अधूरी ख्वाहिशों का क्या करूँ? दफ़ना दूँ? काग़ज़ में लिख कर चिता जला दूँ? दिया जला, पत्ते के दोने में रख गंगा में बहा दूँ? गाँव में थोड़ी ज़मीन ख़रीद कर मंदिर बनवाऊँ और फिर पास में इन्हीं इच्छाओं की समाधि बनवा दूँ? कैसे मिलेगी शांति? ये मन इतना छटपटाता क्यों रहता है हमेशा? हमेशा?
एक हूक उठी रहती है भीतर…हमेशा…हमेशा…
Music is an ancient memory. Carried across lifetimes, like an almost soul-ache.
Almost.
एक पुरातन दुख है, हमारे भीतर। इस जन्म तो इतना मिलना हुआ नहीं है कि बिछोह इस तरह हमारे वजूद के टुकड़े करते जाये। कोई संगीत सुनें और जैसे कि आरी से काटा जा रहा हो बहुत पुराने जंगल में देवदार कोई, ऐसा दुखे…जंगल में पगडंडियों पर चलते जायें और सोचें कि ये चिकने पत्थर जहाँ तक हैं, गंगा यहाँ तक बहती थी…पहाड़ों को डुबाने इतनी गहरी…प्रेम ऐसे ही बहता था हृदय में, बहुत पहले…प्राचीन गंगा नदी की तरह…कई सौ फीट गहराई…कहीं चुपचाप, कहीं शोर करता हुआ।
तुमसे मिल कर लगा, सब कुछ मिला है, सिवाए वक़्त के…लेकिन इतने वक्त के बाद, कौन सा वक्त था कि घट गया। क्या वक़्त कभी पूरा नहीं पड़ेगा?
कोई यूनिट नहीं है न कि किसी के गले लगने पर कब हटा लेनी है बाँहें, है ना? आधा सेकंड और रुकना था…या एक मिनट और? कोई टाइमर, कोई स्टॉपवॉच क्यों नहीं होती जो बता दे…कि नहीं हुआ है वक्त पूरा…थोड़ी देर और रुको…हम क्यों नहीं रुक पाये?
डॉक्टर बताते हैं कि इस उम्र में बेहतर डाइजेशन के लिए ज़रूरी है कि खाना खाते हुए थोड़ी सी भूख बची रही, तब खाना बंद कर देना चाहिए। ऐसी आदत डिसिप्लिन से आती है। लेकिन हम यह डिसिप्लिन खाने पर ही नहीं, हर चीज़ में लागू करते हैं। जितना काफ़ी है, उसके पहले रुक जाना।
लेकिन जो थोड़ा सा और चाहिए, वो जो भीतर भीतर घुमड़ता रहता है, उसका क्या करें?
क्या हमेशा बचा ही रह जाएगा कुछ न कुछ? क्या अधूरी ख्वाहिशों के लिए कोई तर्पण, कोई मुक्ति नहीं?
कुछ लोगों को सिगरेट माँग के पीना अच्छा लगता है। अपनी नहीं जलायेंगे, अपनी ख़रीदेंगे भी नहीं। उनसे कहो कि अपनी नई जला लो, तो मानेंगे भी नहीं, कि पूरी सिगरेट नहीं पीनी है…एक दो कश मारना है, तुम दे दो। अब क्या कहें कि हमारी सिगरेट से जो दो कश मार लिए तुम, उसके कारण मन नहीं भरता…फिर चाहे पूरी सिगरेट की डिब्बी खत्म कर दें…वो जो दो कश था, वो बाक़ी रह गया। तुमने हमारे हिस्से की सिगरेट पी ली।
क्या सिखाने से शेयरिंग आ जाती है? या फिर हम अनिच्छा से दे तो देते हैं, भीतर भीतर भुनभुनाते हुए…कि हमारे हिस्से का था…मत लो। कोई किस समय इतना अपना हो जाता है कि हमारी बॉटल से उसके एक घूँट पानी पी लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन प्यास बुझ जाती है…हमारी सिगरेट से उसके एक कश मार लेने से हमारे भीतर की कोई पुरातन आग बुझ जाती है…ये तो हिसाब की गलती है ना, जितना काफ़ी था, उससे कम में रुकना था ना? फिर हमने उसके लिए अपने बनाए नियम क्यों तोड़ दिए।
