Poetry

कोई कविता आख़िरी नहीं होती, ना कोई प्रेम

कविता हलक में अटकी है
होठों पर तुम्हारा नाम

और साँस में मृत्यु

***

क़लम को सिर्फ़ कहानियाँ आती हैं।
ज़ुबान को झूठ।

तुम्हें तो तरतीब से मेरा नाम लेना भी नहीं आता।

***

कविता लिखने को ठहराव चाहिए।
जो मुझमें नहीं है।
***
मैंने अफ़सोस को अपना प्रेमी चुना है
तुम्हारा डिमोशन हो गया है

‘पूर्व प्रेमी’

***
शहर, मौसम, सफ़र
मेरे पास बहुत कम मौलिक शब्द हैं
इसलिए मैं हमेशा एक नए प्रेम की तलाश में रहती हूँ

***

तुम्हें छोड़ देना
ख़यालों में ज़्यादा तकलीफ़देह था
असल ज़िंदगी में तो तुम मेरे थे ही नहीं कभी
***
मैंने तुमसे ही अलविदा कहना सीखा
ताकि तुम्हें अलविदा कह सकूँ
***
तुम वो वाली ब्लैक शर्ट पहन कर
अपनी अन्य प्रेमिकाओं से मत मिलो
प्रेम का दोहराव शोभा नहीं देता

***

तुम्हारे हाथों में सिगरेट
क़लम या ख़ंजर से भी ख़तरनाक है

तुम्हारे होठों पर झूलती सिगरेट
क़त्ल का फ़रमान देती है

तुम यूँ बेपरवाही से सिगरेट ना पिया करो, प्लीज़!

***

‘तुम्हें समंदर पसंद हैं या पहाड़?’
मुझे तुम पसंद हो, जहाँ भी ले चलो।
***
‘तुम्हारी क़लम मिलेगी एक मिनट के लिए?’
‘मिलेगी, अपना दिल गिरवी रखते जाओ।’
कि इस बाज़ार में ख़रा सौदा कहीं नहीं।

***
आसमान से मेरा नाम मिटा कर
तसल्ली नहीं मिलेगी तुम्हें

कि दुःख की फाँस हृदय में चुभी है
***
कोई कविता आख़िरी नहीं होती, ना कोई प्रेम
हम आख़िरी साँस तक प्रेम कर सकते हैं
या हो सकते हैं कविता भी।
Poetry

पुराने, उदार शहरों के नाम

शहरों के हिस्से
सिर्फ़ लावारिस प्रेम आता है
नियति की नाजायज़ औलाद
जिसका कोई पिता नहीं होता
याद के अनाथ क़िस्सों को
कोई कवि अपनी कविता में पनाह नहीं देता
कोई लेखक छद्म नाम से नहीं छपवाता
कोई अखबारी रिपोर्टर भी उन्हें दुलराता नहीं
इसलिए मेरी जान,
आत्महत्या हमेशा अपने पैतृक शहर में करना
वहाँ तुम्हारी लाश को ठिकाना लगाने वाले भी
तुम्हें अपना समझेंगे
***
बाँझ औरत
दुःख अडॉप्ट करती है
और करती है उन्हें अपने बच्चों से ज़्यादा प्यार
लिखती है प्रेम भरे पत्र
पुराने, उदार शहरों के नाम
कि कुछ शहर बच्चों से उनके पिता का नाम नहीं पूछते
***
असफल प्रेमी
मरने के लिए जगह नहीं तलाशते
जगहें उन्हें ख़ुद तलाश लेती हैं
दुनिया की सबसे ऊँची बिल्डिंग के टॉप फ़्लोर पर
उसके दिल में एक यही ख़याल आया
***
उस शहर को भूल जाने का श्राप
तुम्हारे दिल ने दिया था
इसलिए, सिर्फ़ इसलिए,
मैंने इतना टूट कर चाहा
हफ़्ते भर में हो चुकी है कितनी बारिश
तुम्हें याद है जानां, सड़कों के नाम?
स्टेशनों के नाम? कॉफ़ी शाप, व्हिस्की, सिगरेट की ब्राण्ड?
तो फिर उस लड़की का क्या ही तो याद होगा तुमको
भूल जाना कभी कभी श्राप नहीं, वरदान होता है
***
बंद मुट्ठी से भी छीजती रही
तुम्हारी हथेली की गरमी
दिल के बंद दरवाज़े से
रिस रिस बह गया कितना प्रेम
कैलेंडेर के निशान को कहाँ याद
बाइस सितम्बर किस शहर में थी मैं
रूह को याद है मगर एक वादा
अब इस महीने को, ‘सितम’ बर कभी ना कहूँगी
Stories

फिर कभी…

यातना शिविर के नाज़ी गार्ड पागल हो रहे थे। हवा की सुगबुगाहट पर जैसे कोई उम्मीद की धुन उड़ती आ रही थी। ‘ज़दीकिम निस्तारिम…ज़दीकिम निस्तारिम’। एक लोककथा ये थी कि जब तक इस दुनिया में ३६ भले लोग बचे रहेंगे, चाहे बाक़ी दुनिया कितनी भी बर्बर और क्रूर हो जाए, ईश्वर इस दुनिया को ख़त्म नहीं करेगा। छत्तीस लोगों की अच्छाई इस दुनिया को बचाए रक्खेगी। दो हफ़्ते पहले की घटना थी, एक क़ैदी फ़रार हो गया था और नियम के अनुसार उसके बंकर के दस लोगों को भूखा मार देने के लिए सेल में भेजा जाना था। दस चुने हुए लोगों में एक रोने और चीख़ने लगा, ‘मेरे बीवी बच्चों का क्या होगा’। उसी बंकर में एक पादरी भी था, वो पादरी आगे आया और उसने अफ़सर से कहा, उसकी जगह मैं मरना चाहता हूँ। अफ़सर ने इस अदला बदली की इजाज़त दे दी।

