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कच्चे रंग धुला पानी

अक्सर लगता है कि देर रात जब नींद न आ रही हो…या आधी आ रही हो पर बची खुची ग़ायब हो तो दिमाग़ में जो फ़िल्म चलती है…वो सबसे सच्ची होती है। 

जैसे अभी कोई दो घंटे से नींद आ नहीं रही, जबकि बहुत देर हो चुकी है…तब से ही पानी के रंगों से पेंट करने का मन कर रहा है। छोटे छोटे नीले पहाड़, एक आधी सुनहरी ज़मीन पर पेड़ और ज़रा सी घास। क़ायदे से ऐसी तस्वीर में हमेशा एक नदी होती थी और चाँद…एक नाव होती थी पाल वाली और उसमें अकेली बैठी एक लड़की, जाने क्या सोचती हुयी। मैं छोटी थी तो ये वाली पेंटिंग ख़ूब बनाती थी। मेरे घर के पीछे एक पोखर था और पूर्णिमा में चाँद बड़ा सा दिखता था पोखर के पाने के ऊपर से। मैं बड़ी सी झील की कल्पना करती थी और उसमें किसी नाव में देर रात तक अकेले जा रही होती थी। उन दिनों ऐसे अकेले अकेले चले जाने में या रात को इस तरह झील पर नाव में बैठे होने में डर नहीं लगता था। मैं छोटी थी। डर मेरे लिए कोई किताब की चीज़ थी। टैंजिबल नहीं। काल्पनिक। 

मेरे लिए चीज़ों के सच होने की शर्त इतनी ही है कि मैं उसे छू सकूँ। पहली बार उससे मिली थी तो हाथ मिलाया था। उसने मेरा हाथ थामे रखा था जितनी देर, वो सच लगा था। फिर हम जब उस हॉल से बाहर निकल आए और उसका हाथ छूट गया…वो फिर से किसी कहानी का किरदार लगने लगा। 

मैं रंग घोल कर उनमें उँगलियाँ डुबो कर पेंट किया करती थी। पहले मुझे रंग बहुत पसंद थे। अब भी उँगलियों में इंक लगी ही रहती है अक्सर। इतनी देर रात अब पेंट करने जाऊँगी तो नहीं… लेकिन मन कर रहा है। कुछ ऐब्स्ट्रैक्ट बनाने का इस बार। कुछ रंग हों जो उसके शहर की याद दिलाएँ…थोड़ा सलेटी, सिगरेट के धुएँ की तरह, काले रंग से कुछ आउट्लायन बनाऊँ कि जैसे उसके जानने में कुछ हिस्से प्रतिबंधित कर देना चाहती हूँ…बहुत ईमानदार नहीं होना चाहिए। थोड़े से फ़रेब से बचा रहता है जीवन का उत्साह। उल्लास। 

आज दोस्त से बात कर रही थी। बहुत दिन बाद। मैंने समझदार की तरह कहा, ‘वैसे भी, सब कुछ कहाँ मिलता है किसी को ज़िंदगी में’। उसने कहा, ‘मिलना चाहिए…तुम्हें तो वाक़ई सब कुछ मिलना चाहिए’। मैंने नहीं पूछा कि क्यूँ। ऐसा क्या ख़ास है मुझमें, कि मुझे ही सब कुछ मिलना चाहिए। मैं बस ख़ुश थी कि कितने दिन बाद उससे बात कर रही हूँ। चैट पर ख़ूब ख़ूब बतियाए बहुत दिन बीत जाते हैं। हमने बाक़ी दोस्तों की बात की। मैंने कहा, कि मैं उसे बहुत मिस करती हूँ। बस, एक उस दोस्त के जाने के बाद मन एकदम ही दुःख गया। अब किसी नए व्यक्ति से दूरी बना के रखती हूँ, जो लोग अच्छे लगते हैं, उनसे तो ख़ास तौर पर। 

