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कच्चे रंग धुला पानी

अक्सर लगता है कि देर रात जब नींद न आ रही हो…या आधी आ रही हो पर बची खुची ग़ायब हो तो दिमाग़ में जो फ़िल्म चलती है…वो सबसे सच्ची होती है। 

जैसे अभी कोई दो घंटे से नींद आ नहीं रही, जबकि बहुत देर हो चुकी है…तब से ही पानी के रंगों से पेंट करने का मन कर रहा है। छोटे छोटे नीले पहाड़, एक आधी सुनहरी ज़मीन पर पेड़ और ज़रा सी घास। क़ायदे से ऐसी तस्वीर में हमेशा एक नदी होती थी और चाँद…एक नाव होती थी पाल वाली और उसमें अकेली बैठी एक लड़की, जाने क्या सोचती हुयी। मैं छोटी थी तो ये वाली पेंटिंग ख़ूब बनाती थी। मेरे घर के पीछे एक पोखर था और पूर्णिमा में चाँद बड़ा सा दिखता था पोखर के पाने के ऊपर से। मैं बड़ी सी झील की कल्पना करती थी और उसमें किसी नाव में देर रात तक अकेले जा रही होती थी। उन दिनों ऐसे अकेले अकेले चले जाने में या रात को इस तरह झील पर नाव में बैठे होने में डर नहीं लगता था। मैं छोटी थी। डर मेरे लिए कोई किताब की चीज़ थी। टैंजिबल नहीं। काल्पनिक। 

मेरे लिए चीज़ों के सच होने की शर्त इतनी ही है कि मैं उसे छू सकूँ। पहली बार उससे मिली थी तो हाथ मिलाया था। उसने मेरा हाथ थामे रखा था जितनी देर, वो सच लगा था। फिर हम जब उस हॉल से बाहर निकल आए और उसका हाथ छूट गया…वो फिर से किसी कहानी का किरदार लगने लगा। 

मैं रंग घोल कर उनमें उँगलियाँ डुबो कर पेंट किया करती थी। पहले मुझे रंग बहुत पसंद थे। अब भी उँगलियों में इंक लगी ही रहती है अक्सर। इतनी देर रात अब पेंट करने जाऊँगी तो नहीं… लेकिन मन कर रहा है। कुछ ऐब्स्ट्रैक्ट बनाने का इस बार। कुछ रंग हों जो उसके शहर की याद दिलाएँ…थोड़ा सलेटी, सिगरेट के धुएँ की तरह, काले रंग से कुछ आउट्लायन बनाऊँ कि जैसे उसके जानने में कुछ हिस्से प्रतिबंधित कर देना चाहती हूँ…बहुत ईमानदार नहीं होना चाहिए। थोड़े से फ़रेब से बचा रहता है जीवन का उत्साह। उल्लास। 

आज दोस्त से बात कर रही थी। बहुत दिन बाद। मैंने समझदार की तरह कहा, ‘वैसे भी, सब कुछ कहाँ मिलता है किसी को ज़िंदगी में’। उसने कहा, ‘मिलना चाहिए…तुम्हें तो वाक़ई सब कुछ मिलना चाहिए’। मैंने नहीं पूछा कि क्यूँ। ऐसा क्या ख़ास है मुझमें, कि मुझे ही सब कुछ मिलना चाहिए। मैं बस ख़ुश थी कि कितने दिन बाद उससे बात कर रही हूँ। चैट पर ख़ूब ख़ूब बतियाए बहुत दिन बीत जाते हैं। हमने बाक़ी दोस्तों की बात की। मैंने कहा, कि मैं उसे बहुत मिस करती हूँ। बस, एक उस दोस्त के जाने के बाद मन एकदम ही दुःख गया। अब किसी नए व्यक्ति से दूरी बना के रखती हूँ, जो लोग अच्छे लगते हैं, उनसे तो ख़ास तौर पर। 

कम कम लोग रहे ज़िंदगी में, जिनसे बहुत बहुत प्यार किया। अब उनके जाने के बाद के वे ख़ाली हिस्से भी मेरे हैं…वहाँ थोड़े ना नए किरायेदार रख लूँगी। ये जो ज़िंदगी का दस्तूर है, आने जाने वाला…वो अब नहीं पसंद। कोई न आए, सो भी बेहतर। 

और मुहब्बत…उसने पूछा नहीं, लेकिन मैंने ख़ुद ही कह दिया। यार, ७०% पर उपन्यास अटका है, एक छोटी सी लव स्टोरी नहीं लिखा रही…कि जैसी कहानी एक समय में आधी नींद में लिख दिया करती थी…हम बदल गए हैं। वाक़ई। उसने उदास होकर पूछा, किसने तोड़ा तुम्हारा दिल, दोस्त… हम क्या ही तुम्हारा नाम लेते, सो कह दिया, ज़िंदगी। लेकिन देखो। झूठ नहीं कहा ना?