दो हफ़्ते में बाक़ी ९ लोग तो मर गए थे लेकिन पादरी अभी भी जीवित था। आख़िर ज़हरीला इंजेक्शन देना पड़ा ताकि वो मर सके और उसी कालकोठरी में किसी और क़ैदी को डाला जा सके। जब से पादरी के मृत होने की ख़बर यातना शिविर में फैली थी, क़ैदी लोक कथा ‘ज़दीकिम’ की बात करने लगे थे। जिन लोगों के होने से दुनिया बची रहेगी। ये फुसफुसाहट हर ओर सुनायी देने लगी थी। नींद में, भूखे मरते लोगों के आख़िरी शब्दों में, चीख़ में, चुप्पी में। कुछ ऐसा करना ज़रूरी हो गया था कि क़ैदी चुपचाप मर जाया करें। रोज़ रोज़ लोगों को गोली मारते मारते फ़ाइअरिंग स्क्वॉड भी थक रही थी। नए तरीक़े इजाद करना ज़रूरी था।

अपना मन लगाए रखने के लिए भी ज़रूरी था कोई नया कौतुक शुरू हो। दो एसएस गार्ड्ज़ में शर्त लग गयी कि क्या एक गोली से दो लोगों को मारा जा सकता है। सुबह के नाश्ते के पहले रोल-कॉल के लिए क़ैदी लाइन में लगे हुए थे। गार्ड्ज़ ने पब्लिक अनाउनसेमेंट सिस्टम पर क़िस्सा सुनाया, ‘बात सुनने में आ रही इसी श्रम शिविर में ज़दीकिम निस्तारिम हैं – छुपे हुए भले लोग – इसलिए हम उन्हें बाहर निकालेंगे – देखते हैं दुनिया कब तक बचाए रखते हैं भले लोग’। यहूदी पवित्र संख्या ३० और ६ वाले दो क़ैदी तलाशे गए। यहीं पास में वो ख़ूनी दीवार थी जिसकी ओर मुँह कर के क़ैदियों को गोली मारी जाती थी।

एक कमसिन पोलिश लड़की और एक युवा पोलिश लड़का एक दूसरे के आमने सामने खड़े थे। वे अपना नाम तो कई दिनों पहले भूल चुके थे। उनकी पहचान अब उनकी कलाई में बने टैटू वाली संख्या ही थी। मरने के पहले वे ठीक एक दूसरे के सामने खड़े थे।

लड़का इस शिविर में आने के पहले एक छोटे से स्कूल में संगीत सिखाया करता था। एक पहाड़ी पर उसका छोटा सा गाँव था जहाँ पाँच भाई बहनों वाला उनका ख़ुशहाल परिवार रहता था। उसके पिता दूर के शहर में एक बैंक में काम करते थे और हर इतवार घर आया करते थे। उसे कैम्प में आए कितने दिन हुए थे उसे याद नहीं। बहुत पहले की धुँधली याद में उसने पूरा चाँद देखा था, लेकिन वो इसलिए कि उस दिन ऊँचे वाले बिस्तर के क़ैदी की मौत हो गयी थी और वो ऊपर वाले बिस्तर पर सोने चला गया था। निचले बिस्तर पर पानी का जमाव रहता था और माँसाहारी चूहे काट खाते थे। ऊपर वाले बिस्तर से छत पर का छेद दिखता था जिससे बर्फ़ गिरती थी। जिस पहली रात वो ऊपर के बिस्तर पर गया था, भूख के कारण उसे नींद नहीं आ रही थी और थकान के कारण उसका बदन टूट रहा था। उसी समय उसने देखा कि छत पर के छेद के पीछे पूरा गोल चाँद है। बहुत समय तो उसे चाँद को पहचानने में लग गया। इन दिनों उसे हर चीज़ सिर्फ़ खाने के लिए चाहिए होती थी लेकिन किसी तरह वो चाँद को पहचान गया। उस दिन बहुत दिन बाद उसने एक लोकगीत के बारे में सोचा।

