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Your name is a question, drilled on my heart

मुझे दुखता ये नहीं है कि वहाँ पर एक तारामाछी है। दुखता ये है कि तारामाछी पर अकेले बैठना एक स्ट्रेंज दुख है, दिल के आसमान पर उगता हुआ। ये दुख दूर से दिखता है, ये दुख चाँद सा चमकता है। चाँद को बिना देखे कितने दिन जिया जा सकता है?  
पता नहीं कितने दिन चलेगा मेला और कब जाएगा ये तारामाछी मेरे पसंद के रास्ते से हट कर कहीं और… 

चेर्नोबिल डिजास्टर के कई साल एक फोटोग्राफर ने वहाँ की तस्वीरें खींचीं। मुझे उसमें एक पोस्टकार्ड याद रहा, फ़िरोज़ी बैकग्राउंड पर लाल तारामाछी, मैंने कहाँ देखा था, वो याद नहीं। उसे बचाये रखने को मैंने उसे इश्क़ तिलिस्म में बुना था…मुराकामी के एक नावेल में भी तारामाछी है…थ्री ऑफ़ अस फ़िल्म में भी…आख़िर को वे तारामाछी पर साथ में जाते हैं…याद की आख़िरी किनार का ये चमकता लम्हा क्या डिमेंशिया की धुंध में उसे दिखेगा? मैं नहीं जानती। 

इस शहर में मेरे जाने की जगहें लगभग फिक्स हैं और उन जगहों पर जाती हुई तमाम सड़कों में भी अपनी पसंद की सड़कें फिक्स हैं…इन रास्तों पर बहुत कम चीज़ें बदलती हैं…दो दशक होने को आए। कुछ बदलता भी है तो, धीरे-धीरे। किसी इमारत का टूटना, किसी पेड़ का कटना, किसी मैदान को समतल कर के वहाँ कोई बड़ा सा वेयरहाउस बनाना…ये सब स्लो-मोशन की चीज़ें हैं।  

लेकिन कोई तारामाछी अचानक से लग जाता है और हमारा आसमान बदल जाता है, आवाज़ें, मूवमेंट, रंग…सब तेज़ी से बदलता हुआ…हिंडोले पर हँसते, चीखते, खिलखिलाते लोग होते हैं…हम उन्हें देखते हैं और हर बार जब तारामाछी एक पूरी बार अपने एक्सिस पर घूमता है, इश्क़ की दुनिया के एक प्लेनेट पर एक साल बीत जाता है। वहाँ रहने वाले सारे बाशिंदे कई मौसम जी लेते हैं। 

फ़िल्म देख रही हूँ, अटोनमेंट…पूरी एक साथ तो मुश्किल से देख पाती हूँ आजकल कोई भी फ़िल्म…समंदर की ख़ुशबू आती है तो वह सैनिक अपने दोनों साथियों के साथ ऊँची घास में बनी पगडंडी पर दौड़ता चला जाता है…समंदर किनारे असंख्य सैनिकों को देखता है, टूटे हुए, फटे पाल वाले जहाज़…थके, लहूलुहान सैनिक…उनके क्रिया-कलापों में कोई तारतम्य नहीं है…कोई एक घोड़ों को गोली मार रहा है, कोई व्यायाम कर रहा है…बहुत से लोग एक प्रार्थना साथ में गा रहे हैं…कुछ गालियों वाला गीत गा रहे हैं…हर ओर सैनिक, टूटे हुए जहाज़, गाड़ियाँ, मलबा, लहूलुहान लोग…और इन सब में, पीछे एक तारामाछी है जो घूम रहा है…यह तारामाछी थिर रहता तो मुझे कुछ नहीं दुखता…लेकिन वह घूम रहा है, इस तहसनहस ज़मीन के आसमान में, गोल-गोल, धीरे धीरे… 

ये फ्लैट चाकू नहीं है, कॉन्सेंट्रिक है, किसी स्क्रू की तरह जो किसी ने भोंका है मेरे सीने में और उसे घुमा रहा है घुमा रहा है, गोल-गोल…एक ही दिशा में…सर्कुलर मोशन…जैसे कोई स्क्रू ड्रिल करते हैं दीवाल पर…सवाल क्यों उभरते हैं, क्यूँ दुखते हैं? या कोई अस्फुट वाक्य…I am holding your hand…अंधेरे में लैंडस्केप बदल रहा है, हम कार में हैं…बारिश में धुँधला हो रहा है मन के भीतर का लैंडस्केप भी। वार्म ग्रे कैनवास पर एक पेंटिंग है, कच्चे रंगों से बनी…भीगे कैनवास पर रंग बहने लगे हैं। मैं भूल जाऊँगी इस रात को किसी रोज़? 

मैं फिर से पूछती हूँ, उससे जो अब अजनबी नहीं लगता। तुम्हारी खिड़की से कैसा आसमान दिखता है?  

मैं उससे ये भी पूछना चाहती हूँ, आधी दोपहर जब हम साथ बैठे थे, हमने एक्ज़ैक्टली कितने कप चाय पी थी…और कितनी सिगरेट? मेरी ज़िंदगी में सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है। मुझे थिर रखने के लिए कुछ फाइनाइट नंबर्स चाहिए। प्लीज बताओ, भले ग़लत संख्या, लेकिन बताओ, कितने कप चाय, कितनी सिगरेट। 

बाँट के पी गई सिगरेट को क्या फ्रैक्शन में गिनते हैं? 

मैं सोचती हूँ, अचानक से तुमसे पूछूँ, मेरे साथ तारामाछी पर बैठोगे? तुम्हें तारामाछी में डर तो नहीं लगता? लगे तो तुम मेरा हाथ पकड़ लेना, मैं तुम्हारा। ठीक? मुझे अच्छा लगता है तारामाछी, तुम भी। लेकिन अकेले जाने में डर लगता है।

ये मत कहना, कि डरो मत। मैं वैसे भी बहुत कम ही डरती हूँ। थोड़ा सा तो डरना ज़रूरी है जीवन में, नहीं? डर एकदम खत्म हो जाये, तो पता नहीं क्या कर बैठूँगी मैं। जरा सा ज़िंदा बच जाने का डर ही है जो मुझे जिलाए या कि बचाये रखता है। वरना किसी रोज़ तेज रफ़्तार गाड़ी को फ्लाइओवर से कुदा देने का मन हमारे ज़िंदा रहने के लॉजिक पर हावी हो जाता. 

*** 
The heart’s landscape is an optical illusion…built in multiple stages, to defend, to nurture, to look beautiful. To shelter, those that wander in these unchartered territories. 
शुरुआत में, हृदय एक खाली मैदान होता है। फिर एक इमारत का ब्लूप्रिंट। नक़्शा। 
एक एक ईंट, एक-एक शब्द, एक-एक सपना जुड़ता जाता है और इमारत खड़ी होती है। कई कमरे और कई मंजिलों वाली यह इमारत घर भी हो सकती है, सराय भी। इसके बाशिंदों पर निर्भर करता है कि वे यहाँ कितने वक्त के लिए ठहरना चाहते हैं। 

अक्सर, हृदय कोई अभेद्य दुर्ग नहीं होता। 
इसे घेर कर कोई खाई नहीं खोदते हम…मगरमच्छ नहीं पालते…दीवार पर हथियारबंद सैनिक नहीं बिठाते। तुम्हारी आमद पर तुम्हारे लिए फूल बरसाते हैं आसमान से… 

तुमने कोई किला फतह नहीं किया है। 

दिल जीत लेना खेल हुआ करता है, अक्सर। 
इसे तहस-नहस कर, आग लगा कर, नेस्तनाबूद कर देना भी। 

It’s a fragile ecosystem. 
You don’t have to be cruel, I won’t have you suffer the consequences, just simple indifference would do. No need to bomb my heart. Just, forget to stub out your cigarette. The cinders are enough.  

*** 
*** 
गाड़ी एक सौ नब्बे छू कर आती है, डर नहीं लगता। 
तुम्हारा हाथ छू जाता है जरा सा, गलती से, 
डर लगता है। 
*** 

छेनी हथौड़ी से ठोक रखा है, तुम्हारा नाम 
कलेजे के पत्थर पर, सो डर नहीं लगता 
समंदर किनारे, रेत पर तुम्हारा नाम लिखती हूँ 
डर लगता है।  

*** 
सिगरेट सी महकती हथेलियों वाले हम 
कलाई पे परफ्यूम छिड़कते हैं 
डर लगता है 
*** 

घर से निकलते हुए, 
आईना भी नहीं देखने वाले हम 
बस, काजल लगाने लगते हैं 
डर लगता है  

*** 
सारे इल्ज़ाम ख़ामोशी से अपने सर लेने वाले हम 
तुम्हारे हक़ में जिरह करते हैं 
डर लगता है 

*** 
मुहब्बत में एक ही चीज़ माँगते हैं ईश्वर से 
तुम्हें कभी भी डर न लगे। 

फूँक मारने से कम दुखता है? सच्ची?