हम कभी-कभी बहुत हाइपर होते हैं…एक क्षण नहीं ठहर पाता मन हमारा…पास्ट, प्रेजेंट, फ्यूचर में भागता रहता है। मन तुम्हें हर समय से अलगा कर देखना चाहता है…एक समय, सिर्फ़ अपने लिए…एक समय मन तुम्हें तुम्हारी दुनिया से उठा लाता है और एक कहानी में रख देता है। कि बाक़ी चीज़ें एक जगह, पहले जरा इत्मीनान से देखने दो तुम्हें…थोड़ा मेरा हाथ पकड़ के चुप बैठो…कोई दुखता हुआ म्यूजिक पीस चला दो…ऐसा कि जिससे रूह के दो फाँक हो जायें।
कितना अच्छा होता है ना, प्यार में न होना। हम कितने बहादुर होते हैं। हमें बिल्कुल भी डर नहीं लगता। किसी भी चीज़ से नहीं…काश कि हमारे बस में होता, किसी से प्यार करना, न करना…कम/ज़्यादा प्यार करना…काश कि समझ आता, कि चिंगारी कई सालों में भी नहीं बुझती है। तुम्हें डर नहीं लगता, क्यूंकि तुम्हें प्यार नहीं है। हम कितने बहादुर होते हैं, जब तक हमारे दिल में किसी का नाम थोड़ा सा दुखने नहीं लगे। कि हम कोई नाम सुन कर मुस्कुरा रहे होते हैं, पर आँख भर भर आती है।
औरत को आग बचा के रखने की सलाह दी गई थी…कि हर रोज़ खाना बनाने के पहले आग मांगने जाना न पड़े…उसने जलाये रखे कोयले, गोयठे के भीतर…लाल लाल आग सुलगती रही…उन दिनों माचिस भी मुश्किल से मिलती थी…और खाना चूल्हे पर बनता था। दुनिया बदल गई, खाना बनाने के तरीके बदल गए, लेकिन जो आग बचाये रखने की सलाह दी गई थी, वो लड़की ने भीतर बचा कर रख ली। वो अपने भीतर एक चिंगारी हमेशा बचाये रखती है। अन्तर इतना रहा, कि ये डायनामाइट के पलीते में लगी चिंगारी रही मेरे दोस्त…लड़की को आग-आग में अंतर करना नहीं आया। तुमसे मिली थी तो सूखे पत्ते बिखरे हुए थे जंगल के फर्श पर…जरा रगड़ने से चिंगारी सुलगने लगी…
सिगरेट जलाने की आग और होती है, दिल जलाने की आग और होती है…ये जो भीतर भीतर जलता है…इस आग को आँसुओं से बुझा देना चाहिए.
ये दिल जो हमारा इतना दुखता रहता है, सारा दुख, सारा बिछोह इसी जन्म का हो नहीं सकता। कुछ है जो कई जन्मों से थोड़ा थोड़ा कर ख़त्म हो रहा, लेकिन पूरी तरह ख़त्म नहीं होता। कुछ है जो वापस लौटने के लिए तड़पता रहता है। शायद हम में से कई लोग ईश्वर के पास आत्माओं के रूप में रहते हुए भी एक दूसरे से जुड़े हुए थे।
एक हूक उठती है भीतर, एक दुख तड़पता है। एक गीत में किसी की आवाज़ हमारे दुख से रिज़ोनेट करती है।
ईरान-इजराइल-अमरीका के इस युद्ध का असर हमारे प्रेजेंट और फ्यूचर पर पड़ रहा है। पता नहीं, सफ़र करना कितना आसान या कि मुश्किल होगा। हम तयशुदा तरीक़े से नहीं कह सकते कि अब हम कब मिलेंगे। गीत उसी दिन सुना था, इतवार को…
आज सुबह रहा नहीं गया तो खोज कर इसके पुराने वर्शन सुने…
हिंदी उर्दू के कुछ शब्द हमारे जाने पहचाने हुए हैं…समझ आता हैं उनका मतलब…एक दिल कहता है चले जाओ, एक दिल कहता है रुक जाओ…Soltane Ghalbhan नाम का यह गीत ईरान के लिए सिर्फ़ एक गीत न हो कर याद और लौटने के नामुमकिन सपने जैसा है। रुकने और चले जाने के ठीक पहले। Between memory and hope.