लड़की चार भाइयों के बाद मन्नतों से माँगी हुयी इकलौती बहन थी। माँ पिता की आँखों का तारा। नीली आँखों वाली लड़की। नदी किनारे शहर में रहती थी। बहुत ऊँचे क़िले के पास छोटा सा घर था उनका। माँ नर्स थी और पिता चमड़े के कारख़ाने में काम करते थे। उसके भाई बहुत पढ़े-लिखे और समाज में सम्मानित व्यक्ति थे। उसका सबसे बड़ा भाई तो विदेश के कॉलेज में वक्तव्यों के लिए बुलाया भी जाता था। उससे ठीक बड़ा भाई एक हीरों के व्यापारी के यहाँ काम करता था। कहते थे उसके हाथ में बहुत हुनर था। लेकिन एक वक़्त पर इन सारी चीज़ों पर उनका धर्म भारी पड़ गया। जब उनके पूरे परिवार को ट्रेनों में भर कर कैम्प भेजा जा रहा था, ठीक उसी वक़्त ट्रेन स्टेशन से दौड़ता हुआ उसका बड़ा भाई लौटा था। उसे वहीं गोली मार दी गयी थी उसकी पत्नी और बच्चे के साथ। लड़की उसी समय भूल गयी थी कि उसने अपने हीरे के झुमके कहाँ रखे हैं। वो चाहती थी कि भूल जाए कि उसे अंधेरी कोठरी से रौशनी में क्यूँ लाया जाता था। कि दिन भर बाक़ी क़ैदियों के साथ काम करने के बाद वो बाक़ी औरतों की तरह सो क्यूँ नहीं सकती थी। कि गार्ड्ज़ सिर्फ़ बलात्कार नहीं करना चाहते थे, वे उसकी चीख़ भी सुनना चाहते थे। कि जिस रात उसने चीख़ना बंद करने की कोशिश की वो पहली रात थी जब वो बेहोश हो गयी थी और मालूम नहीं कितनी देर बाद होश में आयी थी। कि वो दिन भर एक शब्द नहीं कहती थी ताकि रात को चीख़ने के लिए अपनी आवाज़ और अपनी ऊर्जा बचा के रख सके। उसे गूँगे हो जाने का डर सताता था।

उन्होंने एक दूसरे की आँखों में देखा। उन्हें बात करने के लिए शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। वे एक दूसरे को सुन सकते थे, पढ़ सकते थे। मृत्यु के पहले सारी इंद्रियाँ बहुत तेज़ हो जाती हैं।

‘ओह, इसकी आँखें कितनी नीली हैं। मुझे याद नहीं मैंने आख़िरी बार आसमान कब देखा था।’
‘ओह, इसकी आँखों में इतना ख़ालीपन क्यूँ है। कोई तो दुःख होना चाहिए था। क्या इस लड़के ने कभी प्रेम नहीं किया’

‘इसके माथे पर ये नीला निशान क्यूँ है? क्या किसी ने इसका सिर दीवार पर दे मारा था?’
‘इसके होंठ कैसे नीले पड़ गए हैं। ये ज़रूर अपनी बैरक में ऊपर वाले बिस्तर पर सोता है। क्या इसके बिस्तर के ऊपर भी कोई सुराख़ है। क्या कल पूरी रात की बर्फ़बारी में उसके बदन पर बर्फ़ गिरी है?’

‘इसकी आँखों में रौशनी टिमटिम करती है। काश मैं एक बार इसे अपना उकेलेले सुना पाता। जब बहुत तेज़ तेज़ नाचती तो इसके गाल कितने दहकने लगते और आँखों में एक गर्माहट का गोला घूमने लगता।’
‘अगर ये मुझे पिछले साल मेले में मिला होता तो मैं उस बेवक़ूफ़ टिम की जगह इसे चूम रही होती। शायद अब तक हमारी शादी हो चुकी होती। [लड़की की आँखें पनियाती हुयीं] ओह, नहीं…हमारे बच्चे को नाज़ियों ने मार दिया होता। और इस समय इसकी आँखें सुख में होतीं।

‘ये लड़की क्यूँ रो रही है। क्या उसे मौत से डर लग रहा है? क्या इसे अपने किसी पूर्व प्रेमी की याद आ रही है? क्या कोई उम्मीद है इसकी ज़िंदगी में, जिसके लिए इसका थोड़ा और जीने का मन है?’
‘मेरी आँखों में आँसू देख कर लड़के की आँखें थोड़ी कोमल हो आयी हैं। इसे मेरे मरने की चिंता हो रही है क्या?’

‘क्या इस लड़की को स्ट्रॉबेरीज़ पसंद होंगी? काश मैं इसे अपनी नानी के बग़ीचे वाली स्ट्रॉबेरीज़ खिला पाता। उनसे मीठी स्ट्रॉबेरीज़ दुनिया में कहीं नहीं होती हैं। हम दोनों नानी की आँख बचा कर चुपचाप बग़ीचे में घुस जाते और लड़की की फ़्रॉक में हम ख़ूब से स्ट्रॉबेरीज़ तोड़ लाते और बाद में क्रीम के साथ खाते’।
‘मैं इस लड़के के लिए ख़ूब गहरे नीले रंग का ऊन का मफ़लर बनाती। करोशिये का उतना सुंदर काम गाँव भर की किसी लड़की के बस का नहीं था। लड़का अपने गले में मफ़लर डालता और मेरे हाथ चूम लेता। उसके दोस्तों की गर्लफ़्रेंड्ज़ मुझसे सीखना चाहतीं कि कैसे बनाते हैं इतना सुंदर मफ़लर। मैं ढिठाई से हँसती और कहती, “प्रेम से” ’

‘माँ मुझे इस लड़की से शादी करने के लिए तुरंत हाँ कह देती। माँ को नीले रंग की आँखों वाली लड़कियाँ कितनी पसंद हैं’
‘मुझे ऐसा क्यूँ लगता है कि इस लड़के की आँखों में कोई धुन बह रही है। क्या इसे कोई वाद्ययंत्र बजाना आता है? मेरे भाइयों को एक उकेलेले बजाने वाले की कितनी ज़रूरत थी। अगर ये उकेलेले बजाता तो मेरे भाइयों के साथ मेले में जा सकता था। मैं इनकी धुनों पर कितना ख़ुश होकर नाचती’।