दुनिया के कई सारे काम हैं, सिलसिलेवार ढंग से करूँ, तो पूरे होते चले जायेंगे। लेकिन हम तुम्हारी याद में अक्सर गिरफ़्तार हुए बैठे होते हैं। सब ठीक होता इतने में भी, लेकिन दिक्कत ये है कि सिपहसालार, हथकड़ी लगा देते हैं। ऐसे में लिखना-पढ़ना दुश्वार हो जाता है। 

स्टारबक्स में बैठी हूँ। एक हॉट अमेरिकानो और एक आइस्ड अमेरिकानो ऑर्डर किया है। दोनों ड्रिंक्स सामने रखे हैं। मैं बरिस्ता को बोलना भूल गई कि एक के बाद एक बनाना। सामने दोनों ड्रिंक्स रखे हैं। काँच के ग्लास में कोल्ड और सिरेमिक कप में हॉट। इन दोनों को साथ देख कर अपनी याद आती है। सिर्फ़ अपनी नहीं, कई बार दोस्तों के साथ जो दिल्ली में कॉफ़ी पीने गई हूँ, वो याद आते हैं। पर याद आने में थोड़ी तेरी गुंडागर्दी चलने लगी है, तो तू ज़्यादा याद आने लगा है। 

अच्छा है, तुझसे कम मिलते हैं, कहने वाले हम, इस बात पर थोड़ा उदास होने लगे हैं कि हम कम मिलते हैं। ज़िंदगी छोटी सी है। इसमें दोस्तों से मिलने में भी किफायती होना पड़ रहा है। क्या जुल्म है। 

***

तीन दिन पहले, इसी हफ़्ते के सोमवार  

***

तेरी ज़्यादा याद आती है तो मेरा दिमाग़ ही नहीं ख़राब होता है, दुनिया का हिसाब-किताब भी गड़बड़ा जाता है। देखो, ना, बरिस्ता ने आज मेरे लिए शोर्ट अमेरिकानो बना दिया। अब इत्ते से कॉफ़ी से तो हम कुल्ला भी न करें। तो बोलना पड़ा, कि देखो, तुम हमारे कॉफ़ी के ऑर्डर के हिसाब से छोटा कॉफ़ी बना दिए हो। बिचारी बरिस्ता नई थी। तो फिर दूसरी कप कॉफ़ी बना लिए वो लोग। अब बताओ, क्या ज़ुल्म है ना। शहर में तुम नहीं हो और हम बैठ के दो कप कॉफी अकेले पी रहे हैं। 

छोटी सी बात है, लेकिन गाली तुमको देने का मन किया। सपना भी ऐसा ही सब देखे हैं आज रात। किसको किसको खींच लाए हैं सपने में। बदतमीज़ दिल। एकदम हाथ से बाहर होता जा रहा है। 

तुम्हारे बारे में सोचते हुए इतने सुंदर लगते हैं कि तुम्हारे साथ होते हुए भी नहीं लगते। यू नो, मुहब्बत में सब कुछ इंतज़ार ही है। तुम्हारे आने का, तुम्हारे होने का। तुम्हारे साथ के शहर, तुम्हारे एब्सेंस के शहर। तुम्हारे लिए लिखे पोस्टकार्ड। तुम्हारे लिए न ख़रीदे गए शर्ट्स। तुम्हारे हिस्से की शामें। तुम्हारे हिस्से की दोपहरें। तेज ड्राईव्स। 

मुझे डर इस बात से लगता है कि मुझे आजकल डर क्यों नहीं लग रहा है। 

मालूम, पॉंडिचेरी गए थे। इस बार 183 पर मिनी चला लिए। कल कज़िन के यहाँ गए थे, पूछता है, ‘डर नहीं लगता है दीदी?’, समझाये उसको, कि इसी बात का तो डर है कि डर नहीं लगता है। काहे नहीं लगता है, लगना चाहिए। क्यों अच्छा लगता है ऐसे मौत को इस तरह क़रीब से छू कर आना। गाड़ी तेज चलती है, तो सोचती हूँ। जरा सी भी गलती हुई तो बॉडी इस तरह से टैंगल्ड हो जाएगी कार में कि चुन चुन के जलाना पड़ेगा। ख़ून दिखता है। ख़ुद को मरते हुए देखती हूँ कई बार। क्या ही कहें किसी ड्रग एडिक्ट की तरह होता है शायद इस तरह का नशा भी। तेज उड़ती है गाड़ी। बहुत बहुत तेज। उतनी थोड़ी देर कुछ भी नहीं दुखता। न पास्ट न प्रेजेंट न फ्यूचर। एकदम से ठीक उसी मोमेंट में होते हैं। योगा हमसे नहीं होगा। हमको फ्रीवे पर गाड़ी चलाने दो। करने दो कुछ छोटे गुनाह। 

गाड़ी में सिगरेट पीते हैं और सुनते हैं…मेहंदी हसन मीर को गा रहे, ‘देख तो दिल कि जाँ से उठता है, ये धुआँ सा कहाँ से उठता है’. पता नहीं, क्यों, ये गाना बजा कर बहुत अच्छा लगता है। इसमें एक शेर आता है। “गोर किस दिलजले की है ये फ़लक

शोला इक सुब्ह याँ से उठता है।” शाम ऑलमोस्ट हो चुकी है। बैंगलोर से पॉण्डिचेरी का रास्ता स्टेट हाईवे है काफ़ी दूर तक। वैसे तो इस रास्ते पर कई बार आए गए होंगे, लेकिन शायद इस मौसम में इस गाड़ी में कभी नहीं आए गए हैं। धान की कटाई का समय है। धान की गंध उड़ रही है। सड़क पर कई जगहों पर लोगों ने अपने घर के आगे धान पसार रखा है सुखाने के लिए। गंध उड़ रही है, हवा में इर्द गिर्द है। धान की गंध लिबास की तरह बदन से लिपटती है…साड़ी की तरह लपेट रही…उसमें धूप की गर्माहट है और बचपन के दिन हैं। गर्मी की आहट वाले दिन जब कि पेड़ों पर आम नीचे लटके दिखते थे। होली के आसपास ऐसी गंध होती थी गाँव में। कटे पुआल की…इस गंध के साथ पूरे देह का छिलना भी याद रहता है। पुआल की टाली में सब बच्चे कूदते थे। पुआल में धार होती है। धान भी नुकीला होता है। देह में यहाँ वहाँ खरोंच पर अक्सर गेंदा के पत्ते मसल कर लगा लेते थे। या पानी से धो लिए…तनी-मनी छिलता था, ठीक हो जाता था अपनेआप। 

***

मेरे घर के आगे अमलतास के दो पेड़ हैं। वे बारी-बारी से फूले…पहले जिस पेड़ पर अमलतास आए, उसके पूरे फूल ख़त्म हो कर जब तक हरे पत्ते आए, उसके पास का अमलतास एकदम ठूँठ ही था। मुझे लगा, पेड़ में शायद कोई तरह की खाद डालनी चाहिए थी। कि हालांकि मैं इस साल जनवरी में इस घर में आई हूँ, फिर भी कहीं न कहीं इस छोटे से अमलतास के पेड़ का न फूलना मेरी ही गलती है। 

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मेरी आँखें थोड़ी ख़राब हो गई हैं। अब अक्सर हर कुछ ही देखने में दिक्कत होती है। कभी दूर का तो कभी पास का नहीं दिखता। अंधे लोग चीज़ों की छू कर शिनाख़्त करते हैं। शायद बहुत साल से मैं ऐसी तैयारी कर रही थी कि जब देखने में दिक्कत हो, आँख बंद कर गहरी साँस ले सकूँ और चीज़ें ठीक ठीक याद रह जायें…स्टारबक्स में कॉफ़ी का गर्म कप पकड़ूँ और तुम्हारे हाथ याद रहें। कोई खुरदरी दिवाल पर हाथ फिराते चलूँ और सांची के स्तूप देखते समय भिक्षुओं के कमरे की दीवार पर हाथ फिराना महसूस हो…धूप, हवा और तुम्हारा होना महसूस हो…तुम्हारी मौजूदगी से दिल को थोड़ा सा करार आता है, वो रहे. 

हम बेचैन लोग हैं…शायद बहुवचन में लिखना सही न हो…मैं बेचैन रहती हूँ अक्सर…मेरे दिल को सलीके से धड़कना नहीं आता…बहुत कम सुबहें होती हैं कि palpitations न होते हों…अब तो याद भी नहीं आता कि कभी मैं ऐसे भी थी कि ये घबराहट रोज़मर्रा का हिस्सा नहीं थी। मालूम, मुझे कॉलेज में लोग पूछा करते थे, तुम हमेशा इतनी खुश क्यों रहती हो? क्या हासिल हुआ है तुम्हें? हासिल उन दिनों भी कुछ नहीं था…लेकिन छोटी छोटी चीज़ों को देखना और उनमें ख़ुश होना थोड़ा ज़्यादा होता था। चाहे वो पटना की सड़क पर चलना हो, जिसमें गुलमोहर और अमलतास अल्टरनेट लगे हुए थे। चाहे वो उस लड़के का इंतज़ार हो, जो कहता था कि मुझसे प्यार नहीं करता…शायद सिर्फ़ अच्छी लगती हूँ उसे…लेकिन इसको प्यार थोड़े न कहते हैं। मुझे इन दिनों भी छोटी छोटी चीज़ों से बहुत ख़ुशी मिलती है। धूप-छाँव वाला ज़मीन का कोई हिस्सा हो, कोई संगीत का टुकड़ा हो, गाड़ी चलाते हुए दिखता, एकदम नीला आसमान हो या कि सूर्यास्त या सूर्योदय। बच्चे भी मेरी तरह कोई फूलों से पूरा लदा हुआ पेड़ देख कर खुश होते हैं, उस पेड़ का नाम पूछते हैं। कभी-कभी होता है, मुझे मालूम नहीं होता, और कहती हूँ, मेरे पास सारे जवाब नहीं है, पर मैं खोजूँगी तुम्हारे लिए। 

शायद तुम समझो, तुम्हें बताने का मन करता है। हालाँकि, तुम्हें बचाने का मन भी तो करता है। मन के भीतर गहरा, गाढ़ा, चिपचिपा तारकोल है…गर्म, खौलता हुआ…इसकी गंध जलाती है, इसकी छुअन भी…इसी कोलतार से सड़कें बनाती हूँ, उन सड़कों पर फर्राटे से याद की गाड़ी चलती है…वरना पहले कच्ची सड़कें थीं…उनपर चलने से तुम्हारे जूते गंदे हो जाते। तुम्हें जूते उतार कर बैठना अच्छा नहीं लगता। शायद तुम भी मेरी तरह, बस, किसी भी समय उठ कर चले जाने का सोचते रहते हो। कभी-कभी। तुम्हें लगता है जूते उतार के बैठने से होटल का कमरा घर जैसा लगने लगेगा। कि घर के भीतर आने के पहले हम जूते उतार कर आते हैं। नहीं? 

