कभी एक शहर होता है, जिसमें हम रहते हैं। 

***

उसके बदन में एक स्याह रग है 

उसके मन में एक स्याह राग बजता है इन दिनों। कोई मेघ मल्हार गाने की जगह राग दीपक छेड़ देता है। वीणा के तार पर उसकी साँवली उँगलियाँ थरथराती हैं। वो चाहती है कि कोई उसकी उसके माथे पर रखे बर्फ़ की ठंढी पट्टियाँ। कहानी का एक किरदार आता भी है दुनिया के दूसरे छोर से, लेकिन अचानक से शहर का मौसम बदल जाता है। बेतहाशा बारिश होती है। वो तपता बदन लिए छत पर है। लोहे की रेलिंग वाली सीढ़ियों पर भीगती रहती है जबतक कि बारिश का सारा पानी उसके बदन को छू कर भाप न बन जाए। 

रूद्र उसकी रॉयल एनफ़ील्ड का भी नाम है और उस किरदार का भी जिससे उसने ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा प्यार किया है। वो सोचती है, अगर आज कार की जगह एनफ़ील्ड से गयी होती तो ट्रक के इस ऐक्सिडेंट में जान जानी ही थी। वो चाहती है कि किसी ईश्वर का शुक्रिया अदा करे, लेकिन ईश्वर से उसे बाक़ी चीज़ें माँगनी हैं। फिर ईश्वर उसके साथ लुका छिपी का खेल खेल भी तो रहा है। कहाँ तलाशे ऐसा कोई अवतार जो सुन सके दुआयें। 

भर दिन सोचती रही उन चिट्ठियों के बारे में जो उसकी नोटबुक में रखी रहती थीं जो इस ट्रिप में भेज आयी है। कि उसके पास इन दिनों कोई अधूरी चिट्ठी नहीं है। धूप उसे थपकियाँ देती है मगर नींद नहीं आती। उसकी आधी नींद में काग़ज़ उगता है। चिट्ठियों की कोई नाज़ुक सी लता जिसमें पीले रंग के काग़ज़ वाले फूल खिलते हैं। 

क़िस्सों में एक दोपहर होती है। बिलकुल वैसी बचपन वाली जैसी दोपहरें अब सिर्फ़ कहानियों में मिलती हैं। वो कोई मीठी धुन गुनगुना रही है और पुदीना की पत्तियाँ चुन रही है। बहुत दिनों बाद कोई लम्हा है जो अपने घटते हुए भी लगता है कि हमेशा रहेगा। एक ठहरी सी दोपहर में। एक गुनगुनाहट की तन्हाई में। जैसे सिर्फ़ उसके लिए हो ये लम्हा। उसका अपना पर्सनल। वो मुट्ठी में लम्हा बंद करने की कोशिश करती है लेकिन सिर्फ़ एक गंध रहती है बाक़ी। वो हँसती है, जैसे कि उसे पागल हो जाने का डर ना हो। उसकी हँसी किसी के शर्ट के चेक्स में उलझ जाती है। जैसे बचपन में मैथ की नोट्बुक के छोटे छोटे स्क्वेयर में उसकी कविताएँ उलझ जाती थीं। कच्ची, अनगढ़ कविताएँ। वो चाहती है याद में कोई इंफिनिटी सिम्बल बनाना कि लम्हा कहीं ना जा सके। किरदार से पूछती है, मैं जो रचती हूँ तुम्हें, तुम्हें याद रहता है स्याही का रंग। किरदार की आँखें हल्की भूरी हैं। उसने अभी तक उसे हँसना सिखाया नहीं है, ना आवाज़ रची है उसकी। किरदार देखता है उसे और मुस्कुराता है। वो जानती है, उसे मर जाना है जल्दी। वो चाहती है। कह सके सारे किरदारों से। इत्मीनान से। प्यार है तुमसे। बहुत। लेकिन शब्दों को रिपीट ना करने का उसे ख़ुद से किया वादा याद आ जाता है। इसलिए कुछ किरदारों के हिस्से दुःख लिखती है, कुछ के हिस्से विसाल, कुछ के हिस्से शाम और बारिश…बस एक उसके हिस्से लिखने का मन करता है। प्यार। बहुत। 

Musings, Poetry

जो रंग तुम्हारे हैं, मेरे पास रहने दो…

Screen Shot 2018-06-07 at 8.59.25 PM

 

 

 

सब कुछ बीत जाने के बाद
सिर्फ़ एक रंग में बचा रह जाता है प्रेम

तुम बिसर गए हो
मौसम अब ऊँगली थाम कर
नहीं ले जाते तुम्हारे शहर

कोई अच्छी कविता
पढ़ लेती हूँ अकेली
और दुखता नहीं

फ़िल्में, गाने, किताबें
कुछ भी तुमसे साझा करने को
अब हूक नहीं उठती

ज़िंदगी में बहुत रंग हैं
और हर रंग के हज़ार क़िस्से
लेकिन नीला
हमेशा उस शर्ट का रंग रहेगा
जो तुमने आख़िरी मुलाक़ात में पहनी थी।

Poetry

कोई कविता आख़िरी नहीं होती, ना कोई प्रेम

कविता हलक में अटकी है
होठों पर तुम्हारा नाम

और साँस में मृत्यु

***

क़लम को सिर्फ़ कहानियाँ आती हैं।
ज़ुबान को झूठ।

तुम्हें तो तरतीब से मेरा नाम लेना भी नहीं आता।

***

कविता लिखने को ठहराव चाहिए।
जो मुझमें नहीं है।
***
मैंने अफ़सोस को अपना प्रेमी चुना है
तुम्हारा डिमोशन हो गया है

‘पूर्व प्रेमी’

***
शहर, मौसम, सफ़र
मेरे पास बहुत कम मौलिक शब्द हैं
इसलिए मैं हमेशा एक नए प्रेम की तलाश में रहती हूँ

***

तुम्हें छोड़ देना
ख़यालों में ज़्यादा तकलीफ़देह था
असल ज़िंदगी में तो तुम मेरे थे ही नहीं कभी
***
मैंने तुमसे ही अलविदा कहना सीखा
ताकि तुम्हें अलविदा कह सकूँ
***
तुम वो वाली ब्लैक शर्ट पहन कर
अपनी अन्य प्रेमिकाओं से मत मिलो
प्रेम का दोहराव शोभा नहीं देता

***

तुम्हारे हाथों में सिगरेट
क़लम या ख़ंजर से भी ख़तरनाक है

तुम्हारे होठों पर झूलती सिगरेट
क़त्ल का फ़रमान देती है

तुम यूँ बेपरवाही से सिगरेट ना पिया करो, प्लीज़!

***

‘तुम्हें समंदर पसंद हैं या पहाड़?’
मुझे तुम पसंद हो, जहाँ भी ले चलो।
***
‘तुम्हारी क़लम मिलेगी एक मिनट के लिए?’
‘मिलेगी, अपना दिल गिरवी रखते जाओ।’
कि इस बाज़ार में ख़रा सौदा कहीं नहीं।

***
आसमान से मेरा नाम मिटा कर
तसल्ली नहीं मिलेगी तुम्हें

कि दुःख की फाँस हृदय में चुभी है
***
कोई कविता आख़िरी नहीं होती, ना कोई प्रेम
हम आख़िरी साँस तक प्रेम कर सकते हैं
या हो सकते हैं कविता भी।