‘मैं इस लड़की के साथ वसंत देखना चाहता हूँ. कौन से फूल पसंद होंगे इसे। जब इसके बाल लम्बे होंगे तो मैं उनमें फूल गूँथ दूँगा’
‘क्या इस लड़के को चेरी वोदका पसंद होगी? गरमी के दिनों में हम कभी कभी स्कूल से भाग कर विस्तुला में नहाने चले जाते और फिर गर्म घास पर लेटे हुए एक दूसरे को चूमते और चेरी वोदका पीते। दीदियाँ कहती हैं वोदका पीने के बाद चूमने का स्वाद अलौकिक होता है’

‘जीवन में पहली बार प्रेम हुआ और वो भी इतने कम वक़्त के लिए’
‘प्रेम जीवन के आख़िरी लम्हे तक रहा। ये बुरा तो नहीं’

‘शादी के तोहफ़े में दादी इसे अपनी सबसे पसंदीदा नीले हीरों का झुमका देती। बचपन से हम सब भाई बहन लड़ते रहे कि दादी वो किसे देगी’
‘धूप वाली खिड़की में बैठ कर माँ मेरे लिए शादी का जोड़ा बना रही होती। उसके गले से कितना मीठा लोकगीत फूटता है। मैं बैठे बैठे रोने लगती तो मेरे भाई मेरी चोटियाँ खींचते और इस लड़के को भद्दी गालियाँ दे देकर चिढ़ाते, मैं उन्हें मारने के लिए उनके पीछे पीछे कितना दौड़ती’

‘अगर मेरी कोई बेटी हो तो एकदम इस लड़की जैसी हो, ऐसी नीली आँखों वाली’
‘__ ___ __ __ __ __’ [लड़की चुप रही। अजन्मे बच्चे का नाम सोच रही थी शायद]

[सैनिक अब आपस में बहस कर रहे थे कि बंदूक़ की नली किसके सर पर रखी जाए और दोनों को एक ही गोली से मारने के लिए बेहतर क्या होगा, वे एक दूसरे के सामने खड़े रहें, अग़ल-बग़ल खड़े रहें, या पीठ से पीठ टिका कर]

“__ __ __ __ __ __ __ __” [लड़के के देखने में चुप्पी थी। जैसे उसके सोचने में भी शब्द ख़त्म हो गए हों। वो बस चाहता था कि सैनिक जल्दी गोली चलाएँ और वह मर जाए। अब सोचना थका देने वाला था। दुखा देने वाला भी]
‘चाहे मैं मर जाऊँ। पर काश ये लड़का बच जाए। दुआ में ज़्यादा वक़्त कहाँ माँग सकती हूँ। लेकिन काश कि मुझे इसका मृत शरीर ना देखना पड़े। भले ही मुझसे एक लम्हा ज़्यादा जी सके।’

‘मैं इस लड़की को मरा हुआ नहीं देख सकता हूँ। अगर मैं अभी विद्रोह कर दूँ तो क्या सैनिक मुझे गोली मार देंगे? लेकिन ऐसा तो नहीं कि वे फिर इस खेल की जगह कोई और मनोरंजन तलाशने लगें? अगर उन्हें मेरी आँखों में इस लड़की के प्रति प्रेम दिख गया तो वे मेरी आँखों के सामने इसका बलात्कार करेंगे। बार बार। और बहुत तड़पा के मारेंगे मुझे। नहीं नहीं। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं आना चाहिए’।

[लड़की उसका कठोर होता चेहरा देखती है]
‘ओह। शायद ये ख़ुद को मज़बूत कर रहा है ताकि मृत्यु से ना डरे। मैं एक बार इसके बाल सहलाना चाहती हूँ। अगर मैं ऐसा करूँ तो क्या होगा? शायद सैनिकों को नया कौतुक मिल जाए। फिर वो मेरी आँखों के सामने इसे तड़पा कर मारेंगे। ओह। नहीं। मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए। मृत्यु जितनी जल्दी आ जाए, बेहतर है। शायद मुझे भी अपना चेहरा एकदम कठोर कर लेना चाहिए।’

[लड़का उसके चेहरे की खिंचती नसें देखता है]
‘ओह। ये लड़की मेरा कठोर चेहरा देख कर कठोर होने की कोशिश कर रही है। शायद इसे लगे कि मैं मृत्यु से डर रहा हूँ। और ये मुझे संबल देने की कोशिश कर रही है।’
‘___ ___ ___ ___ ___’

[सैनिकों ने तय कर लिया है। लड़के के सिर के पीछे बंदूक़ की नली रखते हैं।
वे दोनों बहुत धीरे धीरे और एक साथ अपनी आँखें बंद करते और खोलते हैं।
दोनों एक आख़िरी बार एक दूसरे की आँखों में देखते हैं।]

‘फिर कभी’
‘फिर कभी’

गोली चलती है और दोनों के सिरों के पार निकलती हुयी दीवार में जा के धँस जाती है। उनके बदन एक साथ गिरते हैं। उन्होंने आख़िरी लम्हे में एक दूसरे का हाथ पकड़ लिया था। गार्ड्ज़ बहुत कोशिश करते हैं पर लाशों की मुड़ी हुयी उँगलियाँ उलझ गयी हैं, हड्डियाँ खुलती नहीं। उन्हें एक साथ ही जलती भट्ठी में फेंकना पड़ता है।