मुझे भूल जाने से बहुत डर लगता है…भुला दिए जाने से भी। दरअसल ज़िंदगी में कोई बड़ा हादसा होता है तो वो हमारी core identity हो जाता है। हम चाह कर भी अपनेआप को उस हादसे से इतर बना नहीं पाते। 

एक मई को मम्मी का बर्थडे है। मैं कभी कभी चाहती हूँ कि ये तारीख़ भूल जाऊँ। लेकिन भूल नहीं पाती, वैसे उस दिन छुट्टी रहती है, तो चाह के भी भूलना मुमकिन नहीं है। घर पर रहने का मन नहीं करता एक मई को…अजनबियों के बीच रहना चाहती हूँ…उन्हें मम्मी की बहुत सी बातें बताना चाहती हूँ, कि शायद वे बिना जजमेंट के सुनेंगे…अटकती हुई कहना चाहती हूँ, कि मुझे भुला दिए जाने से इसलिए डर लगता है कि मैं जानती हूँ, बहुत कोशिश करने से हम सब कुछ भूल सकते हैं…

मैं अपना पूरा बचपन भूल गई हूँ…वो सब कुछ जो उसके इर्द-गिर्द था। उसकी साड़ियों के रंग…उसकी ख़ुशबू…उसके बनाए खाने का स्वाद…कभी कभी जब उन लोगों से मिलती हूँ जो उसे जानते थे, जो मुझे जानते थे और वो मुझे उसके बारे में बताते हैं, तो मुझे याद आता है…दुखता हुआ, कि ज़िंदगी में ये सुख भी था। 

हम जिससे प्यार करते हैं, उससे मिलना हमेशा जादू होता है…

लेकिन कभी-कभी, कुछ ख़ुशक़िस्मत लोगों को नसीब होता है कि जिससे बहुत प्यार करते हैं, उससे बिछड़ते हुए, उनके सीने से लग कर, मन भर रो सकें। जैसा बिछोह लिखा है कभी कहानी-किताब में, वैसा कोई बिछोह जी सकें। कभी ऐसा भी हो ज़िन्दगी में, कि रोने पर कोई पोंछ सके आँसू, कि रोते हुए तमीज़ का ख़्याल न रखें…कि कोई बाँध टूटे आँसुओं का, तो टूट जाने दें। कि तुमसे बिछड़ने के दुख में मिल जायें, जीवन के सारे पुराने दुख, “चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले, कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले”। तुमसे बिछड़ना-मिलना तो कई जन्म का किस्सा है। बिछड़ते हुए, हर बार लगता है, इस जन्म, आख़िरी बार मिल रहे हैं। मिलते हुए, हर बार लगता है, बीच में कई जनम बीत गए। 

हाथ से बुने कपास में जादू होता है। उसकी मेमोरी डिस्क होती है…तभी तो, वो हैंडलूम की नीली साड़ी जो तुमसे मिलने के दिन पहनी थी, तह कर के रखी है। उस दिन के बाद दुबारा पहन नहीं पायी हूँ। लगता है कोई फ्रैजिल तिलिस्म है उसमें, खोलने से टूट जाएगा। साड़ियाँ कम रिपीट होती हैं वैसे भी, इतनी सारी ख़रीदती रहती हूँ, कम ही मौक़े आते हैं पहनने के…

मिलने वाले दिन के विजुअल cues हैं, याद को खंगालती हूँ, तुम्हारी ब्लैक शर्ट, तुम्हारे बिना क्रीज वाले लिनेन पैंट्स…तुम्हारी चवन्नी हँसी…सब कुछ आपस में मिला जुला है…मोंटेज. 

***

आज सुबह एक चिट्ठी मिली…स्त्रीलिंग पुल्लिंग, जेंडर डिफाइन करने में मुश्किल हो रही है…कभी लिखती हूँ, तुम्हारा ख़त मिला. कभी लिखती हूँ, चिट्ठी. सुबह उठी तो पैल्पिटेशंस थे, अक्सर जैसे होते हैं. चिट्ठी पढ़ी और इतना रोना आया…ख़ुशी वाले आँसू। कभी यकीन नहीं होता, कि किसी की ज़िंदगी में मेरी कोई ख़ाली जगह है. इक इतवार जैसी. किसी गुरुवार जैसी. कि कितना सादा वाक्य है, ‘तुम्हारी याद आती है’, कलेजे में राहत महसूस होती है, जैसे माँ चोट पर फूँक मार रही हो. 

हमारी सिगरेट से उसके एक कश मार लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन आग बुझ जाती है…

अधूरी ख्वाहिशों का क्या करूँ? दफ़ना दूँ? काग़ज़ में लिख कर चिता जला दूँ? दिया जला, पत्ते के दोने में रख गंगा में बहा दूँ? गाँव में थोड़ी ज़मीन ख़रीद कर मंदिर बनवाऊँ और फिर पास में इन्हीं इच्छाओं की समाधि बनवा दूँ? कैसे मिलेगी शांति? ये मन इतना छटपटाता क्यों रहता है हमेशा? हमेशा? 

एक हूक उठी रहती है भीतर…हमेशा…हमेशा… 

Music is an ancient memory. Carried across lifetimes, like an almost soul-ache. 
Almost. 

एक पुरातन दुख है, हमारे भीतर। इस जन्म तो इतना मिलना हुआ नहीं है कि बिछोह इस तरह हमारे वजूद के टुकड़े करते जाये। कोई संगीत सुनें और जैसे कि आरी से काटा जा रहा हो बहुत पुराने जंगल में देवदार कोई, ऐसा दुखे…जंगल में पगडंडियों पर चलते जायें और सोचें कि ये चिकने पत्थर जहाँ तक हैं, गंगा यहाँ तक बहती थी…पहाड़ों को डुबाने इतनी गहरी…प्रेम ऐसे ही बहता था हृदय में, बहुत पहले…प्राचीन गंगा नदी की तरह…कई सौ फीट गहराई…कहीं चुपचाप, कहीं शोर करता हुआ। 

तुमसे मिल कर लगा, सब कुछ मिला है, सिवाए वक़्त के…लेकिन इतने वक्त के बाद, कौन सा वक्त था कि घट गया। क्या वक़्त कभी पूरा नहीं पड़ेगा? 

कोई यूनिट नहीं है न कि किसी के गले लगने पर कब हटा लेनी है बाँहें, है ना? आधा सेकंड और रुकना था…या एक मिनट और? कोई टाइमर, कोई स्टॉपवॉच क्यों नहीं होती जो बता दे…कि नहीं हुआ है वक्त पूरा…थोड़ी देर और रुको…हम क्यों नहीं रुक पाये? 

डॉक्टर बताते हैं कि इस उम्र में बेहतर डाइजेशन के लिए ज़रूरी है कि खाना खाते हुए थोड़ी सी भूख बची रही, तब खाना बंद कर देना चाहिए। ऐसी आदत डिसिप्लिन से आती है। लेकिन हम यह डिसिप्लिन खाने पर ही नहीं, हर चीज़ में लागू करते हैं। जितना काफ़ी है, उसके पहले रुक जाना। 

लेकिन जो थोड़ा सा और चाहिए, वो जो भीतर भीतर घुमड़ता रहता है, उसका क्या करें? 
क्या हमेशा बचा ही रह जाएगा कुछ न कुछ? क्या अधूरी ख्वाहिशों के लिए कोई तर्पण, कोई मुक्ति नहीं? 