कम कम लोग रहे ज़िंदगी में, जिनसे बहुत बहुत प्यार किया। अब उनके जाने के बाद के वे ख़ाली हिस्से भी मेरे हैं…वहाँ थोड़े ना नए किरायेदार रख लूँगी। ये जो ज़िंदगी का दस्तूर है, आने जाने वाला…वो अब नहीं पसंद। कोई न आए, सो भी बेहतर। 

और मुहब्बत…उसने पूछा नहीं, लेकिन मैंने ख़ुद ही कह दिया। यार, ७०% पर उपन्यास अटका है, एक छोटी सी लव स्टोरी नहीं लिखा रही…कि जैसी कहानी एक समय में आधी नींद में लिख दिया करती थी…हम बदल गए हैं। वाक़ई। उसने उदास होकर पूछा, किसने तोड़ा तुम्हारा दिल, दोस्त… हम क्या ही तुम्हारा नाम लेते, सो कह दिया, ज़िंदगी। लेकिन देखो। झूठ नहीं कहा ना?

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त्रासदी के प्रति अधिकतर लोगों के मन में एक सहज (या असहज) आकर्षण होता है। ड्रामा पढ़ते हुए हम इसे पेथॉस के रूप में पढ़ते हैं। मृत्यु, दुःख, विरह… हमारी सम्वेदना को जागृत करते हैं और हमें उल्लास या ख़ुशी की तुलना में ज़्यादा प्रभावित करते हैं। मीडिया भी हमें अधिकतर नेगेटिव चीज़ें ज़्यादा दिखाता है – हत्या, बलात्कार, आगज़नी, आत्महत्या, भीड़ द्वारा घेर कर मारना। ख़बरों में अच्छी ख़बरें बहुत कम देखने पढ़ने को मिलती हैं। इस लिहाज़ से अगर देखें तो दुनिया में सबसे ज़्यादा ख़ुशी अगर कहीं है तो वो बॉलीवुड फ़िल्मों में है। 

इंटर्नेट और मोबाइल रिकॉर्डिंग के इन दिनों में हम पाते हैं कि क्रूरता का बेख़ौफ़ और निर्लज्ज प्रदर्शन बहुत ज़्यादा बढ़ रहा है। कई क़िस्म के वाइरल विडीओ में हिंसा और एक तरह की निष्ठुरता है। इस सिलसिले में कुछ दिन पहले नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हुयी फ़िल्म द हाईवेमेन याद आती है। फ़िल्म में टेक्सस रेंजर्स  के दो पुराने रेंजर्स को बुलाया जाता है एक ख़ास केस के लिए। उन्हें कुख्यात हत्यारी जोड़ी बॉनी ऐंड क्लाइड को खोजना और ख़त्म करना है। इस जोड़ी ने नृशंस हत्याएँ की हैं लेकिन जनता में इनका पागलों की तरह क्रेज़ है। लोग उनसे बहुत प्यार करते हैं, उनकी तरह कपड़े पहनना चाहते हैं, उनकी तरह बाल कटाना चाहते हैं। लोगों का हत्यारों के प्रति ऐसा आकर्षण ख़तरनाक और समझ से परे है। बॉनी एक कमसिन लड़की है और क्लाइड भी उससे उम्र में थोड़ा ही बड़ा है। हत्या करने में बरती क्रूरता के कारण लोग उन्हें साहसिक मानते हैं। बॉनी और क्लाइड को आख़िर में उनकी कार में घेर कर मार दिया जाता है। रेंजर्स बिना किसी चेतावनी के लगभग 150 राउंड फ़ायर करते हैं। ख़बर फैलती है और लोग उनकी कोई ना कोई निशानी अपने पास रखने के लिए उस फ़ोर्ड ऐंजेला को चारों तरफ़ से घेर लेते हैं…कोई ख़ून सने कपड़ों के टुकड़े काट कर ले जा रहा है…कोई गोलियाँ… कुछ औरतों ने बालों की लट काट कर रखी और एक पुलिस अफ़सर ने देखा कि एक व्यक्ति चाक़ू से क्लाइड की ऊँगली काटने जा रहा था। 