एक उलझे हुए प्रेम से बची रह जाती है दुनिया। वक़्त से हारी हुयी लड़ाई से। एक ‘काश’ से।
उम्मीद की मीठी धुन पर गुनगुनाती है…जीवन के संजीवन मंत्र…प्रेम, आना, फिर कभी।

Musings

सुख का स्वांग

लड़की आधी नींद में है। कि पूरी नींद आती नहीं। उसके सीने में कोई फाँस चुभी हुयी है। अंग्रेज़ी का एक शब्द। heartbroken. हिंदी में यह एक शब्द नहीं है। है भी तो उतना धारदार, उतना नुकीला नहीं है कि नींद में चुभे।

उसके सीने में अवसाद जमता जा रहा है। एक पत्थर की तरह। अवसाद की नदी जागने में, सोने में, अनलिखे में पूरे बदन में घूमती है और ठहरती जा रही है सीने में…ग्लेशियर हो रहा है कोई। कठोर और ठंढा।

ठहराव में जीना नहीं आता उसे। ठहराव में साँस भी नहीं आती। लिखना तो क्या ही होगा।

उसे समझाते हैं सब, let go. live in the moment. वह सुनती है लेकिन समझती नहीं। ये सब तब ही अच्छा लगता है जब हम इनका चुनाव करते हैं। जब हम चुनते हैं हर लम्हे को पूरी तरह जीना, बिना किसी अतीत और भविष्य के। लेकिन यही निर्णय जब मजबूरी में लिया जाए कि अतीत के डरावने साये नींद में दम घोंटते हैं और भविष्य की ज़मीन ठोस नहीं है…तब लम्हे में जीना तकलीफ़ का बायस होता है।

लिखने के लिए मन निर्मल होना ज़रूरी है। साफ़, बहते पानी की तरह। शब्द भी तब ही आते हैं जब मन में जगह जगह बाँध ना बने हुए हों।

वो इक टूटे सपने की धार से मरते मरते बची और इक रोज़ बहुत रोयी। इतना कि आँखें सूज गयीं। इतना कि धार से चुभने लगे आँखों के आगे के सारे मंज़र ही। इतना कि एक शहर हूक हो गया…साँस साँस में चुभता। सपने सारे किरमिच किरमिच हो गए।

वे दिन बहुत अच्छे थे जब जीवन के केंद्र में प्रेम था। प्रेम एक छलावा है जो बहुत से ज़रूरी दुखों से हमें बचा लेता है। प्रेम में होते हुए बाक़ी चीज़ों पर ध्यान नहीं जाता। आज़ादी पर, चुनाव पर, अपनी ज़िंदगी की दिशाहीनता पर। अपनी अकर्मण्यता पर। अपने गुनाहों पर।

वो चाहती है कि उसकी ज़िंदगी में कुछ उसकी मर्ज़ी का भी हो। अपनी मर्ज़ी के सुख ना सही, अपनी मर्ज़ी के दुःख हों…कि अपनी मर्ज़ी के कुछ लोग तो हों। वह बार बार अपनी मर्ज़ी की मृत्यु चुनने के बारे में सोचती है। कि ज़िंदगी की बेबसी उसे बेतरह परेशान करती है। उसके दुस्वप्नों में कलाई काटने के मंज़र होते हैं। उसकी चुप्पी में सिसकियाँ होती हैं।

जिन शहरों को वह जानती है, इन दिनों उस सारे शहरों का मौसम ख़ूबसूरत है। वसंत अपने साथ रंग और ख़ुशबुएँ लेकर आया है। आसमान गहरा नीला है। हल्की सी मन को भाने वाली खुनक है।

मगर मन का मौसम…मन पर उदास मौसम हैं। गहरे काले बादल। बर्फ़बारी। तूफ़ान। बेतरह ठंढ। और नाउम्मीदी। ऐसे मन में रंग नहीं होते। गर्माहट नहीं होती। किसी के आने का कोई दिन नहीं होता।

लड़की कहीं उलाहना देना चाहती है किसी को, तुम बिसरते हो। जैसे थे नहीं कभी। और मैं नहीं लिखती हूँ तुम्हें, जैसे कि सच में भूल गयी हूँ। जब प्रेम था जीवन में तो दुःख बर्दाश्त करने को एक उम्मीद थी। इन दिनों प्रेम नहीं है लेकिन दुःख फिर भी उतना ही है। तो दुःख का प्रेम से कोई सम्बंध नहीं था कभी।

आह रे मन, काश के मैं प्रेम ही करती तुमसे!
इस दुखते कलेजे के साथ सुख का स्वांग।आह, इससे भयावह भी कुछ होगा जीवन में! आह रे आह रे आह!

Musings

हर लड़का समंदर नहीं होता

‘तुमसे किसी को भी डर लगेगा’
‘डर। कुछ भी। डर क्यूँ लगेगा?’