कुछ लोगों को सिगरेट माँग के पीना अच्छा लगता है। अपनी नहीं जलायेंगे, अपनी ख़रीदेंगे भी नहीं। उनसे कहो कि अपनी नई जला लो, तो मानेंगे भी नहीं, कि पूरी सिगरेट नहीं पीनी है…एक दो कश मारना है, तुम दे दो। अब क्या कहें कि हमारी सिगरेट से जो दो कश मार लिए तुम, उसके कारण मन नहीं भरता…फिर चाहे पूरी सिगरेट की डिब्बी खत्म कर दें…वो जो दो कश था, वो बाक़ी रह गया। तुमने हमारे हिस्से की सिगरेट पी ली। 

क्या सिखाने से शेयरिंग आ जाती है? या फिर हम अनिच्छा से दे तो देते हैं, भीतर भीतर भुनभुनाते हुए…कि हमारे हिस्से का था…मत लो। कोई किस समय इतना अपना हो जाता है कि हमारी बॉटल से उसके एक घूँट पानी पी लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन प्यास बुझ जाती है…हमारी सिगरेट से उसके एक कश मार लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन आग बुझ जाती है…ये तो हिसाब की गलती है ना, जितना काफ़ी था, उससे कम में रुकना था ना? फिर हमने उसके लिए अपने बनाए नियम क्यों तोड़ दिए। 

हम कभी-कभी बहुत हाइपर होते हैं…एक क्षण नहीं ठहर पाता मन हमारा…पास्ट, प्रेजेंट, फ्यूचर में भागता रहता है। मन तुम्हें हर समय से अलगा कर देखना चाहता है…एक समय, सिर्फ़ अपने लिए…एक समय मन तुम्हें तुम्हारी दुनिया से उठा लाता है और एक कहानी में रख देता है। कि बाक़ी चीज़ें एक जगह, पहले जरा इत्मीनान से देखने दो तुम्हें…थोड़ा मेरा हाथ पकड़ के चुप बैठो…कोई दुखता हुआ म्यूजिक पीस चला दो…ऐसा कि जिससे रूह के दो फाँक हो जायें। 

कितना अच्छा होता है ना, प्यार में न होना। हम कितने बहादुर होते हैं। हमें बिल्कुल भी डर नहीं लगता। किसी भी चीज़ से नहीं…काश कि हमारे बस में होता, किसी से प्यार करना, न करना…कम/ज़्यादा प्यार करना…काश कि समझ आता, कि चिंगारी कई सालों में भी नहीं बुझती है। तुम्हें डर नहीं लगता, क्यूंकि तुम्हें प्यार नहीं है। हम कितने बहादुर होते हैं, जब तक हमारे दिल में किसी का नाम थोड़ा सा दुखने नहीं लगे। कि हम कोई नाम सुन कर मुस्कुरा रहे होते हैं, पर आँख भर भर आती है। 

औरत को आग बचा के रखने की सलाह दी गई थी…कि हर रोज़ खाना बनाने के पहले आग मांगने जाना न पड़े…उसने जलाये रखे कोयले, गोयठे के भीतर…लाल लाल आग सुलगती रही…उन दिनों माचिस भी मुश्किल से मिलती थी…और खाना चूल्हे पर बनता था। दुनिया बदल गई, खाना बनाने के तरीके बदल गए, लेकिन जो आग बचाये रखने की सलाह दी गई थी, वो लड़की ने भीतर बचा कर रख ली। वो अपने भीतर एक चिंगारी हमेशा बचाये रखती है। अन्तर इतना रहा, कि ये डायनामाइट के पलीते में लगी चिंगारी रही मेरे दोस्त…लड़की को आग-आग में अंतर करना नहीं आया। तुमसे मिली थी तो सूखे पत्ते बिखरे हुए थे जंगल के फर्श पर…जरा रगड़ने से चिंगारी सुलगने लगी… 

सिगरेट जलाने की आग और होती है, दिल जलाने की आग और होती है…ये जो भीतर भीतर जलता है…इस आग को आँसुओं से बुझा देना चाहिए. 

ये दिल जो हमारा इतना दुखता रहता है, सारा दुख, सारा बिछोह इसी जन्म का हो नहीं सकता। कुछ है जो कई जन्मों से थोड़ा थोड़ा कर ख़त्म हो रहा, लेकिन पूरी तरह ख़त्म नहीं होता। कुछ है जो वापस लौटने के लिए तड़पता रहता है। शायद हम में से कई लोग ईश्वर के पास आत्माओं के रूप में रहते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुए थे। 

एक हूक उठती है भीतर, एक दुख तड़पता है। एक गीत में किसी की आवाज़ हमारे दुख से रिज़ोनेट करती है। 
ईरान-इजराइल-अमरीका के इस युद्ध का असर हमारे प्रेजेंट और फ्यूचर पर पड़ रहा है। पता नहीं, सफ़र करना कितना आसान या कि मुश्किल होगा। हम तयशुदा तरीक़े से नहीं कह सकते कि अब हम कब मिलेंगे। गीत उसी दिन सुना था, इतवार को… 

आज सुबह रहा नहीं गया तो खोज कर इसके पुराने वर्शन सुने… 
हिंदी उर्दू के कुछ शब्द हमारे जाने पहचाने हुए हैं…समझ आता हैं उनका मतलब…एक दिल कहता है चले जाओ, एक दिल कहता है रुक जाओ…Soltane Ghalbhan नाम का यह गीत ईरान के लिए सिर्फ़ एक गीत न हो कर याद और लौटने के नामुमकिन सपने जैसा है। रुकने और चले जाने के ठीक पहले। Between memory and hope. 

Soltane Ghalbhan जो वर्शन एकदम कलेजा चाक कर रहा है वह डैनी ने गाया है। बहुत साल पहले Siboney सुना था। उसमें कौनी फ़्रांसिस की आवाज़ ऐसी ही थी, कि ऊँचा खींचती थी तो साथ ही रूह का जैसे तागा तागा खिंच जाता था। saudade को आवाज़ में ढालता Jab Harry met Sejal में एक गाना था, यादों में…ये गीत जैसे ज़ख़्म और मरहम एक साथ होते हैं। 

मैं लिख कर तुम्हें ज़िंदा कर देना चाहती हूँ किसी कहानी में…काग़ज़ पर इतना लिखूँ, इतना कि उँगलियाँ दुखने लगें। कि हथेली पसीने से तरबतर हो जाये और साड़ी के आँचल में हाथ को धीरे धीरे पोंछते हुए तुम्हारे हाथ याद आयें, दुखते हुए। कि जाने कैसा लगता है तुम्हारा हाथ पकड़ कर थोड़ी देर को बैठना, जब वसंत हो और अमलतास खिले हों पूरे शहर में। 

पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी मिलता है। 
दिल ऐसी ही गहरी बावली है। 
*** 

मैं अब भी खूब सारा लिखती हूँ। भले कहीं फ़ेयर न लिखूँ। कोई कहानी न लिखूँ। लेकिन ज़िंदगी में जो जिया, जो गहरे महसूस किया, उसको दर्ज करना अच्छा लगता है। हर साल की एक नोटबुक तो होती है सो होती है, उसके अलावा ढेर सारी छोटी-बड़ी ट्रैवल नोटबुक्स, बहुत तरह के पिक्चर पोस्टकार्ड्स। अन्तर्देशी। चिट्ठी के काग़ज़। लिफ़ाफ़े। 

मेरी हर नोटबुक में अधूरी चिट्ठियाँ, दोस्तों के नाम के पोस्टकार्ड्स होते हैं। शायद हमारे शहरों से इस तरह चिट्ठी गिराने का लाल डिब्बा हटाया नहीं जाता तो मैं ख़त लिख कर गिराती भी। कुरियर बहुत औपचारिक होता है। चिट्ठी बहुत पर्सनल, इसलिए न चाहते हुए भी चिट्ठी कुरियर करने में एक बेईमानी लगती है। जिन्होंने सालों साल चिट्ठियाँ लिखी हैं और डाकघर जा कर रजिस्टर की हैं, वे शायद इस बात को समझ पायें कि पोस्टऑफ़िस के स्टाफ को आप कितनी अच्छी तरह पहचानते हैं…और वे आपको। किस्से में डाकिये के होने से मुहब्बत एक साझा साज़िश हो जाती है। वे आपके गुनाह में शामिल ही नहीं, उसके गवाह भी होते हैं। मुझे लगता है डाकिया के हाथ में लिफ़ाफ़ा हो या कि पोस्टकार्ड, वो ख़त को समझता है। 

डाकिया सिर्फ ख़त डिलीवर नहीं करता, वो दो प्रेमियों के बीच के काग़ज़ के रिश्ते का गवाह होता है। 

किसी रोज़ अदालत में उससे पूछो, कि क्या मैंने तुमसे प्रेम किया था कभी…तो कुरियर वाले को नहीं मालूम होगा, लेकिन डाकिया अपना चश्मा पोंछते बोलेगा…ज़िंदगी के आख़िरी पोस्टकार्ड इसी लड़की के डिलीवर किए। सिर्फ़ इन पोस्टकार्ड और चिट्ठियों के कारण तो रिटायरमेंट का अफ़सोस रहा। तुम्हें देखेगा और कहेगा, मैंने तो सारे ख़त पढ़े भी नहीं, फिर भी तुम्हारा नाम लिखा देख कर जान जाता था कि कोई तुमसे बहुत प्यार करता है। तुम भीतर के ख़त पढ़ कर भी नहीं जान पाये कि कितनी मुहब्बत है, ऐसा कैसे हुआ?