इस तरह के आकर्षण को Hybristophilia कहा जाता है…और इसकी गिनती एक तरह का मानसिक विकार में होती है जहाँ आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों के प्रति आकर्षण होता है। इसे बॉनी और क्लाइड सिंड्रोम भी कहते हैं। कई औरतें इस तरह के सीरियल किलर्स से प्रेम करती हैं…जेल में चिट्ठियाँ लिखना या ऐसे केस की सुनवायी में आना और किलर्स के प्रति दीवानगी प्रदर्शित करने के क़िस्से अक्सर मीडिया में देखने को मिलते हैं। ऐसे पुरूषों का क़िस्सा थोड़ा कम सुनने को मिला है, शायद इसलिए भी आँकड़ों के अनुसार ९०% हत्यायें पुरुष करते हैं(इंटर्नेट पर मिला आँकड़ा) और सीरियल किलर औरतें बहुत कम हुयी हैं।

इन दिनों चर्नोबल की बहुत चर्चा है। मैंने देखने की कोशिश की, लेकिन ज़्यादा देर देख नहीं पायी। पहले एपिसोड में 15 मिनट बचा हुआ था कि आगे देख नहीं पायी। वहाँ कहता है कि शहर से किसी को बाहर जाने नहीं दिया जाएगा। फ़ोन लाइंस कट कर दो। मिलिटेरी बुला लो। apathy is something I have a lot of trouble coming to terms with. ऐसा अपने देश में भी कई बार देखते हैं कि सिर्फ़ इसलिए कि कुछ लोगों को किसी चीज़ से फ़र्क़ नहीं पड़ता, कितने लोगों की जान चली जाती है। उतने देर का एपिसोड देखना ही बुरी तरह परेशान कर गया। क्रिमिनल नेग्लिजेन्स। कि लोगों को बताया तक नहीं गया था कि नूक्लीअर पावर प्लांट है जिससे रेडीएशन निकलता है जो ख़तरनाक है। कितने सारे फ़ायरफ़ाईटर मर गए। खुले में रेडीओ ऐक्टिव पार्ट्स थे। कितना डरावना है ये सब। 

मैंने फिर विकिपीडिया पर डिटेल में चर्नोबल के बारे में पढ़ा। सेफ़्टी रेग्युलेशंज़ का ख़याल नहीं रखा गया। कितने स्तर पर लोगों ने ग़लतियाँ की और ख़ामियाज़ा कितने निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ा। जो बात मुझे बिलकुल दहला गयी वो ये कि चर्नोबल के रेडीएशन के ख़तरे के डर से 150,000 अबॉर्शन कराए गए। आख़िर ऐसे आँकड़े क्यूँ पहुँच जाते हैं मुझ तक। मैं कहाँ जाऊँ कि कुछ सुंदर मिले…जीने लायक़…सादा…उदास, फीकी शाम सही…तन्हा…चुप्पी शाम सही। 