‘मुश्किल सवाल है। धैर्य से सुनो। समझाने की कोशिश करता हूँ। क्यूँकि मेरे सिवा किसी और इंटेलिजेंट इंसान को तुम जानती नहीं जो तुमको ये बात समझा सके। सिम्पल बात है, लेकिन सामने से दिखती नहीं। देखो। तुम्हारे जैसी भयानक तरीक़े से इंडिपेंडेंट लड़की कि जो अपने मूड और मिज़ाज का हाल मौसम तक को अफ़ेक्ट नहीं करने देती। कि जो बारिश को मन का मौसम समझती है। कि जो जानती है कि सब कुछ उसकी भीतरी दुनिया से कंट्रोल होता है और उस हिसाब से जीती है। जो अपनी ख़ुशी और अपने ग़म के लिए ख़ुद से रेस्पॉन्सिबिलिटी लेती है…

तुम्हारे जैसी लड़की…जब ज़रा सा किसी लड़के के साथ वक़्त बिताती है। देखती है उसे मुस्कुरा कर। लम्हे भर को रिलैक्स होती है, अपना सर टिकाती है उसके कंधे पर और कहती है एक उसाँस भर के…मैं ख़ुश हूँ तुम्हारे साथ…तो लड़का डर जाता है…तुम्हारी ख़ुशी का कारण बनने से…ये इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि उसके कंधे सोच के ही दुखने लगते हैं। उसे लगता है कि आज ख़ुशी है तो कल ग़म भी होगा। वो तुम्हारे ख़ुशी ग़म किसी का कारण नहीं बनना चाहता। तुम लड़की नहीं, नदी हो। पहाड़ी नदी…फ़िलहाल तो तुम कहीं नहीं रुक सकती। बहुत ज़िंदगी, कई शहर देखोगी तो थमोगी थोड़ा। ठहरोगी।

एक नदी जैसी लड़की के ठहरने की अंतिम जगह समंदर ही होता है। और हर लड़का समंदर नहीं होता कि तुम्हें अपने बाँहों में समेट कर कह सके। ये तुम्हारा घर है। तुम यहाँ रह सकती हो। हमेशा के लिए।

तुम बहुत मज़बूत हो। तुम्हारे क़रीबी लोगों को तुम्हारे टूटने का डर लगता है कि तुम्हें सम्हालने के लिए तुमसे ज़्यादा मज़बूत होना पड़ेगा। ये जो अपनी ज़िंदगी इतने कटघरों में बाँट के जीती हो, हर सही ग़लत का क्षण क्षण हिसाब लगाते हुए, तुम्हारे काँधे का ये बोझ ज़रा सा कम करना बहुत मुश्किल है। अपने गुनाहों के स्याह में जब घुल कर तुम लिखती हो क़िस्सा कोई तो कौन तुम्हारे लिए सूर्य बन जलेगा। इतना आसान नहीं होता।

तुम्हारा प्रेम साँस लेने की जगह भी छोड़ता है? तुम्हें किनारे पर से बैठ कर देखा भी नहीं जा सकता, ऐसा घातक आकर्षण है तुम में। तुमसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है। तो जब तक चाँदनी रात में तुम्हारे होने की कलकल ध्वनि सुनी थी, तुम्हारे घाट पर बैठ कर लालटेन की रौशनी में किताब पढ़ने को जी चाहा था। लेकिन सुबह की धूप में तुम्हारा वेग देख कर मैं भी चौंक गया हूँ। तुम्हारे प्रेम में अवश होना पड़ेगा। और हर व्यक्ति तुम्हारी तरह कंट्रोल फ़्रीक नहीं होता, लेकिन सब तुम्हारी धार में बह भी नहीं सकते। इसलिए वे डरते हैं। तुम्हारे चपेट में आने से। तुम्हारे प्रेम को ज़रा भी महसूसने से। तुम्हारे क़रीब आने से। समझी अब?’

‘समझ के क्या ही होगा। थोड़े ना बदल जाऊँगी कोई शांत झील या जलकुंड में कि कोई भी नहा ले। ऐसे ही ठीक है। शहर शहर का क़िस्सा सुनना कोई बुरा तो नहीं है। और अंत में होगा ही कोई सागर। जहाँ जा के ठहर सकूँगी मैं। तो फिर उसके पहले जितना भी भटकाव हो। ठीक है। लेकिन ऐसा भी क्या डरना। डूब जाना हमेशा मर जाना थोड़े होता है। कंट्रोल करके डाइव भी तो मारते हैं लोग। डूबने के बात उतराना भी तो होता है। तुम भी चले जाओगे अब?’

‘लग तो रहा है। डर लगता है तुमसे। तुम इतनी ख़ुश रहती हो मेरे साथ। तुम्हारी आदत बनने से डर लगता है।’

‘अलविदा कह के जाना। अचानक से ग़ायब मत हो जाना’

‘अलविदा कह के जाना सम्भव नहीं है, ऐसे सिर्फ़ लौटना होता है। जाना तो अचानक ही पड़ेगा। तुम्हें यूँ ही, किसी कच्चे चाँद की रात को, कच्ची नींद के बीच छोड़ कर। तुम फ़ोन रखना और काश कि भूल जाना कि मैं था।’

‘सपना था। सपना था सब।’

***
लड़की अलार्म की तीखी आवाज़ से हड़बड़ा के उठती है। दौड़ते हुए फ़ोन तक जाती है और अलार्म बंद करती है। उसकी हथेलियों में समंदर का पानी है जिसमें चाँद घुला है। वो हथेलियाँ खोलती हैं तो कमरे भर में चाँद रंग का समंदर का पानी छिलकते जाता है।

लड़का नींद पूरी करके जागता है। उसे तीखी प्यास लगी हुयी है। जैसे रात भर समंदर में डूबता उतराता रहा हो।

Musings

Loving strangers

हम मर रहे होते हैं और किसी को पढ़ कर थोड़ा सा जीने लगते हैं। इतना ही कर सकता है कोई कवि या लेखक हमारे लिए। हम अंधेरे में बैठे होते हैं और अनजान शब्द रौशनी के जुगनुओं की तरह टिमटिमाने लगते हैं। इनसे रात छोटी नहीं होती, बस अवसाद थोड़ा कम होता है।