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कहते हैं, change is the only constant. इस दुनिया में कुछ भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता। चीज़ें बदलती रहती हैं। जो हमारे लिए ज़रूरी है…वो भी ज़िंदगी के अलग अलग मोड़ पर बदलता रहता है। हम भी किन्हीं दो वक़्त में एक जैसे कहाँ होते हैं। फिर बदलाव हमें पसंद भी हैं…वे ज़िंदगी को मायना देते हैं। एक थ्रिल है कि कुछ भी पहले जैसा कभी दुबारा नहीं होगा। 

लेकिन फिर भी। हम चाहते हैं कि कुछ चीज़ें न बदलें। कुछ रिश्ते, कुछ लोग हमारे बने रहें। कुछ चीज़ों के कभी न बदलने का भरोसा हमें राहत देता है। घर, परिवार, कुछ पुराने दोस्त, बचपन की कुछ यादें… जैसे मेरा बचपन देवघर में बीता। मैं वहाँ तक़रीबन ११ साल रही। पूरी स्कूलिंग वहीं से की। वहाँ मिठाई की एक दुकान है – अवंतिका। इतने सालों में भी वहाँ मिलने वाले रसगुल्लों का स्वाद जस का तस है। इसी तरह कभी कभार बस से गाँव जा रहे होते थे तो बेलहर नाम की जगह आती थी जहाँ पलाश के पत्ते के दोने में रसमलाई मिलती थी। सालों साल उसका स्वाद याद रहा और उस स्वाद को फिर तलाशते भी रहे। वहाँ हमारे एक दूर के रिश्ते के भाई रहते थे… मुन्ना भैय्या। बिना मोबाइल फ़ोन वाले उस ज़माने में हम जब भी वहाँ से गुज़रे… वो हमेशा वहाँ रहते थे। एक दोना रसमलाई लिए हुए। मुझे उनकी सिर्फ़ एक यही बात सबसे ज़्यादा याद रही। अब भी कभी गाँव जाने के राते बेलहर आता है लेकिन अब भैय्या वहाँ नहीं रहते और कौन जाने किस दुकान की रसमलाई थी वो। देवघर से दुमका जाने के रास्ते में ऐसे ही एक जगह आती है घोरमारा/घोड़मारा… वहाँ सुखाड़ी साव पेड़ा भंडार था जिसके जैसा पेड़ा का स्वाद कहीं नहीं आता था। जब सुखाड़ी साव नहीं रहे तो उनकी दुकान दो हिस्से में बँट गयी – उन के दोनों बेटों ने एक एक हिस्सा ले लिया। लेकिन वो पेड़े का स्वाद बाँटने के बाद खो गया और फिर कभी नहीं मिला। 

मेरी स्मृति में खाने की बहुत सी जगहें हैं। हर जगह के साथ एक क़िस्सा। हम लौट कर उसी स्वाद तक जाना चाहते हैं… कि माँ के जाने के बाद ज़िंदगी में एक बड़ी ख़ाली सी जगह है… माँ के हाथ के खाने के स्वाद की… या बचपन की… कभी कभी घर जाती हूँ और दीदियाँ कुछ बनाती हैं तो लगता है, शायद… ऐसा ही कुछ था… या कि चाची के हाथ का कुछ खाते हैं तो। लेकिन कभी कह नहीं पाते उनसे… कि कुछ दिन हमको मेरे पसंद का खाना बना के खिला दीजिए। 

मेरा एक क़रीबी और बहुत प्यारा दोस्त था। जैसा कि सब दोस्तों के बीच होता है इस टेक्नॉलजी की दुनिया में… हमारे दिन की पूरी खोज ख़बर एक दूसरे को रहती थी। हम किसी शहर में हैं… हम किसी ख़ूबसूरत आसमान के नीचे हैं… हम किसी समंदर के पास हैं। सोशल मीडिया पर जाने के पहले वे तस्वीरें पर्सनल whatsapp में जाती थीं। मेरी भी, उसकी भी। आज उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर देखीं। ये किसी ब्रेक ऑफ़ से ज़्यादा दुखा। 