इन दिनों नेटफ़्लिक्स पर हर तरह के सीरियल हैं। वायलेंट टीवी ड्रामा का एक पूरा अलग सेक्शन है। ज़ाहिर सी बात है, सबके अलग अलग पसंद की चीज़ें होती हैं और फ़िल्में सिर्फ़ फ़िल्में होती हैं। लेकिन हिंसा देखने के कारण हम उसके प्रति धीरे धीरे उदासीन होते चले जाते हैं। मुझे अब भी याद आता है कि हमने एथिक्स इन जर्नलिज़म में पढ़ा था कि अख़बार चूँकि बच्चे बूढ़े सभी देखते हैं इसलिए ख़ास तौर से मुखपृष्ठ पर ख़ून से सने या विचलित करने वाले फ़ोटो न पब्लिश करें। मगर ये २००५ की बात है। इन दिनों टीवी, अख़बार, मोबाइल…हर जगह हिंसा दिखती है। लोग इतने ग़ुस्से से भरे और क्रूर हैं कि जेबकतरे को पीट पीट कर जान से मार देते हैं। आग लगी बिल्डिंग से कूदते बच्चों की विडीओ शूट करते हैं। ऐसे असंवेदनशील समय में हम क्या कर सकते हैं कि दुनिया में थोड़ी कोमलता बाक़ी रहे। अगर इन दिनों के पौराणिक किरदारों के नए रूप देखें तो उन्हें कई क़िस्म के हथियारों से लैस दिखाया जाता है…जबकि हमारे बचपन के राम … श्री राम चन्द्र कृपालु भजमन हरण भवमय दारुनम हुआ करते थे…पूरा भजन समझ नहीं आता था लेकिन इतना था कि राम की छवि बहुत सुंदर है…उसी तरह कृष्ण के बारे में था कि उनकी मुस्कान दुनिया में सबसे सुंदर मुस्कान है…हम ग़ज़ब सुंदर सुंदर उपमाओं और बिंबों को पढ़ते सुनते हुए बड़े हुए थे। इन दिनों क्या हमारे हाथ में जो किताबें हैं या जो विडीओ हैं वे हमें थोड़ा सा मानवीय बना रही हैं? सुंदरता और कोमलता या मानवीयता कैसे बची रहे… किसी अजनबी को देख कर मुस्कुराना… किसी सुंदर कविता को बहुत से और लोगों तक पहुँचाना… कोई बहुत सुंदर कहानी लिख सकना…

जब हम हर कुछ रच सकते हैं…तो हम क्या करें कि दुनिया थोड़ी सी ज़्यादा सुंदर रहे… 

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मेरे पागल हो जाने का सब सामान इसी दुनिया में है।

तुमसे मुहब्बत… खुदा ख़ैर करे… जानां, मुझे तो तुम्हारे बारे में लिखने में भी डर लगता है। कुछ अजीब जादू है हमारे बीच कि जब भी कुछ लिखती हूँ तुम्हारे बारे में, हमेशा सच हो जाता है। कोई ऑल्टर्नट दुनिया जो उलझ गयी है तुम्हारे नाम पर आ कर…डर लगता है, लिखते लिखते लिख दिया कि तुम मेरे हो गए हो तो… या कि लो, आज की रात तुम्हारे नाम… या कि किसी शहर अचानक मिल गए हैं हम…क्या करोगे फिर?

यूँ ही ख़्वाहिश हुयी दिल में कि हर बार मुझे ही इश्क़ ज़्यादा क्यूँ हो… कभी तो हो कि चाँदभीगे फ़र्श पर तड़पो तुम और ख़्वाब में बहती नदी के पानी के प्यास से जाग में जान जाती रहे…

के बदन कहानियों का बना है और रूह कविताओं से … मैं तुम्हारे शब्दों की बनी हूँ जानां… तुम्हारी उँगलियों की छुअन ने मुझमें जीवन भरा है…किसी रोज़ जान तुम्हारे हाथों ही जाएगी… इतना तो ऐतबार है मुझे…

तुम इश्क़ की दरकार न करो…बाँधो अपना जिरहबख़्तर… भूल जाओ मेरे शहर का रास्ता…भूल जाओ मेरे दिल का रास्ता। लिखती हूँ और ख़ुद को कोसने भेजती हूँ। कि ऐसा क्यूँ। तुम्हारी ख़ातिर…इश्क़ में थोड़ा तुम भी तड़प लो तो क्या हर्ज है। मगर तुम्हारी तड़प मुझे ही चुभती है…कि मेरे हिस्से की नींद तुम्हारे शहर चली गयी है और उन ख़्वाबों में मुझे भी तो जाना था… तुम जाने किस मोड़ पर इंतज़ार कर रहे होगे…