तुम क्या जवाब दोगे भरी अदालत में, कि मैंने तुम्हें कोरे काग़ज़ भेजे हैं उम्र भर। कि बहुत साल पहले कभी मैंने तुमसे पूछा था कि ख़त का जवाब क्यों नहीं देते तो तुमने मोमिन का शेर सुनाया था, “हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँ कर, हाथ दिल से जुदा नहीं होता” 

क्या ही पूछें तुमसे, तुम, जो ख़त के आख़िर में लिखते हो, तुम्हारा। 

*** 

तुम्हें गोल्ड फ्लेक कब से अच्छी लगने लगी? 
तुम अच्छे लगने लगे हो। 

छोटी गोल्ड फ्लेक, दिल पर नन्हे लेकिन मज़बूत टांके लगाने के लिए। 

जल्दी ठीक हो जाने के लिए, हर बड़े ज़ख़्म  को सिलना पड़ता है। छोटी गोल्ड फ्लेक चाक हुए कलेजे को सिलती है। अगर गहरा ज़ख़्म देख कर तुम्हारे हाथ थरथरायें न तो। ये मत कहो, कि छोटी गोल्ड-फ्लेक ही क्यूँ, कि फिर हम कहेंगे, ठीक होने की इतनी भी जल्दी किसको है, फिर तुम क्यूँ भेज देना चाहते हो ऐसे दुखते कलेजे वाली लड़की को ख़ुद से इतना ज़्यादा दूर…बकवास मत करो, कि एक फ्लाइट की दूरी को दूर थोड़े कहते हैं, पास ही कहते हैं…जब मन हुआ, उड़ कर आ जाना। 

ये चारागर है जिसके पास चुप्पी भी है, बातें भी…कहो, किससे ठीक होना है तुम्हें…या कि गोली देना हो तो वो भी है, गोली खानी हो, तो सो भी है…वन स्टॉप सॉल्यूशन। मर्ज़ अच्छा लगने लगे, इतना अच्छा चारागर। 

इस सिगरेट की छोटी साइज पर नहीं जाओ, कि इस ऑपरेशन में ज़्यादा देर लगेगी…मेरे पास वक्त ही वक्त है। देर तक पियेंगे, ढेर सारी, छोटी छोटी गोल्ड-फ्लेक…जब तक कि तुम्हारा कलेजा इतना जलने लगे कि भूल जाओ, किस ज़ख़्म की सिलाई करने बैठे थे। कैसा गर्म मौसम था, तसल्लीबख़्श। स्कूल में जब गर्मी छुट्टी होती थी, करने को कुछ नहीं होता था। नानीघर में गलियों में धूल फाँकते रहते थे या अमरूद के पेड़ पर लटके कौन सा अमरूद कब पकेगा का हिसाब लगाते रहते। जरूरी काम होते थे कि माँझे का धागा बनाने के लिए बल्ब या ट्यूबलाइट मिल जाये, तो कचरे में भी ढूँढने जाते थे कभी कभी। ग़ज़ब डेयरिंग हुआ करते थे उन दिनों। ये गर्मी वैसी ही थी। ये दिल वैसा ही होना चाह रहा था, तुम लोगों के साथ। 

हम जो कि मग्गे में कॉफ़ी पीते हैं। तुम्हें मालूम, कमसेकम 350ml तो होनी ही चाहिए। छोटी कप में पीने में मजा नहीं आता। कुल्हड़ वाली चाय भी पीने जाते हैं तो लार्ज या मीडियम। यहाँ ये इत्ता छोटा छोटा काग़ज़ के कप में चाय, जैसे टेस्टिंग कराते हैं, वैसा ही…लेकिन जाते साथ थोड़े समझ आ जाता, कि एक ही बार में मग्गे भर चाय क्यों नहीं पी रहे। ये इत्मीनान की जगह थी। दोहराव की…बचपन में लिखना सीखते हैं तो बार बार एक ही शब्द लिखते हैं। खूब जोर से पेंसिल गड़ा कर नोटबुक में। डेस्क की लकड़ी में डिवाइडर से खुरच खुरच कर…याद करने वाली चीज़ को दोहराव चाहिए होता है, हमेशा। 

अपने। तुम मेरे अपने लोग थे। मेरे अपने। 

मैंने तुम्हें for-granted लिया। मैंने तुम्हें परेशान होने दिया, अपने लिए। कि ठीक है, आओ तुम भी सुबह सुबह उठ के एयरपोर्ट। ऐसा एक इतवार हो सकता है कि नींद से चोरी करें घंटे-घंटे भर। कि बिना किसी मुद्दे के बात करेंगे हम। कि उलझ जाएँगे किसी एक ही बिंदु पर और तुम झेल लोगे, एक रोज़, थोड़ी देर को…इतना साधिकार कहेंगे, अनाधिकार हो, तो भी सही। 

मेरे भीतर दो तरह की कहानियाँ रहती हैं। एक जो फर्स्ट पर्सन में लिखी जाए और दूसरी जो थर्ड पर्सन में लिखी जाए। दोनों कहानियाँ अलग अलग तरह की होती हैं। सच वाली कहानियाँ थर्ड पर्सन में लिखना आसान रहता है और पूरी काल्पनिक कहानी फर्स्ट पर्सन में…लेकिन आसान रहता है, इसलिए जरूरी नहीं हैं कि हम वही चुनें। मेरे भीतर लगातार बोलते रहने वाली कोई एक किस्सागो लड़की रहती है। पंखे के चलने की आवाज़, ट्रैफिक का शोर…जैसे ये वाइट नॉइज़ है, जिसपर हम ध्यान नहीं देते, मेंटली म्यूट कर के चलते हैं, मैं भी कहानी सुनाने वाली इस लड़की को अक्सर अनसुना कर के जी रही होती हूँ। लेकिन कभी कभी लेकिन उसका दिमाग़ एकदम ही ख़राब हो जाता है, it is chaotic…फिर वो मेरे भीतर भूचाल, सूनामी और ज्वालामुखी फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बुला लेती है…

उस रोज़ स्टारबक्स जाने का मन नहीं किया था। घर से एक घंटा दूर। बाहर बाहर की सड़कें, बिल्कुल भी शोर नहीं, ट्रैफिक नहीं…मौसम प्लीजेंट…मार्च है, बेहद सुंदर फूल खिले हुए हैं सब जगह। खास तौर से गुलाबी और बैगनी फूलों से ढके हुए पेड़…ताम झाम का क़िस्सा ये था कि कुर्ते की स्लीव थोड़ी सी बाँह पर अटकती थी और हमको लिखते हुए अक्सर हत्थे चढ़ाने की आदत है…कुर्ता पहन कर हम अक्सर लिखने तो नहीं ही जाते हैं…तो पहले fabindia में पिट-स्टॉप लिए…एक अच्छा सा कुर्ता खरीदा, मैचिंग झुमके ख़रीदे और फिर उस कैफ़े गई जहाँ कोई मुझे नहीं जानता। 

आसमान में बादल की आउटलाइन सुनहली हो गई थी। शाम से वहाँ बैठ कर नॉवेल का पहला चैप्टर लिखे। सोचे, दोस्त ऐसे होने चाहिए जिनके घर बिना एडवांस नोटिस के जा सकें। जिन्हें बुलाने के लिए जिद मचायें तो वे मान जायें और आ जाएँ चुपचाप…तबीयत अच्छी-ख़राब, ऑफिस का काम, पति की किचकिच, सब छोड़छाड़ के…लेकिन ऐसा कोई है तो नहीं शहर में…फिर क्या ही करते। दिल को समझाने की कोशिश की, वही एक बात, जो इतने साल से समझा रहे हैं…कि वैराग्य भी अभ्यास से आता है। कि हम प्रैक्टिस कर के सीख जाएँगे, किसी की याद में तड़पने के बावजूद उसे बताये बिना जिया जा सकता है। कि कायनात के सामने भीख मांगने की जरूरत नहीं है। कि ये वक़्त गुज़र जाएगा और अभी जिसे एक नज़र देखने के लिए जान जा रही है, वो सामने होगा और तुम उस से दूर रह सकोगी। 

भर दोपहर और शाम कहानी लिखने के बाद किसी दोस्त की बहुत तलब लगती है। जिसे थोड़ी सी कहानी सुनायी जा सके। लेकिन बैंगलोर में मेरी कहानी किसी को समझ में तो आएगी नहीं। कि इतना इंटेंस जीना ही क्यों है…क्या समझायें, कि हमेशा ये ऑप्शन नहीं होता कि एसी के टेम्परेचर की तरह इंटेंसिटी कम ज़्यादा कर सकें…इसका कोई रिमोट नहीं होता. 