हम नहीं जानते कि कब हम किसी से दूर होते चले जाएँगे। किसी की ज़िंदगी में हमारी प्रासंगिकता कम हो जाएगी, हमारी ज़रूरत कम हो जाएगी और हमसे लगाव कम हो जाएगा। ये नॉर्मल है। इससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन जो चाहिए, वो हो पाए…इतनी आसान कब रही है ज़िंदगी। हमें मोह हुआ रहता है। हम कुछ चीजों को यथासम्भव एक जैसा रखना चाहते हैं। कुछ चीज़ों को। कुछ रिश्तों को। 

अक्सर जब हम सबसे ज़्यादा अकेला महसूस करते हैं तो हम सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति को याद कर रहे होते हैं। सिर्फ़ किसी एक को। बस उसके न होने से पूरी दुनिया वाक़ई ख़ाली लगती है। किसी और के होने न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। ऐसा अक्सर उन लोगों के साथ होता है जिनकी ज़िंदगी में लोग थोड़े कम हों… ऐसे में किसी के होने की विशिष्टता इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि उसके जैसा कोई भी महसूस नहीं होता। उसके आसपास तक का भी नहीं। हम उस रिश्ते को निष्पक्ष भाव से देख कर उसका आकलन नहीं कर पाते हैं। हम बाइयस्ड होते हैं। 

इस ख़ाली जगह को सिर्फ़ किताबों या सफ़र से भरा जा सकता है। थोड़ा सा खुला आसमान कि जो किसी पुरानी इमारत पर जा कर ख़त्म होता हो। थोड़ा सा किसी खंडहर का एकांत। कुछ चुप्पे किरदार जो दिमाग़ में ज़्यादा हलचल न मचाएँ। हम पुराने शहरों में ही पुराने लोगों को भूल सकते हैं। पुराने रिश्ते जब पुरानी इमारतों के इर्द गिर्द टूटते हैं तो उनका टूटना थोड़ा ज़्यादा स्थाई भी होता है और दुखता भी कम है। इसलिए पुरानी दिल्ली से आ कर मुझे साँस थोड़ी बेहतर आती है। 

सोचती हूँ…तुम्हें भुलाने के लिए किस शहर का रूख करूँ… फिर शायद वहाँ की तस्वीरें कहीं पर भी पोस्ट न करूँ… क्या ही फ़र्क़ पड़ता है कि आसमान का रंग कैसा था या कि पत्थर में कितनी धूप रहती थी। 

मैं भी तो बदल रही हूँ तुम्हारे बग़ैर। चीज़ों को सहेजने की ख़्वाहिश मिटती जा रही है। कि तुम मेरी ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा क़ीमती थे। पता नहीं, तुम्हें भी क्या ही सूझी होगी जो किसी रोज़ यूँ ही चले आए मेरी ज़िंदगी में। अब जब इसी तरह यूँ ही चले भी गए हो तो तुम्हारे बिना सब चीज़ें फ़ालतू और बेकार लगती हैं। क्या ही रखें कहीं। क्या लिखें। क्यूँ। किसके लिए?

अगर सब कुछ खो ही जाता है…खो ही जाना है इक रोज़ तो मैं भी चुप्पे चली जाऊँ न…
अलविदा कहना शायद तुम्हें भी नहीं आता है।

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There is something wrong with the way I love. Maybe there is some right way to love people, cities, objects… a way that makes you immensely happy when you are around them and gives you strength to endure their absence. 

A way in which you do not become a raving lunatic every time the name crops up in normal everyday conversations. Maybe some people love without getting so attached to their object of desire and get less hurt when they have to let go. Do I obsess too much? Have I given undue importance to love in my life? Making it the centre of everything there is. Poetry I read, films I watch, sunsets that become a part of my city…maybe they are not about love.  Maybe love actually should just be a part of life. Maybe we should do things with a certain detachment to begin with. 

Love is not about pain. It should not be. If loving would hurt so much every time, eventually, I would be and should be afraid to love. Maybe being sarcastic or cynic has its benefits. Maybe creating a self defence wall around the heart helps. 

Maybe. There might be a love in the world that hurts a little less.