हम कि जो अपने पागलखाने में किसी तरह बस अपने सोचने की क्षमता को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहे होते हैं, [preserving our sanity] वैसे में किसी कवि का लिखा हुआ हमारा हाथ थाम कर हमें सोच की एक दिशा देता है। हम मन में रामचरित मानस की ही कोई चौपायी याद करते हैं, उस राम को बसाना चाहते हैं अपने मन में, ‘हृदय राखि कोसलपुर राजा’। मंत्र हमारा हाथ शायद अंतिम क्षण तक नहीं छोड़ते। मैं बेहद उदासी, तन्हाई, अंधेरे और मृत्यु के समीप भी महामृत्युंजय का एक एक शब्द छू सकती हूँ।

सुबह का झुटपुटा अँधेरा है। मौसम गर्म होता जा रहा है। धूप अब जलाने लगी है। मैंने खिड़की पर रेशमी पर्दा खींच दिया है। परदे से छन कर अँधेरा कमरे में गिर रहा है। मेरे पौधे मुझसे नाराज़ हैं कि मैं इन दिनों जाने कहाँ रहती हूँ। वैसे भी ये कमरा जल्दी ही ग़ायब हो जाने वाला है। मेरी कहानियों की तरह।

कहानी लिखने की कई वजहें होती हैं जो हमें ठीक ठीक मालूम नहीं होतीं अक्सर। हम लिख रहे होते हैं कि हमें लिखना होता है। जैसे हम प्रेम में होते हैं तो कोई वजह नहीं होती। लेकिन प्रेम के रीत जाने की कोई वजह कभी कभी मिल जाती है। जैसे लिखने की वजह होती है, कभी कभी। हम लिखते हैं क्यूँकि इस दुनिया में रोने की कोई भी जगह नहीं मिलती।

कई कई सालों से आँसुओं का एक ग्लेशियर है। सीने के बीच जमा हुआ। उस लड़की को देर तक बाँहों में थामे रहे कोई। कुछ भी ना कहे। इंतज़ार करे। उस पहले गर्म आँसू का…उस पहली हिचकी का। वो नहीं जानती कि किरदारों का रोना कैसे लिखे कि उसने कितने कितने सालों से सब कुछ एक बेहद सर्द आह में जमा रखा है।

दोस्त चिढ़ा कर हँस रहा होता है मुझपर। तुम्हें चाहिए क्या। एक औरत का अभिमान होता है कि उसपर कितने पुरुष मर मिटे… तुम भी डाइअरी मेंटेंन करती होगी। मन में ख़ुश होती होगी, कि वाह ये भी मर मिटा हम पर। कि तुम अचरज कर रही हो कि एक यही तो था कि जो दोस्त था…और इसको भी प्यार हो गया हमसे। मुझे ठीक मालूम नहीं कि लेखिका कह रही थी कि औरत, लेकिन कहा मैंने उससे। मैं सोलह की लड़की नहीं रही जो प्यार हो जाने पर भौंचक हो जाती थी। अब मिडलाइफ पहुँच रही हूँ। अब किसी चीज़ पर चकित होना बहुत मुश्किल है। और प्यार। वो तो सबको ही हो जाता है हमसे, इसमें अब हम चौंकते नहीं। वो दिन अब नहीं रहे कि जीवन में सबसे अद्भुत चीज़ हुआ करती थी प्यार। अब समझती हूँ कि फ़ैज़ ने क्यूँ लिखा, ‘और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा’। हम मेरे दिखने पर बात कर रहे थे। कि मैं कह रही थी, इन दिनों मैं बिलकुल भी अच्छी नहीं दिखती और वो फिर से हँस रहा था, कि तुम कब समझोगी, दिखने से कुछ नहीं होता। पर इस पहली बार मैं समझ रही थी। कि हाँ, इससे कभी फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम दिख कैसे रहे हैं। हमेशा बात ये होगी कि हम हैं क्या…कौन…कैसे। कि प्यार हमेशा हमारे भीतर के किसी इंसान से होता है। पर जीवन में कितने रंग का दुःख है, ये भी देखना बाक़ी था। फिर वो पूछता है हमसे, कि तुमको जाने क्या चाहिए, और वो क़सम से, इस शहर में होता तो हम जा कर पीट आते उसको। कि हमको बात चाहिए। समझ नहीं आया तुमको इतने इतने साल में। भाड़ में गयी प्यार मुहब्बत। हो गया तो हो गया, ऐसा कौन सा आसमान टूट पड़ा। लेकिन हमसे बात करना बंद करने का क्या ज़रूरत था। हमको बात करनी है उससे। वो कह क्यूँ नहीं सकता हमसे। इतना कैसा मुश्किल हो जाता है। ये क्या ज़िंदगी भर ऐसे ही दोस्त छूटते रहेंगे हमसे।

ख़ूबसूरती मन की होती है। बातों की होती है। कुछ लोगों से बात करना अच्छा लगता है। उनके साथ होना अच्छा लगता है। उनके पास होने से मौसम अच्छा लगता है, शहर सुंदर लगता है…कॉफ़ी में, खाने में, स्वाद ज़्यादा आता है। कुछ लोग ख़ूबसूरत होते हैं जो हमें अच्छे लगते हैं। हम ठीक ठीक नहीं जानते इसमें ख़ूबसूरती कहाँ है। प्यार से देखने पर सब लोग ही सुंदर लगते हैं।