साथ लाए बैग में सब कुछ था, आईपैड, मैकबुक, तीनों नोटबुक्स, सारी कलमों में फ्रेश इंक, बहुत सारे पोस्टकार्ड्स…और मन में एक गहरा दुःख। ख़त लिखने को दिल किया…वर्ड डॉक्यूमेंट खोल के पढ़ा…इस ख़त पर मेरा नाम नहीं है, सिर्फ़ डियर राइटर…कि मुझे जाने बगैर, सिर्फ़ मेरे शब्दों से मुझे जाने वाला कोई मुझे इतनी प्यारी चिट्ठी लिख सकता है। क़ायदे से तो ऐसे लोगों से कभी मिलना नहीं चाहिए…कि हम तो इतने उलझे हुए, बेसब्र, परेशान से हुए रहते हैं। हमसे मिलने का कोई फ़ायदा नहीं है। टाइमपास भी नहीं, टाइमवेस्ट। ख़त इतनी बार पढ़ चुकी थी, ये भी लगा कि कैसे लोग हैं ना दुनिया में…उन्हें तारीख़ें याद रहती हैं, उन्हें नंबर्स समझ आते हैं…उनका समय तक का हिसाब ठीक है। 

हम हैं, जिससे कल बिछड़े हैं, लगता है पिछले जन्म में मिलेंगे और दुखता ऐसे है कि अगले जन्म उनसे मिले बिना जीवन लगभग सारा बीत जाएगा। 

इसी बेनामी ख़त में बहुत सुंदर शेर लिखा मिला था

दुख ऐसा चाहिए कि मुसलसल रहे मुझे

और उस के साथ साथ अनोखा भी चाहिए

इक ज़ख़्म मुझ को चाहिए मेरे मिज़ाज का

या’नी हरा भी चाहिए गहरा भी चाहिए

  • जव्वाद शेख

उसका हिसाब थोड़ा भी पक्का होता तो गिन लेती न, कितने दिन बीते…कितने साल, कितने मौसम, कितने लम्हे…सड़क के साथ चलती नदी में कितना पानी बह गया। बहुत साल पहले हम अजनबी थे, बिल्कुल झूठी बात लगती है हालाँकि। उससे पहली बार मिलने पर भी अजनबी जैसा नहीं लगा कभी। ऊँचे पेड़ों वाले एक छोटे से शहर के किनारे किनारे नदी चलती थी। नदी के किनारे किनारे सड़क। सड़क पर छोटे छोटे पत्थर थे। नदी दिखने से ज़्यादा महसूस होती थी। ऐसा लगता था, कोई नदी बह रही है कहीं। 

उस दिन ज़िद पर उतर आई थी कहानियों वाली लड़की, कि इस दिल को एब्सेंस से ज़्यादा presence की लत लग रही है, ऐसे में लतखोर दिल को थूर-थकूच के समझाना जरूरी था कि किसी के होने की आदत मत डालो…किसी को आवाज़ न दो। कोई है नहीं, इस भागते शहर में जो तुम्हारे बुलाने पर आ सके। सुनोगी तो मजबूरियाँ सुनायेंगे लोग तुम्हें, बहाने नहीं। इतना आसान थोड़े होता है तुमसे मिलना। लौंग राइड पर जाने के पहले जैसे बाइकर्स राइडिंग गियर पहनते हैं, वैसे ही तो दिल को पूरी तरह सेफ्टीगियर पहना कर लाना पड़ता है तुमसे मिलने। बहुत ताम-झाम है तुमसे मिलना, ऐसे नहीं होता कि कहो, पाँच मिनट में आ जाओ घर के नीचे, चलो, चाय पीने चलेंगे। उसको काल्पनिक किरदारों से मिलने के पहले पूरा तैयार होना होता था, साड़ी झुमके, बिंदी, परफ्यूम…लेकिन ज़िद इतनी भी होती थी कि बाल न उलझें…उससे कौन मिलेगा बिना तैयारी के…कोई भी नहीं तो। जो तुमसे नहीं मिलते, उनसे मिलने को काहे परेशान होती रहती हो। जो मिलना चाहते हैं, वाक़ई, जाओ उनसे मिल आओ। 

मुझे लिखने के पहले बहुत से शहर देखने होते हैं। अहमदाबाद में एक पुरानी, रानी की वाव है। स्टेप-वेल…पत्थर की सीढ़ियों वाला कुआँ। याद नहीं बाओलियों के लिए मुझे इतना प्यार कब से उमड़ा…IIMC के अपने दोस्तों के साथ जब पहली बार एक स्टेपवेल देखी थी, तब से उनका सम्मोहन मेरे भीतर रहता है। मन के भीतर गहरे, कहानियाँ ऐसे ही रहती हैं। 

सुबह साढ़े छह की फ्लाइट की टिकट साढ़े चार बजे कटायी…पंद्रह बीस मिनट में बैग पैक किया…और चालीस मिनट की ड्राइव है एयरपोर्ट की, सो बीस मिनट में आए, उड़ते उड़ते…दौड़ते हुए एयरपोर्ट के गेट से अंदर पहुँचे…जब वाक़ई प्लेन बोर्ड कर गए…तो दोनों मित्रों को ह्वाट्सऐप कर दिया, कि हम बोर्ड कर रहे…आ रहे हैं तुम्हरे शहर, लेकिन तुम परेशान मत होना. आराम से लंच पर मिलते हैं. और हमको एकदम ही नहीं लगा था, वे पहुँच जाएँगे.

अराइवल्स में बाहर निकलते ही देखा उन्हें…धूप थी. भली. वे भी. भले. 

हम ऐसे मिले जैसे जन्मों के बिछड़े दोस्त हों…जैसे न मिलने का हिसाब किताब हम में से किसी को समझ नहीं आता…गाड़ी में बैठे, हम अपना सामान किसी को उठाने नहीं देते, लेकिन पता नहीं कैसे ये कुछ लोग होते हैं, आई insist वाले…कि मैं जाऊँगा ही नहीं तुम ऐसे बैग उठा के चलोगी तो…दूसरी बार मिल रहे थे। तीन साल हो चुके थे। और ये दोनों मुझे सिर्फ़ मेरे लिखे के कारण जानते हैं, प्यार करते हैं। 

नाम लिखने का मन है, लेकिन नाम लेने से दोस्ती को नज़र लग जाएगी, इसलिए लिख नहीं रहे। 

मैं, तुम, हम…कितना मुश्किल हो जाता है कभी कभी इन तीनों के साथ किसी किस्से को ज़िंदा करना। 

पुरानी सीढ़ियों से उतर कर गई तो बहुत साल बाद उस गंध को पाया जो बचपन में गाँव में कुएँ की मुंडेर पर हुआ करती थी। मेरे गांव के घर में दो कुएँ थे, एक भीतरी आँगन में…एक बाहर गोहाल में, खेत के पास…और एक बड़ा इनारा, अर्थात्, बड़ा कुआं…जहाँ से पीने का पानी लाया जाता था। भीतरी कुएँ पर नहाना, मुँह हाथ धोना, और बर्तन माँजने का काम होता था। उन दिनों बर्तन और हाथ, दोनों राख से माँजे जाते थे। 

सीले हुए पानी की गंध…मिट्टी और पुरानेपन की…कहानियों की गंध। ये ख़ुशबू मेरे भीतर अंधड़ की तरह उड़ती है…

मुझे अब अकेले घूमने की आदत हो गई है। दोस्तों की आदत छूट गई है। 

रानी की वाव में पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी है। हम तीनों आसपास देखते हुए उतर रहे हैं। नक्काशीदार बलुआ पत्थर ऊपर में देखने से भुरभुरा लगता है। स्पंज की तरह सुराख़दार भी। नीचे के तल उतरने पर पत्थर छूने में खुरदुरा, ठंढा और सीला हुआ है। हम बातें कर रहे हैं। मुझे सब कुछ मायावी लग रहा। surreal, जैसे किसी कहानी के भीतर ही हैं। ऐसी पानी वाली ठंढी जगहों पर अजीब सा हौल फील होता है, सीने में…प्राचीन किसी दुख का होना। आत्मा में कुछ गहरा दुखना। दिल डूबता है। 

मैं उन्हें देखती हूँ। सोचती हूँ, कितना अच्छा होता है, शहर में एक दोस्त होना भी। 

चामुंडा चलते हैं, तुम्हारे सारे दुखों का इलाज वही है। मैं सोचती हूँ, कैसी जगह होगी…लेकिन कोई इमेज नहीं बनती। हम गाड़ी में जाते हैं…खुली हुई जगह है…मैदान जैसी, कुछ पेड़ हैं…वहीं बीच में बसा हुआ है…यह छोटा सा, चामुंडा. नखलिस्तान ही है. इतवार की सुबह है, एकदम अलसायी सी…लोग टेबल पर बैठे गप्पें कर रहे हैं…कुछ कुर्सियाँ हैं, सतरंगी धागे से बने कुछ छोटे स्टूल हैं…हम तीन कुर्सियों पर बैठ गए हैं…जूते मोजे उतार दिए हैं. पैर स्टूल पर टिका दिए हैं. 

छोटी छोटे काग़ज़ के कप में चाय…छोटी वाली गोल्ड फ्लेक…जेट फ्लेम लाइटर. 

मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी ऐसी किसी दोपहर को नहीं जिया है…शायद इसलिए भी कि कॉलेज के दिनों में चाय पीते नहीं थे, न पॉलिटिक्स की ख़ास समझ थी। IIMC में पढ़ते हुए जब लोग चाय पीने टपरी पर निकलते थे, हम ऑलमोस्ट कभी नहीं जाते थे, ढाबा पर जाते थे तो खाने के लिए। चाय, सिगरेट, पॉलिटिक्स, ये तीनों मेरी ज़िंदगी में नहीं थे। 

चाय हमको अब भी पसंद नहीं है। जैसे लोग सोशल ड्रिंकिंग करते हैं, वैसे ही हम चाय सिर्फ़ कुछ स्पेशल लोगों के साथ पीते हैं। ये स्पेशल लोग थे। ये स्पेशल सुबह थी। 

इतनी बातें हम ख़ुद के लिए लिख रहे हैं, क्यूंकि बाद में सब कुछ भूल जाते हैं हम। दिन जल्दी शुरू करो तो वक्त धीरे बीतता है। ऐसा इतवार बचपन में ही मिलता था। पापा की छुट्टी रहती थी। सुबह रेडियो पर गाने चल रहे होते थे। मम्मी खाना बना रही होती थी। हम दोनों भाई बहन घास खोद रहे होते थे, कभी आलू उखाड़ रहे होते, कभी मटर छील रहे होते। फालतू के काम। झूला झूल रहे होते, दिन दिन भर। गर्मी छुट्टी के दिन। 