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फ़ासले ऐसे भी होंगे

आज सुबह नींद खुली और आदतन फ़ोन की ओर हाथ नहीं गया। कि आदत सिर्फ़ बनने में ही वक़्त नहीं लगता, छूटने में भी तो वक़्त लगता है। रोज़ लगता था कि आज सुबह फ़ोन में तुम्हारा मेसेज होगा। कि तुमने कुछ कहा होगा। कोई तस्वीर होगी। कोई कविता का टुकड़ा होगा। कोई वजह होगी। कई सालों की आदत थी। लेकिन शायद आज दिल ने आख़िरकार मान लिया कि कोई मेसेज नहीं होगा। इस तरह उम्मीद टूट जाती है। इंतज़ार चुक जाता है।

अब हम बात करेंगे भी तो उस रोज़ की तरह नहीं जैसे पिछले कुछ सालों से करते आ रहे थे। कि हर ख़ुशी में तुम्हारा हिस्सा निकाल के रख देना ज़रूरी नहीं लगेगा। हर ख़ूबसूरत चीज़ को तुमसे बाँटने की हूक नहीं सालेगी। होगा ये सब भी, धीरे धीरे होगा।
यूँ तुम्हें भुलाने को हज़ार तरीक़े हैं। काम है, पढ़ना लिखना है, घूमने की जगहें हैं, कोई नया शौक़ पाल सकती हूँ, इस घर में तो गमले ही इतने हैं कि फूल लगा दूँ तो हज़ार रंगो में भूल जाऊँगी तुम्हारी आँखों का रंग… बहुत कुछ है जिससे ख़ुद को इस तरह व्यस्त रखा जा सके कि तुम्हारी याद नहीं आए। हालाँकि ऐसे व्यस्त रहने के बावजूद याद जिन दिनों आती है, उन दिनों आ ही जाती है। लेकिन ज़िद्दी मन ऐसा कुछ करना नहीं चाहता था। उसे तुम्हारी मौजूदगी का आश्वासन चाहिए था। तुम्हारी ज़रूरत थी। मुझे ऐसे ज़िंदगी नहीं चाहिए जिसमें लोग नहीं हों। मुझे ऐसे सुख नहीं चाहिए जिनके बारे में हुलस कर किसी को फ़ोन नहीं किया जा सके।
कि फ़िलासफ़ी पढ़ने से समझ में आ जाती है सारी चीज़ें भी। गीता का ठीक से अध्ध्ययन करने से समझ में आएगा, ‘नष्टोमोह’। लेकिन मुझे वैसी ज़िंदगी नहीं चाहिए। ‘रहने दो हे देव, अरे यह मेरा मिटने का अधिकार’ की तरह, मेरे लिए मेरा ये चोटिल और नाज़ुक मन ज़रूरी है जो प्रेम कर सकता हो। प्रेम में टूट सकता हो। मैं निष्ठुर नहीं होना चाहती। हर बार टूट कर भी फिर जुड़ने की क्षमता ही जिजीविषा है। मैं मोह-माया छोड़ना नहीं चाहती। जीवन जीने भर को प्रेम की चाह क्या बहुत ज़्यादा है?
ख़ुश रहने की किताब मिलती है बाज़ार में। एक ऐसी किताब है, हैप्पीनेस हायपोथेसिस, उसमें लिखा है कि अगर कोई रिश्ता टूटा हो और आप इस बात पर यक़ीन करना चाहते हैं कि जीवन प्रेम के बिना ही बेहतर है तो आपको फ़लसफ़े पढ़ने चाहिए। उसी किताब में लिखा है कि जब आपको प्रेम हुआ हो और आप प्रेम के अतिरेक में हों, तो आपको कविता पढ़नी चाहिए।
मैं कविता हमेशा ही पढ़ती हूँ। कविता मेरा घर है। मैं उस तक लौट कर आती हूँ थोड़े सुकून की तलाश में। मेरे सिरहाने हमेशा कविता की किताबें रहती हैं। मेरे हर बैग में कमोबेश एक ना एक कविता की किताब ज़रूर ही। मैं प्रेम में ही होती हूँ, हमेशा। अतिरेक ठीक ठीक नहीं मालूम।
लेकिन तड़प कर किसी ईश्वर से तुम्हें माँगने का मन नहीं करता। आने वाले को और जाने वाले को कौन रोक सका है। मैं दुःख के साथ विरक्ति भी महसूस करती हूँ। मेरे जीवन में तुम्हारी जगह इतनी ही थी। एक मौसम की तरह। जाड़ों का मौसम। कि तुम्हारे आने पर थोड़ी सी गरम कॉफ़ी की ज़रूरत और थोड़ी थरथराहट महसूस हुयी।
मुझसे कहते थे कुछ लोग, तुम्हें छोड़ कर कैसे रह लेते हैं लोग। तुमसे भी कोई रिश्ता तोड़ सकता है! अचरज होता था मुझे पहले भी। अब नहीं होता। अब तो मालूम होता है कि ऐसा ही होगा। अब डर लगता है। हर नए व्यक्ति से बात करने में एक दूरी बना के रखती हूँ। कभी थोड़ा जुड़ाव लगता भी है तो जान बूझ कर कुछ दिन बात करना बंद कर देती हूँ। टूटते टूटते कितना ही हौसला रखें कि ख़ुद को सम्हाल लेंगे। फिर लोगों में इतनी तमीज़ कहाँ होती कि अलविदा कह के जाएँ ज़िंदगी से दूर। जब तुम जा सकते हो बिना अलविदा कहे हुए, तो अब हमको किसी से कोई उम्मीद करनी ही नहीं है।
दुःख तुम्हारे जाने का है। बदला अपने दिल से और पूरी दुनिया से लेंगे।