मेरी हथेलियों में प्यास भर आती है। ऐसा इनके साथ कभी नहीं होता… कभी भी नहीं, सिवाए तब कि जब बात तुम्हारी हो। मेरे हाथों को वरना सिर्फ़ काग़ज़ क़लम की दरकार होती है… छुअन की नहीं… किसी भी और बदन की नहीं। तो फिर कौन सा दरिया बहता है तुम्हारे बदन में जानां कि जिसे ओक में भर पीने को रतजगे लिखाते हैं मेरे शहर में। मैं डरती हूँ इस ख़याल से कि तुम्हें छूने को जी चाहता है… तुम्हें छू लेना तुम्हें काग़ज़ के पन्नों से ज़िंदा कर कमरे में उतार लाना है…तुम ख़यालों में हो फिर भी तुम्हारे इश्क़ में साँस रुक जाती है…तुम मूर्त रूप में आ जाओगे तो जाने क्या ही हो… मैं सोच नहीं पाती… मैं सोचने से डरती हूँ। तुम समझ रहे हो मेरा डर, जानां?

तुम्हें चूमना पहाड़ी नदी हुए जाना है कि जिसका ठहराव तुम्हारी बाँहों के बाँध में है…मगर फिर लगता है, तुम्हें तोड़ न डालूँ अपने आवेग में… बहा न लूँ… मिटा न दूँ… कि जाने तुम क्या चाहते हो… कि जाने मैं क्या लिखती हूँ… 

कि देर रात अमलतास के पीछे झाँकता है चाँद… मैं सपने में में तलाश रही होती हूँ तुम्हारी ख़ुशबू…हम यूँ ही नहीं जीते इश्क़ में बौराए हुए।

के जानां, मेरे पागल हो जाने का सब सामान इसी दुनिया में है। 

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मेरे मरने पर मेरा पता पब्लिक कर देना कि वे सारी चिट्ठियाँ मुझ तक पहुँच सकें जिन पर मेरा हक़ है। मुझे यक़ीन है कि बहुत सी चिट्ठियाँ होंगी मेरे हिस्से की…बहुत से अधूरे क़िस्से होंगे जो लोगों को सुनाने होंगे… बहुत सा प्रेम होगा, अनकहा। बहुत से सवाल होंगे जिनके जवाब सिर्फ़ मेरे पास हैं। फिर कितने शहरों की मिट्टी होगी… कितने मौसमों का ब्योरा होगा… और शायद एक उसका ख़त भी तो, जिसने कभी मेरे जीते जी मेरे खतों का जवाब नहीं दिया। बहुत सा कुछ होगा। आधा। अधूरा। कच्चा। कि सब कहते हैं, तुम्हारे ख़तों का जवाब देना नामुमकिन है। शायद इक आख़िरी बार कहनी हो किसी को कोई बात… शायद अलविदा… शायद फिर मिलेंगे… मुझे नहीं मालूम क्या…

बस इतना कि बहुत से पेंडिंग ख़त हैं मेरे हिस्से के…और कि वे सब आएँगे, इक रोज़।

मुझे उन अनगिन चिट्ठियों की चिता पर ही जला देना।

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मेरे पास फूल और तितलियों के सिवा कुछ भी नहीं है।

ज़िंदगी के किसी मोड़ पर हम खड़े होते है और देखते हैं कि हमारे पास शायद वो सब कुछ है जो हमने किसी उम्र में चाहा होगा। फिर लगता है कि वो ख़ुशी कहाँ गयी जिसका कि हमने ख़ुद से वादा किया था। उदासी कैसे फ़ितरत का हिस्सा बनती चली गयी और भूल गए कि बेवजह ख़ुश होना कोई इतनी अजीब बात नहीं थी। 