कितना अच्छा होता है ना, जब किसी से कुछ नहीं चाहिये होता है। फिर जो भी मिलता है, सरप्लस ही होता है। भूख लगी थी ज़ोर से…दो प्लेट वेजिटेबल सैंडविच…खीरा टमाटर प्याज़, हरी चटनी और शायद चाट मसाला. गर्म. ताज़ा. इतना अच्छा स्वाद था. एक छोटू था, फ्लास्क और चाय के कप लिए घूम रहा था…हर कुछ देर में चाय पिला जाता था। 

कितने इत्मीनान से बैठे थे। कितनी सारी बातें थीं। बातें ही बस। लगातार चाय, सिगरेट, गप्प…लूप में. पानी की बोतलें. कहीं कोई शोर नहीं। कोई संगीत नहीं। कोई ackwardness नहीं…इतना सहज…जैसे कितने पुराने दोस्त हों. जैसे हम महीने की दो तीन इतवार तो वहीं पाये जाते हैं. ऐसी जगह, ऐसे लोग…कि अचानक से उस शहर में रहने को मन करने लगे। कितना कम चाहिए एक शहर से, लेकिन इतने पार्टिक्युअलर, कि बैंगलोर में सब कुछ मिलता…एक ऐसी दोपहर, एक ऐसी टपरी, दो ऐसे दोस्त और इतनी सारी बातें नहीं मिलतीं। इतना सा ही तो चाहिए, लेकिन। यही चाहिए। कोई और कॉम्बिनेशन नहीं।  

कोई सिगरेट जला के पी हो, सो याद नहीं…जली हुई सिगरेट माँग माँग के पीते रहे…ये अलग था…ये अजब था…ये भीतर की किसी आग को बुझाता था…कोई दुख पे मरहम करता था। लोग क्यों पीते हैं सिगरेट, मालूम नहीं। हम हमेशा दोस्तों के साथ सिगरेट पीते हैं। सिगरेट अपने आप में एक किरदार है। किसी एक बार की सिगरेट, किसी दूसरे बार की सिगरेट जैसी नहीं होती। किसी एक दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट, किसी दूसरे दोस्त के साथ पी हुई सिगरेट जैसी नहीं होती। हम अपने घर में बैठे, कभी सिगरेट पी भी रहे हैं तो ऐसे किसी रोज़ को याद करते हुए ही पी रहे। इत्ती इति सी गोल्ड फ्लेक…छोटी गोल्ड फ्लेक…कड़वी गोल्ड फ्लेक…दिल को जलाती, बुझाती…चारागर। 

इम्पॉसिबल था यहाँ होना…ऐसे कैसे अचानक से खिंच के चले आए ना. 

उसने ख़त में दिनों की गिनती लिखी थी…आख़िरी बार मिले हुए कितने दिन हुए. 

मुझे रश्क हुआ उन दोनों से…कितना आसान था उनके लिए यहाँ होना…कितना मुश्किल और कितना rare है मेरे लिए, जो कितनों को सरलता से मिलता है। 

जाना जितना आसान लग रहा था। लौटना उतना ही मुश्किल था। 

गाड़ी से उतर कर गले लगे…गेट की ओर लौटे…दिल नहीं भरा…लौट लौट कर जाना चाहता था दिल. ये कौन से लोग हैं जो मुझ टूटे फूटे इंसान से इतना प्यार कर सकते हैं…तो क्या शहर की बात है? Bangalore finds me difficult to love. Impossible to love. 

एक बार विदा करने के बाद, वो फिर से दौड़ कर साथ आई। गेट तक। हम दो बार गेट से लौटे। मैं वहाँ खड़ी उसे दूर जाते देखती रही। जब तक वो भीड़ में गुम नहीं गई। 

मन नहीं भरा। मन कभी नहीं भरेगा। 

फ़्लाइट में रोते सुबकते आई। मेरा कोई मायका है नहीं। बिन माँ की लड़कियों का मायका नहीं होता। लेकिन कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसे लोग दे देती है, जिनके पास हम लौट सकेंगे, ऐसा भरोसा होता है। कि वे हमारा इंतज़ार करेंगे। That they can love us in our worst form. That I can take them for-granted. हमेशा माँगते हुए ज़रूरत भर को हाथ फैलाने वाले हम, किफ़ायती लोग। ज़िंदगी उदार हो कर भेजती है, दोस्त, जान से प्यारे…जो बाँहें खोलते हैं और हमें समेट लेते हैं। 

दिल दुखता है। लेकिन इसलिए कि भरा-भरा है। 

और कुछ भी पूरी तरह ख़राब नहीं होता। सिगरेट भले बुरी चीज़ है, लेकिन हमारे लिए मरहम है। 

ज़िंदगी के सबसे सुंदर मोमेंट्स की कभी तस्वीर नहीं होती। उससे बोला, चामुंडा की एक फोटो भेज दो…उसने जो भेजी है, उसमें  एक कुर्सी पर बैग है, दो खाली कुर्सियाँ हैं…टेबल पर एक सिगरेट का पैकेट है…एक कप चाय. 

मैंने अपनी ज़िंदगी में इससे उदास तस्वीर नहीं देखी। 

दुनिया बदल रही है। हम जाने कब मिलेंगे फिर। 

लेकिन इस बदलती दुनिया में, मिल लिए। ये अच्छा है। 

और अच्छे से ज़्यादा, ये काफ़ी है। 

कहो, कर सकोगे, अप्रेम में, इतना, मेरे लिए?

मायावी लड़की, ख़ुद से डरती थी। जिसके इश्क़ में एक आँसू रो दे, उसकी आत्मा उसी एक कतरे में क़ैद हो जाती थी…फिर वो आँसू का कतरा जहाँ जज़्ब हो, प्रेमी की रूह का एक हिस्सा वहीं ग़ुम हो जाता था…फिर वे दुनिया में भटके भटके फिरते, कि जाने क्या छूट गया है…क्यों ज़रा खाली खाली सा लगता है, सीने के बीच ज़रा सा दुखता क्यूँ है। सिगरेट के कश में जो पुरसुकून सुख था, वो घट क्यों गया है। किसने मेरी ज़िंदगी का ज़रा सा सुकून ग़ायब किया है। सब कुछ हासिल कर के भी काफ़ी क्यों नहीं लगता…क्या छूट रहा है…क्या फिसल रहा है हाथ से…

काग़ज़ में जज़्ब होता आँसू का कतरा, तो कहानी बनता, उसे पढ़ते हुए हर अधूरे व्यक्ति को लगता, किसी ने उसकी रूह पर जरा सा मरहम लगा दिया है। कहानियों में कच्ची मिट्टी होती। इससे भरे जा सकते गहरे से गहरे ज़ख़्म। दो फाँक दिल पर लगा के जरा सी कहानी की मिट्टी, टांक देती लड़की अपनी हँसी के कच्चे धागे से ज़ख़्म। माचिस लिए घूमती। उसकी नज़र में इतनी तपिश थी, सियाह आँखें, कोयले जैसी। नज़र भर देखती तो आँच लगती, ज़ख़्म की मिट्टी पर खिलते अमलतास। बारिश में झूमते, नशे में…गुनगुनाते उसका नाम…मंत्र बाँधते, कि बिजली ना गिर जाये इस पेड़ पर। 

रतजगों के बाद वे आँखें भट्ठी जैसी जलती थीं…कभी कभी आँसू भाप बन जाता। आसमान से बरसता। उसके ये अनजान प्रेमी फँस जाते बहुत तेज बारिश के बाद वाले किसी ट्रैफिक जाम में…सारी गाड़ियाँ खड़ी रहतीं अपनी जगह पर। वे एक ही सड़क के दो तरफ़ होते। एक दूसरे को नहीं देख पाते एक नज़र भी। 

वे अजनबी थे, लेकिन जाते हुए एक बार लौट कर आते, हाथ मिलाने को…कि यकीन हो, छुआ हुआ सच है। लड़की हँसती, सिगरेट से जला देती उनकी उँगलियाँ। कहती, ज़ख़्म का निशान देखोगे तो पक्का याद रहेगा, कि मैं सच में थी। 

सच तो कुछ भी नहीं था इस हर पल बदलती, युद्धरत दुनिया में…

इश्क़ और जंग में सब जायज़ है, कहती हुई लड़की किसी बहुत तेज बारिश की रात में पूरा भीगती लेकिन बारिश में गुम नहीं होता आँसू का वो कतरा जिसमें नाम घुला हो…वो कतरा चमकता…आसमान में…

वो अजनबी हर बार जब बिजली कड़कते हुए देखता खिड़की से बाहर तो सोचता, ये उसके नाम का अक्षर हमेशा कैसे दिखता है सेकंड के क्षणांश में आसमान में लपकती रोशनी की लकीरों में…

तेज बारिश में गीली सिगरेट आसमान की ओर उठाती लड़की और आसमान को चैलेंज करती, उस लड़के को मुझसे जरा भी प्यार नहीं है, जो मैं झूठ बोलूँ तो इस सिगरेट को जला कर दिखा…भगवान हँसते, बेवकूफ लड़की, इतना सिंपल टेस्ट…आसमान से धरती की ओर बिजली लपकती और सिर्फ़ सिगरेट का सिरा जला कर ज़मींदोज़ हो जाती…