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वो कि ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार-सू

मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था

याद कर के और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’

भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था

***

बता ज़िंदगी। ऐसा ही होगा क्या। हमेशा। कि हम अकेले रह जाएँगे किसी के होने और ना होने का हिसाब करते हुए? बहुत दिन इंतज़ार करने के बाद इक सुबह सोचते कि अब शायद एक तारीख़ मुक़र्रर करनी होगी, जिस तारीख़ तक उसे याद किया जाए और फिर भूलने की क़वायद शुरू हो। कि कितना डर लगता है ऐसी किसी तारीख़ से।

हमने कौन सा कुनबा माँग लिया? मतलब, भगवान क़सम, हमसे ज़्यादा लो-मेंट्नेन्स होना नामुमकिन है। दोस्ती में, प्रेम में… किसी भी और रिश्ते में। हथेली फैला कर कुछ नहीं माँगते। जितना सा हक़ है, उससे एक ज़रा ज़्यादा नहीं माँगा कभी, भले कम में ही एडजस्ट कर लिए कभी ज़रूरत पड़ी तो। हमेशा सामने वाला का हालत समझे, रियायत बरते। हम तो दर्द मरते रहे लेकिन परिवार से भी कभी अपने हिस्से का वक़्त, प्रेम, मौजूदगी के लिए लड़ाई नहीं की। एक ग्लास पानी माँग कर नहीं पिया कभी। 

यही तुम्हारा न्याय है? किसी को हमारी याद नहीं आएगी और हम बिसरते जाएँगे इंतज़ार में। कितनी बार यही बात दोहरायी जाएगी? किसी को दूर जाना है तो क़रीबी होने के बाद क्यूँ? फ़ासला हमेशा से क्यूँ नहीं रख सकते। चाह इतनी ही है ना कि कभी एक फ़ोन करने के पहले सोचना ना पड़े। कि whatsapp पर भेजा कोई मेसेज महीने भर तक ग्रे ना रहे… नीले टिक्स आ जाएँ कि पढ़ लिया गया है। कि बातें रहें। थोड़ी सी सुख की, थोड़ी सी दुःख की। शहर के मौसम, पढ़ी गयी कविताएँ और जिए गए दिन, दोपहर, शामें रहें… थोड़ी बारिश, थोड़ा विंडचाइम की आवाज़ भेज सकूँ। फिर जाना है तो कह क्यूँ नहीं सकते? कितना मुश्किल है इतना भर कह देना कि आजकल हम बहुत व्यस्त होते जा रहे हैं… या कि एक आख़िरी बार बहुत सी बात कर ली जाए… बात जिसमें अलविदा का स्वाद हो… खारा। बात करते हुए गला रूँध जाए। आँख बेमौसम भर आए। इतना सा अलविदा ही तो माँगे, हम तो किसी के रुकने तक का नहीं कहते। 