ग़ुस्सा किसी का, लड़ किसी और से रही थी। कि यार उससे इतना नहीं हो सकता कि कह दे। कि देखो, सॉरी नॉट सॉरी पर प्यार हो गया है तुमसे और जितना हो गया उतना भी बहुत है, अब तुमसे बात नहीं करेंगे। या कि देखो, अब तुमसे बात करने का मन नहीं करता है, सब बात सब ख़त्म हो गया हमारे बीच में। या कि कुछ भी कारण। कह काहे नहीं सकता है कि हमसे बात नहीं करना है। कितना मुश्किल होता है ऐसा कहना। हम तो कह देते हैं। कई बार कहे हैं…कि हमारा अभी मेंटल स्टेट नहीं है कि नयी दोस्ती कर सकें या तुम्हारे जैसे कॉम्प्लिकेटेड इंसान के साथ दोस्ती कर सकें या कि तुम्हारे जैसे सिम्पल इंसान से दोस्ती करें। कहना आसान होता है। दुखता भी एक ही बार है, लेकिन आख़िरी बार होता है वो।

यूँ बिना कहे चले जाने वाले लोग। उफ़। और ये हमको ही मिलने होते हैं!

Musings

बनाएँगे काग़ज़ की गौरैय्या लेटर पैड के सुंदर काग़ज़ से और हथेलियों में भर तुम्हारे नाम का कोई जादू मंतर, भेज देंगे उनको नीले आसमान में

हम इतनी तन्हाई में जीते हैं कि ऐसी शिकायत भी नहीं कर सकते कि ‘जाना ही था तो आए ही क्यूँ थे’। हम सीखेंगे कम में ख़ुश होना। जितना मिला है उतने में जीना। हम सीखेंगे बिना अलविदा कहे चले गए लोगों के हिस्से की दिल की ज़मीन पर रोपना सुर्ख़ बोगनविला के पौधे…

भले ही प्रेम कितनी भी गहराई से करें…अलविदा को आसान करना सीखना बाक़ी रहेगा शायद बहुत बहुत सालों तक भी। हम स्टेप बाई स्टेप सीखेंगे। जैसे कि पहला स्टेप होगा कि सब कुछ इतना ज़्यादा ना दुखे, थोड़ा कम दुखे…बस थोड़ा सा कम।

हम सीखेंगे साँस लेना…कुछ ऐसे साँस लेना कि सीने के बीच कुछ ना चुभे। ख़ास तौर से कविताएँ, किसी की हँसी, कोई अबोला, किसी शहर की धूप…कुछ भी ना चुभे साँस की रफ़्तार में। आसान हो साँस लेना।

लिखे में, पढ़े में, जिए में से उनकी छेकी हुयी जगह ख़ाली करना। थोड़ा थोड़ा कर के। मिटाएँगे किताबों के हाशिए पर लिखे उनके नाम ख़त। बनाएँगे काग़ज़ की गौरैय्या लेटर पैड के सुंदर काग़ज़ से और हथेलियों में भर तुम्हारे नाम का कोई जादू मंतर, भेज देंगे उनको नीले आसमान में।

हम जितनी आसानी से करते हैं प्रेम…काश उतनी ही आसानी से बिसार भी सकते तुम्हें। तुम्हारी हँसी को। तुम्हारे शहर के मौसम को। तुम्हारी आवाज़ को। तुम्हारे गले लग कर अपने हिस्से लिखा लाए बहुत से सुख को।

हम सीखेंगे ख़ुद को माफ़ करना…इतने ज़्यादा प्रेम के लिए। कि हमारा कोई दोष नहीं है। हमारे हिस्से कुछ ज़्यादा लोग होते तो शायद हर एक के हिस्से थोड़ा कम कम प्यार आता। इतने कम लोग हैं कि सबके हिस्से दिल भर भर आने तक प्यार आता है।

जब अतीत में हम ज़्यादा लौटते हैं तो इसका मतलब हम अपने वर्तमान में नहीं होना चाहते। तो हम शुरू करेंगे एक ऐसा वर्तमान बनाना जिसके रंग ख़ुश हों। जिसका आसमान अपना हो। जिसमें रहने वाले लोगों को कुछ भी आए या नहीं आए, अलविदा कहना ज़रूर आए। लेकिन अगर इतना ना हो सके तो हमें थोड़ा सा अपने दिल को दुखना कम करना आ जाए, बस।

तुम्हें जिस रोज़ पूरी तरह भूल जाएँगे, उस दिन बहुत दुखेगा। हमको याद नहीं किसी को बहुत सालों में भी इतना और बिना कुछ चाहे, माँगे, या डरे हुए, बेमतलब ही प्यार किए थे, बेतरह। तुमसे अपनी बेगुनाही में प्यार किया था। अपने किसी किरदार की तरह। अपनी ईमानदारी में। बिना समझे या समझने की कोशिश किए हुए।

हम तो ये भी नहीं माँगते हैं कि हमको बताओ कि तुम गए क्यूँ हो…लेकिन इतना कह देना, कि जा रहे हो, और मैं तुम्हारा इंतज़ार ना करूँ। इतना चाहना तो ऐक्सेप्टबल है ना? कुछ नही कह सकते अब भी तुमसे। सिवाए एक ‘शुक्रिया’ के। मेरी ज़िंदगी में होने का शुक्रिया।

बहुत प्यार।