लड़की गहरा कश लेती, हँसती…यार भगवान, तुम भी ना, ये बिजली हमारे दिल पर गिरा कर क़िस्सा तमाम कर देते, इतना क्या सोचना है तुमको…एक मेरे मर जाने से कुछ भी तो हिसाब-किताब गड़बड़ नहीं होगा दुनिया पर…भगवान जी कहते, जरा-जरा मरो तुम इश्क़ में…पूरा मत मर जाना, जितनी बेवकूफ हो, उतनी ही प्यारी भी तो हो। 

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शहर दिल्ली से बेइंतहा मुहब्बत करने के कोई सुबूत नहीं हैं मेरे पास, सिवाए इसके कि किसी रैंडम से दिन बहुत मुश्किल से पायी हुई एक ख़ाली दोपहर में लिखने बैठी हूँ, कहानी मिजाज में घुली हुई है। मॉल का गेट सामने है। लोग इर्द-गिर्द हैं। मैं किसकी याद में हूँ, मालूम भी नहीं। मुहब्बत को तो उस शहर में भी याद करते हैं, जहाँ उसके होने का कोई ठिकाना नहीं होता। शहर दिल्ली में अभी पलाश और सेमल खिले होंगे। लोधी गार्डन में बोगनविला के उस पेड़ पर झूम कर गुलाबी रंग खिला होगा। हौज खास की इमारतों के पत्थर अभी पूरी तरह धीपते नहीं हैं। शाम को वहाँ बैठा जा सकता है। जिसे एक दिन ज़िद करके हौज खास ले गई थी, कि देखो, ज़िंदगी अभी कमरे से बाहर भी है। कि देखो, शाम के रंग सुंदर हैं। कि देखो, तुम्हरे अपने पर्सनल दुख के अलावा दुनिया कितनी बड़ी है। वो, जिसने उस रोज़ कहा था, तुम्हारे साथ यहाँ आ कर पता नहीं क्यों मन करता है कि फिर से पेंट ब्रश उठाऊँ और कुछ पेंटिंग्स बनाऊँ इस जगह की…वो, जिसने तड़प के कहा था, आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। आज आ जाओ बस, फिर किसी रोज़ नहीं आना। और मैं सिर्फ़ इसलिए नहीं गई थी, कि दो दिन ही लगते हैं दुखती हुई आदत के लिए। किसी से एक दिन मिलना हमेशा anomaly होता है, दिल कभी इस बात का यकीन नहीं करता कि उससे मिल कर जो महसूस हुआ था, वो सच का रूह में धँसा हुआ था। दिल कहता रहता है, एक्सेप्शन था वह, उतनी तेज धड़कना, वो ख़ुशी का फूल जो खिलता था, मुस्कुराता था, एक रोज़ का फूल था…उस पर भरोसा मत करो, वो गलती से बेमौसम खिला था। अभी वसंत आने में एक जन्म का फ़ासला है। वो लड़की नहीं थी, भरम थी। उससे दो बार मिल लोगे, लगातार, तो रूह में ज़ख़्म की तरह दर्ज हो जाएगी। फिर चुभेगी हर रोज़, एक तीसरी बार की मुलाकात की ज़िद लिए। कि स्पेस में भी ग्राफ प्लॉट करने के लिए दो वेल्यूज़ चाहिए होते हैं, एक्स एक्सिस के अलग, वाय एक्सिस के अलग। समय और स्थान। दो बार मिलने से यकीन हो जाता है कि किसी एक जगह पर, किसी एक वक्त में वो सचमुच थी। मरीचिका के पीछे क्यों भागना यायावर। सब कुछ भरम था उसका, किसी पुराने खंडहर में आती खुशबू हमेशा किसी प्रेत की होती है। किसी अधूरी इच्छा की…इन प्रेतों को इग्नोर करना ही सबसे अच्छा उपाय होता है। जैसे ही इनके होने का तुमपर असर पड़ने लगेगा, तुम्हें मालूम भी नहीं चलेगा और तुम्हारी घड़ी की सुइयाँ उलटी दिशा में घूमने लगेंगी। तुम गुज़रा हुआ सारा वक़्त लौटा लेना चाहोगे सिर्फ़ उस एक लड़की के साथ एक शाम, एक दोपहर, एक मौसम पहली बार जीने के लिए। तुम अपना जिया हुआ सब कुछ इरेज कर दोगे उसके लिए। वो जो है भी नहीं, जो कभी नहीं होगी तुम्हारे आसपास। उसने अनाधिकार अपनी साड़ी का आँचल तुम्हारी ओर बढ़ा दिया था कि इसमें धीपा हुआ, भीगा हुआ चेहरा पोंछ लो। वो अपनी साड़ी के आँचल में गाँठ बाँध लेती तुम्हारी ख़ुशबू…फिर तुम्हारी कलाइयों से कपास की गंध उठती और तुम सिगरेट पीते हुए अपनी कलाइयाँ जला लेते लेकिन उसके गीले बालों से उड़ती गंध तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती। 

बरिस्ता ने कॉफ़ी टेबल पर ला कर रख दी, हम दिल्ली में थे, या ख़्वाब के किसी शहर में, अनायास ज़बान से शुक्रिया कहा, और आँख से आँसू उसी समय छलक गए। ऐसे कैफ़े में बैठ बिना मतलब एकदम अचानक आँसू से रो देने की वजह कोई माँग ले, तो क्या ही कह सकेंगे हम। कि लोधी गार्डन में सेमल के पेड़ों का वो छोटा सा जंगल क्या अब भी खिल के आसमान और ज़मीन दोनों को गहरा लाल रंगता है? कि शुक्रिया कहना दुखता है? कि कॉफ़ी कलेजा जलाती है? कि हम कुछ भी कर लें, इस तन्हाई के ख़िलाफ़ कोई मुकदमा जीत नहीं सकेंगे। कि इतने साल में भी आदत क्यों नहीं पड़ती। कहते तो हैं ना, कि “कफ़स भी हो तो बन जाता है घर, आहिस्ता आहिस्ता”, लेकिन किसी औरत ने क्यों नहीं लिखा कि घर हो जाता है कफ़स आहिस्ता आहिस्ता? कि भाग जाने के सपने में गाड़ी उलट जाती है, बस खाई में गिर जाती है। कि बारिश में भीगते हुए दोस्त की याद आती है तो इतना ही कह पाते हैं, वॉइस नोट भेज दिया कर, तेरी याद आती है। ग़ज़ब ज़िद में दुखती है तन्हाई। 

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मुझे कोई बहुत अच्छा लगता है तो उससे सिंपल सवाल पूछती हूँ, तुम्हारा सबसे पसंदीदा रंग कौन सा है…पता नहीं क्यों। शायद उस रंग को उसकी नज़र से देखना होता है। शायद उसकी नज़र से दुनिया देखनी होती है। मेरे पापा का सबसे फ़ेवरिट रंग हरा था। मैंने जब अपनी मर्जी की कलमें खरीदनी शुरू की थीं, तो मेरा सबसे पसंदीदा रंग हरा था। मेरे पास हमेशा एक हरे रंग का पायलट पेन जरूर रहता था। कुछ हादसे आपको कैसे बदल देते हैं ना, ज़िंदगी से कोई एक रंग चुरा लेते हैं। आप कह भी नहीं सकते, ऑलमोस्ट किसी से भी…कि आपको हरे रंग से डर लगता है। 

धूसर रंग पसंद था उसे…मिट्टी के सारे रंग। मैंने कई बार ख़ुद को ऑफ वाइट या beige रंग की साड़ी में लपेटते हुए सोचा, वो मुझे देखता तो क्या कहता…क्या वो कहता कि मेरी पसंद के रंग की साड़ी में अच्छी लग रही हो। क्या उसे मालूम होता कि मैंने जो बस, ऐसे ही, लाइट कन्वर्सेशन जैसा सवाल किया है, उसके इर्द-गिर्द मेरी वार्ड-ड्रोब बन रही है? क्रीम पैंट और ब्लैक शर्ट का मेरा सबसे फ़ेवरिट कॉम्बिनेशन सिर्फ़ ब्लैक ऑन ब्लैक से हराया जा सकता है। यार, ब्लैक पहन कर मेरी जान लेने आते हो तो पहले वार्न कर दिया करो, हम दिल का जिरहबख़्तर पहन कर मिलेंगे तुमसे। 

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मेरे दिमाग़ में फालतू चीज़ें सेव्ड रहती हैं। शहर के स्पीडब्रेकर का नक्शा है। और मेरी ज़िंदगी की जिन चीज़ों को तुमने छुआ है, उनका भी…चाहे तुमने किसी कॉफ़ी कप से एक घूँट लिया हो, किसी ग्लास या बॉटल से मुँह लगा कर पानी पिया हो…किसी कॉफ़ी शॉप में लकड़ी के स्टिरर से चीनी मिलायी हो…मैं क्या करूँ कि तुम्हारी छुई हर चीज़ को उठा कर दिल के म्यूजियम में स्टोर करती गई हूँ।  

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तुम इक रोज़ भूल जाओ कि मैं कॉफ़ी में चीनी नहीं पीती, भगवान कसम, उसी रोज़ तुमको एकदम से भूल जाऊँगी। लेकिन इसके लिए किसी कॉफ़ी शॉप में मिलो तो सही…मेरे लिए अमेरिकानो ऑर्डर करो और उसमें अपनी कॉफ़ी की तरह, दो चम्मच चीनी डाल दो…

सिंपल है ना…कहो, कर सकोगे, अप्रेम में इतना, मेरे लिए?