हमें कब आएगा अपने दिल को किसी इमोशन-टाइट-प्रूफ़ डिब्बे में बंद करके दफ़ना देना। हम कब हो सकेंगे ऐसे कि अपनी तन्हाई के साथ बिना रोए कलपे रह सकें। इस शहर की चुप्पी को आत्मसात कर सकें। सह सकें दुःख। 

बता ज़िंदगी। खेलती ही रहोगी हमारे काँच दिल से? टूटता ही रहेगा, उम्र भर? दुखता ही रहेगा ऐसे? हम कब सीखेंगे अपने हालात के साथ सामंजस्य बिठाना। 

कि इससे अच्छा तो कर लिए होते गुनाह कुछ। तोड़ा होता बेरहम होकर दिल किसी का। किसी की दोस्ती ठुकरायी होती। किसी के स्नेह पर सवाल किए होते। किसी को आदर की जगह दुत्कार दिए होते। कमसेकम ये तो लगता कि ये हमारी सज़ा है। 

निर्दोष होने का गुनाह है हमारा?

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तुम्हें पता है जानां, तुम्हारे शहर पर तुम जो ताला लगा के रखे हो…हम जाने कितनी रात से सपने में जाते हैं और शहर को बाहर से देख कर आ जाते हैं। शहर की चहारदिवारी के आसपास भटकते हैं कितनी कितनी देर। खड़े खड़े इंतज़ार करते हैं तुम्हारा।

तुम्हें पता है जानां…सपने के इस इंतज़ार से भर दिन मेरे घुटने दर्द करते हैं। मैं कितनी कितनी देर भटकती रहती हूँ शहर के बाहर वाले रास्ते पर। कभी कभी तो यूँ भी हुआ है कि गयी हूँ तुम्हारे शहर और दूर हूँ बहुत तुमसे। मैं चलती हूँ आती हूँ मगर सड़क है की बढ़ती ही चली जाती है.. कई कई मील। मैं सपने में चलते चलते, सच की ज़िंदगी में थक जाती हूँ।

जानां। सपनों में खोलो दरवाज़ा। मुझे आने दो तुम्हारे शहर। मुझे घुमाओ ज़रा सा कोई ख़ुशगवार मौसम। तुम्हारी कमी बदन में दर्द होकर दुखती है। मिलो मुझसे सपने में। दिखाओ मुझे कोई ख़ाली पड़ी बेंच कि जिसपर बैठ कर तुम्हारे साथ पी सकूँ कॉफ़ी। दूर हो मेरा सर दर्द। मिले मेरे सफ़र को मंज़िल कोई।

मिलो सपने में। मिलो सपने के शहर में। कि इस दर्द में कितना चलूँ मैं, मेरी जान! तुम्हारे हिस्से का ढेर सारा प्यार लिए दिल जो धड़कता है…दुखने लगता है। सम्हालो अपने हिस्से का प्यार, मुझे लौटाओ मेरे हिस्से का प्यार। थोड़ा अदला बदली कर लेते हैं। थोड़ा मेरा मन शांत हो, थोड़ा तुम्हारा मन अशांत। थोड़ा सुख का एक क़तरा, मेरे शहर के आसमान में मुस्कुराए। थोड़ा मेरे दुःख का बादल तुम्हारे शहर को भिगो दे।

ज़रा से तुम मेरे हुए जाओ, थोड़ा सा तुम्हारा शहर किसी और के नाम लिख दो। थोड़ा सा याद रखो मुझे। थोड़ा सा भूल जाऊँ मैं कि कितना दर्द है।

जानां। सपनों के उस शहर के दरवाज़े पर इंतज़ार लिखा है। उसे मिटा कर मेरे आने के लिए ‘स्वागतम’ लिख दो। मैं आऊँ तुम्हारे शहर तो मिलो मुझसे। कहो कि ख़त्म हुआ सफ़र। कि मैं लौट सकूँ ज़िंदगी में, क़दमों में तेज़ी और दिल में धड़कता हुआ तुम्हारा नाम लेकर।

ढेर सारा प्यार।

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एक बहुत ही सुफ़ेद दोपहर थी। नीले आसमान और सफ़ेद बादलों वाली। चमकीली। हवा की खुनक यादों के साथ मिल कर जी को उदास कर रही थी। ये दिल्ली की फ़रवरी का मौसम था। इसी मौसम उसने पहली बार किसी से गुज़ारिश की थी, ‘मेरे साथ एक सिगरेट पिएँगे आप? प्लीज़’। एक सिगरेट बाँट के पीते हुए पहली बार उनकी उँगलियाँ छू गयी थीं। उसने याद करने की कोशिश की कि उसने कौन से कपड़े पहने थे। मगर चमकीली धूप में आँखें चुंधिया रहीं थीं और दिख नहीं रहा था कुछ साफ़। 