Soltane Ghalbhan जो वर्शन एकदम कलेजा चाक कर रहा है वह डैनी ने गाया है। बहुत साल पहले Siboney सुना था। उसमें कौनी फ़्रांसिस की आवाज़ ऐसी ही थी, कि ऊँचा खींचती थी तो साथ ही रूह का जैसे तागा तागा खिंच जाता था। saudade को आवाज़ में ढालता Jab Harry met Sejal में एक गाना था, यादों में…ये गीत जैसे ज़ख़्म और मरहम एक साथ होते हैं।
मैं लिख कर तुम्हें ज़िंदा कर देना चाहती हूँ किसी कहानी में…काग़ज़ पर इतना लिखूँ, इतना कि उँगलियाँ दुखने लगें। कि हथेली पसीने से तरबतर हो जाये और साड़ी के आँचल में हाथ को धीरे धीरे पोंछते हुए तुम्हारे हाथ याद आयें, दुखते हुए। कि जाने कैसा लगता है तुम्हारा हाथ पकड़ कर थोड़ी देर को बैठना, जब वसंत हो और अमलतास खिले हों पूरे शहर में।
पाँच तल्ले नीचे उतर कर पानी मिलता है।
दिल ऐसी ही गहरी बावली है।
***
मैं अब भी खूब सारा लिखती हूँ। भले कहीं फ़ेयर न लिखूँ। कोई कहानी न लिखूँ। लेकिन ज़िंदगी में जो जिया, जो गहरे महसूस किया, उसको दर्ज करना अच्छा लगता है। हर साल की एक नोटबुक तो होती है सो होती है, उसके अलावा ढेर सारी छोटी-बड़ी ट्रैवल नोटबुक्स, बहुत तरह के पिक्चर पोस्टकार्ड्स। अन्तर्देशी। चिट्ठी के काग़ज़। लिफ़ाफ़े।
मेरी हर नोटबुक में अधूरी चिट्ठियाँ, दोस्तों के नाम के पोस्टकार्ड्स होते हैं। शायद हमारे शहरों से इस तरह चिट्ठी गिराने का लाल डिब्बा हटाया नहीं जाता तो मैं ख़त लिख कर गिराती भी। कुरियर बहुत औपचारिक होता है। चिट्ठी बहुत पर्सनल, इसलिए न चाहते हुए भी चिट्ठी कुरियर करने में एक बेईमानी लगती है। जिन्होंने सालों साल चिट्ठियाँ लिखी हैं और डाकघर जा कर रजिस्टर की हैं, वे शायद इस बात को समझ पायें कि पोस्टऑफ़िस के स्टाफ को आप कितनी अच्छी तरह पहचानते हैं…और वे आपको। किस्से में डाकिये के होने से मुहब्बत एक साझा साज़िश हो जाती है। वे आपके गुनाह में शामिल ही नहीं, उसके गवाह भी होते हैं। मुझे लगता है डाकिया के हाथ में लिफ़ाफ़ा हो या कि पोस्टकार्ड, वो ख़त को समझता है।
डाकिया सिर्फ ख़त डिलीवर नहीं करता, वो दो प्रेमियों के बीच के काग़ज़ के रिश्ते का गवाह होता है।
किसी रोज़ अदालत में उससे पूछो, कि क्या मैंने तुमसे प्रेम किया था कभी…तो कुरियर वाले को नहीं मालूम होगा, लेकिन डाकिया अपना चश्मा पोंछते बोलेगा…ज़िंदगी के आख़िरी पोस्टकार्ड इसी लड़की के डिलीवर किए। सिर्फ़ इन पोस्टकार्ड और चिट्ठियों के कारण तो रिटायरमेंट का अफ़सोस रहा। तुम्हें देखेगा और कहेगा, मैंने तो सारे ख़त पढ़े भी नहीं, फिर भी तुम्हारा नाम लिखा देख कर जान जाता था कि कोई तुमसे बहुत प्यार करता है। तुम भीतर के ख़त पढ़ कर भी नहीं जान पाये कि कितनी मुहब्बत है, ऐसा कैसे हुआ?
तुम क्या जवाब दोगे भरी अदालत में, कि मैंने तुम्हें कोरे काग़ज़ भेजे हैं उम्र भर। कि बहुत साल पहले कभी मैंने तुमसे पूछा था कि ख़त का जवाब क्यों नहीं देते तो तुमने मोमिन का शेर सुनाया था, “हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँ कर, हाथ दिल से जुदा नहीं होता”
क्या ही पूछें तुमसे, तुम, जो ख़त के आख़िर में लिखते हो, तुम्हारा।
***
तुम्हें गोल्ड फ्लेक कब से अच्छी लगने लगी?
तुम अच्छे लगने लगे हो।