कब होता है कि हम अपने सबसे क़रीबी लोगों की ख़ुशी देखते देखते भूल जाते हैं कि हमें ख़ुद का ख़याल ख़ुद से रखना पड़ता है। रखना चाहिए। कि हमारी ख़ुशी का ख़याल रखे कोई… ऐसा नहीं होता है। हमने इतने दिनों में आदत बना ली है कि किसी के ऊपर अपनी ख़ुशी के लिए निर्भर नहीं रहेंगे। 

कि अब भी आइने के सामने खड़े हो कर ख़ुद से पूछो कि तुम्हें किस चीज़ में ख़ुशी मिलती है तो जवाब अब भी सिर्फ़ एक होगा… लिखने में। जैसे बाक़ी लोग छुट्टियाँ मनाने जाते हैं… हम उस तरह लिखते हैं। इस दुनिया के नियमों से अलग… इस दुनिया के दुखों से दूर। कुछ अपनी पसंद के लोगों के पास… कुछ अपने बनाए शहरों में। 

और जानां… इन दिनों ऐसा लगता है कि तुम मेरे शहर का रास्ता भूल चुके हो। इतने हज़ार सालों में अगर इक मुहब्बत है जिसे मैं अब भी अपने क़िस्सों के शहर में अधूरा देखती हूँ तो वो हमारी ही है…

मुझे कभी कभी लगता है कि मैं ही भूल गयी हूँ अपने क़िस्सों के शहर का रास्ता… और चूँकि तुम भी लिखते हो, सोचती हूँ पूछ लूँ… कुछ दिन तुम्हारे क़िस्सों के शहर में पनाह मिलेगी?

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कहते हैं, change is the only constant. इस दुनिया में कुछ भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता। चीज़ें बदलती रहती हैं। जो हमारे लिए ज़रूरी है…वो भी ज़िंदगी के अलग अलग मोड़ पर बदलता रहता है। हम भी किन्हीं दो वक़्त में एक जैसे कहाँ होते हैं। फिर बदलाव हमें पसंद भी हैं…वे ज़िंदगी को मायना देते हैं। एक थ्रिल है कि कुछ भी पहले जैसा कभी दुबारा नहीं होगा। 

लेकिन फिर भी। हम चाहते हैं कि कुछ चीज़ें न बदलें। कुछ रिश्ते, कुछ लोग हमारे बने रहें। कुछ चीज़ों के कभी न बदलने का भरोसा हमें राहत देता है। घर, परिवार, कुछ पुराने दोस्त, बचपन की कुछ यादें… जैसे मेरा बचपन देवघर में बीता। मैं वहाँ तक़रीबन ११ साल रही। पूरी स्कूलिंग वहीं से की। वहाँ मिठाई की एक दुकान है – अवंतिका। इतने सालों में भी वहाँ मिलने वाले रसगुल्लों का स्वाद जस का तस है। इसी तरह कभी कभार बस से गाँव जा रहे होते थे तो बेलहर नाम की जगह आती थी जहाँ पलाश के पत्ते के दोने में रसमलाई मिलती थी। सालों साल उसका स्वाद याद रहा और उस स्वाद को फिर तलाशते भी रहे। वहाँ हमारे एक दूर के रिश्ते के भाई रहते थे… मुन्ना भैय्या। बिना मोबाइल फ़ोन वाले उस ज़माने में हम जब भी वहाँ से गुज़रे… वो हमेशा वहाँ रहते थे। एक दोना रसमलाई लिए हुए। मुझे उनकी सिर्फ़ एक यही बात सबसे ज़्यादा याद रही। अब भी कभी गाँव जाने के राते बेलहर आता है लेकिन अब भैय्या वहाँ नहीं रहते और कौन जाने किस दुकान की रसमलाई थी वो। देवघर से दुमका जाने के रास्ते में ऐसे ही एक जगह आती है घोरमारा/घोड़मारा… वहाँ सुखाड़ी साव पेड़ा भंडार था जिसके जैसा पेड़ा का स्वाद कहीं नहीं आता था। जब सुखाड़ी साव नहीं रहे तो उनकी दुकान दो हिस्से में बँट गयी – उन के दोनों बेटों ने एक एक हिस्सा ले लिया। लेकिन वो पेड़े का स्वाद बाँटने के बाद खो गया और फिर कभी नहीं मिला। 