धूप पीली नहीं, एकदम सफ़ेद थी। उसने ईंट लाल सूती साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी सी गोल बिंदी। आज शहर से दूर एक मंदिर जाने का प्रोग्राम था…उसका मूड बहुत अच्छा था। सब कुछ उसने सोच रखा था। मंदिर के पत्थर के किसी स्तम्भ से टिक कर बैठे रहना। पत्थर की गरमी। मंदिर से दिखता नंदी हिल्ज़। सामने का सीढ़ियों वाले कुंड का हरा पानी। मंदिर की गंध जिसमें अगरबत्ती का धुआँ, कपूर, गुलाब और बेली के फूल, और घी की मिलीजुली महक थी। वहाँ की शांति, हवा की हल्की सरसराहट। खुले बालों को पीछे करते हुए कलाई में काँच की चूड़ियों की खनक। सब कुछ उसकी आँखों के सामने था। गाड़ी की सारी खिड़कियाँ खोल कर गुनगुनाती हुयी ड्राइव कर रही थी वो कि तभी रास्ते में एक पागल ट्रक वाले ने कार पीछे से ठोक दी। सारा सपना किर्च किर्च बिखरा। वो अपने घबराए जी को सम्हाले हुए घर लौट आयी थी। मन की थकान थी कुछ। 

किताबों के साथ रहने पर तन्हाई का अहसास कुछ कम होता था। उसने बेड पर दो तीन किताबें बिखेर दीं। एक उपन्यास पढ़ना शुरू किया। हिंदी का ये उपन्यास बहुत दिन बाद फिर से उठाया था, दो तीन बार पढ़ने की कोशिश कर के रख चुकी थी। कश्मीरी केसर के ज़िक्र से उसे २००५ की कश्मीर ट्रिप याद आयी। केसर के फूलों वाले खेत। बैंगनी फूल और उनके अंदर केसर का रंग और उँगलियों के बीच रह गयी ज़रा सी उनकी ख़ुशबू। 

नींद नहीं आती दोपहरों में। जब दर्द की जगह नहीं मालूम हो तो दर्द बदन में नहीं, आत्मा में होता है। आँख से निकले आँसू अगर ज़मीन पर नहीं गिरते तो आत्मा में जज़्ब हो जाते हैं। उसका जी किया कि आत्मा को धूप भरी खिड़की पर परदे की तरह डाल कर सूखने के लिए छोड़ दे। 

थोड़ी किताब। थोड़ी याद। थोड़ा शहर। थोड़ा डर।

बहुत दिन बाद उसके मन में वाक्य उभरा। ‘मैं तुमसे प्यार करती हूँ’। ऐसा लगा कि वो अपनी ही कहानी का किरदार है कोई। उसे रूद्र की याद आयी। ऐसे जैसे कोई बहुत प्यारा खो गया हो ज़िंदगी से। उसने चाहा कि रूद्र वाक़ई में होता तो उसके सीने से लग कर रोती बहुत सा। उसे इतने दिन में पहली बार उस प्यार का अहसास हुआ जो रूद्र उससे करता है। जैसे धूप करती है उसकी आँखों से प्यार। एक गर्माहट की तरह। उसे अच्छा लगा कि उसने ऐसा कोई किरदार रचा है। 

उसे वो दोपहर याद आयी जब उसने पहली बार रूद्र की सुनहली आँखें देखी थीं। धूप उगाती आँखें। जो एक बार तुम पर पड़ें तो लगे कि तुम दुनिया की हर मुश्किल से लड़ सकते हो। उसे मालूम नहीं था उसकी आँखों का रंग कैसा होगा। उसने फ़ोन पर कैमरा ओपन किया तो उसकी नज़र पिछली दोपहर की खींची एक तस्वीर पर पड़ी। 

तब उसने जाना, आप प्रेम में उन किरदारों की तरह हो जाते हो जिनसे आपने प्यार किया है। 

जिन्होंने रूद्र को नहीं देखा है कभी, उसकी आँखें ऐसी दिखती हैं। मेरी आँखें भी।