मेरी स्मृति में खाने की बहुत सी जगहें हैं। हर जगह के साथ एक क़िस्सा। हम लौट कर उसी स्वाद तक जाना चाहते हैं… कि माँ के जाने के बाद ज़िंदगी में एक बड़ी ख़ाली सी जगह है… माँ के हाथ के खाने के स्वाद की… या बचपन की… कभी कभी घर जाती हूँ और दीदियाँ कुछ बनाती हैं तो लगता है, शायद… ऐसा ही कुछ था… या कि चाची के हाथ का कुछ खाते हैं तो। लेकिन कभी कह नहीं पाते उनसे… कि कुछ दिन हमको मेरे पसंद का खाना बना के खिला दीजिए। 

मेरा एक क़रीबी और बहुत प्यारा दोस्त था। जैसा कि सब दोस्तों के बीच होता है इस टेक्नॉलजी की दुनिया में… हमारे दिन की पूरी खोज ख़बर एक दूसरे को रहती थी। हम किसी शहर में हैं… हम किसी ख़ूबसूरत आसमान के नीचे हैं… हम किसी समंदर के पास हैं। सोशल मीडिया पर जाने के पहले वे तस्वीरें पर्सनल whatsapp में जाती थीं। मेरी भी, उसकी भी। आज उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर देखीं। ये किसी ब्रेक ऑफ़ से ज़्यादा दुखा। 

हम नहीं जानते कि कब हम किसी से दूर होते चले जाएँगे। किसी की ज़िंदगी में हमारी प्रासंगिकता कम हो जाएगी, हमारी ज़रूरत कम हो जाएगी और हमसे लगाव कम हो जाएगा। ये नॉर्मल है। इससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन जो चाहिए, वो हो पाए…इतनी आसान कब रही है ज़िंदगी। हमें मोह हुआ रहता है। हम कुछ चीजों को यथासम्भव एक जैसा रखना चाहते हैं। कुछ चीज़ों को। कुछ रिश्तों को। 

अक्सर जब हम सबसे ज़्यादा अकेला महसूस करते हैं तो हम सिर्फ़ किसी एक व्यक्ति को याद कर रहे होते हैं। सिर्फ़ किसी एक को। बस उसके न होने से पूरी दुनिया वाक़ई ख़ाली लगती है। किसी और के होने न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। ऐसा अक्सर उन लोगों के साथ होता है जिनकी ज़िंदगी में लोग थोड़े कम हों… ऐसे में किसी के होने की विशिष्टता इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि उसके जैसा कोई भी महसूस नहीं होता। उसके आसपास तक का भी नहीं। हम उस रिश्ते को निष्पक्ष भाव से देख कर उसका आकलन नहीं कर पाते हैं। हम बाइयस्ड होते हैं। 

इस ख़ाली जगह को सिर्फ़ किताबों या सफ़र से भरा जा सकता है। थोड़ा सा खुला आसमान कि जो किसी पुरानी इमारत पर जा कर ख़त्म होता हो। थोड़ा सा किसी खंडहर का एकांत। कुछ चुप्पे किरदार जो दिमाग़ में ज़्यादा हलचल न मचाएँ। हम पुराने शहरों में ही पुराने लोगों को भूल सकते हैं। पुराने रिश्ते जब पुरानी इमारतों के इर्द गिर्द टूटते हैं तो उनका टूटना थोड़ा ज़्यादा स्थाई भी होता है और दुखता भी कम है। इसलिए पुरानी दिल्ली से आ कर मुझे साँस थोड़ी बेहतर आती है। 

सोचती हूँ…तुम्हें भुलाने के लिए किस शहर का रूख करूँ… फिर शायद वहाँ की तस्वीरें कहीं पर भी पोस्ट न करूँ… क्या ही फ़र्क़ पड़ता है कि आसमान का रंग कैसा था या कि पत्थर में कितनी धूप रहती थी। 

मैं भी तो बदल रही हूँ तुम्हारे बग़ैर। चीज़ों को सहेजने की ख़्वाहिश मिटती जा रही है। कि तुम मेरी ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा क़ीमती थे। पता नहीं, तुम्हें भी क्या ही सूझी होगी जो किसी रोज़ यूँ ही चले आए मेरी ज़िंदगी में। अब जब इसी तरह यूँ ही चले भी गए हो तो तुम्हारे बिना सब चीज़ें फ़ालतू और बेकार लगती हैं। क्या ही रखें कहीं। क्या लिखें। क्यूँ। किसके लिए?

अगर सब कुछ खो ही जाता है…खो ही जाना है इक रोज़ तो मैं भी चुप्पे चली जाऊँ न…
अलविदा कहना शायद तुम्हें भी नहीं आता है।

Musings, Shorts

इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है 

दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात 

यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ 

ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात 

  • फ़ैज़ 

इक़बाल बानो की आवाज़ में इसे पहली बार कब सुना था याद नहीं… लेकिन जानां… अभी यूँ ही ‘इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है … दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हात’ … पंखा चलता है तो हल्की ठंड लगती है… पैरों पर हल्की सी चादर रख के बैठी हूँ। कपास की गंध आती है कलाइयों से। जाने कब तुम्हारी वो ब्लैक चेक की शर्ट देखी थी ख़्वाब में। उँगलियों पर थोड़ी थोड़ी कपास की महसूसियत है। तुम्हें देखने को तड़प सी गयी हूँ। जब भी सोचती हूँ कि मर जाऊँगी तुम्हारे इश्क़ में…आवाज़ यही आती है दिल से कि तुम्हें तो मर जाना ही चाहिए। 

रात को नींद आधी होती है आँख में और चाँद पूरा होता है आसमान में…सोचती हूँ कि जाने कभी कुछ सोचते होगे तुम भी। मेरे शहर के बारे में। मेरे दिल के मौसम के बारे में? कभी फ़ैज़ पढ़ते हुए सोचा होगा मुझे… जाने कब… किसी ख़ाली लम्हे में सही। मैं चाहती हूँ इतना व्यस्त हो जाना… घर के सारे परदे धो दूँ… किचन रीअरेंज कर दूँ… किताबें रंग के हिसाब से लगा दूँ बुक रैक में… घर को चमका दूँ एकदम ही… इस साढ़े चार हज़ार स्क्वेर फ़ीट के घर को रगड़ के साफ कर दूँ… कि हाथ व्यस्त रहेंगे तो क्या मन भी व्यस्त रहेगा? कि मुझे लिखने के सिवा कुछ आता भी तो नहीं… और मेरे लिखने में इतने साल से सबसे ख़ूबसूरत ज़िक्र तुम्हारा है। मैं तुम्हारे ख़याल की ख़ुशबू से भी इश्क़ करती हूँ। 

इतनी गहराई से समंदर चाहने पर एक झील तो मिल ही सकती है किसी शहर में… किसी शाम… जाने तुम कब मिलोगे। ज़िंदगी में सब कुछ स्लो मोशन है। तुम्हें बिसराना भी। इक रोज़ तुम्हें कम याद करूँगी। किसी ग़ज़ल की नज़ाकत से नहीं याद आएगी तुम्हारे माथे पर की झूलती हुयी लट। कि मालूम, जानां, कैमरा उठाया ही नहीं है दिल्ली से लौट कर इस बार… कि कुछ शूट करने का मन नहीं करता… 

मैं किसी कहानी में मर जाना चाहती हूँ।